प्यार और धर्म के क्षेत्र में ठगी जाती है नारी

 

-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

प्रकृति ने सृष्‍ट‍ि में नारी को कोमलांगी, सुन्दर, एवं सुशील होने के साथ-साथ संवेदनशील विनम्र और भावुक भी बनाया है। वह चंचल, मधुर और प्रिय भाषी है। नारी पुरुष से शारीरिक और मानसिक तौर पर कहीं भी निर्बल नहीं बौद्धिक स्तर पर वह मर्द को पछाड़ने की क्षमता रखती है। परन्तु अपने चंचल और भावुक स्वभाव के कारण कई बार जीवन की दौड़ में पुरुष से मात खा जाती है। विशेष कर प्रेम के क्षेत्र और धर्म की आड़ में वह लुट जाती है।

यौवन की दहलीज़ पर पहुंचते ही उसके मन में भी पुरुष से मित्रता करने की अभिलाषा जागृत होती है। वह जिसके पास रहती है जिस व्यक्‍त‍ि के संसर्ग में ज़्यादा देर रहती है, जो उसके सौन्दर्य की चाहे अंट-छंट ही प्रशंसा करता है, वह उसकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ जाती है और उसकी ओर आकर्षित होने लगती है तथा धीरे-धीरे उसके चंगुल में फंसती चली जाती है। उसकी अवस्था उस गले-सड़े पेड़ के साथ लता की भांति लिपटने जैसी हो जाती है। वह उस चालाक और धूर्त पुरुष के अन्तर्मन को पहचानने में असमर्थ रहती है जो उसे फंसाने के लिए खूब सब्ज़बाग दिखाता है, वह गोरा-काला, छोटा-बड़ा, रिश्तेदार या भाई का दोस्त कोई भी हो उसे अपना सखा मान लेती है। महान् नाटककार शेक्सपीयर का कथन है कि नारी जिस पुरुष के साथ लगातार एक सप्‍ताह अकेले संसर्ग कर ले उस पर भी आंशिक प्रेम दर्शा डालती है। अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण वह प्यार में अपार धोखा खाती है। उसे मुहब्बत के उन्माद में खरे-खोटे की परख नहीं होती। कमसिन बाला से लेकर हर वर्ग की नारी प्रेम उत्पीड़न का आघात सहती है। प्यार की उत्तेजना, जवानी का खुमार और लोलुप कामुक मृगतृष्णा में उसके पास तर्क-विवेक और मानसिक चेतना आलोप हो जाती है। वह निर्णय इतनी शीघ्रता से लेती है कि सब गुड़-गोबर हो जाता है। वह प्यार में लुटकर अपनी ज़िन्दगी को ग्रहण लगा लेती है।

नारी अपनी ज़िन्दगी का फ़ैसला करते समय हमेशा से चूकती रही है और आज तक चूक रही है। नारी हठ इतना बलवान होता है कि वह अपने सही या ग़लत फ़ैसले पर अड़ी रहती है ऋषियों-मुनियों को भी अपनी ज़िद्द के आगे मजबूर कर सकती है। दैत्य गुरु शुक्राचार्य की बेटी देवयानी ने अपने पिता के शिष्य से जो संजीवनी विद्या को सीखने आया था उससे विवाह करने की ठान ली।

पुरातन काल का एक और उदाहरण देवर्षि दुर्वासा की पुत्री शकुन्तला राजा दुष्यंत पर मर मिटी और उसकी दी हुई अंगूठी को तोहफ़ा मानकर उसे सच्चा प्रेमी समझने लगी। यह श्राप समझिए या सत्य कथन दुर्वासा जी ने कहा था कि वह राजन है, तुम्हें भूल जाएगा। वही हुआ जो कहा गया था। राजा सलवान की पत्‍नी लूणा का पूरन की ओर आकर्षित होना बेशक हम यह कहें कि ‘हाण नूं हाण प्यारा’ परन्तु पूरन तो उस समय बिलकुल प्रणय-बंधन की स्थिति में नहीं था। मध्ययुग में अल्तमश की पुत्री रज़िया का हब्शी याकूत का हाथ थाम लेना अन्धा प्रेम ही था।

पृथ्वी राज चौहान रिश्ते में जयचन्द का चचेरा भाई था, अपने रिश्ते में चाचा के साथ संयोगिता ने शादी रचा ली और भारत की बदनसीबी शुरू हो गई राजाओं के वैमनस्य से। मॉर्डन लड़कियां वेलेन्टाइन-डे मनाकर बेशक अपने प्रेम संबंधों का इज़हार करती फिरें परन्तु आधुनिक लड़कियां यह भूल जाती हैं कि वे जिस पर राई जितना भी सन्देह नहीं करती वहां उनके प्रेमी उन्हें पहाड़ जितना धोखा देते हैं।

फ़िल्मों की तरह, एक थाली, एक कटोरे और नीले आकाश के तले जीवन नहीं गुज़ारा जा सकता। आजकल की कॉलेज की लड़की अपने आप को जितनी मर्ज़ी समझदार माने परन्तु प्रेम की अन्धी गली में चलते-चलते वह इतनी मदहोश हो जाती है कि प्रेमी का नाम पता, कारोबार पूछे बग़ैर ही उसके झांसे में आकर सब कुछ गंवा चुकी होती है। कई बार तो वह सुनहरे सपने दिखाकर गधे के सींगों की माफ़िक़ ग़ायब हो जाता है। लाख अतिपात के बाद भी वह प्रेमी के सम्मुख हथियार डाल देती है उसे तब पता चलता है जब पेट में भ्रूण हरकत करने लगता है। तब गर्भपात या आत्महत्या के सिवा उसके अन्धे प्रेम का अन्त और कुछ नहीं हो सकता। आधुनिक युग में कौन-सा युवक प्यार और मुहब्बत के प्रति वफ़ादार है। लड़की को फंसाते समय तो सभी स्वर्ग बसाने के प्रलोभन देते हैं, आकाश से तारे तोड़ कर लाने के वायदे करते हैं, परन्तु जब जी भर जाए तो कहीं और आंख लड़ाते फिरते हैं। सोहनी पर मरने वाला न कोई महिवाल है न शीरी के लिए फ़रहाद, अब न कोई सस्सी का पुन्नू है और न लैला का मजनूं।

अकसर नारी के साथ धोखा इस हद तक हो जाता है कि उसे ताउम्र झेलना पड़ता है। कहीं-कहीं सुनने में आता है कि लड़की ने नाजायज़ बच्चे को जन्म देकर फेंक दिया। अपने प्रेमी की करतूत का फल उस बेचारी को भुगतना पड़ता है।

कुछेक स्थानों में अस्पताल में नाजायज़ बच्चों को जन्म देकर कुंवारी माताओं के आलोप हो जाने की घटनाएं भी सुनने में आई हैं। उनके लिए और क्या चारा था। प्रेम की अंधी गली का यही तो परिणाम है। कई लड़कियां झूठी फ़िल्मी कम्पनी के झांसे में अभिनेत्रियां बनने के लालच में मुम्बई के वेश्यावृति के अड्डे पर पहुंच गई। इस तरह का अन्धा प्रेम और विश्‍वास नारी जाति के लिए अति घातक है।

धर्म के विषय में तो नारी शोषित होती है और लुटपुट जाती है। धर्म के प्रति अन्धी आस्था नारी जीवन को कठिनाइयों से भर देती है। वर्तमान और भविष्य की चिन्ता में वह अपने पति और परिवार के सुख की कामना में धर्मस्थलों में माथा रगड़ती है। वह केवल श्रद्धा, दया और उदार हृदय ही नहीं रखती। धनदान, वस्त्रदान, अनाज दान देकर पुण्य प्राप्‍त करने का प्रयत्‍न करती है। साधुओं, पीरों-फ़क़ीरों को भिक्षा देकर उसके मन को शान्ति मिलती है। इस होड़ में साधारण नारी नहीं अपितु स्वयं परमेश्‍वरी भी शामिल है। मां सीता दुष्‍ट रावण को साधु भेष में भिक्षा देने के लिए लक्ष्मण रेखा को पार कर गई थी। बाद में इसका अंजाम सबके सामने खुला हुआ है। साधारणतयः नारी के मन में परिवार और पति के अनिष्‍ट की शंका बनी रहती है। वह कभी असाध्य रोग के निवारण हेतु तो कभी संतान प्राप्‍त करने हेतु मन्दिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों में शरण लेती हैं। पाखंडी फ़क़ीरों, तान्त्रिकों और सन्यासियों के डेरों पर जाकर अपनी अस्मिता को लुटा बैठती है। धर्म के प्रति आस्था अच्छी बात है परन्तु आडम्बर और अंधविश्‍वास और रूढ़िवादिता अहितकर है। अब कोई असाध्य रोग छू-मंत्र करके ठीक नहीं होता और न ही डेरों से सेब का प्रसाद लेने से पुत्र की प्राप्‍त‍ि होती है। नारी को विकासवादी और वैज्ञानिक सोच रखनी होगी। भारतीय नारी वीरांगना है, उसकी राष्‍ट्रीय भावना लक्ष्मीबाई जैसी और क़ुर्बानी पन्नाधाय जैसी होनी चाहिए। उसका स्वर लता मंगेश्कर जैसा, उसकी दौड़ पी.टी. उषा तथा सुनीता रानी जैसी, उड़ान कल्पना चावला जैसी, हिम्मत किरण बेदी जैसी, लगन भावना गर्ग की माफ़िक़ होनी चाहिए। नारी को अपनी शक्‍त‍ि को पहचानना होगा। तभी वह मेरी क्यूरी, श्रीमती एन्नी वेसेंट, मदर टरेसा तथा इन्दिरा गाँधी जैसी बन सकती है।   

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