जीने का सहारा

Jeene Ka Shara Story File

-डॉ.प्रेमपाल सिंह वाल्यान

एक चर्मकार था- जूता बनाने वाला। उसका नाम साइमन था। उसका न अपना मकान था न अपनी ज़मीन। वह अपनी पत्‍नी के साथ एक किसान के घर में रहता था। जूते बनाने से उसकी इतनी ही आय होती थी कि दोनों का शाम का भोजन चल जाए। रोटी महंगी थी। काम सस्ता था।

साइमन के पास भेड़ के चमड़े से बना एक कोट था। इस कोट को पति-पत्‍नी दोनों पहना करते थे। यह कोट अब चिथड़ों में परिणत हो चुका था। साइमन पिछले साल से ही एक नया कोट बनाने के लिए भेड़ का चमड़ा ख़रीदने की सोच रहा था, किन्तु इतने पैसे बच ही नहीं पाते थे कि वह चमड़ा ख़रीद सके।

जाड़े का मौसम आ गया। साइमन की पत्‍नी के बक्से में तीन रूबल (रूसी सिक्का) थे। गांव में किसानों के जूते की क़ीमत पांच रूबल और पच्चीस कोपेक बाक़ी थे। एक दिन सुबह-सुबह साइमन अपनी पत्‍नी के तीन रूबल लेकर गांव की ओर चल पड़ा। उसने सोचा, किसानों से बाक़ी पैसे मिल जाएंगे तो मिला-जुलाकर नए कोट के लिए भेड़ का चमड़ा ख़रीदा जा सकता है। ठंड से बचने के लिए उसने कमीज़ के ऊपर पत्‍नी का जैकेट पहना, उसके ऊपर लॉन्ग कोट पहन लिया और अपनी लंबी छड़ी लेकर चला जा रहा था।

गांव में जिन किसानों के यहां पैसे बाक़ी थे, उनमें से किसी ने उसे पैसे नहीं दिए। एक की पत्‍नी ने कहा- “पति दूसरी जगह गए हैं। आएंगे तो एक हफ़्ते के अंदर पैसे भेज दूंगी।” दूसरे ने भगवान् की क़सम खाते हुए कहा- “मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं। जूते की मुरम्मत के ये 20 कोपेक अभी ले लो।”

तब साइमन ने सोचा, चलें, चमड़े वाले से उधार मांगकर देखें, किंतु चमड़े के दुकानदार ने टका सा जवाब दिया- “नहीं, पैसे ले आओ, फिर जो चाहे ले जाओ। मैं जानता हूं, उधार किस तरह बढ़ता जा रहा है।”

इस प्रकार साइमन को कुछ नहीं मिला। 20 कोपेक और एक किसान के खोल लगाने के लिए जूते लेकर चल पड़ा। एक हाथ में एक जोड़ा जूता और दूसरे हाथ में छड़ी। वह शहर आ गया। यहां 20 कोपेक साइमन ने शराब पर ख़र्च कर दिए। वह वोदका पी गया।

अब अपने से बात कर रहा था- मैंने भरपेट पी लिया है। मेरी नस-नस में गर्मी आ गई। मुझे भेड़ के चमड़े की अब कोई ज़रूरत नहीं है। मैं अपना सारा दुःख भूल गया। वाह! मैं भी क्या आदमी हूं, लेकिन एक बात है, जब मेरी पत्‍नी को यह सब मालूम होगा तो वह जल-भुनकर ख़ाक हो जाएगी। वह कहेगी- “यह कितने शर्म की बात है। तुम जिसका काम करते हो वह तुम्हें उल्लू बनाता है।”

“तुम! तुम किसान! मेरे पैसे नहीं दोगे तो मैं तुम्हारे सिर पर से टोपी उतारकर अपने सिर पर रख लूंगा। भगवान् की क़सम खाकर कहता हूं, मैं ज़रूर यह काम करूंगा। मेरी हथेली पर 20 कोपेक रख दिए। 20 कोपेक से भला क्या होना है। पी गया ख़त्म हो गए तुम्हारे 20 कोपेक। ‘आज’ मैं मुसीबत में हूं। क्या मैं मुसीबत में नहीं हूं? तुम्हारे पास घर है। मवेशी है। सब कुछ है। तुम अपने गेहूं से स्वयं आटा तैयार कर रहे हो। मुझे ख़रीदना पड़ता है। रोटी के लिए मुझे डेढ़ रूबल ख़र्च करने पड़ेंगे। तुम मेरे पैसे क्यों नहीं दे देते? ….. ”

इस प्रकार अपने आप से सवाल-जवाब करता हुआ साइमन चला जा रहा था कि एक मंदिर के पास चमकती हुई किसी वस्तु पर उसकी नज़र पड़ी। उसने सोचा इस तरह का कोई पत्थर यहां पर नहीं है। लगता है यह गाय है किन्तु नहीं, इसका सिर गाय जैसा नहीं आदमी जैसा है।

Jeene Ka Shara Story File Imageवह और नज़दीक आ गया। उसने देखा एक बिलकुल नंगा आदमी मंदिर की ओर झुका हुआ है। एकदम निश्‍चल, ज़रा भी हिलता-डुलता नहीं। उसने सोचा शायद किसी ने सबकुछ छीनकर इसे जान से मार डाला है। और मार कर यहां रख गया है। यहां से चल देना चाहिए। वह आगे बढ़ गया। थोड़ी दूर जाने के बाद उसने चारों ओर देखा। उसे लगा- वह नंगा आदमी किसी की ओर देख रहा है। उसके मन में तरह-तरह के विचार आने लगे- पता नहीं, यह कौन है, क्या मुझे उसके पास जाना चाहिए। नहीं, हो सकता है, मैं मुसीबत में फंस जाऊं। हो सकता है, वह मुझे कूदकर दबोच ले, मेरा गला दबा दे। ऐसा न भी हो तो क्या। मैं नंगे आदमी के लिए कर भी क्या सकता हूं। क्या अपना फटा-चिथड़ा कोट उसे पहना दूंगा? भगवान् बचाए, यहां से किसी प्रकार सकुशल निकल जाऊं। बस।

साइमन तेज़ी से क़दम बढ़ाने लगा। कुछ दूर जाने पर उसके पांव रुक गए। उसकी अंतरात्मा कहने लगी- यह तुम क्या कर रहे हो साइमन? तुम्हारे सामने एक आदमी संकट में दम तोड़ रहा है और तुम उसे छोड़कर भागे जा रहे हो? तुम धनी हो गए हो क्या? तुम समझ रहे हो, वह तुम्हारी दौलत छीन लेगा? ऐसा नहीं होगा। जाओ, उसके निकट जाओ।

साइमन उस नंगे व्यक्‍त‍ि के पास चला गया। उस व्यक्‍त‍ि ने सिर उठाकर ऐसे मायूस और करुण दृष्‍ट‍ि से देखा कि साइमन द्रवित हो उठा। उसने अपना कोट उतारकर उसे देते हुए कहा- इसे पहन लो। किन्तु वह इतना कमज़ोर था कि उठ भी नहीं पा रहा था। साइमन ने उसे बांह से पकड़कर खड़ा किया और अपना कोट पहना दिया। जो जूते वह हाथ में लिए हुए था, उन्हें उसके आगे रखते हुए बोला- “बैठ जाओ जूते पहना दूं।” वह बैठ गया। साइमन ने उसे जूते पहनाए और पुनः बांह पकड़कर खड़ा करते हुए कहा- “यह छड़ी लो और मेरे साथ चलो।”

वह नंगा व्यक्‍त‍ि उसके साथ चलने लगा। अब वह सामान्य गति से चल रहा था- साइमन के साथ क़दम से क़दम मिलाकर। साइमन ने देखा, उसका शरीर बिलकुल स्वच्छ और स्निग्ध था। रास्ते में साइमन ने उसे पूछा- “कहां से आए हो?”

“मैं इस जगह का रहने वाला नहीं हूं।”

“यह तो मैं देख रहा हूं। यहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्‍त‍ि को पहचानता हूं। इस मक़बरे के निकट कैसे आए?”

“यह बात मैं तुम्हें अवश्य बताऊंगा।”

“किसी ने तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार किया है?”

“नहीं, मुझे अपने कर्म का फल मिला है।”

“हां, ईश्‍वर सर्वोपरि है। सबके सिर पर उसका हाथ रहता है।”

“कहां जाना चाहते हो?”

“जहां ईश्‍वर ले जाना चाहे।”

“हां, केवल ईश्‍वर जानता है, इस संसार में क्या हो रहा है, क्या होगा।” उस नंगे आदमी की वाणी में कोमलता और सरलता थी। साइमन को लगा- यह आदमी नेक और भला है। कोई बदमाश या लोफ़र नहीं है। उसने कहा- “मेरे घर चलो और अपने आप को गरमा लो।” तेज़ और ठंडी हवा साइमन की छाती से टकरा रही थी। वोदका की गर्मी बेअसर हो चुकी थी। वह काफ़ी ठंड महसूस कर रहा था। वह ज़ोर-ज़ोर से छींक रहा था। उसने अपनी पत्‍नी की जैकेट को कसकर लपेट लिया। जैसे कोई उसे कह रहा था- चले थे भेड़ का चमड़ा ख़रीदने। भेड़ का चमड़ा तो क्या मिला, पुराना कोट भी बदन पर नहीं है। अपने साथ एक नंगे आदमी को घर लिए जा रहा है। तुम्हारी पत्‍नी मैटरीना तुम्हारी तारीफ़ नहीं करेगी।

पत्‍नी का ख़्याल आते ही साइमन थोड़ा विचलित हो उठा किन्तु जब मंदिर के निकट उस नंगे आदमी की याद आई तो वह भीतर ही भीतर उल्लासित हो उठा।

साइमन की पत्‍नी मैटरीना साइमन की फटी हुई कमीज़ में पैबंद लगा रही थी। तभी बाहर की सीढ़ियों पर किसी की पदचाप सुनाई दी। उसने गलियारे से देखा साइमन एक अनजान व्यक्‍त‍ि के साथ आ रहा है उसके पैर में फटे जूते हैं और सिर पर टोपा नहीं है। पास आने पर मैटरीना सब समझ गई। साइमन पीकर आ रहा है। जब उसने देखा साइमन के हाथ में कुछ भी नहीं है, पुराना कोट भी देह पर नहीं तो उसका पारा गरम होने लगा। उसने सोचा सारा पैसा पी गया और एक आवारा के साथ घूम-फिरकर इसे साथ घर ले आया है।

साइमन उस अनजान व्यक्‍त‍ि के साथ कमरे के अंदर दाख़िल हो गया। उसने उस व्यक्‍त‍ि से कहा- “बैठ जाओ भाई। अब हम लोग खाना खाएंगे।”

साइमन ने मैटरीना से कहा- “मैटरीना, तुमने खाना बनाया है न। हम लोगों को खाना खिलाओ।”

मैटरीना उबल पड़ी- “हां, बनाया है लेकिन तुम्हारे लिए नहीं। तुम अपना होश-हवास पी गए थे। भेड़ के चमड़े का कोट लाने गए थे और अपना कोट भी गंवा दिया। बदले में एक नंगे भिखारी को साथ लेते आए। दो पियक्कड़ों को देने के लिए मेरे पास खाना नहीं है।”

“चुप भी रहो मैटरीना। तुम्हारी ज़ुबान चलती जा रही है। पहले पूछो तो यह कैसा आदमी है?” साइमन ने कहा। “तुम बताओ कि तुमने मेरे पैसों का क्या किया?” साइमन रूबल के तीन नोट खोलकर मैटरीना के हाथ में थमाते हुए बोला- “ये रहे तुम्हारे नोट। फोनोव ने पैसे नहीं दिए। कहा कि जल्दी ही दे दूंगा।”

साइमन ने अपना कोट उस नंगे आदमी को दे दिया था इससे मैटरीना और गुस्से में आ गई- “तुम्हें खाना नहीं मिलेगा। अपने पीछे दौड़ने वाले सभी नंगे भिखारियों को तुम खाना नहीं खिला सकते।”

“आह, अपनी ज़ुबान को लगाम दो मैटरीना, कोई सुनेगा तो तुम्हें क्या कहेगा।”

“क्या? एक पियक्कड़ की बात पर मैं ध्यान दूं। मैंने तुमसे शादी करने से इंकार कर दिया था। ठीक किया था मैंने। तुम। तुम शराबी। तुम भेड़ का चमड़ा ख़रीदने गए थे और सारा पैसा पी गए।”

साइमन मैटरीना को सब कुछ बताना चाहता था, किन्तु मैटरीना उसे बोलने का अवसर ही नहीं दे रही थी। उसने कहा- “अगर यह कोई भला आदमी होता तो इसके बदन पर कमीज़ तो होती। तुम बताते क्यों नहीं कि यह तुम्हें कहां मिला?”

“ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूं। साइमन ने मैटरीना को उस नंगे आदमी के बारे में सबकुछ बता दिया।” अंत में उसने कहा- “तुम्हीं कहो, यदि ईश्‍वर मुझे उसके पास नहीं भेजता तो क्या वह मर नहीं जाता? क्रोध न करो। यह पाप है। हम सबको एक दिन मरना है। क्या तुम्हारे दिल में ज़रा भी ईश्‍वर का ख़्याल नहीं है?”

साइमन की अंतिम बात से मैटरीना का क्रोध शांत हो गया। उसने उस अनजान व्यक्‍त‍ि पर नज़र डाली और विचलित हो उठी। वह रसोईघर में गई और प्लेट में रोटी लाकर दोनों के सामने रख दी। एक कटोरे में सब्ज़ी, एक छुरी और दो कांटे भी रख दिए। साइमन और अनजान व्यक्‍त‍ि दोनों खाने लगे। मैटरीना टेबल के एक किनारे दोनों कुहनियों के बीच सिर रखकर उस अजनबी की तरफ़ देखने लगी।

जब मैटरीना ने खाना लाकर सामने रखा था तो अजनबी पहली बार मुस्कुराया था। मैटरीना साइमन की एक पुरानी पैबंद लगी कमीज़ और एक पुराना पजामा ले आई और उस अजनबी को देते हुए बोली- “लो, पहन लो और जहां चाहो सो जाओ।” सुबह साइमन ने अजनबी से पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है?”

“माइकल।”

“तुम इतना तो समझते ही हो रोटी और कपड़े के लिए कुछ काम करना पड़ता है। तुम्हें भोजन और वस्त्र के लिए कुछ काम करना चाहिए। तुम कौन-सा काम जानते हो?”

“मैं कुछ नहीं जानता।”

“आदमी कोई भी काम सीख सकता है अगर वह चाहे।”

“मैं सीखूंगा। बताओ, मैं क्या करूं?”

“मैं तुम्हें जूते बनाना सिखाऊंगा। सीखोगे?”

“अवश्य। क्यों नहीं।”

साइमन माइकल को जूते बनाना सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में माइकल जूते का कुशल कारीगर हो गया। लोग उसके जूते पसंद करने लगे। उसके बनाए हुए जूते सुंदर, मज़बूत और टिकाऊ होते थे। साइमन को जूते बनाने के ढेर सारे ऑर्डर मिलने लगे और वह अधिक सुख से रहने लगा।

एक दिन घोड़ा-गाड़ी पर सवार एक धनी मानी भद्र पुरुष जूता बनवाने के लिए साइमन के घर आया। उसने साइमन को ख़ास तरह का चमड़ा दिखाते हुए कहा- “यह चमड़ा तुमने कभी नहीं देखा होगा। क्या तुम इस चमड़े से मेरे जूते बना सकते हो? और हां, जूता ऐसा होना चाहिए जो एक साल तक टूटे नहीं, इसकी शक्ल-सूरत भी ज्यों की त्यों रहे। यदि एक साल के अंदर कोई ख़राबी आई तो तुम्हें जेल भेज दूंगा। नहीं तो 10 रूबल दूंगा।”

साइमन ने माइकल को बुलाकर चमड़ा दिखाया और धीरे से पूछा- “क्या यह काम हम मंज़ूर कर लें?”

माइकल उस भद्र पुरुष को नहीं, उसके पीछे कुछ देख रहा था। अनायास उसके चेहरे पर चमक आ गई और वह मुस्कुराने लगा।

इस बार वह दूसरी बार मुस्कुराया।

उसने साइमन से कहा- “स्वीकार कर लीजिए।”

अपने पैर की नाप देकर वह भद्र पुरुष चला गया। माइकल जूते बनाने लगा। एक दिन साइमन उसके पास आया और यह देखकर हैरान रह गया कि माइकल जूते के बदले स्लीपर बना रहा है। उसने कहा- “यह क्या कर रहे हो, माइकल? उस भद्र पुरुष ने जूते बनाने को कहा है। तुम स्लीपर बना रहे हो। तुमने चमड़ा बर्बाद कर दिया। मैं उस भद्र पुरुष को क्या जवाब दूंगा? मैं यही चमड़ा कहां से लाऊंगा? तुमने तो मुझे कहीं का नहीं रखा।” साइमन यह सब कह रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाज़ा खोलने पर साइमन ने देखा – सामने एक नौकर जैसा छोकरा खड़ा है। उसके पीछे घोड़ा बंधा था।

उस लड़के ने कहा- “मेरी मालकिन ने मुझे भेजा है। मेरे मालिक अब कभी जूते नहीं पहन सकेंगे। उनकी मृत्यु हो गई। मालकिन ने कहा है, अगर उनके पैर के लायक़ तुम स्लीपर बना सको तो बना दो। मैं साथ लेता जाऊंगा।”

स्लीपर बनकर तैयार था। माइकल ने उन्हें काग़ज़ में लपेटकर उसे लड़के को दे दिया। माइकल को साइमन के घर रहते छः वर्ष बीत गए।

एक दिन साइमन, उसकी पत्‍नी मैटरीना और माइकल कमरे में बातें कर रहे थे कि साइमन का बच्चा बोल उठा- “देखो-देखो अंकल एक औरत हमारे ही घर आ रही है। उसके साथ दो लड़कियां हैं। एक लंगड़ा कर चल रही है।”

Jeene Ka Shara Story File Image3माइकल ने खिड़की से झांक कर देखा- एक महिला आ रही थी। देखने में वह सुखी संपन्न सभ्य और ऊंचे खानदान की लग रही थी। उसके साथ दो छोटी लड़कियां थीं। वे लाल रंग का कोट पहने थीं। देखने में दोनों जुड़वां बच्चियां लग रही थीं। एक लड़की लंगड़ाकर चल रही थी।

सब लोगों ने उस महिला का स्वागत किया। अंदर आकर वह कुर्सी पर बैठ गई। साइमन ने कहा- “कहिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?”

ये दोनों बच्चियां जुड़वां हैं। इनके पैर के जूते बना दो। तीन पैरों की नाप एक ही होगी। यह लड़की लंगड़ाती है। इसके एक पैर की नाप जिससे लंगड़ाती है, अलग होती है। महिला बोली।

साइमन को जिज्ञासा हुई- “क्या जन्म से ही यह लंगड़ाती है?” “नहीं, इसकी मां ने इसे लंगड़ा बना दिया।” “तो क्या आप इसकी मां नहीं हैं?” मैटरीना ने पूछा। “नहीं, मेरे एक ही बच्चा था। जो ईश्‍वर को प्यारा हो गया। मैंने इन लड़कियों को गोद लिया है। मैं आपको पूरी बात बताती हूं।”

कुछ देर रुक कर महिला ने कहना शुरू कियाः

इन लड़कियों का पिता लकड़हारा था। एक दिन वह एक पेड़ काट कर गिरा रहा था। अचानक वह पेड़ उसकी देह पर गिर पड़ा और वह दबकर मर गया। उसकी मृत्यु के तीन दिन बाद इन लड़कियों की मां ने इन्हें जन्म दिया। जन्म देते ही वह भी स्वर्ग सिधार गई। उस समय उसके घर में कोई नहीं था। न कोई नर्स न कोई औरत।

Jeene Ka Shara Story File Image1लड़कियों को जन्म देने के बाद वह दर्द से छटपटा रही थी। इसी क्रम में वह इस लड़की के पैर पर लुढ़क गई और इसका एक पैर टूट गया। बेचारी ने तड़पते हुए दम तोड़ दिया। ये दोनों बच्चे अनाथ, असहाय, अकेले पड़े थे। पास-पड़ोस ने मिलकर इन बच्चियों की मां को दफ़ना दिया।

मैं इन लड़कियों की मां की पड़ोसन ही नहीं थी, बिलकुल बग़ल में रहती थी। पड़ोसियों ने मुझे कहा- “इन अनाथ बच्चियों को कुछ दिन तुम पालो। बाद में हमलोग इनके पालन-पोषण की व्यवस्था करेंगे।”

मैं दोनों अनाथ बच्चियों को घर ले आई। मैं ही एक ऐसी औरत थी जो इन्हें दूध पिला सकती थी। मेरा अपना बच्चा उस समय आठ महीने का था। मैं तीनों को दूध पिलाती थी। दूसरे ही वर्ष मेरा अपना बच्चा ईश्‍वर को प्यारा हो गया।

यदि ये बच्चियां मेरे साथ न होती तो मैं अकेली कैसे जी सकती थी? ये मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। बिना इनके मैं मोम रहित एक सूखी बत्ती हो जाऊंगी।

इतना कहकर उस महिला ने लंगड़ी बच्ची को अपने दाहिने हाथ से खींचकर छाती से लगा लिया और दूसरे हाथ से आंसू पोंछने लगी।

साइमन जूते की नाप ले चुका था। वह महिला उठी और दोनों लड़कियों का हाथ पकड़कर जाने लगी। अचानक वह कमरा एक आभा से प्रकाशित हो उठा। साइमन और मैटरीना ने देखा- माइकल दोनों हाथ जोड़े घुटने के बल बैठा ऊपर की ओर देखता मुस्कुरा रहा था।

आज वह तीसरी बार मुस्कुराया।

साइमन माइकल के समीप जाकर बोला- “यह सब क्या है माइकल?”

माइकल काम छोड़कर खड़ा हो गया और अपना एप्रॅन उठाकर साइमन तथा उसकी पत्‍नी को नमस्कार करता हुआ बोला, “विदा मेरे मेज़बान, ईश्‍वर ने मुझे क्षमा कर दिया। तुम भी मुझे क्षमा कर दो।”

साइमन और मैटरीना ने देखा- माइकल के चेहरे से एक आभा फूट रही है। साइमन ने सिर झुकाकर कहा, “मैं देख रहा हूं तुम कोई सामान्य मनुष्य नहीं हो और मैं तुम्हें अपने घर में रखने के लायक़ नहीं हूं, न मैं तुमसे प्रश्‍न कर सकता हूं, किन्तु इतना बता दो कि जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा तो इतने उदास क्यों थे? मैटरीना ने तुम्हें खाना दिया तो तुम पहली बार मुस्कुराए और तुम्हारे चेहरे पर एक आभा आ गई।”

“फिर जब वह भद्र पुरुष जूता बनवाने के लिए घर आया तो उसे देखकर तुम दूसरी बार मुस्कुराए और तुम्हारा चेहरा और अधिक दमक उठा। फिर जब यह औरत जूते बनवाने आई तो उसे देखकर तुम तीसरी बार मुस्कुराए और तुम्हारे चेहरे से निकलने वाले तीव्र प्रकाश से मेरा कमरा भर गया।”

माइकल ने कहा- “मैं एक देवदूत था। मैंने ईश्‍वर की आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसी का फल मुझे मिला है। ईश्‍वर ने मुझे औरत की आत्मा को ले जाने का आदेश दिया था – वही औरत – दोनों बच्चियों की मां जिन्हें लेकर वह महिला आई थी। मैं जब उस औरत के पास उसकी आत्मा को ले जाने के उद्देश्य से पहुंचा तो वह पीड़ा से कराह रही थी। उसने तब ही दो बच्चियों को जन्म दिया था। उसकी देह में इतनी शक्‍त‍ि नहीं थी कि अपनी नवजात बच्चियों को छाती से लगाए। उसने मुझे पहचान लिया और वह समझ गई कि मैं उसकी आत्मा को ले जाने के लिए आया हूं। वह आंसुओं में फूट पड़ी- देवदूत, अभी-अभी मेरे मृत पति को लोगों ने दफ़नाया है। मेरे परिवार में कोई नहीं जो मेरे इन बच्चों को पाले। मेरी आत्मा को तब तक नहीं ले जाओ, जब तक ये बच्चियां अपने पैरों पर खड़ी न हो जाएं। बिना मां-बाप के ये कैसे जीवित रहेंगी?” मुझे उस औरत की दशा पर दया आ गई और मैं उसकी आत्मा को बिना लिए ईश्‍वर के पास लौट आया।

ईश्‍वर ने कहा- “जाओ उस औरत की आत्मा को ले आओ। तुम वहां तीन पाठ सीखोगे- मनुष्य को क्या दिया गया, मनुष्य को क्या नहीं दिया गया और मनुष्य किसके सहारे जीवित रहता है।”

मैं पृथ्वी पर आया और उस औरत को लेकर उड़ गया। अचानक सर्द हवा का तेज़ झोंका आया और मेरे पंख गिर पड़े। मैं ज़मीन पर गिर पड़ा और उस औरत की आत्मा अपने आप ईश्‍वर के पास चली गई।

“मैं जब ज़मीन पर गिरा तो बिलकुल नग्न था और ठंड से कांप रहा था। मैं मनुष्य की आत्माओं से अपरिचित था। मैं नहीं जानता था कि भूख क्या है और सर्दी क्या है। मैं एक मंदिर में जाकर शरण लेना चाहता था। किन्तु मंदिर के दरवाज़े पर ताला लटक रहा था। इस लिए उसकी दीवार से लगकर बैठ गया। मैं भूखा और बेहद कमज़ोर था। तुमने मुझे देखा और अपने घर ले आए। इसके बाद की कहानी तुम जानते ही हो।” साइमन और मैटरीना अब समझे, किसने किसको खिलाया और पहनाया और अपने घर में रखा। भय और उल्लास से उनकी आंखों में आंसू आ गए।

माइकल ने पुनः कहना आरंभ किया- “जब तुम्हारी पत्‍नी ने मुझे देखा तो वह गुस्से से भर गई। और मुझे शराबी और शैतान समझकर घर से निकाल देना चाहती थी। उस समय उसके सिर पर मृत्यु के दूत मंडरा रहे थे। किन्तु जब तुमने उसे ईश्‍वर का स्मरण दिलाया तो उसमें महान् परिवर्तन आ गया। उसके हृदय में मेरे प्रति दया और प्रेम उमड़ आया और उसने मुझे खाना खिलाया। तब मैं पहली बार मुस्कुराया, क्योंकि मैंने पहला पाठ सीखा था, ‘मनुष्य को क्या दिया गया है।’ “मनुष्य के हृदय में प्रेम दिया गया है।” तुम्हारी पत्‍नी के सिर पर से मौत की छाया हट गई थी।”

“जब वह भद्र पुरुष जूते बनवाने के लिए आया तो उसने कहा- ‘ऐसे जूते बनाओ जो एक साल तक टूटे नहीं’ मैंने देखा, उसके पीछे मृत्यु दल खड़ा है। मैं यह भी जान गया कि मृत्यु का वह दूत सूर्यास्त के पहले ही उसकी आत्मा को ले जाएगा। मैं सोचने लगा- यह आदमी एक वर्ष की योजना बना रहा है और इसे पता नहीं कि दिन ढलने के बाद ही दुनियां से चला जाएगा। मुझे ईश्‍वर का दूसरा पाठ याद हो गया- ‘मनुष्य को क्या नहीं दिया गया है।’ मनुष्य को वह ज्ञान नहीं दिया गया है जिससे वह जान सके कि उसे किस चीज़ की ज़रूरत है। उसकी आवश्यकताएं क्या हैं। उन नवजात बच्चियों की मां नहीं जानती थी कि इसकी मृत्यु के बाद उसकी अनाथ बच्चियों को कौन पालेगा। वह धनी व्यक्‍त‍ि नहीं जानता था कि शाम तक उसे बूट चाहिए या अपनी लाश के लिए कफ़न पर जब मैं पंख विहीन होकर गिरा तो मैं नहीं जानता था कि कौन मुझे खाना-कपड़ा देगा और तब मैं दूसरी बार मुस्कुराया।”

“ईश्‍वर का तीसरा पाठ सीखना अभी बाक़ी था। जब वह भद्र महिला दो बच्चियों के साथ तुम्हारे घर आई तो बच्चियों को देखते ही मैं पहचान गया। उनकी मां की आत्मा को लेने के बाद मैं समझ रहा था, बिना मां-बाप की ये अनाथ नवजात बच्चियां कैसे रहेंगी। कौन इनका पालन-पोषण करेगा। ये जीवित नहीं रहेंगी।”

किन्तु आश्‍चर्य। इस महिला ने इन्हें अपने बच्चों की तरह पाला और प्यार किया। जब उस महिला ने उस लंगड़ी बच्ची को छाती से लगा लिया और अपने आंसू पोंछने लगी तो मुझे ईश्‍वर का तीसरा पाठ याद आ गया। मनुष्य केवल अपने से प्रेम करके और केवल अपनी चिंता करके जीवित नहीं रहता। एक-दूसरे के प्रति प्रेम के सहारे जीवित रहता है।

“जब मैं पृथ्वी पर आया तो अपने प्रयत्‍न से जीवित नहीं रहा। मेरे प्रति तुम और तुम्हारी पत्‍नी के प्रेम ने मुझे जीवित रखा। वे नवजात अनाथ बच्चियां अपने प्रयास से जीवित नहीं रहीं, बल्कि उस महिला के हृदय में उनके लिए जो प्रेम उमड़ पड़ा उस प्रेम ने उन्हें जीवित रखा। इसी प्रकार एक-दूसरे के प्रति प्रेम के सहारे मनुष्य जीता है।”

ऐसा, सोचकर मैं तीसरी बार मुस्कुराया। मैं समझ गया कि ईश्‍वर ने मनुष्य को जीवित रहने की इच्छा प्रदान की है, किन्तु उन्हें एक-दूसरे से अनजान, पृथक और भिन्न रहने को नहीं कहा है। ईश्‍वर चाहता है कि सभी लोग मिलकर रहें और परस्पर आनंद और सुख का आदान-प्रदान करते रहें।

“मैं यह अच्छी तरह समझ गया कि मनुष्य केवल अपने को जीवित रखने के लिए प्रयास करके केवल अपनी चिंता करके जीवित नहीं रह सकता। एक दूसरे Jeene Ka Shara Story File Image2को प्यार करके ही जीवित रह सकता है।”

“जिसके हृदय में प्रेम है उसके हृदय में ईश्‍वर का निवास रहता है और वह ईश्‍वर के समीप रहता है क्योंकि प्रेम ही ईश्‍वर है।”

वह देवदूत ईश्‍वर की प्रशंसा के गीत गाने लगा। उसके स्वर से वह घर कांप उठा। छत फट गई और एक अग्नि-स्तम्भ ऊपर स्वर्ग की ओर विद्युत गति से जाने लगा। साइमन और उसकी पत्‍नी, दोनों ने ज़मीन पर माथा टेक दिया। उस देवदूत के दोनों कंधों पर पंख निकल आए और वह ऊपर– स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गया।

जब साइमन ने आंखें ऊपर उठाई तो देखा- उसका घर पूर्ववत् ज्यों का त्यों खड़ा था और वहां उसके परिवार के अलावा और कोई नहीं था।

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