मरी हुई तितलियां

जब हम चले तो बहुत से लोग थे। तब जंगल अभी इतना घना नहीं था। एक-दूसरे के साथ हँसी मज़ाक करते हुये हम ज़ोर-ज़ोर से हँसते रहे। पेड़-पौधों की फूल-पत्तियां तोड़ते, उंगलियों में मसलते हुये हम चलते रहे।

लगता था हमने सारी उम्र इसी तरह चलना है। जंगल धीरे-धीरे घना होता गया। हम एक-एक करके गुम होते रहे। उन में से ज़्यादा के तो चेहरे और नाम भी धीरे-धीरे भूलने लग पड़े। अगर किसी के साथ अचानक कभी सामना भी हो तो पहचान का भ्रम-सा पड़ कर अदृश्य हो जाता।

जंगल ने बहुत से लोगों को निगल लिया पर हम पाँच व्‍यक्‍त‍ि बचे रह गये। वक्‍़त ने बेशक कैसी मार भी मारी हो परन्तु हमें एक-दूसरे की पहचान फिर भी याद रही। जंगल में विभिन्न प्रकार के प्राणी थे। उनमें मांसाहारी प्राणी भी थे। हमें मांसाहारी प्राणियों से डर था।  हम जंगली रास्तों की भूल-भुलैया से भी घबराये हुये थे। हमने अपनी-अपनी मचानें बना ली।

आख़िर दोस्त थे, कहीं न कहीं मिलते ही रहे। एक बार हम तय करके अपनी-अपनी मचानों से नीचे आ गये। एक अलग से स्थान पर बैठ कर आग जलाई और हाथ सेंकने लग गये।

हम सभी का ठण्ड के मारे बुरा हाल था। कुछ गर्म हुये तो हमारे अन्दर के अत्यधिक ठण्डे हो चुके ढक्कन खुलने शुरू हो गये। आग की तपिश में हमारे चेहरे तप रहे थे। चेहरों पर तांबे जैसा रंग पुता हुआ था। आंखें दूर कहीं सपनों की राख कुरेद रही थी। जब आग बुझने लगती तो हम एकाध सूखी हुई लकड़ी उस आग में डाल देते। आग फिर से दहकने लगती। हम बारी-बारी बोलते रहे और उदास होते रहे। प्रत्येक को प्रेमिका चौंधियाने वाले रूप में कहीं पर मिली थी, किसी को विवाह में, किसी को कॉलेज में, किसी को यूथ-फेस्टिवल पर या इसी तरह के ही किसी नशीले माहौल में। इस के बाद मुहब्बत का इज़हार हुआ था: लिखकर, बोलकर, इशारों से या फिर किसी सांझे दोस्त के ज़रिए।

मुहब्बत की तरबियत में अगला क़दम एक-दूसरे से दूरी बना कर ख़तों को लिखने का था। हमने भी लिखे थे। किसी औरत के पत्‍नी बनने के साथ ही प्रेमिका के रूप में उसकी मृत्यु हो जाती थी। यह ज़रूरी था कि वह बिछड़ जायें और प्रेमी आंहें भरता रहे। हम पांचों लोग इसी तरह की आवश्यक सभी आवश्यकताएँ पूरी करते थे। हम में से किसी का भी अपनी प्रेमिका के साथ विवाह नहीं हुआ था। मैंने भावुक होकर कहा था, “मैं सभी की मुहब्बत की कहानी लिखूंगा।”

मैं कहानियों की पड़ताल करने बैठा तो हैरान रह गया। पांचों लोगों की पांच कहानियां दरअसल एक ही कहानी थी। मैंने उन पांचों प्रेमिकाओं को एक नाम दिया-अरीत। अरीत मेरी प्रेमिका का नाम था। बाकी की प्रेमिकाओं के नाम इस एक ही नाम ने ले लिये। प्रेमिका के ख़तों में से मुहब्बत के हर्फ़ बाहर निकले और धीरे–धीरे गुब्बारे बन गये। गुब्बारों के साथ मैं भी आसमान की तरफ़ उड़ चला। पहले मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन निकली और फिर दूर होती गई।

मैं बादलों के घोड़ों पर सवार था। सूर्य की तपिश से गुब्बारे एक-एक करके फटने लगे। गुब्बारों के फटने के साथ काला धुंआ फैल गया। उस धुंए ने पहले घर को ढांप लिया और फिर घर में ही जज़्ब हो गया। मैं पसीने-पसीने हुआ उठ कर बैठ गया। यह सपना मेरा सहम था। यह सपना अरीत के पत्रों की तासीर नहीं था। अरीत के पत्रों को तो पंख लगे हुये थे, पर अरीत नहीं चाहती थी कि उसके पत्र पंछी बन जायें। इसलिये वह हर पत्र में लिखती थी, “पाली, तुम पत्र पढ़कर फाड़ देना।”

अरीत के पत्रों की यह पंक्‍त‍ि कभी पहली होती थी और कभी अन्तिम।

अरीत के पत्रों के अक्षरों के साथ मेरे सपनों का घौंसला बनता था। मैं अपना घौंसला अपने हाथों से कैसे तोड़ देता।

मैंने वह पत्र कभी नहीं फाड़े थे। सुनसान एकान्त की खंदकों में बैठ कर मैंने अरीत के पत्रों को कई बार पढ़ा था, परन्तु मेरी प्यास सिर्फ़ कुछ शब्दों की नहीं थी। मैंने अरीत को लिखा था, “मैं तुम्हें पूरे का पूरा पढ़ना चाहता हूँ।” वह पत्र मेरे निर्वाण की गाथा नहीं थे, परन्तु अरीत ने अपने शब्दों का लिबास कुछ नीचे खिसका दिया था। उन दिनों में वह लड़कियों के होस्टल की वार्डन लगी थी।

“पाली, एक दिन तो हद ही हो गई। परमिन्दर को तो तुम जानते ही हो। वह मिलने आई तो बैग में छुपाकर कहीं से व्हिस्की की बोतल भी लेकर आई। रात जब होस्टल की बत्तियाँ बुझ गई तो हम दोनों ने व्हिस्की पी। मालूम है, पी कर क्या हुआ?”

मैंने उठकर खिड़की के सामने पर्दा कर दिया। मेरे और अरीत के बीच जमी हुई बर्फ़ धीरे-धीरे पिघलती रही। बर्फ़ के नीचे छुपा हुआ सच कीचड़ था, परन्तु उस में बर्फ़ के पिघलने का आनन्द भी शामिल था।

अरीत ने लिखा था, मालूम है, जब भी मौक़ा लगता परमिन्दर अपने लवर के पास एक रात रह कर आती है। जब तुम्हारी बदली नज़दीक हो जायेगी तो मैं भी तुम्हारे पास आ जाया करूंगी। मैं अरीत की प्यास से दूर बैठा हुआ था। मेरी बदली उसके शहर के नज़दीक हुई तो एक शाम वह सचमुच ही मेरे पास पहुँच गई। उस रात मद्धिम-सी रौशनी में, मैं अरीत के शरीर के तिल गिनने लग पड़ा। उसने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया, “नहीं प्लीज़। इस के आगे नहीं।” उसके आगे आत्महत्या का जंगल था और एक डूबने वाली झील।

… और उस समय अरीत का कांपता हुआ हाथ निढाल भी था और स्वीकृति जैसा भी। दो साल बाद पहले जैसी ही दूरी बढ़ गई। हम फिर से एक दूसरे को पत्रों के द्वारा भोगने लग पड़े। अरीत का दरवाज़ा मेरे हज का मुक़ाम था। अगले साल की छुट्टी में मैं घर के कामों में से फुर्सत निकाल कर अरीत के होस्टल पहुँचा तो गेट वाले संतरी ने बताया, “मैडम को नौकरी छोड़े तो दो महीने हो गये हैं।”

“दो महीने।”

पिछले कुछ समय से अरीत ने कोई पत्र नहीं लिखा था। उसके आख़िरी पत्र में भी नौकरी छोड़ने का कोई ज़िक्र नहीं था।

“मैडम ने विवाह करवा लिया है।” संतरी ने अगला पन्ना पलटा, “इस कारण भी शायद नौकरी छोड़नी पड़ी हो।” मेरे पास सिर्फ़ दीवारें थी, वह दीवारें छत डालने के लिये नहीं थी, बल्कि मुझे अरीत तक पहुंचने से रोकने के लिए थी। मैंने कई बार सोचा था कि दीवारों को तोड़ कर कच्चा कोठड़ा बना लूं, परन्तु इस तरह हुआ नहीं था।

मेरी मुहब्बत के साथ सोने की लड़ियां नहीं थी। सोने की लड़ियों के बिना मुहब्बत के लिये उड़ान भरना वर्जित था। मेरे पास अपने पंख होते तो बात और थी, परन्तु मेरे पास जितने भी पंख थे मां के दिये हुए थे, मैं उन पंखों को फैशन के लिये कंधों पर लगा तो सकता था, परन्तु उन पंखों से उड़ नहीं सकता था। मुझे उस समय पहली बार मालूम हुआ कि माताएं अपने बच्चों की पहली दुश्मन होती हैं।

अरीत भी क्या करती? अरीत पवन थी, मेरे पत्तों में से सरसराहट बन कर निकल गई। सभी प्रेमिकायें इसी तरह ही चली जाती हैं और कागज़ों की तहों में दबे हुये शब्द पीछे रह जाते हैं जैसे स्कूल के विद्यार्थियों की कापियों में मरी हुई तितलियाँ होती हैं।

मैंने अब मरी हुई तितलियों से क्या लेना था पर मरी हुई तितलियाँ मैंने फिर भी संभाली हुई थी। उनके साथ जुड़े हुये कुछ अधमुये सवाल भी थे, जो मसली हुई तितलियों की तरह कभी-कभार फड़फड़ाते थे।

उसके बाद मैंने भी एक छत खींच कर अपने सिर के ऊपर कर ली।

समय मेरे वजूद पर पद-चिन्ह गहरे करता रहा, परन्तु वह पद-चिन्ह इतने भी गहरे नहीं थे कि आंखों की धुंध बन जाते। एक विवाह के अवसर पर मैंने अरीत की सहेली परमिन्दर को पहचान लिया। उसके बालों पर लगा क़लफ़ और चेहरे पर गहरा मेकअप पुराने पुल की बुढ़ापे को ढांपने की मिन्नत थी। फिर भी परमिन्दर के नक्श पूरी तरह गुम नहीं हुए थे।

परमिन्दर इस तरह मिली जैसे बेमानी ज़िंदगी को अर्थ मिल गये हों। उस समय परमिन्दर मीट के टुकड़े चबा रही थी। टुकड़ों को चबाने की तरह ही वह बीते सालों को चबाने लग पड़ी।

वह कौन था जिसने अरीत को घर दिया था। यह बेसब्रा सवाल बुढ़ापे की दहलीज़ तक मेरे साथ चला था। अब उत्तर ने मुझे परेशान कर दिया था। अपने आख़िरी पत्रों में अरीत कभी-कभार किसी शम्मी का ज़िक्र करने लग पड़ी थी। “शम्मी ने मुझे एम.ए. अंग्रेज़ी के पत्र-व्यवहार कोर्स में दाख़िल करवा दिया है। मालूम है, यदि शम्मी न होता तो मुझे दाख़िला नहीं मिलना था।”

एक पत्र के बाद दूसरा पत्र।

“मेरे बर्थ-डे पर शम्मी ने मुझे तीन सालों के लिये रीडर्ज़ डाईजैस्ट लगवा कर दिया है।”

“शम्मी ….. शम्मी।” मुझे पत्रों में से ख़तरे की गंध आई थी। मैं एकदम छुट्टी लेकर अरीत के पास पहुँचा था।

संयोग से वह भी वहां पर ही बैठा हुआ था। “यह श्याम सुंदर जी है।” अरीत ने पहचान करवाई थी।

उम्र पैंतीस-चालीस के लगभग, सिर गंजा और चांद के पीछे की तरफ़ तेल से चुपड़े हुए बहुत थोड़े से बाल। मेरा सारा गुस्सा जाता रहा।

उस समय यह नहीं जानता था कि शिखर दोपहर सुनसान खड़ी मुहब्बत से अधिक अरीत को किसी छत की ज़रूरत थी।  

अरीत अपने जिस्म की तपिश से इतना नहीं थी डरी जितना बढ़ रही उम्र से डर गई थी।

“अरीत ने उस गंजे में आख़िर देखा क्या था?” सवाल मेरे मन का था, परन्तु चिढ़ने की तरह होंठो पर आ गया।

शामियाने और कनातों ने हवा रोकी हुई थी। माहौल कुछ दम घुटने वाला था।

परमिन्दर मुझे साथ लेकर आईसक्रीम लेने चल पड़ी और सवाल विचारों में गुम हुआ जूठी प्लेटों के पास खड़ा रह गया।

वापिस आते हुये सवाल सामने अड़ कर खड़ा हो गया। इस बार परमिन्दर से उत्तर टाला न जा सका। वह कुछ तीखे स्वर में बोली, “क्या यह काफ़ी नहीं था कि तुम्हारे होते हुये वह अरीत को घर देना चाहता था।”

पुल अब पुराने दिनों जैसा नहीं था। वह पहाड़ी गाँव को जाते किसी रास्ते के पुल जैसा था, टूटा-फूटा जो गिरने के कगार पर था। कौन जाने कब कोई पार जाने वाला फिसले और नाले में गिर कर बह जाये। अगले क्षण परमिन्दर ने अपने पिछले रूखे व्यवहार पर पर्दा डालने का प्रयास किया। उसने पर्स से विज़टिंग कार्ड निकाला और उसके पीछे अरीत का टेलीफोन नंबर और पता लिख दिया, “लो, कभी मौक़ा बने तो अरीत को मिल लेना। खुद ही पूछ लेना जो पूछना है।”

कुछ दूर कनात के पीछे बार बनी हुई थी। शराब के शौकीन लुढ़कने के बाद धीरे-धीरे उठने लगे। परमिन्दर धीरे से बोली, “अब तो मेरे पति भी उठने वाले होंगे।”

वह मुझ से विदा लेकर वहां से चली गई।

मेरे वजूद ने पचपन साल व्यतीत कर लिये परन्तु मैं अरीत को युवावस्था की तरह मिलना चाहता था।

“हैलो! …. जी मैंने रीत से बात करनी है।” संयोग बना तो प्यास के शहर को मैंने पानी का सवाल किया।

“रीत। …. कौन रीत? कड़वे बोल उभरे।

“जी दरअसल मैंने मिसिज़ श्याम सुंदर से बात करनी है।”

प्रेमिका के लिये इस तरह का संबोधन कच्चे तेल के घूंट जैसा था, परन्तु मैंने पी लिया। “माता जी तो इस समय पूजा कर रहे हैं, आप दो घंटे बाद फ़ोन करें।” शब्दों रूपी कांटे मेरे पांव के नीचे बिछ गये। कोई मेरी प्रेमिका को ‘माता जी’ कहकर मुख़ातिब था। परमिन्दर ने बताया था, शम्मी का काम बहुत फैला हुया था। बस, पैसा ही पैसा था उस के पास, परन्तु खाली समय बिल्कुल नहीं था। अरीत क्या करे सारा दिन? वह अति धार्मिक बन गई थी। वह कई-कई घंटे लगातार पूजा करती रहती थी। लोग उसे आदर से और श्रद्धा से ‘माता जी’ कहने लगे थे। मैं अरीत के शहर से खाली नहीं वापिस आना चाहता था। रिसीवर अरीत ने उठाया। मैंने अपनी पहचान बताई तो बेयकीनी में उसकी आवाज़ कांपी, “यह सचमुच तुम ही हो न?” “नहीं। मैं भूत हूँ।…… निरोल आत्मा।” मैं हँसा। मेरा ख़्याल था कि जवाब में अरीत भी हँसेगी परन्तु मुझे सिर्फ़ अरीत की सांसों की अवाज़ ही सुनाई दी।

“मैंने आज तुम्हें बहुत-सा मिलना है।”

“बहुत-सा?”

“हां, जिस तरह हम उस समय मिलते थे।”

मैंने अरीत की आह भरी आवाज़ पकड़ी। उस के बोल बुझे हुये थे, “अब क्या है मेरे पास?”

मैं चुप रहा।

वह एक क्षण रुकी जैसे अपने आप को संभाल रही हो। फिर कुछ घबराहट में बोली, “मेरे गुरु स्वामी कल्पनानाथ जी कहा करते हैं – शरीर का सच आत्मा है। मनुष्य की सुंदरता आत्मा की सुंदरता है। मेरे गुरु जी आये हुये हैं। तुम्हें मैं उनसे भी मिलवाऊंगी। तुम …..।”

हमारी मुहब्बत की यह पता नहीं कौन-सी बरसी थी। अरीत के बोल भोग के समय बोले गये किसी मोहतबर के वचनों जैसे थे। पच्चीस साल बाद प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ पहली बार बातें कर रही थी।

मेरे सपनों की परी अचानक पचास साल की बूढ़ी औरत हो गई। मैं इस औरत को नहीं जानता था। मैंने सहम कर फोन बंद कर दिया।

मुहब्बत शब्दों की लहरों पर डोलती रही, एक खाली और उदास नाव की तरह।

छप्प! ….. छप्प! लहरें नाव से लगातर टकराती रही।

मैं कहानी के अन्तिम चरण में था कि लिखते-लिखते रुक गया। कोई बाहर वाला दरवाज़ा खटखटा रहा था। उस समय घर में और कोई नहीं था। मैं झुंझला कर उठा और दरवाज़ा खोल दिया। बाहर पाली था, यानि पांचों में से एक था। उसके पास पुराने रूमाल में बन्धा हुआ पत्रों का पुलिंदा था उसने पुलिंदा मेरी तरफ़ कर दिया, “ले, अब स्वयं ही संभाल इन्हें और मेरी ओर से चाहे कुएं में फेंक दे।” हर किसी ने कभी न कभी इस तरह के पत्र लिखे होते हैं, कभी काग़ज़ों पर और कभी हवा पर। चाहे कोई इन पत्रों को फाड़ दे और चाहे जला दे। फिर यह पाली परेशान क्यों था? मैंने पूछा, “बात क्या है?”

“दोस्त! मैं तो इन पत्रों को संभालता-संभालता थक गया हूँ” वह थकी हुई आवाज़ में बोला, “तुम्हारे पास तो अपनी कोठी है। प्रेमिका के पत्र कहीं भी छुपाकर रखो। मेरे पास तो वन रूम फ्लैट है और वह भी किराये पर। जगह की कमी के कारण सामान भी बहुत थोड़ा रखा हुआ है। सर्दियों के मौसम में पत्रों को गर्मियों वाले कपड़ों के ट्रंक में रखता हूँ और गर्मियों में मैं सर्दियों वाले कपड़ों के ट्रंक में पत्रों को छुपाने के लिये जगह ढूंढ़ने लगता हूँ। तुम्हें नहीं मालूम व्‍यक्‍त‍ि कितना थक जाता है इस तरह।”

पहले पाली के आने से मुझे इतना ज़रूर सूझ गया कि पत्रों के परिणाम के बारे में दूसरों से भी बात कर लूं। अगले दिन मैंने दूसरे पाली का दरवाज़ा खटखटाया, “मैंने पूछना था कि उन पत्रों का क्या बना?”

“कौन से पत्र?” उसने हैरान होकर पूछा।

“अरीत के पत्र।”

“अरीत! कौन अरीत?”

उसकी प्रेमिका का नाम कुछ और था। मुझे यह याद ही नहीं रहा था। मैंने उसे पूरी बात बताई तो वह हँसा और फिर संपूर्ण दिल का भेद खोल दिया। दूसरे पाली की पत्‍नी उसकी प्रेमिका के बारे में जानती थी, परन्तु वह सोचती थी कि पाली ख़तरों से भरा जंगल पार कर आया है। पत्‍नी यह नहीं जानती थी कि केक के टुकड़े की तरह समय का टुकड़ा कटा हुआ घर में पड़ा था। वह टुकड़ा कभी-कभार जीवित हो जाता था। उसकी पत्‍नी एक दिन किताबों वाले कमरे का बिखरा हुआ सामान संभाल रही थी कि हाथ लगने से उभरी हुई फाइलें गिर पड़ी। मुहब्बत के दस्तावेज़ पन्ना-पन्ना होकर कमरे में बिखर गये।

चुप सा पहाड़ उस दिन ज्वालामुखी हो गया।

सारा घर लावे की लपेट में आ गया।

लम्बी कलह के बाद वाली चुप की तपिश उस लावे से कहीं अधिक थी।

घर बहुत दिनों तक अधमुआ सा पड़ा रहा था और फिर स्वयं ही उठ कर धीरे-धीरे रेंगने लग पड़ा था। तीसरे पाली की पत्‍नी को बेटी का फ़िक्र खाने लग पड़ा था। वह कहती, “मैं बेटी की शादी सुख व शांति से कर लूं, फिर चाहे मर जाऊं।” बेटी स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद कॉलेज जाने लगी थी। दूसरे पाली की पत्‍नी उसको कई बार समझाती, “मेरी रानी बेटी, कॉलेज में लड़कों के साथ बहुत अधिक मेल-जोल नहीं रखते।” बेटी टी.वी. का कोई सीरियल देख रही होती तो वह अश्‍लील दृश्य देख कर परेशान हो जाती। वह टी.वी का चैनल बदल देती। यदि चैनल बदलने में देरी हो जाती तो उस दृश्य के प्रभाव को पूरी तरह से मिटाने की कोशिश में वह जल्दी से बोलती, “देख बेटी, यह सब बकवास है। इस तरह बस फ़िल्मों में ही होता है, तुम ऐसे ….।” तीसरे पाली की पत्‍नी कुछ अधिक ही चौकस थी। वह बेटी को नसीहतें देने तक ही सीमित नहीं थी। बेटी की ग़ैर-हाज़िरी में वह बेटी की कापियां-किताबें भी देखती थी। दरअसल वह कापियां-किताबें सिर्फ़ देखती ही नहीं थी, सूंघती भी थी।

…. और एक दिन तीसरे पाली की पत्‍नी को बेटी की किसी किताब में से वर्जित रिश्ते की गंध आ गई। उसने किताब की जिल्द पर चढ़े ख़ाकी कागज़ के पीछे छुपाया हुआ प्रेम-पत्र ढूंढ लिया। उस समय बेटी कॉलेज गई हुई थी। संतापा दिन बेटी के लिए चक्रवात सृजन के लिये बैठ गया। उस दिन बेटी की मुहब्बत के तिलिस्म ने पिता का तिलिस्म तोड़ा था। जो पत्र सालों की धूप-छांव में सांस ले रहे थे, अचानक उन्हीं पत्रों में से बू आने लगी।

पत्रों की आत्मा ने चोला बदल लिया था। उस दिन तीसरे पाली ने मरे हुए पत्रों के छोटे-छोटे टुकड़े करके बहती हुई हवा को सौंप दिये थे।

चौथे पाली के मन पर बोझ था। उसने लिखकर मुझे बुलावा भेजा। हम काफ़ी समय के बाद मिले और ठण्डी रात में आग जला दी। इस बार हम दोनों थे और रात का सन्नाटा था तथा उस सन्नाटे में जंगल के अनेकों कीड़े-मकोड़ों की आवाज़ें मिली हुई थी।

हम व्हिस्की के छोटे-छोटे घूंट लेते रहे।

धीरे-धीरे शराब चढ़ने लगी।

चौथे पाली ने थैले में से प्रेमिका के पत्र निकाले और एक-एक करके आग में फेंकने लग पड़ा। आग की लपटें ऊंची उठी। मासूम से लड़खड़ाते लेलों की तरह सपने उन अक्षरों में जलने लगे। “भाई! समय इन पत्रों से आगे निकल गया है।” चौथा पाली रोने की मुद्रा में बोला। मैं उसकी बात को समझा नहीं था, मेरे चेहरे पर उलझन दिखाई देने लगी।

उसने आह भरने की तरह व्हिस्की का घूंट भरा, “बेटी ने मेरे सारे पत्र पढ़ लिये हैं।”

“क्या!” मेरे हाथों से शराब छलक गई। कोई जवान बेटी पिता की प्रेमिका के पत्र पढ़े, यह बात मेरी सोच से बाहर थी। मैंने गिलास नीचे रख दिया और रूमाल से हाथ साफ़ करते हुये पूछा, “तुमने पत्रों को छुपा कर नहीं रखा था?”

“छुपाये थे, परन्तु उसे मालूम नहीं कहां से मिल गये।”

मैं चौथे पाली की बात सुन कर गुमसुम बैठा था। मैंने जल्दी से गिलास खाली करके पैग तैयार किए और एक गिलास उसकी तरफ़ कर दिया। उसने गिलास पकड़कर घूंट भर लिया और पहले गिलास की बची हुई व्हिस्की उस गिलास में उलट दी। फिर बुझी हुई आवाज़ में बोला, “मालूम है, पत्रों को वापिस करते हुये बेटी ने मज़ाक किया – पापा, आप लोग किस तरह के फिज़ूल पत्र लिखते थे – रातों को नींद नहीं आती। जब से तुम्हें देखा है खाना-पीना भूल गया हूं। मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगा …. ओ शिट। वह हाथ पर हाथ मार कर खूब हँसी और फिर गंभीर होती हुई बोली – हम तो बिल्कुल भी इस तरह की फ़िजूल बातों में नहीं पड़ते। हम तो….।” बेटी की बात बताते हुए वह भावुक हो गया। उसने बात अधूरी रहने दी।

प्रेमिका के अंतिम कुछ पत्र मैंने उसके आगे से उठाये और इक्ट्ठे करके आग में फेंक दिये। पत्र लपटें मार कर राख हो गये परन्तु आग जलती रही।

वह ख़त कच्ची उम्र की मासूमियत के दस्तावेज़ थे। इस मासूमियत की संभाल का किसी के पास भी कोई योग्य प्रबंध नहीं था। अरीत के मेरे नाम लिखे हुए पत्र भी बालकोनी के ऊपर फालतू सामान वाले एक टूटे-फूटे बॉक्स में पड़े थे। वह ख़त मैंने पढ़ने तो क्या थे, बहुत सालों से देखे भी नहीं थे। क्या मालूम, उन पत्रों को अब तक दीमक खा गई हो।

चौथा पाली झुक कर कुछ समय गुमसुम बैठा रहा, फिर धीरे से बोला, “होना तो ऐसा चाहिये कि कोई इस तरह का अजायब घर हो जहां पर हर कोई अपने प्रेम-पत्र जमा करवा सके। जब किसी का मन करे वहां जाकर अपने पत्र पढ़ ले, देख ले या वैसे ही अनदेखे पड़े रहने दे।”

मैंने उसका कन्धा थपथपाया जैसे डोले हुए मन को हौसला दे रहा हूँ।

उसने आग में से एक कोयला उठाया और हरे घास पर लाइन खींच दी, कोयला वापिस आग में फेंक कर उसने पूछा, “भाई! तुमने तो अरीत के पत्रों के बारे में कुछ बताया ही नहीं। क्या तुमने पत्र फाड़ डाले?”

मुझे लगा, मैं उसके घर पर मातम पर बैठा हुआ था और उसने किसी मरे हुए का ज़िक्र शूरू कर दिया था। मुझे कोई जवाब नहीं सूझा था। मातम की चुप्पी बहुत लम्बी हो गई थी। उसने फिर से अपना सवाल नहीं दोहराया था। शायद उसने स्वयं ही जान लिया था कि इस तरह के पत्रों को व्‍यक्‍त‍ि नहीं फाड़ता, समय फाड़ता है।

मैं जो कि पांचवां पाली था, मेरे पास पड़े हुए अरीत के पत्रों को समय कब का फाड़ चुका था।

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