परिक्रमा

उसके ललाट पर तेजस्वीपन दमक रहा था। एक सुकून उसके चेहरे पर था, जैसे सूर्य की पूरी परिक्रमा कर चुकी धरती के चेहरे पर होता है।

उसके साथ अपनी इस सांझ को मैं कौन से रिश्ते का नाम दूं? धरती के सभी रिश्तों में कोई न कोई कमी आ जाती है, परन्तु उसकी इस सांझ में ऐसा कुछ भी नहीं था। घर की खेलों से लेकर स्कूल कॉलेज तक इक्ट्ठी पढ़ी थी। बढ़िया बातें तो प्रत्येक के साथ हो जाती हैं, उसके साथ तो कमीनापन और कमज़ोरियां भी साझी थी।

पूरे पौने सात साल के बाद वह आज ही विदेश से वापिस आ रही है। यह समय मैं किसी डायरी से देख कर नहीं बता रही, बल्कि मेरी यादों पर लिखा हुआ है।

एक सप्‍ताह पहले ही उसका देश आने के बारे में फ़ोन आया था तो मैंने फ़ोन पर ही उसे साल, महीने और दिन गिनवाते हुए कहा था कि तुम इतने समय बाद वापिस आ रही हो।

“सचमुच तुम्हें इतना याद है?”

“हां, तुम ही तो कहा करती थी कि मैं वह धुरी हूं, जिसके आसपास तुम चक्कर काटती हो – फिर याद कैसे न हो?”

और वह हँसी थी – फ़ोन पर ही कितनी देर हंसती रही और फिर हंसी में सिसकी जैसा भी कुछ शामिल हो गया लगता था, “सुन जोगिन, हर धरती की कोई न कोई धुरी होती है और हर धरती का कोई न कोई सूर्य भी।”

मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं थी। वह यहां रहते भी अक्सर इसी तरह कहा करती थी। जब भी उसमें बहुत–सा प्यार उमड़ता तो वह मुझे अपनी बाहों में कस लेती और कहती, “सुन जोगिन मुझे लगता है, जैसे मैं धरती हूं, तुम मेरी धुरी और रवि मेरा सूर्य। धरती ने धुरी के आस-पास भी घूमना होता है और सूर्य के इर्द-गिर्द भी।”

उसने अपने आने की सूचना देते हुए फ़ोन पर एक आग्रह भी किया था, “मैं बिलकुल अकेली वतन आ रही हूं और यह वतन, रवि और तुम्हारे कारण ही मेरा वतन है। लाख शिकवे हों, परन्तु रवि को कहना, बस मैं एक बार उसका मुंह देखना चाहती हूं – जब मैं एयर-पोर्ट से बाहर निकलूं – मुझे सिर्फ़ तुम दोनों ही दिखाई दो।” सिसकियों जैसी आवाज़ धीरे-धीरे आंसुओं के साथ मिलती लग रही थी।

मैं उसकी भावुकता से वाकिफ़ थी। मैं उसको कितनी बार कहा करती थी, “हरजी, ज़िंदगी में जज़्बाती होकर जिया नहीं जा सकता। हक़ीक़त तितलियों के पंखों जैसी नहीं होती।”

“मुझे भी मालूम है” वह उत्तर देती, “परन्तु कोई उन आंखों का क्या करे, जो दिन में भी सपने देखने की आदी हो जाती हैं।”

“मालूम है, जब सपने टूटते हैं तो क्या हाल होता है?”

“मुझे यह भी मालूम है पर सूनी आंखें भी मुझे अच्छी नहीं लगती।”

मैं सोचने लग जाती हूं कि अगले सप्‍ताह हरजी मेरे पास होगी। उसकी आंखों में से टूटे हुये सपनों की इबारत पढ़ सकूंगी। वैसे तो ये इबारत उसको अपने हाथों से विदा करते समय ही पढ़ ली थी। उसकी उदास आंखों के आंसुओं को मैंने अपनी उंगलियों के साथ साफ़ भी किया था, परन्तु अब सोचती हूं, जो हरजी रवि की ज़िंदगी में से चुप-चाप बिना आहट किए धीरे से खिसक ली थी, वह रवि की उदासी का सामना किस हौसले के साथ करेगी?

रवि का सामना तो कितना समय मैं भी नहीं कर सकी थी। बेशक उसने सभी कुछ नियति समझ कर सहन कर लिया था। हरजी के बारे में उसके मन में कोई कड़वाहट नहीं थी। उसने मुझसे केवल इतनी ही शिकायत की थी, “तू ही मुझे ख़बर कर देती .. मैं अन्तिम बार उसे मिल तो लेता।” इसलिए मैं सोचती हूं इस तरह की जीरांद वाले व्यक्‍त‍ि का सामना करना तो और भी कठिन होगा।

मैंने भी सोचा था कि दूसरे शहर आर्किटेॅक्ट करने गये रवि को लिख दूं परन्तु हरजी ने ही रोक दिया था। वह कहती थी, “मैं अपना दुख तो सह लूंगी परन्तु उसका दुख मुझ से सहन नहीं होगा।”

दरअसल दस एक दिन में ही सब कुछ घट गया था।

पिछले साल ही हरजी की अमेरिका में शादीशुदा बहन का पति तो विवाह करवाते ही जहाज़ पर चढ़ गया था और बाद में कागज़ पूरे होकर आये तो परिवार वालों ने उस की बहन को छोटी-छोटी रस्में और चाव पूरे करके जहाज़ पर चढ़ाया था।

ऐयर पोर्ट पर चढ़ाने गये सदस्य अभी घर भी नहीं पहुंचे थे कि उधर प्रतीक्षा कर रहा उसका पति जहाज़ के हादसे की ख़बर सुनकर, इन्क्वॉयरी ऑफिस की दीवारों के साथ अपना माथा पटक रहा था। बहुत सी मन्नतें करने के बावजूद भी सच झूठ नहीं बन पाया।

उसकी मरी हुई बहन की बरसी ससुराल वालों ने भी मनाई थी और मायके वालों ने भी। मायके की बरसी के अवसर पर बातें होती-होती कुछ इस तरह की हो गई कि दोनों घरों ने अपनी सांझ को बनाए रखने के लिये, हरजी को पूछना भी मुनासिब नहीं समझा और सब कुछ नये सिरे से खुद ही तय कर लिया।

जितना विरोध कर सकती थी, हरजी ने किया परन्तु आस-पास भावनाओं की बाढ़ आ गई थी। मर चुकी बहन की बातें थीं। उसके जीवित पति की प्रशंसा थी, मां-बाप के नये फ़ैसले की सराहना थी और बहन के लिये सब कुछ करने वाली हरजी के लिये रिश्तेदारों की दुआयें थी और हरजी का सारा विरोध इस बाढ़ में तिनके की भांति बह गया।

पराजित व्यक्‍त‍ि भी क्या होता है? मैं हर रोज़ हरजी के चेहरे पर पराजय का नया रंग देख रही थी। इस पराजय में भी कभी झूठी मुस्कुराहट होती, कभी बेबसी, कभी गुस्सा और कभी मौत जैसी खामोशी।

अमेरिका जा कर हरजी ने साल भर तक कोई पत्र तक भी न लिखा। दरअसल वह चलने के समय मुझ से लिपट कर रोते हुये कह गई थी, “आज के बाद तो सिर रख कर रोने के लिये मेरे पास कोई कंधा भी नहीं होगा – बस समझ लेना हरजी आज से ही मर गई है और यही बात रवि से भी कह देना।”

बहुत समय बाद उसका फ़ोन आया था। कानों को भी यकीन न आये, परन्तु दूसरी ओर से हरजी ही बोल रही थी, “जोगिन मैं अपने आप को और धोखा नहीं दे सकती – रवि से कहना मुझे फ़ोन करे – जितना भला-बुरा कहना चाहे कह ले पर फ़ोन ज़रूर करे। मैं उसकी आवाज़ सुनने को तरस गई हूं।”

बहुत ज़ोर लगा कर रवि को फ़ोन के लिये मनाया। डॉयल कर रहे रवि की अंगुलियों में लरज़िश थी। उसकी सांसें तेज़ चल रही थी। जब हरजी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, उसने आंखें मूंद ली। हरजी कह रही थी, “रवि मुझसे पूछना कुछ मत बस तुम बातें करते जाओ – जो तुम्हारा मन करे कहो, मुझे गालियां निकालो, खूब कोस लो पर भगवान के लिए मुझसे प्रश्‍न मत करना” रवि आंखों को मूंद कर सब कुछ सुनता रहा फिर उसने सिर्फ़ इतना ही पूछा, “तुम ठीक हो न?” और अब दूसरी तरफ़ शब्द नहीं थे सिर्फ़ सिसकियां ही थी। अब इस तरफ़ भी कोई शब्द नहीं थे। रवि की मुंदी हुई आंखों में से आंसू ही बह रहे थे – शांत और अवाक्य आंसू। वह लगातार आंसू बहाता हरजी की सिसकियां सुनता रहा और जब सब कुछ वश से बाहर हो गया, उसने धीरे से रिसीवर वापिस रख दिया।

आज हरजी पौने सात साल बाद अपने देश वापिस आ रही थी। उसकी फलाईट आने से काफ़ी समय पहले ही रवि और मैं हवाई अड्डे पर पहुंच गये थे।

जहाज़ के पहुंचने की सूचना मिली तो हमारी सांसों की धड़कन तेज़ हो गई। अब हरजी और हमारे बीच कांच की एक विशाल इमारत ही थी। हम उस इमारत के दरवाज़े पर खड़े हरजी की प्रतीक्षा कर रहे थे। ‘हैंड ट्रालियों’ पर अपना अटैची केस और अन्य सामान रख कर लोग एक-एक करके बाहर आ रहे थे, परन्तु हमें हरजी कहीं भी नहीं दिखाई दे रही थी। हम कई यात्रियों से उसकी फलाईट का नंबर पूछ चुके थे। फलाईट नंबर हरजी वाला ही था परन्तु हरजी पता नहीं कौन से पाताल में चली गई थी? हमारे सब्र का प्याला छलकने लगा।

रवि मुझसे कहने लगा, “तुम उसे देखकर खुश होगी – खुश तो मैं भी हूंगा परन्तु मुझे लगता है कि उसको अचानक देखकर जैसे मेरे दिल की धड़कन रुक जायेगी।”

अचानक शीशों में से हरजी दिखाई पड़ी। मैंने हाथ हिलाया उसने भी प्रत्युत्तर दिया। सिर्फ पच्चीस-तीस गज़ की दूरी हमारे बीच थी। यह पच्चीस-तीस गज़ का फ़ासला भी मुझे सदियों के सफ़र जितना लग रहा था। यदि मेरा यह हाल था तो रवि का क्या हाल होगा? मैंने रवि की तरफ़ देखा, वह तो सचमुच ही पत्थर बना खड़ा था।

दरवाज़े से बाहर निकलते ही मैंने उसकी ट्राली का हैंडल पकड़ लिया। मेरी तरफ़ बिना ध्यान दिये वह उदास खड़े हुये रवि को दौड़कर मिली। उसने अपनी दोनों बाजुओं से रवि को कस लिया। वह दुनियां से बेख़बर, रवि को अपनी बांहों में और अधिक कसती गई, और अंत में अपनी बांहों के बंधन को इतनी ज़ोर से कस लिया कि उस के हाथों में पड़ी चूड़ियां टूट-टूट कर धरती पर गिरती रहीं। बहुत से लोग उनकी तरफ़ देख रहे थे, परन्तु उन दोनों को होश तक नहीं था। आखिर मैंने ही उन्हें सचेत किया, “हरजी मुझको नहीं मिलोगी?” उसने आंखें खोली जैसे कोई नीम बेहोशी से होश में आता हो। मैंने देखा उसकी दायीं कलाई से खून बह रहा था। टूटी हुई चूड़ियों का कोई टुकड़ा उसकी बाजू में धंस गया लगता था।

रवि ने झुककर फ़र्श पर गिरे चूड़ियों के सभी टुकड़े उठा लिये।

इस तरह पहली बार नहीं हुआ था, पहले भी जब कभी वे एकांत में मिलते तो हरजी की चूड़ियां ज़रूर टूटती। रवि कहता, “यह समझ नहीं लगती तुम्हें क्या हो जाता है?” हरजी अक्सर कहती, “जब तुम मुझे मेरे जितना चाहने लग पड़ोगे, तो अपने आप ही समझ लग जायेगी।”

“पहचान सकते हो इन टुकड़ों को?” रवि जब ध्यान से टुकड़ों को देख रहा था, तो हरजी ने पूछा।

इतना समय गुज़रने के बाद भी रवि को पहचानने में भूल न हुई। उसने सोचा, समय बीता कहां था, यह तो रुक गया था।

कैसे दिन थे वे भी? तब तो छोटी-सी जुदाई भी सहन नहीं होती थी।

आर्किटेॅक्ट का कोर्स दूसरे शहर में होने से, महीने बाद जब वह पहली बार घर आया था तो हरजी उस समय भी इस तरह ही मिली थी। उस समय पता नहीं कौन-सी पवन का पहरा था उसके सिर पर? वह रवि को इस तरह कस कर मिली कि उसकी कलाइयों की सभी चूड़ियां टुकड़े-टुकड़े होकर नीचे गिर गई थी। तब भी रवि ने इस तरह ही झुक कर सभी टुकड़े उठा लिये थे। हरजी अपनी सूनी बाहों की तरफ़ देखकर कह रही थी, “अपनी होश में मैं पहली बार अपनी बांहें सूनी देख रही हूं।”

रवि ने तब भी कहा था, “मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या जाता है?” “जब तुम मुझे मेरे जितना चाहने लग पड़ोगे तो हैरान भी नहीं होगे।” तब भी हरजी का उत्तर कुछ इस तरह का ही था। इसलि‍ए रवि को लग रहा था जैसे समय बीता नहीं बल्कि रुक गया था।

“किसी को बताना पड़ा तो चूड़ियों के बारे में बताओगी क्या?” रवि को जैसे चिन्ता थी।

“आज तुम्हारे से नई पहनवाकर घर जाऊंगी।” हरजी ने शायद पहले ही इसका हल ढूंढ लिया था और वो सीधे ही बाज़ार गये थे। रवि ने अपनी मर्ज़ी के दो सैट ख़रीद कर हरजी को दिये थे, “यह एक तोड़ने के लिये, और यह सम्भाल कर रखने के लिये।”

दूसरी बार रवि के आने से पहले ही हरजी को कोई कहानियों के दानव की तरह उठाकर ले गया था, और उसके टूटने वाले सैट को भी टूटना नसीब नहीं हुआ था।

“यह टूटने वाला सैट था या सम्भाल कर रखने वाला?” रवि टुकड़ों को देखकर मुस्कराता हुआ पूछ रहा था।

“तुमने तो तोड़ने के लिये ही दिया था, परन्तु मैंने इसे भी सम्भाल कर रख लिया। रवि, तुम्हारा जो कुछ भी मेरे पास था मैं गंवाना नहीं चाहती थी, और अब जब फिर मिल गये हो तो मैं सब कुछ खो देना चाहती हूं। मुझे यकीन है कि तुम सब कुछ नये सिरे से भी तो बना सकते हो।”

वर्षों की चुप्पी के बाद उनमें छोटी-छोटी बातें शुरू हुई थी। उनकी आवाज़ पीतल की बाल्टी में पड़ने वाली दूध की धार की तरह लग रही थी।

“आओ भाई चलें सारी बातें यही ख़त्म थोड़े ही करनी हैं – वैसे भी यदि कस्टम वालों को पता चल गया तो ऐसी महंगी-महंगी बातों पर डि‍यूटी लगा देंगे।” दूर पार्क की गई कार मैं कब लेने गई – कब वापिस आई उन्हें कोई होश नहीं था। वह हैरानी के साथ मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुराये। सामान कार में रखा गया। मैं कार चला रही थी और दोनों पीछे की सीट पर बैठे रिमझिम-रिमझिम बरस रहे थे।

कभी-कभी शिकवों-शिकायतों के काले बादलों की छोटी-छोटी फुहार भी इस में शामिल हो जाती।

“उस दिन मैंने तुम्हें फ़ोन पर कहा था न कि मुझे कुछ मत पूछना। असल में मैं डरती थी रवि कि कहीं तुम नाराज़ न हो जाओ। आज मैं कहना चाहती हूं, जो तुम्हारा मन करे पूछो – तुम मेरे पास हो मैं तुम्हें मना भी सकती हूं।” हरजी बातें करती-करती रुकी और रवि का हाथ पकड़ कर आग्रह करने लगी, “पर नाराज़ मत होना – मुझसे तेरी नाराज़गी अब भी सहन नहीं होगी।”

“मैं जानता हूं तू ज़रूर बेबस होगी, नहीं तो कभी भी मुझे इस तरह छोड़कर न जाती।”

“इस बेबसी के लिये मैं अपने आप को सारी उम्र माफ़ नहीं कर सकूंगी।”

“परन्तु मैंने तुम्हारी इस बेबसी को समझ लिया था, इसलिये ही माफ़ कर दिया था तुम्हें।”

“यह सिर्फ़ तुम ही कर सकते थे रवि।”

“तुम्हारे चले जाने के बाद मैं हमेशा यह सोचता रहा कि तुमने यहां से चलने के समय महसूस कैसा किया होगा?”

“न पूछो रवि, न पूछो” परन्तु कुछ क्षण चुपचाप रह कर खुद ही कहने लगी, “बस इस तरह था जैसे किसी ने मेरे हाथ-पांव बांध कर दरिया में धक्का दे दिया हो।” मिलने की खुशी और उदासी की परछाइयां बड़े नज़दीक लगते थे।

“मुझे इस जोगिन से पता चला था कि तुम्हारे दो बच्चे भी हैं।”

“हां- और उन दोनों के नाम भी मैंने वही रखे हैं जो कभी हमने अपने बच्चों के लिये पहले से ही सोच रखे थे।” रवि को यह बात टूटी हुई चूड़ियों के टुकड़ों को सम्भालने जैसी लगी – वह मुस्कुरा पड़ा।

“तुमने अभी तक विवाह क्यों नहीं करवाया?”

“तुम्हें क्या बताऊं? – बस मुझे हमेशा इस तरह लगता रहा जैसे तुमने मेरे लिये एक न एक दिन वापिस आना हो।”

“मैंने भी बहुत बार ऐसा ही सोचा था, परन्तु वापिस आना बहुत ही मुश्किल होता है रवि।” रवि को झटका-सा लगा। कभी यह हरजी कहा करती थी कि मैं तो सात समुद्र तैर कर भी तुम्हारे पास पहुंच सकती हूं। रवि ने इस झटके को अपने अंदर ही समेट लिया और बहुत ही सहजता के साथ कहा, कठिन तो प्रतीक्षा करनी भी होती है, परन्तु मैं फिर भी तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहा – दरअसल अंतर हालातों का था। तुम्हारे पास सब कुछ था मेरे पास कुछ भी नहीं था। तुम्हारे लिये वापिस आना कठिन हो गया था और मेरे पास सिवाय प्रतीक्षा के और कोई चारा न रहा। तुम्हें कोई और मुहब्बत करने वाला मिल गया ……. मेरे पास जो था, वह भी खो गया ……..

“परन्तु मैं वहां मुहब्बत कर ही नहीं सकी रवि।” रवि ने हरजी को अविश्‍वास की दृष्‍ट‍ि से देखा।

“हां रवि-वहां पर कभी भी इस तरह चूड़ियां नहीं टूट सकी।” हरजी ने एक लम्बी आह के साथ कहा।

“प्यार ज़रूरी नहीं कि पहाड़ों में से निकले दरिया की तरह कलकल करता और बहता ही रहे, यह कभी-कभी मैदानी नदी की तरह शान्त और धीमा भी हो जाता है।” रवि मैदानी नदी के धैर्य की भान्ति ही सब कुछ कह रहा था।

“ठीक है – पर मुझे बताओ तुझे देख कर ही यह फिर कलकल करता हुआ दरिया क्यों बन गया?”

हरजी ने एक गहरी सिसकी भरी और रवि के हाथ कस लिए। रवि ने हरजी के हाथों को चूम कर एक आह भरी।

“रवि, यह सारा कुछ मुझसे सहन तो नहीं होगा, परन्तु फिर भी मैं चाहती हूं, तुम विवाह करवा लो – बस इस तरह मैं थोड़ी-सी दोष मुक्‍त‍ हो जाऊंगी।”

“मेरी तो कोई इच्छा ही नहीं – हां, यदि तुम अपने हाथों से इस तरह कर दो तो शायद मैं तैयार हो जाऊं।”

“मैं इस तरह कैसे करूं? – तुम्हें पता है न रवि कि मेरे में क़ब्ज़े की कितनी भावना होती थी। मैं तेरी हर चीज़ पर अपना हक़ समझती थी। मैं तो यह भी सहन नहीं कर सकती थी कि तुम्हारे कपड़े बीजी क्यों धोते हैं? तुम्हारे छोटे-छोटे काम तुम्हारी भाभी क्यों करती है? तुम्हारे बाहर से आने पर तुम्हारे घर में बैठे हुये भी, मैं तुम्हें पानी का गिलास क्यों नहीं पकड़ा सकती। तुम्हारे बारे में बातें करने का, तुम्हारी बहन को मुझसे अधिक हक़ क्यों है? और पता नहीं मैं इस तरह का कितना कुछ – बस मुझसे कुछ भी सहन नहीं होता था।”

“हां तुमने एक बार इस तरह की एक नज़म भी लिखी थी।”

“वह नज़म मैंने लिखी भी इसलिए थी, क्योंकि इस तरह का सच सिर्फ़ मैं नज़म में ही लिख सकती थी। तुम्हारे ऊपर पता नहीं कौन सा फ़लसफ़ा भारी होता था कि तुम प्यार को सिर्फ़ पहचान तक ही सीमित समझते थे, परन्तु मुझे लगता था, जहां पहचान हो जाये, वहां क़ब्ज़े की भावना अपने आप पैदा हो जाती है।”

“तेरी उस नज़म की एक पंक्ति थी …… ” रवि उस पंक्ति के बारे में जैसे सोचने लग पड़ा। हरजी ने धीमे-धीमे वह पंक्ति दोहराई- “महबूब के जिस्म पर मां के दूध जितना हक़ होता है।” रवि ने विस्मय में आकर अपनी आंखें मूंद ली, “परन्तु तुमने यह हक़ मुझे तो कभी नहीं दिया?”

“दिया था, तुम्हें यह हक़ पूरे का पूरा। तुम्हें आज की तरह तब भी पूरे का पूरा हक़ था। परन्तु मन ही मन मैंने यह हक़ किसी ख़ास दिन के लिये सुरक्षित कर लिया था। सोचती थी, उस दिन तुम्हें अर्पित करने के लिये मेरे पास कुछ तो ताज़ा और अनछुया चाहिये।” रवि ने आवेश में आकर हरजी को अपने आलिंगन में ले लिया और उसके रंगे हुये होंठों को चूमता-चूमता रुक गया, “तुम्हारे लिपस्टिक लगे हुये होंठ मुझे बेगाने से लगते हैं – जैसे यह तुम्हारे न हों।” हरजी ने रूमाल के साथ होंठों से लिपस्टिक साफ़ करते हुये शिकायत की, “यह तुम अपने चुम्बन के साथ भी तो साफ़ कर सकते थे।”

मैं सोच रही थी, कार में समा जाना जैसे उनके बस के बाहर था, परन्तु जिस होटल में हमने ठहरना था, वह अभी भी दूर था। मैंने कार को और भी तेज़ कर दिया। हरजी शायद मेरे उतावलेपन को भांप गई थी। कहने लगी, धीरे चला जोगिन – यह पल भी कौन से रोज़ नसीब होने हैं।

होटल के कमरों में अपना सामान रखवा कर हम फिर एक कमरे में बैठ गये। खाया तो हमने भी सुबह से कुछ भी नहीं था और हमें यह भी मालूम था कि हरजी को भी ज़रूर भूख लगी होगी। हमने वेटर को नाश्ते के लिये कहा।

छोटी-छोटी बातें फिर से आरम्भ हो गई, मैं तो सिर्फ़ एक श्रोता थी। हरजी ने चाय की चुस्की लेते हुये रवि से पूछा, “तुम्हें मेरी कौन-सी बातें सबसे अधिक याद आती रही?”

“बहुत सी, बस सभी ही।”

“फिर भी …… कुछ ……?”

“मिलन के समय तुम्हारी चूड़ियों का टूटना……. ”

“और……?”

“मेरे पसीने से भीगे माथे को अपने दुपट्टे के साथ साफ़ करना……”

“और रवि, और……?”

और रवि जैसे बताते हुये रुक गया।

“बताओ न रवि, मुझे तुमको सुनना बहुत अच्छा लग रहा है।”

“……. किसी नई जगह पर बैठे हुये तुम अपने हाथों से जब मुझे छूती थी तो मुझे लगता था जैसे तुम्हारे जिस्म से एक रौशनी चल कर मेरे अंदर समा रही हो।”

हरजी ने सुन कर अपनी आंखें मूंद ली और फिर कितना समय कोई बात नहीं हुई।

कमरे में फैली चुप्पी को तोड़ने के लिये मैंने चाय का घूंट चुस्की के साथ पिया। वह दोनों मुस्कुराए।

“अब तुम बताओ हरजी, तुम्हें भी तो कुछ याद आता ही होगा?”

“मुझे तो भूलता ही कुछ नहीं – बीते हुए को याद करते हुये ही मैंने यह सारे साल बिताए हैं – परन्तु वह इलायची वाली घटना मुझे सबसे अधिक याद आती है। तुम्हें भी याद होगा कि मुझे मुंह में इलायची रखने की बहुत आदत थी और अकसर किसी शायर की एक लाइन तुम्हें सुनाया करती थी कि तुम मेरे पास इतना समय बैठे रहो जितना समय मुंह में इलायची की खुशबू – और फिर मेरी यह तमन्ना हुई कि यह इलायची तुम कुछ समय अपने मुंह में रखकर मुझे दिया करो ताकि इसमें से तेरी खुशबू भी आती रहे। जब तुम आर्किटेॅक्ट करने के लिये गये तो, मैंने बहुत सी इलायचियों को तुमसे जूठी करवा कर अपने पास रख लिया था। और हर रोज़ एक मुंह में डालकर सोचती थी कि तुम इलायची की खुशबू की तरह कहीं मेरे पास ही हो, और रवि, उसके बाद मैं अब तक कभी भी इलायची नहीं खा सकी।”

रवि ने हरजी के इलायची की खुशबू जैसे होंठों पर अपनी दाहिने हाथ की अंगुली फेरी और हरजी ने अंगुली को इलायची की तरह अपने होंठों में दबा लिया।

वह दोनों एक-दूसरे में इतना समा गये थे कि मेरी उपस्थिति या अनुपस्थिति का कोई अर्थ नहीं रह गया था। मैं चुपके से उठकर आने लगी तो हरजी ने रोक लिया।

“तुम मेरी सूनी कलाइयों की गवाह तो बन ही चुकी हो अब भरी हुई कलाइयों की साक्षी भी बनो और उसने अपने पर्स से चूड़ियां निकाल कर मुझे पकड़ाते हुये कलाइयां मेरी तरफ़ कर दी। मुझे इनके महत्त्व का पता था, इसलिये मैंने बहुत ही सावधानी से एक-एक करके चूड़ियों को उसकी कलाइयों पर चढ़ा दिया।”

उसने मेरे माथे को चूमा। इसका अर्थ मैं अच्छी तरह समझती थी। मैंने दोनों की ओर शुभ कामनाओं जैसी मुस्कुराहट फैलाई और दूसरे कमरे में चली गई।

बिस्तर से चूड़ियों के टुकड़ों को इक्‍ट्ठा करते हुये रवि कह रहा था, “तुम्हें शायद टूटना अच्छा लगता हो, पर मुझे इस तरह संभालना।”

“रवि शायद मैं कब की टूट के बिखर चुकी होती, यदि तुम में इस तरह संभालने का सामर्थ्य न होता- मुझे मालूम है, टूटना भी आसान नहीं होता, परन्तु संभाल कर रखना और भी कठिन कार्य है। मैंने एक सज़ा की भांति सबसे अधिक कठिन कार्य तुम्हें सौंप दिया।”

रवि ने चूड़ियों के टुकड़ों को चूमा और टुकड़े-टुकड़े हुई हरजी को भी।

“रवि, तुमने आज फिर से मुझे नये सिरे से बना दिया है। तुम जिस तरह की पूर्णता मेरे अंदर देखना चाहते थे, मैं आज वह पूर्ण स्त्री तुम्हारे सामने हूं – तुम्हारी बनाई हुई और संपूर्ण स्त्री।”

वह जब मेरे सामने आई, मुस्कुरा रही थी। उसने एक बार फिर मेरे माथे को चूमा। मैं बहुत ही गौर से एक नई-नवेली हरजी को देख रही थी। उसकी कलाइयां सूनी थी, परन्तु वह पूरी की पूरी भरी हुई थी।

मुझसे उसका तेज़ सहा नहीं जा रहा था। एक विस्मय उसकी आंखों में भरा पड़ा था। उसके ललाट पर तेजस्वीपन दमक रहा था। एक सुकून उसके चेहरे पर था, जैसे सूर्य की पूरी परिक्रमा कर चुकी धरती के चेहरे पर होता है।

मैंने अब तक इस तरह की कोई भी स्त्री इस धरती पर नहीं देखी थी।

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