अमिताभ का सफ़र जया की नज़र

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हरजिंदर सिंह

‘कभी निराश नहीं हुए अमिताभ अपनी असफलताओं से’

अमिताभ बच्चन के 60वें जन्मदिन पर उनकी पत्‍नी जया बच्चन ने अमिताभ के कैरियर से जुड़ी बातों पर आधारित पुस्तक ‘टु बी ऑर नॉट टु बी’ उन्हें भेंट की। अपने प्रिय पाठकों के लिए प्रस्तुत है, इस पुस्तक का सार।

यह अपने आप में उत्सुकता का विषय हो सकता है कि अनजाने में हम दोनों की ज़िन्दगियां समानांतर पटरियों पर दौड़ रही थीं। सन् 1970 में अमिताभ बच्चन एक नवोदित अभिनेता के रूप में अपनी शुरूआत कर रहे थे, उन्हीं दिनों पूना इंस्टीट्यूट में मेरा एक्टिंग का कोर्स पूरा होने जा रहा था, इससे पहले मैं 13 साल की उम्र में सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘महानगर’ में अभिनय कर चुकी थी, स्कूल की पढ़ाई ख़त्म करने के बाद मैंने पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट ज्वाइन किया था।

पहली हिन्दी फ़िल्म ‘गुड्डी’ का मिलना

उधर बी.एस.सी. की डिग्री हासिल करने के बाद अमित ने कुछ समय के लिए कोलकाता में नौकरी की और फिर के.ऐ. अब्बास की फ़िल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ में उन्हें एक रोल मिल गया। इंस्टीट्यूट के प्रिंसीपल जगत मुरारी ने ऋषिकेश मुखर्जी से मेरी सिफ़ारिश की, उन्होंने मेरी डिप्लोमा फ़िल्म ‘समन’ के रशेज़ देखे और मुझ से पूछा, ‘क्या तुम मेरी फ़िल्म ‘गुड्डी’ का टाइटल रोल करना चाहोगी?’ क्यों नहीं? मैंने तुरन्त कहा, मैंने उस प्रोजेक्ट के बारे में पहले ही सुन रखा था, शायद ‘गुड्डी’ का रोल मौसमी चटर्जी निभाने वाली थी, ‘गुड्डी’ के प्रपोज़ल से पहले मेरे हाथ से मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ निकल चुकी थी क्योंकि अभी तक मैंने अपना डिप्लोमा हासिल नहीं किया था, जे. ओम प्रकाश भी मेरा स्क्रीन टेस्ट ले चुके थे और फ़िल्म ‘तेरे मेरे सपने’ के लिए मैं विजय आनंद से भी मिल चुकी थी, लेकिन विजय आनंद ने महसूस किया कि फ़िल्म में पत्‍नी का रोल निभाने के लिहाज़ से मैं काफ़ी युवा थी।

अमिताभ हुए ‘गुड्डी’ से ‘इन’ और ‘आऊट’

बहरहाल, गुड्डी में मेरे अपोज़िट नवीन निश्‍चल को लिया जाने वाला था, तभी महमूद भाई ने निर्माता एन.सी. सिप्पी के ज़रिए ऋषि दा से अमिताभ की सिफ़ारिश की, जब मैंने सुना कि ‘गुड्डी’ में अमिताभ को लिया जा रहा है तो मन ही मन मुझे बेहद खुशी हुई, क्योंकि मुझे लगा कि ‘गुड्डी’ जैसी हीरो-हीरोइन के रोमांस बग़ैर वाली फ़िल्म में अमिताभ बच्चन जैसे अलग हटकर दिखने वाले अभिनेता की ही ज़रूरत है।

अमिताभ को ‘गुड्डी’ से आऊट किए जाने को लेकर आज तक कई कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन जहां तक मैं समझती हूँ कि फ़िल्म ‘आनंद’ के बाद अमिताभ का चेहरा जाना-पहचाना हो चुका था जबकि ‘गुड्डी’ की कहानी के अनुसार एक नए चेहरे की ज़रूरत थी। ख़ैर ‘गुड्डी’ की पूरी यूनिट अमिताभ को आऊट किए जाने के फ़ैसले से काफ़ी दुःखी हुई, हम लोग अकसर अमिताभ के साथ शूट की गई रीलें देखा करते, अमिताभ मज़ाक-मज़ाक में यह कहते कि मैंने ही उन्हें ‘गुड्डी’ से आउट करवाया है, लेकिन मुझे उनका यह मज़ाक बिल्कुल नहीं सुहाता था, लेकिन उस समय मैं अभिभूत हो गई, जब पूना इंस्टीट्यूट में मेरे डिप्लोमा दिवस पर आयोजित दीक्षांत समारोह में वे मुंबई से पूना आए।

अमिताभ द्वारा उपहार में साड़ियां दिया जाना

अमिताभ अकसर मुझे उपहार स्वरूप कांजीवरम की भारी और महंगी साड़ियां दिया करते थे, उनमें से ज़्यादातर साड़ियां पीले रंग के बॉर्डर वाली और सफ़ेद रंग की होतीं, जो मुझ पर ज़रा भी नहीं फबतीं, लेकिन चूंकि मैं उनका दिल नहीं तोड़ना चाहती थी इसलिए मैं वो साड़ियां पहन लेती थी, उनमें से कुछ साड़ियां मैंने फ़िल्म ‘अभिमान’ में भी पहनीं, जिनमें ‘तेरी बिंदिया रे…’ गीत में पहनी गई साड़ी भी शामिल है।

अमिताभ के प्रति चाहत की भावना

अमिताभ के साथ रहना मुझे बहुत अच्छा लगता था, मैं उनके साथ हमेशा के लिए रहना चाहती थी। मेरी नज़र में वे कभी कोई ग़लत काम कर ही नहीं सकते थे। जैसा कि लोग समझते हैं, अमिताभ ने अपने कैरियर के शुरूआती दिनों में मुझ से कभी भी किसी प्रकार की मदद नहीं ली, वे अपने बूते पर अपने लिए कुछ करना चाहते थे। फ़िल्म ‘बंसी और बिरजू’ और ‘एक नज़र’ करते समय मुझे महसूस हुआ कि इन दोनों ही फ़िल्मों के साथ कुछ-न-कुछ गड़बड़ ज़रूर है, दोनों की कहानी भी एक जैसी थी। ‘एक नज़र’ की एक डांस सीक्वेंस में मैंने जब खुद को देखा तो मुझे महसूस हुआ कि मैं उसमें बेहद अटपटी दिखी हूँ, लेकिन अमिताभ ने वो देखकर भी मेरा मज़ाक नहीं उड़ाया। बाद में एक दिन वहीदा रहमान जी ने मुझ से कहा, “क्या डांस करना ज़रूरी था?” बहरहाल, अमिताभ की लगातार फ़्लॉप फ़िल्मों के बावजूद मुझे हमेशा यक़ीन रहा कि आगे चलकर वे एक बहुत बड़े अभिनेता बनेंगे। वे भी अपनी असफलताओं से कभी निराश नहीं हुए, हां कभी-कभी तीखे स्वर में यह ज़रूर कहते, “कोई मुझे नहीं चाहता क्योंकि मैं एक फ़्लॉप एक्टर हूँ।” आज अभिषेक भी ऐसा ही कहता है, लेकिन मैं उसे भी यही कहती हूँ कि यह दौर खुद-ब-खुद एक दिन गुज़र जाएगा।

अमिताभ की ख़ातिर फ़िल्म ‘ज़ंजीर’ की

फ़िल्म ‘ज़ंजीर’ में अमिताभ की हीरोइन बनने के लिए कोई भी बड़ी अभिनेत्री तैयार नहीं हो रही थी, ऐसे में सलीम जावेद ने मुझ से वो फ़िल्म करने के लिए कहा, चूंकि उसमें हीरोइन के करने लायक़ कुछ भी नहीं था इसलिए मैं वो रोल करने से हिचकिचा रही थी, तब अमित ने मुझसे कहा “मुझे लगता है कि तुम मेरे साथ काम करने से मना कर रही हो।” मैंने उनकी इस बात को स्वीकार किया, अगर अमिताभ की जगह कोई और एक्टर होता तो मैं कभी भी ‘ज़ंजीर’ में काम न करती। सच बात तो यह है ‘ज़ंजीर’ के बहाने मैं उस व्यक्‍त‍ि के साथ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त गुज़ारना चाहती थी, जिससे मैं बेहद प्यार करती थी।

हमारी शादी

अमिताभ के माता-पिता मुझे बहुत पसंद करते थे, वे चाहते थे कि उनका बेटा शादी करके अपनी ज़िन्दगी में सेटल हो जाए, जब मैं मद्रास में फ़िल्म ‘नया दिन नई रात’ की शूटिंग कर रही थी तो एक दिन अमिताभ ने फ़ोन पर मुझसे कहा कि उन्होंने मुझसे शादी के लिए अपने माता-पिता से बात की है, उनके पिता यह सुनकर बेहद खुश थे। अमिताभ की खुशी देखकर उनकी माँ की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। दूसरी ओर मेरे पिता ने कहा कि हमें थोड़ा इंतज़ार करना चाहिए ताकि मैं अपना कैरियर थोड़ा और आगे बढ़ा सकूँ। शादी के लिए अमित के माता-पिता की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया, उनके माता-पिता चाहते थे कि जिस लड़की का अमिताभ चयन करते हैं, उसके साथ उनकी शादी कर दी जाए। अमित को शादी के बाद भी मेरे कैरियर जारी रखने पर कोई एतराज़ नहीं था, अंततः 4 मई, 1973 को ‘ज़ंजीर’ रिलीज़ हुई और 4 जून, 1973 को हमने शादी कर ली।

अमिताभ के स्वभाव में परिवर्तन

अभिषेक के जन्म के बाद अमिताभ और मुझे आपस में वक़्त बिताने का मौक़ा बहुत कम मिलता था, उन दिनों अमित की एक के बाद एक फ़िल्में हिट हो रही थीं, लेकिन घर में वे एकदम सामान्य नज़र आते, ज़बरदस्त प्रसिद्धि का उन पर बिल्कुल प्रभाव नहीं पड़ा था, अलबत्ता उनका आत्म-विश्‍वास दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था, उधर फ़िल्मों से मैं लगातार दूर होती चली गई। अमिताभ भी कभी अपना काम घर पर नहीं लाते थे, मुझे यह भी नहीं पता होता था कि वे कितनी फ़िल्में कर रहे हैं और किसके साथ कर रहे हैं?

सन् 1976 में हम लोग ‘प्रतीक्षा’ में शिफ़्ट हो गए। यह घर अमिताभ ने खुद बनाया था, लेकिन वे उसमें बहुत कम रहते थे, यह उनके कैरियर का व्यस्ततम दौर था लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा व्यस्तता ने उनके स्वभाव में तबदीली ला दी, वे ज़रूरत से ज़्यादा गंभीर और चिंतित रहने लगे।

अमित का मूड कब कैसा हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। मैंने उनके अलग-अलग मूड के प्रति रिएक्ट न करने की कोशिश की है, लेकिन मैं इसमें क़ामयाब नहीं हो पाई, जब कभी वे शांतचित्त होते हैं, हम संगीत सुनते हैं या फ़िल्म अथवा टी.वी. देखते हैं, हमारी शादी के 29 सालों में मैंने उन्हें सबसे ज़्यादा खुश तब देखा है जब वे बच्चों के साथ छुट्टी मना रहे होते हैं वे एक संरक्षक की भूमिका निभा कर बेहद प्रसन्नता अनुभव करते हैं।

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