क्यों कांपती हैं गृहस्थ की दीवारें

-गोपाल शर्मा फ़िरोजपुरी

घर समाज की प्रथम इकाई है। घरों से मुहल्ला, मुहल्लों से गांव और गांवों से शहरों और नगरों का निर्माण होता है। घर एक ऐसा सुन्दर स्थान होता है जहां मनुष्य स्वयं को सुखद और आनंदित अनुभव करता है। मनुष्य ही नहीं अपितु जीव-जंतु, पशु-पक्षी भी अपने-अपने घरों और घौंसलों में स्वयं को सुरक्षित मानते हैं। एक घर में पति-पत्‍नी, बच्चे, दादा-दादी, चाचा-चाचियां आदि मिलकर रहते हैं। जिन घरों में सुख, शान्ति, प्रेम, सहयोग अनुशासन और एक दूसरे के प्रति आदर की भावना पाई जाती है वे घर स्वर्ग के तुल्य माने जाते हैं। किसी ने कितने सुन्दर शब्दों में कहा है कि ‘जो सुख छज्जू दे चौबारे न बलख न बुखारे।’ अर्थात् घर में जो आराम जो सकून मिलता है वह कहीं अन्यत्र प्राप्‍त नहीं होता। इसके विपरीत जिस घर में कलह, कलेश, ईर्ष्या, वैर-विरोध, आलस, छल-कपट पाया जाता है वह घर नर्क तुल्य बन जाता है। कई तरह की उक्‍ति‍यां इस तथ्य को उजागर करती हैं- ‘कलह कलन्दर वस्सै ते घड़ियों पानी नस्से’। अर्थात् जिस घर में लड़ाई-झगड़ा रहता है वहां से बरकत भाग जाती है, आर्थिक अभाव बना रहता है, कई प्रकार की आपदाएं आकर गृहस्थ जीवन की दीवारें हिला देती हैं। सभ्यता के विकास के साथ मानव ने भी बहुत विकास किया है, प्रगति की है। आज विश्‍व के हर व्यक्‍त‍ि द्वारा वह हर सुविधा प्राप्‍त की जा सकती है जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। ट्रांसपोर्टेशन, दूर संचार, यातायात, मशीनीकरण और कम्प्यूटरीकरण तथा टेलीफ़ोन जैसी सुविधाओं से धरती पर स्वर्ग लाकर खड़ा कर दिया है।

इतना सब कुछ होने के बावजूद विज्ञान और मैडीकल साईंस की प्राप्‍ति‍ होने पर, शिक्षा के क्षेत्र में महानतम उपलब्धियां प्राप्‍त कर लेने पर भी घरों में टूटन-बिखरन जारी है। पति-पत्‍नी, मां-बाप और बच्चों के संबंधों में कड़वाहट है। आक्रोश, घुटन, पीड़ा, संताप, विद्रोह और असंतोष जारी है। हत्याएं, आत्महत्याएं, मारा-मारी, छल-कपट और धोखा पल-पल देखा जा सकता है। नर तड़प रहा है, नारी तड़प रही है, बच्चा विलाप कर रहा है। आख़िर क्यों है ऐसा? क्यों आती है पति-पत्‍नी के बीच संबंधों की कड़वाहट? क्यों कांपती है गृहस्थ जीवन की दीवारें? आओ करें विश्‍लेषण उन परिस्थितियों का, उन कारणों का जिसकी वजह से जीवन की गाड़ी पटरी से उतर सकती है।

पुरानी धारणा के मुताबिक़ विवाह संयोगों का खेल है। विवाह वहां होता है जहां भाग्य में लिखा हो, तो फिर जहां लड़का-लड़की एक दूसरे को चाहते हैं वहां संयोग क्यों नहीं माना जाता। लड़के और कन्या के रिश्ते में ज़बरदस्ती विधाता को बीच में खींच कर लाने से, ज़बरदस्ती रिश्ता करवाने से कभी आपस में प्यार नहीं रह सकता। क्योंकि गले पड़ा ढोल बजाना पड़ता है – घर में सुख शान्ति का आनन्द नहीं लिया जा सकता। लड़के और लड़की की आयु का अन्तर, रंग गोरा-काला कई प्रकार की भ्रांतियां उत्पन्न करता है, स्वाभिमान और आत्म-मंथन को बढ़ावा देता है। कहीं हीन भावना पनपती है तो कहीं उच्च भावना जन्म लेती है जिससे पति-पत्‍नी में सामंजस्य नहीं बन पाता। घर में कलह का वातावरण उपजता है।

यह भी देखा गया है किसी ग़रीब लड़की का विवाह किसी व्यापारी या अशिक्षित दुकानदार से कर दिया जाता है, वह अशिक्षित व्यक्‍त‍ि पढ़ी लिखी लड़की की फ़िलॉसफ़ी नहीं समझ सकता और न ही लड़की उस गूढ़ व्यक्‍त‍ि की लाभ-हानि, मुनाफ़ाख़ोरी की छल-कपट की नीति को पसंद करती है। मनोवैज्ञानिक वैचारिक असन्तुलन पति-पत्‍नी में तनाव का कारण बनता है। कई बार अनपढ़ व्यक्‍त‍ि सभा सोसाइटी में पत्‍नी के लिए सिरदर्द का कारण बन जाता है।

गृहस्थ जीवन को तबाह करने के कारणों में एक कारण वैवाहिक जीवन से पहले का प्रेम संबंध भी हो सकता है। आवश्यकता तो इस बात की है कि पुराने संबंधों को भुलाकर नए जीवन के साथ समझौता किया जाए। परन्तु कई बार देखा गया है कि वैवाहिक होने पर भी यह लुका-छिपी का खेल चलता रहता है इस विकृत प्रेम का जब भांडा फूटता है तो उसका परिणाम भी भयंकर निकलता है। समाचार पत्रों में प्रेमी से मिलकर पति की हत्या या प्रेमिका के कारण पत्‍नी की हत्या की ख़बरें आम पढ़ने को मिलती हैं।

आर्थिक समस्या भी घर-गृहस्थी को चैन की सांस नहीं लेने देती। कई बार पति इतना निकम्मा पल्ले पड़ जाता है कि चार पैसे अर्जित नहीं कर सकता। ऐसे में चौका-चूल्हा कैसे चले, बच्चों की पढ़ाई, बीमारी पर ख़र्च कहां से किया जाए। रोज़ रोज़ की आर्थिक तंगी गृहस्थ जीवन के विकास में अड़चन बन जाती है। घर में मातम का सा माहौल छाया रहता है।

नशाख़ोरी की प्रवृत्ति आम पतियों में पाई जाती है। घर की ज़रूरी वस्तुओं को अवहेलित करके जब पति शराब, सिगरेट, तम्बाकू और गुटके में धन को बर्बाद करता है तो परिवार की भलाई कहां सम्भव है। इतना ही नहीं जब किसी औरत का शौहर नशे में गाली गलौज करता है गली मुहल्ले में तमाशा बनता है। गन्दी नालियों में गिरता फिसलता है तो परिवार के लिए शर्मिन्दगी का कारण बनता है। समझाने पर जब हाथापाई और मार कुटाई करता है तो परिवार का संतुलन बिगड़ता है।

पारिवारिक विघटन के मुख्य कारणों में सेक्स की भूख अहम भूमिका निभाती है। इसी भूख के कारण पुरुष कॉल-गर्लज़ और वेश्याओं के कोठे की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं।

कई बार यह भी देखा गया है कि अवहेलित मनोवृत्तियों के कारण भी पति-पत्‍नी आपस में खिंचे-खिंचे रहते हैं। उदाहरणतया विवाह से पूर्व यदि कोई लड़की नाटकों, संगीत या शायरी की महफिलों में भाग लेती है और ससुराल में आकर जब यह सब एकदम वर्जित हो जाता है तो उस के अंदर परिवार के प्रति घृणा, आक्रोश, नफ़रत तथा विरोध की ज्वाला भड़कती है। अन्दर ही अन्दर जो लावा पनपता है वह कभी न कभी बाहर अवश्य विस्फोटित होता है।

कई बार मर्द के मृत शुक्राणुओं की वजह से औलाद नहीं हो पाती। पर महिला को ही बांझ आदि शब्दों से अपमानित किया जाता है जब कि कई बार दोष मर्द में ही होता है। नई शादी रचाने की धमकियां दी जाती हैं। ऐसे में भला परिवार की शान्ति कैसे स्थापित रह सकती है।

यदि एक दूसरे की भावनाओं, शौक़ आदि पर तवज्जों न दें तो भी समस्या बनती है। बदलते हुए फ़ैशनों के साथ आभूषणों, वस्त्रों और मेले-त्योहारों पर यदि स्त्री का ध्यान न रखा जाए तो भी स्त्री के मन में रोष अवश्य रहता है। आदमी अकेला विश्‍व की यात्रा करता फिरे और स्त्री घर की चारदीवारी में सड़ती रहे यह आधुनिक नारी को क़तई पसंद नहीं है। यदि पति, पत्‍नी के जन्म दिन पर उसे मुबारक तक भी न दे तो उसके दिल पर क्या गुज़रती है। यहां मैं एक बहुत बड़े मसले की ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूं। वह मसला है शादी में धोखाधड़ी का। देखने में आया है कि एन.आर.आई कई-कई शादियां धोखे से रचा लेते हैं। यह समस्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।

परिवार के लिए पीड़ादायक कारण एक यह भी हो सकता है कि कामकाजी महिला-पुरुष अपने-अपने महिला बॉस या पुरुष बॉस की प्रशंसा के पुल बांध कर व्याख्यान न दें। वृथा का संशय खड़ा करने से लाभ की बजाए हानि के चांस ही ज़्यादा होते हैं।

बसते-रसते परिवार को नर्क बनाने में घरवालों की भी अहम भूमिका होती है। बिना वजह लड़के पक्ष पर कीचड़ उछालना या वर पक्ष की तरफ़ से कन्या पक्ष वालों को भला-बुरा कहना दोनों के लिए अहितकर है। ग़रीब भाई-बहन की यदि कोई स्त्री सहायता करती है तो उसकी मदद करनी चाहिए न कि उसे अपमानित किया जाए।

पति-पत्‍नी के बीच मीलों की दूरी कई प्रकार से अहितकर है। देवताओं, राजे-रानियों का ईमान डोलता है तो साधारण स्त्री-पुरुष कभी भी भूल कर सकता है, कई बार पानी सिर से इतना ऊपर चला जाता है कि बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं बचता।

इसके अतिरिक्‍त‍ जायदाद, पैतृक संपत्ति के झगड़े घरों को तोड़ने-मरोड़ने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।

आधुनिक परिवारों में मन-मुटाव, खींचा-तानी और कलह कलेश का एक सशक्‍त‍ कारण यह भी है कि संयुक्‍त‍ परिवारों का अभाव है। घर में बड़े बुज़ुर्गों का दबदबा होता था। लाज, शर्म, हया और अनुशासन होता था। अब क्या है? ‘सास न ननान बहुरी आपे प्रधान।’ इस प्रकार खुले-खुले मन मर्ज़ी के माहौल में सभी राजे हैं नौकर कोई भी नहीं। सबका स्वार्थ अपना स्वाभिमान अपना-अपना।

सबसे विशेष कारण जो किसी परिवार की सुख-सुविधा, आराम, चैन और शान्ति को भंग करता है वह किसी तीसरे व्यक्‍त‍ि या स्त्री का परिवार में हस्तक्षेप। बहकावे में पत्थर फट जाया करते हैं। यह तीसरा व्‍यक्‍त‍ि कोई रिश्तेदार, कोई पड़ोसी, कोई प्रेमी, प्रेमिका या दुश्मन का दूत हो सकता है। कान के कच्चे लोग अपना ही घर बर्बाद कर लेते हैं। ऐसे मक्कार लोगों से दूर रहना ही बेहतर है।

परिवार विघटन के अन्य कारण भी हो सकते हैं परन्तु यदि उन पर ध्यान दिया जाए और समझदारी से काम लिया जाए तो सुरक्षित रहा जा सकता है। 

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