ये मन, क्यों बने कुंठाओं का मालगोदाम?

-दीप ज़ीरवी

श्रीमती ‘क’ जहां कहीं भी जाती हैं अपने उन की नौकरी, बंगले, कम्पनी वग़ैरह की तारीफ़ों के पुल बांधती नहीं थकती।

श्रीमती ‘ख’ हर समय अपने आप को कोसती मिलती हैं।

श्रीमती ‘ग’ को अपने स्टेटॅस को दिखाने का कोई मौक़ा मिलना चाहिए वो चूकती नहीं।

इसी तरह की एक नहीं अनेक उदाहरणें हमें हमारे आस-पास देखने को मिल जाती हैं। ऐसे अटपटे व्यवहार के मूल कारणों में से एक हैः मानव व्यवहार में उपस्थित कुंठित भावों की प्रबलता।

भावों की विशाल धारा जिस गंगोत्री से निकलती है उस गंगोत्री का नाम हैः मन।

मन, जिसे हमारे मुनि-मनीषियों ने पारे-सा चंचल बताया है।

मन के कारखाने में सूक्ष्म, स्थूल अनेक भांति के भावों की सृजन क्रिया स्ततः चलती रहती है। संपूर्ण विश्‍व को संचालित करने में ये भावनाएं अपना-अपना काम करती हैं। इनके यथा योग्य इस्तेमाल से परिवार, क़बीले, समाज और विश्‍व की रचना होती है, संचालन होता है। इन भावों का आदर्श समायोजन करने वाला व्‍यक्‍त‍ित्व ही आदर्श कहला सकता है।

जब तक भाव संयत रहते हैं, नियमित रहते हैं तब तक भाव भावना के पर्यायवाची रहते हैं। इनके असंयत होने पर, अनियमित होने पर इन्हें भावनाओं के पर्यायवाची न मान कर, कुंठाओं के पर्यायवाची माना जाने लगता है।

 प्रशंसा सुनना किसे अच्छा नहीं लगता। क्या औरत, क्या मर्द सभी को प्रशंसा से अपूर्व आनन्द अनुभव होता है। हर शख़्स चाहता है कि उसकी तारीफ़ की जाए। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, हर उम्र के शख़्स को प्रशंसा भाती है, तारीफ़ अच्छी लगती है। किन्तु प्रशंसा करना, तारीफ़ करना भी बेशक एक कला है। (लेख गौरव के भय से उस कला की चर्चा यहां नहीं करूंगा।) तारीफ़ सुनते-सुनते कुछ लोग तारीफ़ सुनने की कुंठा पाल बैठते हैं। उनके जानकार लोग-बाग उन महाशय की चापलूसी कर के उन्हें तारीफ़ सुनने का सुख देते हैं और अपना-अपना उल्लू भी सीधा करते हैं ऐसे ‘महापुरुष’ सुपीरिऑरिटि कॉमप्लैॅक्स के शिकार हुआ करते हैं। जहां मौक़ा मिले ये अपनी बड़ाई अपने मुंह से करने से भी नहीं चूकते। मैंने यह किया है – – मेरे पास सब से अच्छी लोकैलिटी में कोठी है – – मेरे बच्चे सबसे अच्छे हैं। – – मेरी हर चीज़ विलायती है। – – मेरे मायके वाले – – मेरे भाई – – मेरे पापा – – मैंने हमेशा अव्वल रहना पसन्द किया। – – वग़ैरह-वग़ैरह। – – और यहां तक कि अगर किसी को इन के गलीचे में लगा कीड़ा दिखाई पड़ जाए और वो ‘इन’ का ध्यान उस की तरफ़ दिलवाए तो भी ये बड़े अकड़ू अंदाज़ में कहेंगे, ‘ये कीड़ा इधर का थोड़े न है यह तो बाहर से मंगवाया हैः गलीचा खाने के लिए।’ बड़ी-बड़ी डींग हांकने वाले यह महाशय अपनी ढोल का पोल अकसर खुद ही खोल बैठते हैं।

इनके विपरीत, कुछ-कुछ शख़्स ऐसे होते हैं जिन्हें अपने-आप में कुछ भी अच्छा नहीं दिखता। रात-दिन अपने आप को, अपनी क़िस्मत को कोसना इनका दैनिक काम होता है। हर पल अपने-आप में कमियां ही कमियां ढूंढते रहना इनका जैसे मुख्य काम हो।

-यह भी कोई जीना है।

-मुझे तो कभी सुख नहीं मिला।

-मुझसे तो सभी अच्छे हैं।

-मेरे बच्चों से अच्छे तो पड़ोसी के बच्चे हैं।

-शर्मा जी के टिंकू ने 75 प्रतिशत अंक ले लिए हैं और एक हमारा नालायक है जो सिर्फ़ 74.5 प्रतिशत अंक लेकर ही घर आ गया है।

 अहसास-ए-कमतरी के मारे इन हज़रात में मर्द भी होते हैं, औरतें भी। ये गिलास के ख़ाली हिस्से को ही देखते हैं। आधा भरा गिलास देखने की ये लोग बिलकुल भी कोशिश नहीं करते।

अकसर ‘ये लोग’ दूसरों की सहानुभूति बटोरने में ही (जाने/अनजाने) व्यस्त दिखते हैं।

-मेरी तो क़िस्मत ही फूट गई। मेरे घरवाले से तो कुछ भी नहीं होता। कला के मियां जी ने दिनों में कोठी खड़ी कर ली।

-मेरे पास तो कोई ढंग की साड़ी भी नहीं मिसिज़ …. के पास तो एक से एक महंगी-महंगी साड़ियां हैं।

ऐसे लोगों को कौन समझाए कि दूसरे की दौलत और अपनी अकल हर किसी को ज़्यादा ही लगा करती है।

इन दोनों क़िस्मों के अलावा एक क़िस्म के लोग और भी समाज में काफ़ी गिनती में मिलते हैं। ये हज़रात, स्टेटॅस कॉमप्लैॅक्स के शिकार होते हैं।

अपने आर्थिक साधनों की तरफ़ से बेख़बर होकर अपने ‘नाक’ की चिन्ता में घुलने वाले ये लोग, ‘उधार लेकर घी पीएं’ वाले चार्वाक मंत्र को मानते हैं।

 बच्चे की पैदाइश के साथ ही इनका नाक सकते में आ जाता है। बेटा/बेटी तो क़ुदरत के हाथ में होता है; ये लोग बच्चा पैदा होते ही अपने-अपने नाक की दुहाई देना शुरू कर देते हैं-

-ऐ री! ‘नाक’ कटा दी तन्नै, छोरी जणा दी;

हमारे ताऊ के छोरे की बहू ने तो छोरा जणा था …..

बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके स्कूल के चुनाव की समस्या में भी यही ‘नाक’ आकर अटक जाता है।

-हम तो अपने बच्चे नैं उड़े पढ़ावैंगे, जहां पै उसके ताऊ के छोरे पढ़ैं हैं नहीं तो भई म्हारी नाक कट जाएगी।

 पढ़ाई में, कपड़े लत्ते में, घर, मकान, कोठी, बंगले में; हर जगह ‘नाक’ महोदय आकर अटक जाते हैं। झूठी शान को बरक़रार रखने के लिए उधार लेने में भी नहीं चूकते ये हज़रात। फिर उधार चुकाने में चाहे उम्र बीत जाए। कितनी प्रकार की बीमारियों की जड़ को यह लोग आमंत्रित करते हैं जिसका नाम है – अवसाद। झूठी आन-बान-शान को ढोते-ढोते इनकी कमर खोखली हो जाती है लेकिन बल नहीं जाते।

 ऐसी एक नहीं, अनेक कुंठाएं हमारे मन के गोदाम को अपना डेरा बनाए रहती हैं और हमारे व्‍यक्‍त‍ित्व को आदर्श व्‍यक्‍त‍ित्व बनने से रोकती हैं। इनके रहते हम महापुरुष तो क्या पुरुष भी नहीं बनते। जीवन रस के नित्य नए रूप का पान करने में यह कुंठाएं बाधक बनती हैं।

 मन क्यों बने कुंठाओं का माल गोदाम? यह मन, जो हमारे जीवन-चक्र को ओज देता है, तेज़ देता है इन कुंठाओं के राहू केतुओं द्वारा क्यों ग्रसा जाए।

क्यों हम अपने खोल में सिमटे सुकुचाए कुंठाओं को ढोते रहें? अपने मन को ओस धुला गुलाब बनाने के लिए क्यों कोशिश नहीं करते? क्यों भूल जाते हैं कि उस मालिक, रब्ब, गॉड, अल्ला, भगवान् ने हमें निरोग देह के साथ दिमाग़ भी दिया है। इस बेमिसाल तोहफ़े के लिए हमने कभी उस ऊपर वाले को शुक्रिया नहीं कहा। क्यों??? हम क्यों इस तोहफ़े का भरपूर इस्तेमाल नहीं करते? वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि औसतन एक शख़्स 5 प्रतिशत दिमाग़ का ही इस्तेमाल करता है बाकी 95 प्रतिशत दिमाग़ अनछुआ-सा ही रह जाता है। हमें चाहिएः-

-निठल्ली बातों में समय बर्बाद करने के स्थान पर हम अपना समय क्रियेटीविटी में लगाएं।

-निष्पक्ष विवेचना को विकसित करने का प्रयास करें।

-दिमाग़ की मानें दिल की सुनें ‘अकल बड़ी होती है भैंस नहीं’ यह बात मान लें।

-भगवान् कृष्ण के कर्म सिद्धांत को अपने जीवन में उचित स्थान दें, क्योंकि काम करने से कोई नहीं मरता। जब मन के पास कुंठाएं पालने का समय नहीं बचेगा तो मन में कुंठाएं आएंगी कहां से?

दूसरों के गुणों की प्रशंसा एक सेहतमंद मानसिकता वाले शख़्स के लिए ही संभव है। यदि कोई सूर्य कहीं उदय होगा, कोई गुलाब कहीं खिलेगा तो उसे अपना प्रचार करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

हर नया दिन आशाओं का नया सूर्य लेकर निकलता है हर दिन के नए सूर्य के संदेश सुनने की कोशिश की जाए कि हर दिन का नया सूर्य बीते ‘कल’ को जला कर निकलता है। अपने मन के कपाट खोल कर हर दिन के नए सूर्य को शुभ आगमन कहने की आदत डालें, इस से भी मन का आंगन स्वच्छ होगा। अपने साधनों को, अपने आप को नित्य मूल्यांकन की कसौटी पर कसने की आदत डालें। हमारा मन, ओस धुले गुलाब जैसा निर्मल सुवासित हो जाएगा।         

One comment

  1. true and nice thought and good advice for all, specially for ladies

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