टैलीवुड भी चल निकला बॉलीवुड की राह

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बॉलीवुड सदैव ही दर्शकों के दिलों में समाया रहा है। फ़िल्मी सितारों का उन पर सर्वाधिक प्रभाव रहा है। पृथ्वी राज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक का फ़िल्मी सफ़र अपने आप में एक इतिहास को समेटे हुए है। पृथ्वी राज कपूर द्वारा अभिनीत मुग़ल-ए-आज़म आज भी सभी की पसंदीदा फ़िल्म है। पृथ्वी राज कपूर ने मुग़ल-ए-आज़म अकबर के रूप में दर्शकों के दिलों पर एक अमिट छाप छोड़ी जो आज भी दर्शकों के दिलो दिमाग़ पर अंकित है। मधुबाला ने अनारकली को अपने अभिनय से अमर कर दिखाया तो दिलीप कुमार भी सलीम के रूप में लाजवाब थे। मुग़ले आज़म के गीत आज भी सदाबहार गीतों में शीर्ष स्थान पर क़ायम हैं।

‘मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए, बड़ी चोट खाई, जवानी पे रोए,’ ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और ‘ऐ मुहब्बत ज़िन्दाबाद।’ एक दूसरे के प्रेम में समाए प्रेमियों की मुहब्बत, उनकी जुर्रत व जुदाई के तमाम भावों को भली-भान्ति व्यक्‍त करते थे ये प्रेम और विरह के गीत। गीत और संगीत जहां भारतीय फ़िल्मों की रूह से उठता था और दर्शकों के कानों में बजता हुआ दिलों में बसता था। जन मानस के जीवन की रोज़मर्रा की घटनाओं से उत्पन्न भावनाओं की अभिव्यक्‍त‍ि के प्रतीक रूप साबित होने वाले गीत सदैव लोगों की ज़ुबान पर रहे। बॉलीवुड के सितारों ने जहां फ़िल्मों के माध्यम से जनमानस का मनोरंजन किया वहीं अपने अन्दाज़ से लोगों के स्टाइल को भी बदला। सदाबहार देवानन्द का हेयर स्टाइल इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे बाल कटवाने मुश्किल हो गए थे। राजेश खन्ना का बन्द गले वाला प्रिंटिड कुर्ता उस दौर के हर नौजवान ने पहना। ऋषि कपूर के मफ़लर व बम्पर शू किशोरों की पहली पसंद बन गए थे। साधना कट हेयर स्टाइल व उसके जैसा चूड़ीदार पजामा हर युवती की पहली पसन्द बना। अमिताभ बच्चन ने बालों से अपने भद्दे कान ढके तो यह अमिताभ हेयर स्टाइल बन कर युवा पीढ़ी द्वारा अपनाया गया। संजय कट दाढ़ी व शैट्टी जैसी टांट भी कम लोकप्रिय नहीं हुई। फ़िल्मी सितारों के विशिष्‍ट अंदाज़ में फ़िल्माए गए फ़िल्मी गीत जन जन की खुशी और ग़म के साथी बने। कई फ़िल्मी संवाद भी अपने अनोखे स्टाइल के कारण रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बने। बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्म ‘वक्‍़त’ में राज कुमार द्वारा बोले गए संवाद जन जन की ज़ुबान पर चढ़े रहे। ‘अमर प्रेम’ में राजेश खन्ना द्वारा बोला संवाद ‘‘पुष्पा आई हेट टिअर्स’’ भी सब की ज़ुबान पर चढ़ा रहा। जीपी सिप्पी की ‘शोले’ के संवाद जन जन की ज़ुबान पर चढ़े रहे। ‘‘अरे ओ सांबा, कितने आदमी थे?’’ ‘‘बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना’’, ‘‘यह हाथ नहीं फांसी का फंदा है’’ ‘‘यह हाथ मुझे दे दे ठाकुर।’’ कहने का तात्पर्य यह है कि फ़िल्मों, फ़िल्मी सितारों, संवादों और गीतों ने सदैव आम लोगों पर अपना जादू चलाया। ‘‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझ को सुखी संसार मिले’’ यह गीत डोली के गीत का पक्का प्रतीक बन गया। ‘‘बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है’’ बारात आने पर दूल्हे के कानों में यह गीत अक्सर गूंजता है। ‘‘तुम्हीं मेरे मन्दिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो’’ एक टिपीकल भारतीय नारी के पतिव्रता होने की भावना का प्रतीक इस गाने से बेहतर भला क्या हो सकता था? वी. सी. आर. के प्रचलन से लोगों का सिनेमा हाल की ओर रुझान कम तो हुआ मगर बॉलीवुड ने वी.सी.आर एवं वीडियो कैसेट के साथ दर्शकों के ड्राईंग रूम और बैडरूम में घुसपैठ कर ली। दर्शकों के बदले रुझान से पायरेटिड सीडीज़ का कारोबार वायरस की भान्ति बॉलीवुड को चौपट करने लगा। पुराने थियेटर पहले बन्द हुए उसके बाद धीरे-धीरे नए थियेटर भी बन्द होने लगे। फ़िल्म वितरकों के दफ्‍़तरों को मोटे-मोटे ताले लगने लगे। बॉलीवुड के पतन के इस धीमे दौर में टैलीवुड ने दर्शकों को अपने साथ जोड़ लिया। विलास और सुविधा के दौर में दर्शकों ने मनोरंजन के लिए टैलीवुड का दामन थाम लिया। ‘हम लोग’ ने दूरदर्शन के दर्शकों से नज़दीकियां क़ायम कर लीं। रामानन्द की रामायण और बी. आर. चोपड़ा के महाभारत ने तो दर्शकों के दिलों में घर ही कर लिया। बॉलीवुड की विफलता में बची खुची कसर प्राइवेट चैनलों के आगमन ने निकाल दी। आर्थिक रूप से डांवांडोल हो चुके बॉलीवुड की नज़र टैलीवुड पर पड़ गई। अमिताभ बच्चन जैसे महानायक की डूबती नैया टैलीवुड ने पार लगाई। करोड़पति की क़ामयाबी से उत्साहित होकर फ़िल्मी सितारों ने तो जैसे टैलीवुड पर धावा ही बोल दिया। बी. आर चोपड़ा के अलावा रामानन्द सागर तो पहले ही टैलीवुड में शरणागत हो चुके थे। टैलीवुड के छोटे पर्दे में बॉलीवुड का बड़ा पर्दा समाने की फ़िराक़ में नज़र आने लगा। पहले मॉडलिंग की दुनियां से लोग फ़िल्मों में प्रवेश पाते थे। राखी और रेखा जैसी महान् अभिनेत्रियों ने मॉडलिंग में हाथ आज़माए थे। विश्‍व सुंदरियों को भी फ़िल्मों में लगातार चांस मिलते रहे हैं। युक्‍ता मुखी, सुष्मिता सेन, ऐश्‍वर्या राय, प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता सब की सब सौन्दर्य प्रतियोगिताओं की देन हैं। आज स्थापित कलाकारों ने विज्ञापन जगत् को भी अपनी आमदन के साथ-साथ स्टेटॅस सिम्बल का भी साधन मान रखा है। अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, ऐश्‍वर्या राय बच्चन, सुष्मिता सेन, रानी मुखर्जी, शाहरुख खान, आमिर खान, काजोल, करीना कपूर, कैटरीना कैफ और अक्षय कुमार के अलावा विवेक ओबराय, दीपिका पादूकोण और इसके साथ ही अनिल कपूर, सोनम कपूर, श्री देवी और जूही चावला जैसे फ़िल्मी सितारे छोटे पर्दे पर साबुन, तेल, कुरकुरे, कोल्ड ड्रिंक्स से लेकर बाइक व हीरे जवाहरात की मॉडलिंग करते नज़र आते हैं। वहीं लाइव शोज़, डांस शोज़ में भी अमिताभ, शाहरुख और सलमान के अलावा मिथुन चक्रवर्ती, अभिषेक बच्चन, करण जौहर जैसी फ़िल्मी हस्तियां छोटे पर्दे पर अपनी धूम मचाती रहीं। छोटे पर्दे पर के. बी. सी. से लेकर बिंगो और बिग मनी जैसे गेम शोज़ की जहां धूम रही वहीं सलमान खान का शो दस का दम भी पूरा-पूरा दम दिखाता रहा। फराह खान, अनु मलिक, भप्पी लहरी जैसी पर्दे के पीछे रहने वाली हस्तियां भी आज छोटे पर्दे से ग्लैमर की प्रत्यक्ष दुनियां का एक हिस्सा बनी हुई हैं। ख़तरों के खिलाड़ी अक्षय कुमार ने भी युवा पीढ़ी के मन से भय निकाल कर डर के आगे जीत का पाठ पढ़ाया।

TV imageछोटा पर्दा जहां कला और मनोरंजन का धनी था अब बॉलीवुड ने उसे अपनी चकाचौंध से सराबोर कर दिया है। बॉलीवुड ने अपनी तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के साथ छोटे पर्दे पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। आज के छोटे पर्दे व कल के छोटे पर्दे में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। प्रोफ़ेशनलिज्‍़म ने छोटे पर्दे का कायाकल्प करके उसे ग्लैमर से सराबोर कर दिया है। चैनल्ज़ में आज इतनी भिन्नता और आधुनिक तकनीक आ चुकी है कि छोटे पर्दे ने दर्शकों को उनके घरों में ही बांध लिया है। आज गुणवत्ता के बोलबाले में दर्शकों के पास जितने विकल्प हैं उससे कुछ नया कर दिखाने की ललक ने चैनल्ज़ को गला काट प्रतियोगिता के लिए बाध्य कर लिया है। आज से कुछ ही वर्ष पूर्व शुरू हुआ चैनल कलर्स लोकप्रियता में पुराने चैनल ‘ज़ी’ को कहीं पीछे छोड़ गया है। सैनेटरी नैपकिन्ज़ के विज्ञापन जब छोटे पर्दे पर दिखाने शुरू हुए थे तो दर्शकों की भवें तन गई थीं। किशोर बच्चों के संग बैठ कर देखना उन्हें बहुत अटपटा लग रहा था। ऐसे विज्ञापन देखते ही समझदार दर्शक चैनल बदल दिया करते थे मगर अब तो कंडोम का विज्ञापन आता है। उसमें युवती चॉकलेट दिखाते हुए सरप्राइज़ देने और लेने की बात बड़ी मस्ती से करती दिखाई देती है गोया कंडोम भी खाने की कोई चीज़ हो गई है। छोटे पर्दे पर अंग प्रदर्शन से लेकर चुम्बन तक के दृश्यों को दिखाने की परिपाटी तो बॉलीवुड से ही आई है। बॉलीवुड की घुसपैठ ने टैलीवुड के घरेलू वातावरण को दूषित कर दिया है। नच, कॉमेडी और अप्रासंगिक घटनाक्रम से भरपूर धारावाहिकों ने दर्शकों की मानसिकता को भी विकृत करने की कोशिश की है। एक डांस कार्यक्रम में अभिभावक अपनी कमसिन बेटी को इतनी भौंडी पोशाक पहना कर लाये कि डांस मास्टर महिला को अभिभावकों की कलास तक लेनी पड़ी मगर फटकार के बावजूद वे बच्ची की भौंडी पोशाक पर क़तई शर्मिंदा नहीं थे। अपनी किशोर बेटियों और बेटों को कमाई का ज़रिया बनाने के चाहवान अभिभावक आज उनकी मासूमियत तक दांव पर लगाने को तैयार हैं। ऐसा भी नहीं है कि छोटे पर्दे में सब बुराइयों के आने से अच्छाइयों का पूरी तरह से अन्त ही हो चुका है। चैनल्ज़ के बढ़ते प्रचलन ने कला के इतने द्वार खोल डाले हैं कि प्रतिभावान व्यक्‍ति का आज गुमनाम रह जाना कठिन है। कला और कमाई अर्थात् सरस्वती के पुजारी को लक्ष्मी का वरदान भी मिलने लगा है। आज प्रतिभा तमाम बेड़ियों से मुक्‍त हो चुकी है। संकोच का स्थान मनोबल ने लिया है। कला प्रदर्शन के असीम मौक़े हैं आज शोहरत के सातों आसमान बांहें फैलाए खड़े हैं। यह तो तय हम ही को करना है कि हमें उन सातों आसमानों की सारी बुलंदियों को छूना है या फिर पतन की छिछली गलियों से गुज़र कर अपनी भी नज़रों से गिर जाना है। आज छोटे पर्दे पर बेपर्दा होने के अच्छे और बुरे दोनों ही तौर तरीक़े मौजूद हैं बस ज़रूरत है तो उन में से सही विकल्प को चुनने की।

TV image 2बॉलीवुड की तर्ज़ पर धूमधाम से शुरू होने वाले धारावाहिकों को बॉलीवुड के फ़ार्मूले से तड़का लगाये जाने पर अच्छे से अच्छा धारावाहिक दर्शकों की रुचि का दम तोड़ देता है। जब धारावाहिक को लम्बा खींचने के लिए कहानी को अप्रासंगिक मोड़ पर घुमाया जाता है तो दर्शक के मन में वो जमा रह ही नहीं पाता है। ‘बालिका वधू’ हो या फिर ‘साथ निभाना साथिया’, ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ हो या ‘ससुराल सिमर’ का सब के सब दर्शकों के दिलों से तब उतर जाते हैं जब उसमें दिखाए जाने वाली घटनाएं और पात्र उनके गले नहीं उतरते। अप्रासंगिक और अप्रत्याशित और असंभव अतिश्योक्‍ति दर्शकों को अक्सर स्वीकार्य नहीं होती। आज धारावाहिकों के पात्र भी तमाम सामाजिक मान्यताओं और मर्यादाओं को चूर-चूर करते नज़र आ रहे हैं। छोटे पर्दे पर दर्शकों से बना पारिवारिक वातावरण आज पूरी तरह से दूषित हो चुका है। नच्च बल्लिए, वूगी वूगी समेत सारे नृत्य मुक़ाबलों में अश्‍लीलता की एक होड़ मच गई है।

महिला एंकर्स का लिबास यूं ही छोटा होता रहा तो यह अन्धाधुन्ध ग्लैमर छोटे पर्दे को कहां पहुंचा देगा? अगर आज छोटे पर्दे पर मिनी लिबास पहनाने की होड़ यूं ही चलती रही तो आने वाले दौर में छोटा पर्दा ही टू पीस बिकनी से लेकर टॉप लैस एंगल में नज़र आएगा। नृत्य के नाम पर नग्नता की सर्कस दिखाई जा रही है वहीं हास्य रस के नाम पर अश्‍लील दो अर्थी संवादों ने बेहयाई का एक नया अध्याय खोल रखा है। मनोरंजन के नाम पर बेहूदगी परोसने की शुरू हुई नई परिपाटी का यहीं अन्त अनिवार्य है। बड़े पर्दे का मोह त्याग कर घर बैठ गए दर्शकों को तलाश करता बड़ा पर्दा बॉलीवुड को छोटे पर्दे पर लाकर दर्शकों के घरों में घुस आया है। तब दर्शकों को वो यही कहता नज़र आ रहा है कि बच्चू मुझसे बच कर कहां जाओगे? उकताऊ और उबाऊ धारावाहिकों से तो दर्शकों का मोह भंग हो ही चुका है। भौंडे नृत्यों और कॉमेडी से उकता जाने पर दर्शक बच कर कहां जाएगा?