प्रौढ़ावस्था की समस्याएं

-डॉ. प्रेमपाल सिंह वाल्यान

मानव जीवन को सतायु माना गया है यानि 100 वर्ष का जीवन काल जिसे 25-25 वर्ष के चार भागों में बांटा गया है जब मानव अपने जीवन काल की अर्धशताब्दी पूरी कर चुका होता है तो उसकी प्रौढ़ अवस्था शुरू होती है। जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं कि प्रत्येक अवस्था के अपने सुख-दुःख होते हैं, लेकिन अगर हम कुछ मूलभूत बातों को ध्यान में रखकर जीवन यापन करें तो हम ज़्यादा सुख भोग सकते हैं।

विवाहः- विवाह समाजशास्त्रीय दृष्‍ट‍ि से एक अति प्राचीन संस्था है जो भारतीय धार्मिक दृष्‍ट‍ि से एक संस्कार है। यह संस्था मानव जीवन को आदर्श रूप में संचालित करने के लिए स्थापित हुई थी। समाज और कानून के द्वारा वयस्क व्यक्‍त‍ि विवाह बंधन में बंधकर अपना दाम्पत्य जीवन शुरू करता है क्योंकि मानव एक सजीव प्राणी है जिसकी अपने परिवार विस्तार के साथ-साथ कुछ जैविक आवश्यकतायें भी होती हैं। परलिंगी के साथ उसका आकर्षण एक सहज तथा स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। उसके जीवन में ऐसे क्षण भी आते हैं जब वह अपने जीवन की ढलान पर कुछ मानसिक व शारीरि‍क परेशानियां महसूस करता है। क्योंकि विवाह सिर्फ़ सेक्स गतिविधि का ही नाम नहीं, बल्कि यह तमाम दूसरे मनोभावों के साथ किये जाने वाले एडजस्टमेंट का नाम भी है। इस प्रकार दम्पति जब प्रौढ़ अवस्था में पहुँचता है तो सबसे ज़्यादा डर इस बात से लगता है कि उनकी यौन क्षमता में कमी आ जायेगी। महिलाओं को रजोनिवृत्ति के बाद यह लगने लगता है कि अब उनका यौन जीवन समाप्‍त हो जायेगा तथा पुरुषों में भी उनके वीर्य की मात्रा कम होने लगती है तथा प्रोस्टेट व टेस्टिकल्स में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है जिसके कारण लिंग की उत्तेजना में कमी आने लगती है और वह शरीर से चुस्त-दुरुस्त होते हुए भी अपने आप को नपुंसक समझने लगता है और वह दाम्पत्य जीवन से ही दूर भागने लगता है।

हम इस लेख में मुख्य रूप से महिलाओं के यौन-जीवन में आने वाली समस्याओं पर विचार करेंगे। जैसा कि हम लेख के शुरू में ही बता चुके हैं कि अगर कुछ सावधानियां रखी जायें तो हम अपनी परेशानियों को कम कर सकते हैं। महिलाओं को निम्न परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

ओस्टियोपोरोसिसः- हम यह तो जानते हैं कि अधिक आयु के लोगों की हड्डियां आसानी से टूट जाती हैं। अब इस रोग को नाम मिल गया है ओस्टियोपोरोसिस। कुछ पाठक जानते होंगे कि कैलशियम हड्डियों को मज़बूत बनाता है। लेकिन औसत आहार में जितना कैलशियम मिलता है, स्त्रियों को उससे 450 से 550 मिलीग्राम तक अधिक कैलशियम की आवश्यकता होती है। युवतियों में गर्भावस्था और स्तनपान कराने के दौरान कैलशियम की काफ़ी कमी हो जाती है। अगर स्त्रियां रजोनिवृत्ति काल के बहुत पहले से प्रतिदिन 1000 से 1400 मिलीग्राम कैलशियम लेती रहें तो वे अपने आप को ओस्टियोपोरोसिस रोग के ख़तरे से सुरक्षित कर सकती हैं। रजोनिवृत्ति के बाद अब एस्ट्रोजन की कमी के कारण अस्थि क्षय होने लगता है तो 1500 मिलीग्राम कैलशियम लेना ज़रूरी हो जाता है। कैलशियम की यह दैनिक मात्रा दूध (एक गिलास दूध में 300 मिलीग्राम) तथा दूध से बनी अन्य वस्तुओं या कैलशियम की गोलियों से प्राप्‍त की जा सकती है।

यदि युवतियां नियमित रूप से लम्बे समय तक व्यायाम करती रहें तो इतनी अस्थिमज्जा एकत्र कर सकती हैं कि वह उनके शेष जीवन के लिये पर्याप्‍त हो। प्रौढ़ वय की स्त्रियां भी व्यायाम करके अस्थि क्षय को रोक सकती हैं। अस्थियों को शक्‍त‍िशाली बनाने वाले व्यायाम वे होते हैं जिनमें आप अपना बोझ स्वयं वहन करते हैं जैसे टहलना, जॉगिंग, स्कीइंग, साईकिल चलाना, एरोबिक नृत्य और रैकेट से खेले जाने वाले खेल। अस्थियों को शक्‍त‍िशाली बनाने के साथ-साथ वे व्यायाम गुर्दे की ग्रंथि को भी बल प्रदान करते हैं जो इतना अधिक एस्ट्रोजन पैदा कर सकते हैं कि रजोनिवृत्ति के बाद होने वाली एस्ट्रोजन की कमी पूरी हो जाये। याद रखिये कैलशियम की अच्छी खुराक, नियमित व्यायाम, अच्छा पौष्‍टि‍क आहार और रहन-सहन का उपयुक्‍त तरीक़ा …. ये सारी चीज़ें आवश्यक हैं और ये सब मिलकर आपको ओस्टियोपोरोसिस रोग से बचने से सहायक हो सकती हैं।

शरीर की ताप वृद्धिः- शरीर का तापमान बढ़ना अभी तक चिकित्सा विज्ञान के लिए रहस्य बना हुआ है। क्योंकि आज भी चिकित्सक ये नहीं जानते कि शरीर में क्या गड़बड़ होने पर शरीर का थर्मोस्टेट बिगड़ जाता है और स्त्री के शरीर में अचानक इतना ताप पैदा हो जाता है कि उसे लगता है कि उसकी त्वचा तप रही है। अगर उसका यह ताप सहसा किसी सार्वजनिक स्थान पर बढ़ जाता है तो उसे लगता है कि हर कोई उसके लाल तमतमाते चेहरे को घूर रहा है। हालांकि ऊपरी स्तर पर इसके कारण जो परिवर्तन होते हैं वे बहुत हल्के होते हैं और अधिकांश लोगों को पता भी नहीं चल पाता कि स्त्री के शरीर का ताप बढ़ रहा है।

आमतौर पर ताप वृद्धि का यह रोग आता जाता रहता है और कोई दो वर्ष बाद ख़त्म हो जाता है। लेकिन कुछ स्त्रियों को यह रोग 10 वर्ष या इससे भी अधिक समय तक लगा रहता है। ऐसा लगता है कि एस्ट्रोजन से वह ठीक हो जाता है लेकिन और भी औषधियां इसमें लाभप्रद हो सकती हैं। मध्यवय की समस्याओं पर शोध कर रहे एक विशेषज्ञ ने यह जानने के लिये कि यह ताप किस कारण बढ़ता है और इसका क्या उपचार है, विभिन्न वर्ग की 400 स्त्रियों के विचार एकत्र किये तो उसने निम्न निष्कर्ष दिये।

• एक के ऊपर एक ऐसे कपड़े पहनिए जिन्हें आसानी से पहना और उतारा जा सके। वे वस्त्र सूती या ऊन से ही बने हों तो बेहतर होगा।
• नियमित व्यायाम कीजिए।
• एल्कोहल से बचें। विशेषकर लाल वाईन न लें तथा तम्बाकू और कैफ़ीन से परहेज़ करें।
• आराम करने की सहज युक्‍त‍ि का सहारा लें। कल्पना करें कि आप शीतल स्थान पर हैं। इससे आपको राहत मिलेगी। इसी तरह एक गिलास ठंडे पानी से भी राहत मिलेगी।
• तनाव से बचें। कुछ स्त्रियों को विटामिन ‘बी’ के सेवन से तनाव में राहत मिलती है। लेकिन कोई भी विटामिन प्रयुक्‍त करने से पूर्व अपने चिकित्सक से परामर्श कर लें।

रात को पसीना आनाः- शरीर का ताप ही रात में स्त्री की नींद तोड़ देता है और कई बार उसकी नींद टूट जाती है। अगर रात्रि भोजन के बाद और कुछ न खाया जाए और सोने से पहले शरीर को शिथिल छोड़कर हल्का कर लिया जाए तो कुछ स्त्रियों को लाभ हो सकता है। कुछ स्त्रियां इससे बचने के लिए रात समय अपने पास ठंडा पानी या बर्फ़ रखती हैं। जिसका वे रात को जागने पर इस्तेमाल करती हैं।

मूत्राशय की समस्याएं:- रजोनिवृत्ति के उपरान्त कुछ स्त्रियों को मसाने को नियंत्रित रखने में कठिनाई होती है। यह कठिनाई जघन क्षेत्र की मांसपेशियों के कमज़ोर पड़ जाने के कारण होती हैं। केवल व्यायाम से कभी-कभी ये मांसपेशियां सशक्‍त हो जाती हैं। इस व्यायाम में जघन क्षेत्र की मांसपेशियों को भरसक तेज़ी के साथ खींचकर कसिए और ढीला छोड़ दीजिए और बाद में धीरे-धीरे खींचिए, कम से कम तीन तक गिनती गिनने तक रोके रहि‍ए फिर शिथिल छोड़ दीजिये। इस व्यायाम से अगर आराम मिलता है तो इसे लम्बे समय तक करती रहें।

योनि शुष्कताः- एस्ट्रोजन के अभाव के कारण कुछ स्त्रियों की योनि शुष्क हो जाती है, इससे योनि में खुजली मचने लगती है और योनि की मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं। इसका निरोधात्मक और उपचारात्मक उपाय है नियमित और सक्रिय संभोग।

योनि शुष्क होने पर कुछ स्त्रियों को संभोग में कष्‍ट होने लगता है जिसके कारण वे इससे दूर रहने की कोशिश करती हैं। इस अवस्था में उन्हें उत्तेजित और कामातुर होने में देर लगती है और इस प्रकार उन्हें अधिक कामोत्तेजना की आवश्यकता होती है। ऐसी स्त्रियों के पतियों को अपनी पत्‍न‍ियों की यह कठिनाई समझनी चाहिए और संभोग की प्रक्रिया को धीरे-धीरे आगे बढ़ाना चाहिए।

वैसे तो व्यायाम इस कठिनाई को दूर करने में सहायक हो सकते हैं लेकिन कुछ चिकित्सक योनि में लगाने के लिए एस्ट्रोजन क्रीम की सलाह देते हैं लेकिन अनेक स्त्रियां इस शुष्कता को ग़ैर हारमोन औषधियों से ठीक करने के उपचार प्रयोग में लाती हैं जैसे पानी में घुलने वाली औषधियां या नारियल का तेल।

मध्य वय की अन्य कठिनाइयाँ:- हर व्यक्‍त‍ि के जीवन में परिवर्तन होता है और उसके अपने तनाव होते हैं तो फिर रजोनिवृत्ति ही इससे अलग क्यों हो? कुछ स्त्रियां ख़ब्ती, सनकी और भुलक्कड़ हो जाती है। यह शरीर में तीव्र ताप और दूसरी कठिनाइयों के प्रति उनकी तेज़ प्रक्रिया मात्र हो सकती है अथवा उन्हें यौवन के बुझ जाने का विषाद होता है। अब बच्चे पैदा करने की अक्षमता भी उन्हें प्रतिकूल होती है, स्वास्थ्य या वित्तीय स्थिति से भी परेशान हो सकती हैं या यह भावना भी उन्हें प्रभावित करती है कि अब उनका वास्तविक जीवन समाप्‍त हो गया है।

अध्ययनों से पता चला है कि जो स्त्रियां रजोनिवृत्ति से पहले दुःखी थीं वे रजोनिवृत्ति के बाद और भी अधिक उदास और दुःखी हो सकती हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि जो स्त्रियां व्यस्त रहती हैं और सोद्देश्य जीवन जीती हैं उन्हें कम भावनात्मक कठिनाई होती है। अपने आपको निराशा में न उलझा कर स्त्रियों को अपने आहार, व्यायाम और अपनी देखभाल पर ध्यान देना चाहिए। इससे उन्हें अपने आप को स्वस्थ रखने में सहायता मिल सकती है। जो स्त्रियां अपनी तरुणाई में विभिन्न प्रकार की रूचियां, शौक़ तथा मित्रता पैदा कर लेती हैं वे उनका लाभ इन क्षणों में भी उठाएंगी और आने वाले कल में भी अपनी माताओं की अपेक्षा उनके लिए रजोनिवृत्ति चिन्ता का कारण नहीं होगी, बल्कि वे यह सोचकर खुश हो सकेंगी कि अब आज़ादी मिल गई, सेक्स की मौज मस्ती और बुद्धिमत्ता जताने की आज़ादी।

दैहिक परिवर्तनः- उम्र बढ़ने के साथ-साथ बाल भी सफ़ेद होने लगते हैं, शरीर शिथिल और स्थूल होने लगता है, झुर्रियां उभरने लगती हैं। यह परिवर्तन प्रत्येक मानव में होते हैं और एस्ट्रोजन इसे रोक नहीं सकता हालांकि यह कुछ तकलीफ़ों में राहत प्रदान करता है और अन्य अनेक पदार्थ भी हैं जो रजोनिवृत्ति के कारण होने वाली तकलीफ़ों को कम कर सकते हैं- आहार, व्यायाम और जीवन के प्रति लगाव आपके यौवन की भावना को बनाए रखने में भी सहायक हो सकते हैं।

फिर भी हमें अपनी उम्र के साथ-साथ शरीर में होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान रखना चाहिए। रजोनिवृत्ति को स्त्रियों को एक ऐसा संकेत समझना चाहिए कि अब उन्हें स्वास्थ्य पर नियंत्रण रखना चाहिए, रक्‍त‍कचाप और मधुमेह पर निगाह रखनी चाहिए और अपने रहन-सहन, खान-पान और व्यायाम में उपयोगी और लाभप्रद परिवर्तन करने चाहिए।

जैसा कि नृवंश विज्ञानी स्वर्गीय मार्गरेट मीड कहा करती थी कि स्त्री के सबसे अधिक सृजनात्मक वर्ष प्रायः रजोनिवृत्ति के वर्ष होते हैं जब उसमें रजोनिवृत्ति के उपरान्त नया-नया उत्साह भर जाता है और उन निर्णयों को लेने तथा अपने आप में वह उत्साह पैदा करने का समय युवतियों के पास आज ही है, कल नहीं।

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