आधुनिकता और संस्कृति के बीच फँसी नारी

-श्रीमती मृदुला गुप्‍ता

“मैं आज जो भी हूँ और भविष्य में बनने की आशा करता हूँ उसके लिए मैं अपनी देवी समान माता का ऋणी हूँ”-अब्राहिम लिंकन।

“हर सफल व्यक्‍त‍ि के पीछे किसी न किसी औरत का हाथ है।”

उपरोक्‍त‍ शब्दों से नारी के महत्त्व का पता चलता है अपने जीवन काल में नारी विभिन्न रूपों में सामने आती है। एक ओर बेटी और बहन बनकर पिता के घर में स्नेह का अमृत बहाती है तो वहीं दूसरी ओर पत्‍नी और माँ बनकर ससुराल में प्रेम और स्नेह लुटाती है। एक तरफ़ जहां वह अपने सम्मान की रक्षा के लिए रानी पदमावती बनकर स्वयं को जौहर की आग में झोंक देती है, वहीं दूसरी ओर पत्‍नी के रूप में अपने देश व पति के मान की रक्षा के लिए सारन्धा बन अपने पति व खुद को मारकर जीवन बलिदान करती है। एक ओर जहां वह वीर राजपूतनी बनकर युद्ध से भागकर आये भाई को दोबारा युद्ध में जाने के लिए प्रेरित करती है, वहीं दूसरी ओर माँ के रूप में पन्ना धाय बनकर देश के भावी सम्राट को बचाने के लिए अपने पुत्र के जीवन का बलिदान करती है।

मगर समय के साथ हमारे समाज में आये परिवर्तन के साथ ही साथ नारी के जीवन में भी काफ़ी बदलाव आया है। आज के बदलते परिवेश में अब नारी मात्र चार दीवारी में ही क़ैद होकर नहीं रह जाती घर से बाहर भी वह अपनी एक अलग पहचान बनाती है वह पुरुष की सहचरी है। शारीरिक रूप से पुरुष से कमज़ोर होते हुए भी वह अपनी आत्मिक शक्‍त‍ि के बल पर जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल हुई है। घर के अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए घर के बाहर भी अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में सफल हुई है। मगर इस दोहरे उत्तरदायित्व को पूरा करते हुए वह ‘आधुनिकता और अपनी संस्कृति के बीच स्वयं को फँसा हुआ पाती है। वह अपनी संस्कृति और संस्कार जो उसे जन्म से ही अपने परिवार से मिलते हैं, न तो उन्हें छोड़ पाती है और न ही आधुनिकता के नाम पर मिले घर और बाहर के दोहरे उत्तरदायित्व को।’

संस्कृति के नाम पर उससे अपेक्षा की जाती है कि वह घर के सभी कार्यों को कुशलता पूर्वक करे, बड़ों की किसी ग़लत बात को भी सिर झुकाकर स्वीकार करे, उसको बड़ों के सामने जवाब देने का अधिकार नहीं। वहीं आधुनिकता के नाम पर उससे अपेक्षा की जाती है कि घर के बाहर जाकर कार्य करे ताकि परिवार की आर्थिक रूप से मदद हो क्योंकि परिवार का उत्तरदायित्व उसका भी है मगर साथ ही साथ उसको स्वतंत्र निर्णय लेने या बाहर के लोगों से अपनी इच्छा से मिलने का अधिकार नहीं है, क्योंकि यह हमारी संस्कृति के ख़िलाफ़ है भले घर की बहू-बेटियां ऐसा नहीं करती ऐसा कहकर उसके सम्मान पर प्रश्‍न चिन्ह लगा दिया जाता है।

ऐसे में आधुनिकता और अपनी संस्कृति के बीच फँसी आज की नारी क्या करे? यह सवाल उठना स्वाभाविक है। इसके लिए आवश्यकता है कि हमारे समाज को अपनी संकुचित विचारधारा में परिवर्तन लाना होगा। बहू और बेटी के फ़र्क़ को समाप्‍त कर दोनों को उचित सम्मान देना होगा और उसके साथ पूरा सहयोग करते हुए उसके स्वतंत्र रूप से लिये गये निर्णय का सम्मान करना होगा। केवल तभी वह अपने घर और बाहर के दोहरे उत्तरदायित्वों को कुशलता के साथ निभायेगी।

मगर समाज व परिवार के साथ नारी को भी अपनी विचारधारा में परिवर्तन लाना आवश्यक है। उसे आधुनिकता की परिभाषा का अभिप्राय समझना होगा। आधुनिकता का अभिप्राय अपने कर्त्तव्यों व उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़कर घर-परिवार से बाहर जाकर होटल, रेस्टोरेंट, एवं डिस्को में जाना, मौज-मस्ती करना और अपने बुज़ुर्गों की नसीहतों को पुराने ज़माने की सड़ी-गली विचारधारा कह कर उनका अपमान करना नहीं वरन् अपने सभी उत्तरदायित्वों को पूरा करते हुए घर में व बाहर सभ्य और शालीन व्यवहार करते हुए अपनी स्वतंत्रता का उपभोग करना है।

आधुनिकता और अपनी संस्कृति के बीच फँसी आज की नारी को हार माने बिना अपने व्यवहार व विचारधारा में ऐसा परिवर्तन लाना होगा कि वह नारी जाति की गरिमा को बनाये रखने के साथ ही साथ आधुनिकता को भी अपनाये और अपने इस दोहरे उत्तरदायित्व को कुशलता के साथ निभाते हुए सभी की प्रशंसा का पात्र बने तभी उसको आंतरिक संतुष्‍ट‍ि प्राप्‍त होगी। 

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