अब तो कुछ सोचो

Ab Toh Kuch Socho File

-दीपक कुमार गर्ग

अगर कन्या भ्रूण हत्याओं का दौर इसी प्रकार चलता रहा तो 2035-2050 तक हालात बेहद भयंकर हो जाएंगे। आज जिन महिलाओं को ‘वुमेन ऑन टॉप’ जैसे ख़िताब दिये जा रहे हैं, उनकी स्थिति नीचे की ओर जाने लगेगी। हालांकि कन्या भ्रूण हत्या के कारण महिलाओं या लड़कियों की गिनती बेहद कम हो चुकी होगी, लेकिन जो महिलाएं या लड़कियां होंगी, उनका जीवन भी नर्क के समान हो जाएगा, क्योंकि ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली स्थिति बन जाने के कारण जैसे ही कोई लड़की या महिला, जो कि जवान या आकर्षक होगी, अपने घर की दहलीज़ से बाहर पांव रखेगी तो उसे लड़कियों की कमी के कारण यौन भूख से बेहाल पुरुष और लड़के, शिकारी कुत्तों की तरह झपटने को तैयार मिलेंगे।

अविवाहित और यौन भूख से बेहाल ये पुरुष कई प्रकार के नशों व बुराइयों का भी शिकार हो चुके होंगे। इनको बहन या मौसी आदि रिश्तों के न अर्थ मालूम होंगे न रिश्तों की पवित्रता। शादी न हो पाने के कारण उन्हें पत्‍नी का अर्थ भी नहीं पता होगा, क्योंकि सभी दोस्तों की टोली ही अविवाहित होगी।

ये बात समझ से परे है कि दुनियां को भविष्य की ख़ौफ़नाक तसवीर क्यों नहीं दिख रही है, क्योंकि यह दुनियां अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। अतीत की खोज में करोड़ों रुपये बर्बाद करने में लगे वैज्ञानिकों ने अल्ट्रासाउण्ड की खोज को भविष्य ख़राब करने का माध्यम बना दिया है। महिला ही महिला की दुश्मन बन गई है, डॉक्टर शरीफ़ डाकू बन गये हैं, जैसे डाकू लोगों को क़त्ल करके लूटते थे, उसी प्रकार आज के युग में कुछ डाकू रूपी डॉक्टर कन्याओं का कोख में क़त्ल करके, दुनियां को लूट कर विनाश की ओर ले जाने में लगे हैं। दुनियां की स्थिति उस रेशम के कीड़े की तरह हो गई है, जिसे अपने आस-पास रेशम बुनने का सुख मिलता है, जो बुनता ही रहता है, यह भूलकर कि एक दिन वो रेशम के जाल में क़ैद होकर मर जाएगा। उसी प्रकार इस दुनियां के लोगों को केवल लड़कों की भीड़ इक्ट्ठा करने में सुख दिख रहा है, इसलिए ये दुनियां लड़कियों को नज़रअंदाज़ करके लड़कों का जाल बुन रही है, यही लड़कों का जाल एक दिन दुनियां को विनाश की ओर ले जाएगा। कोई वक़्त होता था, जब किसी गांव या शहर में गिनती करने लायक़ कुंवारे होते थे। ऐसे कुंवारे पूरे शहर में, पूरे गांव में प्रसिद्ध होते थे। यह बात भी नहीं थी कि तब लड़कियों की कोई कमी थी, लेकिन कुछ कारण ऐसे बन जाते थे कि कुछ नाम मात्र पुरुष कुंवारे रह जाते थे। ऐसे कुंवारों की स्थिति आम तौर पर फ़िल्मों के कॉमेडी कलाकारों की तरह होती थी। महिलाएं दूर खड़ी होकर ऐसे व्यक्‍त‍ियों का मज़ाक उड़ाती थी पर पास से गुज़रने से गुरेज़ करती थी।

लेकिन आगे ऐसा समय आने वाला है जब पूरे शहर और गांव के ज़्यादातर पुरुष कुंवारे होंगे। कोई एकाध भाग्यवान् को पत्‍नी सुख की प्राप्‍त‍ि हो सकेगी। कुछ गांवों में तो सभी कुंवारे मिलेंगे, ऐसे गांवों को कुंवारों का गांव जैसी ख्यातियां प्राप्‍त‍ होंगी। हालांकि तब तक तकनीक इतनी अधिक विकसित हो चुकी होगी कि पुरुषों को आम घरेलू कामों के लिए महिलाओं पर निर्भरता नहीं रखनी पड़ेगी। जबकि बीते युग के कुंवारे, महिला की अनुपस्थिति में अगर मां-बहन या भाभी न हो तो उन्हें यौन सुख से भी अधिक घरेलू कामों की परेशानी सताती थी। लेकिन 2035-2050 तक बढ़ चुकी कुंवारों की संख्या दुनियां के लिए परेशानी का कारण बन जाएगी, क्योंकि यौन सुख से वंचित ऐसे कुंवारे कई प्रकार के तनावों का शिकार हो जाएंगे। तकनीक आरामदायक स्थितियों को तो बढ़ा देगी, पर ख़ाली दिमाग़ों को शैतान का घर बना देगी। नशीली वस्तुओं का प्रयोग बढ़ जाएगा। वेश्याएं भी इतने अधिक कुंवारों की यौन भूख मिटाने के साथ-साथ उन्हें केवल और केवल लड़का रूपी संतान कहां से देंगी। हां एक बात ज़रूर सोची जा सकती है। संभव है तब तक वैज्ञानिक ऐसी नकली महिला बनाने में क़ामयाब हो जाएं जो दुनियां में बढ़ चुके कुंवारों की यौन भूख मिटाने के साथ-साथ उन्हें केवल और केवल लड़का रूपी संतान भी दे। लेकिन क्या ऐसी महिलाओं या संतान के पास भावनाएं, प्यार या ममता होगी। फिर क्यों हो रही हैं, आज कन्या भ्रूण हत्याएं। यदि हम कारण समझना चाहें तो कुछ कारण नज़र आते भी हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि किसी भी लड़की को जन्म लेते ही दहेज़ से तोला जाने लगता है तो लड़की के जन्म का मतलब है कि दहेज़ चाहिए। बिना दहेज़ ब्याही गई लड़कियां अक्सर ही बलि चढ़ जाती हैं। दहेज़ की मांग दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है, इस मांग को बढ़ाने के लिए नए-नए ढंग विकसित हो रहे हैं। हालांकि सरकार ने दहेज़ के लिए सख़्त कानून बना रखे हैं, फिर भी सरेआम इन कानूनों की धज्जियां उड़ती हैं। दूसरी बात लड़की जन्म तो ले लेती है लेकिन जन्म के साथ ही उसे समाज में छुपे कुछ वहशी दरिंदों से बचाना बेहद ज़रूरी हो जाता है। टी.वी. चैनलों और समाचार पत्रों में रोज़ाना बलात्कार की घटनाओं का ज़िक्र होता है। इन घटनाओं को देखकर हर मां-बाप के मन में यह डर पैदा हो जाता है कि कहीं मेरी बेटी के साथ भी ऐसा न हो जाए। हमारे देश के कमज़ोर कानून के चलते बलात्कारी या तो सज़ा से बच जाते हैं या फिर उन्हें बेहद कम सज़ा हो पाती है। जब तक ऐसे वहशी दरिंदों को सरेआम फांसी पर नहीं चढ़ाया जाएगा तब तक इन दरिंदों की हिम्मत बढ़ती ही रहेगी। अगर कोई लड़की ऐसे वहशी दरिंदों से बची रहे तो भी जैसे ही वह जवान होने लगती है वैसे ही समाज उसे वासना की नज़रों से देखने लगता है चाहे उसकी सोच, उसके चरित्र, उसके ख़्याल कितने भी अच्छे हों। उसको कई नाम दे दिए जाते हैं, मनचलों की नज़र में लड़की पुरज़ा, पटाखा, आतिशबाज़ी, फुलझड़ी बन जाती है। शायर उस पर शायरी करने लगते हैं। ज़्यादातर शायरों की शेरो-शायरी के पीछे उनकी पत्‍नी कम प्रेमिकाएं ज़्यादा होती हैं। लड़कियां बदनाम हो जाती हैं, शायर महान् बन जाते हैं। लड़की को चाहे अभी वासना का अर्थ भी ठीक से मालूम न हो, कुछ चेहरे उसमें वासना ढूंढ़ने लगते हैं। कच्ची कली की तरह पैरों के तले रौंद देना चाहते हैं। ऐसे लोग शारीरिक रूप से भले ही लड़की के साथ बलात्कार न कर सकें, नज़रों के बलात्कार का शिकार तो लगभग हर लड़की होने लगती है। लड़की चाहे सती-सावित्री ही क्यों न हो, हमारी गंदी मानसिकता वाला समाज उसे शक की नज़रों से देखने लगता है। जब तक लड़की की शादी न हो जाए तब तक तो वह शंका के घेरे में रहती ही है। शादी के बाद भी समाज बाज़ की तरह उस पर नज़र गढ़ाये रहता है। जब कोई लड़की या महिला बदनाम हो जाती है, टी.वी. चैनलों और मैगज़ीनों आदि के पत्रकार, मिर्च मसाला लगाकर ऐसी बदनामी के क़िस्से की चटनी बनाकर ही दम लेते हैं। क्या गुनहगार केवल लड़की या महिला ही होती है। क्यों समाज उसके साथ सौतेला व्यवहार करता है, लड़के क्यों नहीं लड़कियों की तरह समाज की नज़रों में चढ़ पाते। लड़कियों को हमेशा दबाव के अधीन रहना पड़ता है। लड़कों की तरह उन्हें निडर होकर जीने का हक़ नहीं है। अगर लड़का किसी लड़की के साथ रेप भी कर दे तो उसके परिवार वाले उसे माफ़ कर देते हैं, लेकिन रेप की शिकार लड़की परिवार वालों की नज़र में भी दोषी बन जाती है। रेप तो रेप ही है, दोष लड़के का, सज़ा लड़की को आख़िर क्यों?

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना ही नहीं, लड़के को जन्म देने वाली मां की खुराक भी, लड़की को जन्म देने वाली मां से बेहतर होती है। लड़के के जन्म पर पंजीरी, लड़की के जन्म पर सादा हलवा भी नहीं। मां की तरह लड़की की खुराक पर भी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता जबकि लड़के को चैंपियन बनाने के लिए उसे बचपन से ही टॉनिक पिलाने शुरू कर दिए जाते हैं। हालांकि होना इसके उल्टा चाहिए, लड़कियों पर हमेशा जुर्म का शिकार होने का ख़तरा मंडराता रहता है, इसलिए लड़कियों की खुराक पर बचपन से ही ध्यान देकर उन्हें संभावित ख़तरों का मुक़ाबला करने वाली चैंपियन बनाना चाहिए ताकि कोई बुरी नज़र उनकी तरफ़ आंख उठाकर भी न देख सके। अगर ऐसा होने लगेगा तो हर मां-बाप के दिल में लड़कियों के प्रति ख़तरों का शिकार होने का डर समाप्‍त हो जाएगा।

सरकार को भी कुछ सुझावों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। लड़की चाहे अमीर की हो, चाहे ग़रीब की हो, उसके लिए शिक्षा निःशुल्क कर दी जानी चाहिए। 1975 से पहले शिक्षा सस्ती थी, सरकारी स्कूलों में से डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक तक निकल आते थे। आज सरकारी स्कूलों में से डॉक्टर, इंजीनियर तो दूर की बात है, चपरासी भी मुश्किल से निकल रहे हैं। प्राईवेट स्कूलों पर अंकुश न होने के कारण, इनके संचालकों ने शिक्षा को महंगी बनाकर, करोड़ों रुपये कमाने शुरू कर दिए हैं। सरकार को कुछ ऐसे नियम बनाने चाहिए कि किसी भी तरह लड़कियों को सस्ती या निःशुल्क शिक्षा की प्राप्‍त‍ि हो। कोई ज़माना था, जब लड़की अनपढ़ भी हो तो अमीर घर की बहू बन जाती थी। लेकिल आज के युग में ग़रीब के लिए भी लड़की को पढ़ाना बेहद ज़रूरी हो गया है। पढ़ाई-लिखाई पर भारी ख़र्च करने पर भी लड़की ससुराल की अमानत होती है। अगर सरकार लड़कियों की पढ़ाई पर आने वाले शुल्क को नाम मात्र बना दे तो मायके वालों का बोझ कम हो जाएगा। लड़कियों के जीवन में सुधार से लोग भ्रूण हत्या की तरफ़ कम प्रेरित होंगे।

इसके अलावा बचपन से ही लड़कियों को जुडो-कराटे आदि सिखाने की योजना सरकार को बनानी चाहिए। इसके लिए स्कूलों में आवश्यक प्रबंध करने चाहिए। बीमार होने पर लड़कियों के लिए निःशुल्क इलाज और दवाओं का प्रबंध भी सरकार को करना चाहिए। वैसे तो भविष्य हमेशा भविष्य के गर्भ में रहता है, फिर भी स्थिति इस लेख के शुरू में लिखी गई लाईनों के उल्ट भी हो सकती है। संभावना व्यक्‍त‍ की जा सकती है कि 2035-2050 तक स्थिति ऐसी भी हो सकती है कि कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ रही तादाद के कारण लड़कियां घट रही हैं। लड़कियों की कम संख्या के कारण आने वाले समय में सभी महिलाएं, पुरुषों से बढ़कर ‘वुमेन ऑन टॉप’ का तगमा हासिल कर लें और पुरुष-महिला के पैर की जूती बन जाए, क्योंकि अब लड़कियां या महिलाएं कम होंगी तो समाज को उनकी क़दर मालूम होगी। हीरा भी अगर भारी मात्रा में मिलने लगे तो कोयला बन जाएगा। हीरे की क़दर इसलिए है, क्योंकि हीरा दुर्लभ है। आज जिसके पास हीरा है, उसे भाग्यवान् समझा जाता है, क्योंकि हीरा हर कोई प्राप्‍त नहीं कर सकता है। भविष्य में जिस घर में लड़की होगी या जिस घर में बहू होगी, वह घर क़िस्मत वाला माना जाएगा, बेटियां कम होंगी तो बहुएं भी कम ही होंगी। आजकल शादी के लिए लड़के लड़कियों को पसंद करते हैं। भविष्य में लड़कियां लड़कों का चुनाव किया करेंगी। एक संभावना यह भी है कि लड़कियां अपने ससुराल वालों से दहेज़ मांगें, सास-ससुर को दरबान बनाकर रखें और पति को हुक्म का गु़लाम ……. ।

स्थिति चाहे कोई भी हो, कन्या भ्रूण हत्या के नतीजे बुरे ही निकलेंगे, इसलिए अब तो कुछ सोचो।                          

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