आज भी असहाय है नारी एक कटु सत्य

-बलवीर बाली

भारतीय नारी की सदा यह विशेषता रही है कि भारतीय पुरुष समाज तथा नारी समाज में नारी अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति की मानी गई है। यद्यपि धार्मिक भावना दोनों में प्रबल रूप से विद्यमान् है। कहते हैं न जैसे हर सफल पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ होता है ठीक उसी प्रकार यद्यपि सभी धार्मिक कार्य पुरुष समाज द्वारा पूर्ण किये जाते हैं परन्तु वह धैर्य जिसके बिना धार्मिक कार्य पूर्ण नहीं होते, अत्यधिक मात्रा में स्त्रियों में ही पाया जाता है, इसी कारण कहा गया हैः

नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्‍वास रजत, नग, पग तल में,

पीयूष स्त्रोत सी बहा करो,

जीवन के सुन्दर समतल में

इतनी विविधता धारण किये हुए है नारी कि हम उसकी कलपना भी नहीं कर सकते। कहीं तो नारी प्रेम की प्रतिमूर्ति है तो कहीं नारी ने रानी लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगना का रूप धरा है। इतिहास साक्षी रहा है कि समय के साथ-साथ नारी ने अपने व्यक्‍त‍ित्व में जितना सम्भव हो पाया, परिवर्तन किया है। परन्तु उल्लेखनीय है कि भारतीय नारी ने अपनी पहचान नहीं भूली, वह उस समय भी धार्मिक थी आज भी धार्मिक प्रवृत्ति की है और कल भी यानि भविष्य में भी धार्मिक प्रवृत्ति की ही रहेगी। आज यद्यपि विज्ञान का युग है तथा नारी ने समय की मांग को समझते हुए, अपने में व्यापक परिवर्तन किया है। परन्तु फिर भी आज सम्पूर्ण विश्‍व में भारतीय नारी की अपनी ही एक छवि है और वह छवि है भारतीय धार्मिक नारी की। इसी कारण आज भारतीय नारी को सम्मान की दृष्‍ट‍ि से देखा जाता है।

आज नारी प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, प्रत्येक क्षेत्र में वह पुरुष समाज को चुनौती दे रही है तथा कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि आज पुरुष समाज ने दबे स्वर में नारी समाज की दक्षता को स्वीकारना भी शुरू कर दिया है। आज कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा जहां नारी ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ न करवाई हो, यहां तक कि धार्मिक क्षेत्रों में भी पुरुष समाज की चली आ रही धौंस को समाप्‍त कर दिया है। आज नारी ने पुरुष समाज का आधिपत्य समझे जाने वाले कर्मकाण्डी क्षेत्र में भी अपनी सहभागिता निभानी शुरू कर दी है। बहुगुण सम्पन्न है नारी। परन्तु इतनी सदियों पुरानी चली आ रही पुरुष जाति की धौंस आज भी कई जगह नारी जाति को इतनी अधिक प्रभावित कर रही है कि आज के युग की आधुनिक नारी जो अपने अधिकारों की प्राप्‍त‍ि के लिए प्रयत्‍नशील है, पुनः उसी सदियों पुराने समाज की एक दासी प्रतीत होती है जो केवल मात्र अपनी सुविधाओं के लिए पुरुष समाज प्रयोग करता था।

आज यद्यपि नारी समाज ने प्रशंसनीय उन्नति की है, उसे आज जितनी सफलता मिली है, शायद उतनी कभी भी प्राप्‍त‍ न की हो, परन्तु क्यों वह कई जगह आज भी असहाय सी लगती है। आज के युग की मुख्य पहचान, मौलिक अधिकारों की ही अभी प्राप्‍त‍ि नहीं कर पाई नारी। भारत को तो 200 वर्षों बाद आज़ादी मिल गई, परन्तु नारी जाति को आज़ादी कब मिलेगी जोकि सदियों से पुरुष समाज के अधीन है। क्या नारी जाति कुछ कर पाएगी। रानी लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगना क्यों आज अपनी स्वतंत्रता के मामले में चुप्पी साधे है। स्वतंत्रता हनन कई रूपों में हो रहा है, मसलन आज भी नारी अपने घर के निर्णय स्वयं न लेकर घर के पुरुष सदस्य पर छोड़ देती है, वह क्यों अपनी भावनाओं की अभिव्यक्‍त‍ि नहीं कर पाती। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण पंचायतों तथा नगरपालिका चुनावों में मिलता है, जहां स्वतंत्रता के नाम पर महिला प्रत्याशी खड़ी होती हैं। परन्तु जीतने के बाद सभी निर्णय उनके पारिवारिक पुरुष सदस्यों द्वारा लिए जाने लगते हैं, क्या यह नारी जाति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं? आज भी अधिकतर महिलाओं से विवाह के समय उनकी राय नहीं सुनी जाती कि क्या वह उक्‍त पुरुष से विवाह करना भी चाहती है या नहीं। कभी नारी की सहमति नहीं ली जाती परिवार के कल्याणार्थ कार्यों के लिए, बल्कि उसे केवल उपभोग की वस्तु समझा जाता है, इसीलिए हम 100 करोड़ हो चुके हैं। इतिहास साक्षी रहा है कि सदा नारी को केवल मनोरंजन का साधन माना गया है, क्या यह नारी जाति की सदियों की ग़ुलामी नहीं। स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं। नारी जाति के अधिकारों की दुहाई देने वाले आधुनिक पुरुष समाज में आज भी नारी जाति की स्वतंत्रता का प्रतीक 33 प्रतिशत आरक्षण बिल पास नहीं हो पाया। क्या यह भारतीय नारी के स्वतंत्रता प्राप्‍त‍ि के अधिकारों का हनन नहीं।

हम यह नहीं कह सकते कि भारतीय नारी आज भी वही 18वीं शताब्दी की नारी है। जी नहीं, आज की भारतीय नारी घर की चौखट को छोड़ कर समाज का निर्माण कर रही है तभी तो कहा गया है कि पुरुष व नारी एक ही रथ के पहिये हैं, अथवा घड़ी की दो सुइयां। हमने आधुनिक नारी का वह दुखद रूप भी देखा है जिसको आज हम भूल रहे हैं, परन्तु एक ऐसा वर्ग है जो आज भी अन्याय की चक्की में पिस रहा है। भारतीय नारी की हार्दिक इच्छा होती है कि वह एक विवाहित जीवन व्यतीत करे, मां बने, बच्चे खिलाए, वह जब तक जिये अपने सुहाग के साथ रहे, वह सदा सुहागन रहे। इसी कारण भारतीय नारी का करवाचौथ का व्रत पूरी दुनियां में मशहूर है। परन्तु कितने खेद की बात है कि आज हम 21वीं सदी में पहुंचने के बावजूद नारी के उस रूप का तिरस्कार करते आ रहे हैं जो वह खुद नहीं चुनती अपितु भाग्यवश धारण करती है, ‘वैधव्य’। आज नारी के इस रूप पर दृष्‍ट‍ि डालने वाला कोई नहीं हैं, यद्यपि आज से दो शताब्दी पुर्व राजाराम मोहन राय ने नारी के इस रूप को मिटाने के लिए भरसक प्रयास किया था। परन्तु उस महान् पुरुष के बाद किसी ने भी इस ओर प्रयास नहीं किया। ज़रा सोचिए क्या बीतती होगी, उस नवयौवना पर जो अपने मन में हज़ारों उमंगें लेकर अपने प्रियतम के घर जाती है। अभी उमंगें पूरी भी नहीं होती कि वैधव्य रूपी ग्रहण उनकी ज़िंदगी में लग जाता है। क्यों अपेक्षा-उपेक्षा में परिवर्तित हो जाती है, आख़िर इसमें नारी का क्या दोष? उसका तो जीवन आज के आधुनिक युग में भी नारकीय बन जाता है और उस पर पुरुष समाज की दहशत। यद्यपि संविधान में यह घोषित है कि विधवा महिला पुनः विवाह कर सकती है, परन्तु आप खुद ध्यान दीजिए, आज कितने विधवा विवाहों के बारे में हम सुनते हैं, इस क्षेत्र में आज तक इतने कम प्रयास हुए हैं कि नारी जाति कराह उठी है। इसी कराह में पुरुष समाज ने और भी वृद्धि कर दी, जब पुरुष समाज को ‘तलाक़’ जैसी सुविधा मिल गई। यद्यपि यह सुविधा नारी को भी मिली है, परन्तु देखने में आया है कि नारी समाज इस अधिकार का प्रयोग तब करता है जब पानी सर के ऊपर चला जाता है। प्रयोग तो करता है पुरुष समाज अपनी इच्छाओं की तृप्‍त‍ि के लिए। परन्तु शिकार होती है नारी जाति। एक वैधव्य तथा दूसरा तलाक़ जिस नारी के जीवन में घर कर जाए तो वह चाहे आज का युग क्यों न हो कभी पुष्पित नहीं होता। आज समाचार पत्रों में वर चाहिए वधू चाहिए के इतने विज्ञापन आते हैं, मैरिज ब्यूरो व निजी संपर्क माध्यम से संबंध बनाये जा रहे हैं, परन्तु विधवा महिला व तलाक़शुदा महिला के संबंध नाममात्र के लिए ही बनते हैं इसी कारण आज नारी जाति का काफ़ी बड़ा भाग इसी आपदा से ग्रस्त है। आज युवा वर्ग में वह जोश व समर्पण नहीं जो इन आश्रितों को आश्रय दे सके। आज नारी जाति इस कराह के बीच युवाओं की बांहों की प्रतीक्षा में कह रही है, ‘कब लोगे ख़बर मोरी राम।’ क्या राम, आगे आयेगा। क्या नारी के वह सपने पूरे होंगे जो दब जाते हैं समय की क़ब्र में, क्या नारी को आज की वास्तविक स्वतत्रंता का रसवादन करने को मिलेगा। यह कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं जो आज की नारी को न चाहते हुए भी असहाय बना देते हैं, क्या यह एक कटु सत्य नहीं।

 

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