विवाह के पश्‍चात् क्या उपनाम बदलना ज़रुरी है

-विद्या भूषण शर्मा

विवाह के पश्‍चात् लड़की को हमेशा नया स्थान, घर, परिवेश, नए रिश्ते-नाते, नए लोग एवं नई संस्कृति के अनुरूप ढलना पड़ता है। अचानक ही नए माहौल में आने से उसके जीवन में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। नए बदलाव का उसके रहन-सहन, खान-पान, आदत-व्यवहार, आचार-विचार सब पर अप्रत्याशित प्रभाव पड़ता है। नए परिवेश तथा नए लोगों के बीच सामंजस्य बिठाने  के लिए उसे स्वयं को उन्हीं के अनुसार ढालना पड़ता है और रिश्तों में स्थायित्व लाने के लिए शायद यह ज़रूरी भी समझा जाता है। इस सारी प्रक्रिया में लड़की के स्वयं की मूल पहचान गुम होती-सी प्रतीत होती है। उसे न चाहते हुए भी अपने नाम के साथ नया उपनाम, जो नए रिश्तों का सूचक होता है, ग्रहण करना पड़ता है। इसका परिणाम यह होता है कि लड़की को पुन: नए सिरे से अपना अस्तित्त्व स्थापित करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

यदि कोई लड़की अपनी जाति, धर्म से बाहर प्रेम विवाह करती है तो उसके लिए अपने पति का वंश, नाम, जाति व धर्म अपनाना निहायत मजबूरी हो जाता है। यदि वह अपना उपनाम, जाति, धर्म न बदलने का साहस दिखाती है तो उसे समाज में शंका की दृष्‍ट‍ि से देखा जाता है और क़दम-क़दम पर उसके सामने सवाल उछाले जाते हैं कि उसका कुल, जाति, धर्म क्या है? उसका पारंपरिक विवाह हुआ है या प्रेम विवाह, यदि प्रेम विवाह हुआ है तो घरवालों की रज़ामंदी से हुआ है या स्वेच्छा से। यह उसके लिए पीड़ादायक स्थिति होती है। इससे बचने का उसके पास एक मात्र रास्ता होता है कि वह चुपचाप अपने उपनाम, जाति, धर्म आदि को तिलांजलि देते हुए पति का उपनाम धारण कर ले तभी वह प्रश्‍नों के आक्रमण से स्वयं को बचा पाएगी। लेकिन तब उसके सामने अपनी खोई पहचान को पुन: स्थापित करने की नई चुनौती होगी।

लड़की के लिए वह स्थिति तो और भी कष्‍टप्रद होती है, जब उसने शिक्षा, क्रीड़ा, समाजसेवा या लेखन के क्षेत्र में विशिष्‍ट उपलब्धि अर्जित की हो, शादी के बाद उसका वह नाम झटके से मिटा दिया गया हो। वह किस-किस को कहां-कहां अपने पूर्व के नाम के बारे में स्पष्‍टीकरण देती फिरेगी कि वह मैं ही हूं, मैंने ही वह उपलब्धि अर्जित की है। अब शादी के बाद मेरा नाम परिवर्तित हो गया है। ऐसे तो उसे अकारण ही अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। पुरानी पहचान खोकर नई पहचान क़ायम करना आसान नहीं होगा। यह नारी के साथ एक त्रास्द स्थिति है कि शादी होते ही उसे उसकी मूल जड़ों से उखड़ा समझ लिया  जाता है।

बात जब 21वीं सदी की नई नारी के बारे में की जाती है तो उसे इतना तो अधिकार मिलना चाहिए कि वह अपनी मूल पहचान को क़ायम रख सके। उसके अपने अस्तित्त्व के साथ कोई खिलवाड़ न किया जाए और उसे शादी से पूर्व अर्जित उपलब्धि को शादी के बाद भी अपने मूल नाम से जोड़े रखने का गौरव मिले।

क्या जाति, धर्म, संस्कृति तथा उपनाम बदले बिना विवाह नहीं हो सकते? यदि हो सकते हैं तो फिर उसे उसके नाम को बदलने का फ़रमान क्यों जारी किया जाता है। इसके अपने अस्तित्त्व के होते हुए अपनी नई पहचान बनाने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता उसे सच्चे अर्थों में यह अधिकार मिले कि वह अपने नाम के साथ, उसके साथ जुड़ी स्मृतियों और उपलब्धियों को बिना किसी बाधा के साथ रख सके।

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