बहता पानी

“इस बार का जन्म दिन हम पाली के साथ नहीं किसी अन्य के साथ मिलकर मनायेंगे।” मनिन्दर मुझसे कह रही है।

मैं हैरानी के साथ उसके चेहरे की तरफ़ देखता हुआ सोचता हूं कि यह त्रिकोण की चौथी कोण कौन हो सकता है?

“बस यह तुम्हारे लिए सरप्राइज़ होगा- तुम पैसों वाले तोहफ़े पसंद नहीं न करते, इसलिए मैंने सब से क़ीमती परन्तु मुफ़्त वाले तोहफ़े का चुनाव किया है तुम्हारे लिए,” वह कह रही है और मैं अभी भी उसी तरह हैरान हूं।

त्रिकोण के इस चौथे कोण का तो मुझे भी नहीं पता, परन्तु तारुफ़ के लिए त्रिकोण के बारे में आपको बता सकता हूं।

त्रिकोण है हरमीत, मनिन्दर और सुखपाल की। हम इन नामों के साथ ही पहचाने जाते हैं परन्तु कुछ प्यार-वश और कुछ आवश्यकता के कारण, हमने एक-दूसरे के नाम थोड़े-बहुत बिगाड़ कर रखे हुए हैं। मनिन्दर-मिड्डी है, हरमीत-मीता है और सुखपाल-पाली। हां मैं यानि हरमीत उर्फ़ मीता, मनिन्दर को कई अन्य नामों के साथ भी पुकार लेता हूं। कभी वह मेरे लिए मिड्डा होता है, कभी गुगला और कभी कुक्कला। मुझे एक बार यह जानकर बहुत खुशी हुई कि ग्रीक भाषा में कुक्कला का अर्थ खूबसूरत है।

मेरी मिड्डी है भी खूबसूरत।

लम्बी-सी और पतली-सी। तीखे नयन-नक़्श और सांवला-सा रंग। मैं कई बार सोचता हूं यदि उसका रंग गोरा होता तो शायद वो खूबसूरत न लगती।

पाली मेरा मित्र है। इतना अपना और नज़दीकी कि मेरे और मिड्डी के बीच के सभी राज़ उसके लिए राज़ नहीं। वैसे भी ज़िंदगी का कोई रहस्य एक दूसरे से छुपा नहीं। जब से मिड्डे के साथ मेरा सामीप्य बढ़ा है, उस समय से ही मेरा जन्मदिन हम तीनों मिलकर मनाते आये हैं। मुझे जन्मदिन मनाना कभी अच्छा नहीं लगता था। परन्तु इस बार यह मेरा नौवां जन्मदिन है जो मिड्डे के साथ मनाना है और उसके साथ इस तरह प्रत्येक वर्ष एक ख़ास रस्मी तरीक़े से गुज़ारना मुझे अच्छा लगता है और शायद इसीलिए अपने जन्मदिन की प्रतीक्षा करता रहता हूं। परन्तु यह सब कुछ तो हम तीनों में ही सांझा था, यह चौथा कौन है? मैं अभी भी हैरानी के साथ उस चौथे के बारे में सोच रहा हूं।

“यू विल इन्जॉय हिज़ कंपनी।” मिड्डी शायद मेरी हैरानी पकड़ लेती है।

किसी के साथ का आनन्द लेना या न लेना यह तो बाद की बात है परन्तु मैं तो किसी अन्य को इस राज़ का राज़दार बनाने को भी तैयार नहीं।

हां, वैसे मैं समझता हूं कि प्रत्येक के साथ-साथ चलने वाला कोई न कोई गिरधारी लाल ज़रूर होता है। नहीं तो जितने आदमी भूख से मरते हैं, शायद इससे भी अधिक भरे पूरे होने की अधिकता से मर जाएं।

शुक्र है कि कभी पाली मेरा गिरधारी लाल होता है और जब उसकी कोई महबूबा आई हो तो, मैं उसका। इस तरह एक दूसरे के गिरधारी लाल बनकर बहुत-सी कठिन घाटियां भी बड़ी आसानी से पार हो जाती हैं। परन्तु मिड्डे ने यह नया गिरधारी लाल किस को बना लिया है?

मैं सोचता हूं शायद वह खूबसूरत और शादीशुदा मिड्डी की सहेली हो जिसको हमारे सामीप्य का थोड़ा बहुत अंदाज़ा हो। वह अकसर कहती है, “आपकी जोड़ी मुझे बहुत प्यारी लगती है, यदि यह सचमुच की होती तो और भी अच्छी लगती।”

“तुम स्वयं अपनी ओर ही देखकर बताओ कि सचमुच की कौन-सी जोड़ी होती है?” मिड्डी पूछती है।

“तुम शायद ठीक ही कहती हो,” वह एक उदास-सी आह भरते हुए कहती। कभी उसने सभी की इच्छा के ख़िलाफ़ शादी की थी, फिर वह खुद ही एक दूसरे के ख़िलाफ़ हो गए थे।

वह एक अच्छी विश्‍वास योग्य स्त्री है। मिड्डी के साथ कॉलेज में पढ़ाती है और दुःख-सुख भी बांट लेती है। यहां तक तो ठीक है, परन्तु उसके साथ इस तरह के सभी राज़ खोलना भी तो ठीक नहीं। फिर भी मैं सोचता हूं यदि पाली के स्थान पर किसी अन्य ने ही होना है तो मुझे इस स्त्री की उपस्थिति मंज़ूर है, पर मिड्डी तो हिज़ कंपनी कह रही थी। सोचता हूं वह ‘हिज़’ ‘हर’ की कोई ग़लती तो नहीं कर सकती?

मुझे वैसे भी पाली के बिना कहीं भी जाना सूना-सूना लगता है। बहुत ही अलग व्यक्‍त‍ित्व का मालिक है पाली भी। मैं उसे भी कई बार प्यार से कहूंगा, “तू मेरा कुक्कला है।” वह हंस कर कहेगा, “एक तो तेरे कुक्कलों का भी पता नहीं चलता?”

“यार जिससे भी प्यार करें वह कुक्कला ही होता है।”

“और गिरधारी लाल?” वह हंस कर पूछेगा।

“बस जो साथ-साथ चले वही गिरधारी लाल।” वह और भी ज़ोर से हंसता हुआ कहेगा, “शब्दों में बहुत जान होती है दोस्त- जब मैं कार चलाऊं तो तुम कहोगे तुम तो मेरे सारथी हो- शब्द, शब्द ही हैं महाराज- शब्दों से व्यक्‍त‍ि संसार जीत सकता है।” पाली अपनी ही धुन में कहता, “जिसके पास शब्द हैं वह आज का सिकन्दर है।”

हमारे प्रत्येक जन्मदिन पर मोमबत्ती पाली ही जलाता है और हर बार यह भी कहता है, “यह तो बस बच्चों का खेल है- केक पर लिखवा लेना नाम और फिर चाकू के साथ काट देना- प्रत्येक वर्ष अपने ही नाम का क़त्लेआम- फिर अगले ही पल कहेगा, खुशी के दिन इस तरह की बातें अच्छी नहीं लगती, “लाओ खुशियों को डालो गिलासों में और गिलासों को लगाएं होंठों से- बस फिर अन्दर बाहर खुशियां ही खुशियां।” तब फिर वह गाने लग पड़ेगा- “लख खुशियां पातशाहियां – – – – ।”

हम तीनों गिलासों में डाली हुई शराब को ऊंचा उठाते हैं। मिड्डी घूंट भरते हुए दांतों को जोड़ कर कंपकंपी-सी लेती और अपनी शराब मेरे गिलास में डाल देती।

आज से नौ वर्ष पहले की बात है कि पाली ने यह अधिकार मिड्डी से पूरे रौब के साथ ले लिया था। मोमबत्ती जला कर पाली ने तीनों गिलासों में शराब डाल दी थी। तीसरा गिलास देखकर मैं हैरान था, परन्तु पाली कह रहा था, “ले भई मिड्डिया, आज तुम्हारी परीक्षा ही सही- बेशक एक घूंट ही पी ले परन्तु तुझे पीनी ही पड़ेगी।” अब की तरह ही दांतों को कस कर मिड्डी ने नहीं में सिर हिलाया था, “मुझे तो इसकी गंध से भी ऐलर्जी है।”

“अगर तुम मीते से मुहब्बत करती हो तो एक घूंट तो पीना ही पड़ेगा।” पाली कुछ ज़्यादा ही दावा कर गया था और मिड्डी ने दावे के मान को रखते हुए एक घूंट भर लिया था। पाली ने हाथ उठाकर “वाह-वाह” की थी। तभी से ही सब कुछ किसी पवित्र रस्म की तरह निभाते चले आ रहे हैं।

इतने में लगभग अंधेरा-सा हो गया। हम कमरे से निकल कर बहती नहर के किनारे लगे मेज़ कुर्सियों पर आ बैठे। रेस्टोरेंट की जलती हुई लाइटों में नहर का शान्त बहता पानी कालिमा की आभा बिखेरता हुआ और भी खूबसूरत नज़र आने लगा।

लगातार प्रत्येक वर्ष से इस ख़ास दिन पर हम यहीं आ रहे हैं। नहर के किनारे पर टूरिस्ट कम्पलैक्स का यह ख़ास कमरा हम पहले ही आरक्षित करवा लेते हैं। दोनों कमरों के बीच एक ही दरवाज़ा तथा बीच का स्नानघर, इसको एक भी रखता और अलग-अलग भी।

प्रत्येक वर्ष इसी दिन मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे हम शराब पीते और मिड्डी कोई कोल्ड ड्रिंक सिप करती और फिर एक विशेष मुक़ाम पर पहुंच कर पाली की फ़िलासफ़ी एक ख़ास अंदाज़ में हमें समझाने लगती, “मुहब्बत यह नहीं होती कि चिपक कर एक दूसरे के निकट बैठे रहो। मुहब्बत तो इस पानी की तरह बहने का नाम है।” वह नहर के पानी की तरफ़ इशारा करता, “इस नहर पर सैंकड़ों पुल आएंगे। परन्तु पानी का यह धर्म नहीं कि वह किसी पुल के साथ लग कर रुक जाए। बस पानी तो पुल को चूम कर आगे बहता चला जाता है, उसका कई अन्य पुल इंतज़ार कर रहे होते हैं- पानी कभी भी पुल को आगोश में लेकर नहीं बैठते।” मैं आम तौर पर चुप ही रहता, पर मिड्डी चिढ़कर पूछती, “पाली! तुमने कभी मुहब्बत भी की है किसी के साथ?”

“हां।” वह ऊपर नीचे सिर मारता, “पर बहते पानी की तरह, मैं एक स्थान पर टिक ही नहीं सकता।”

“यूं तो मैं हूं किसी बहते हुए दरिया की तरह, तुम अगर मुझको पुकारोगे ठहर जाऊंगा।” मिड्डी प्रश्‍न करने की बजाय, उर्दू का शेर बड़े विजयी अंदाज़ में बोलती।

“मैं रुकने वाला पानी नहीं,” वह किसी बेखुदी के आलम में बोल रहा लगता।

“कभी पुल बन कर भी मुहब्बत करके देख?” दोनों में कशमकश सी हो जाती।

“एक जगह पर खड़े पुल कभी भी मुहब्बत नहीं कर सकते,” पाली पास बने पुल की तरफ़ इशारा करता हुआ कहता।

“बहते हुए पानी को सिर्फ़ पुल ही मुहब्बत कर सकते हैं। पुलों को सिवाए पानी के अन्य किसी की प्रतीक्षा ही नहीं होती।” मैं आस-पास का आनंद ले रहा होता और वे दोनों अक्सर इस तरह की बहस में उलझे रहते।

“मुहब्बत मेरे लिए एक तजुर्बा है। मैं अलग-अलग सोच और क्षेत्रों वाली स्त्रियों के साथ मुहब्बत करके अपने नावलों, कहानियों को ज़रख़ेज बनाता हूं, मैं यह तजुर्बा कहीं भी, किसी के साथ भी और कभी भी कर सकता हूं।”

इस बार वह हमारे साथ नहीं आया, परन्तु उसकी बातें हमारे साथ-साथ ही चल रही हैं। “तुम आज उदास क्यों दिख रहे हो?” मिड्डी पूछती है।

“उदास तो नहीं पर पाली के बिना बहुत कुछ अधूरा-सा लग रहा है।”

फिर एक बार भूली-बिसरी हैरानी मुझे झिंझोड़ जाती है।

“यह भेद किसी और के साथ बांटने की आवश्यकता क्यों पड़ गई?” मैं मिड्डी से पूछता हूं।

“यह रहस्य तो शुरू से ही किसी से बंटा था, परन्तु तुम्हें बताने का या इस तरह आमने-सामने करने का मेरा हौसला नहीं पड़ रहा था।”

“थोड़ा-सा बताओ तो सही वह है कौन?” मिड्डी ने मुस्कुराकर सिर फेर दिया और घड़ी की तरफ़ देखा। मैंने भी अपनी घड़ी की तरफ़ देखा- सात बजने में तो अभी दो घंटे पड़े थे।

मैं सोचता हूं, मिड्डी कई बार अपने एक प्रोफ़ेसर की बातें भी सुनाती है। वह भी पाली की तरह ही मुहब्बत के बारे में बड़े अलग और रूखे से विचार रखता था। “प्यार-व्यार कोई दिल पर लगाने वाली चीज़ नहीं होती। मैं जिस लड़की को जवानी में मुहब्बत करता था, अगर उसके साथ वहां रुक जाता तो आज मैं प्रोफ़ेसरी की जगह पर ट्रक-ड्राईवरी करता।” हो सकता है मिड्डी ने उसके विचारों को झुठलाने के लिए उसे ही बुलाया हो कि देखो मुहब्बत करने वाला इंसान प्रोफ़ेसरी भी कर सकता है।

मिड्डी ने एम.ए. तो विवाह से पहले ही कर ली थी पर विवाह करवा कर घर पर ही बैठ गई थी। मैंने ज़ोर देकर उसे एम.फिल. में दाख़िला दिलाया था। यहां पर ही हमारा मेल-मिलाप बढ़ा और मिड्डी के शब्दों में हम एक-दूसरे के प्यार में और भी ऊंचे हो गए। वह अंग्रेज़ी के शब्दों ‘फ़ैॅल इन लव’ पर बहुत ही चिढ़ती थी, उसका कहना था कि प्यार में कोई गिरता नहीं बल्कि वह तो ऊंचाई से भी अधिक ऊंचा हो जाता है।

“मैंने ज़िंदगी में सबसे अधिक मोह अपने भइया से किया है,” यह बात वह मुझको पहले भी कई बार बता चुकी है। मोह के नंबर लगाने की आदत हमें मालूम नहीं कैसे पड़ चुकी थी- हम प्रत्येक रिश्ते के नंबर लगाते और हमेशा भइया ही नंबर एक पर रहते- यहां तक कि विवाह के बाद भी मेरा नंबर एक वह ही रहा। फिर वह मेरे कंधे पर हलके-हलके मुक्के मारती हुई कहती, “तुमने मेरी ज़िंदगी में आकर उसे पछाड़ दिया है।” उसकी शिक़ायत भरी कही बात मुझे अच्छी लगती।

मैं उसके भाई को कई बार मिल चुका हूं। बहुत ही बढ़िया इंसान है वो। उसके व्यक्‍ति‍त्व की आभा के सामने बहुत से चेहरे बुझे-बुझे लगने लगते। मैं कहता हूं, “वह सचमुच ही नंबर एक पर बना रहने के क़ाबिल है।”

“पर तुमने बना नहीं रहने दिया” और मिड्डी कोई पुरानी बात शुरू कर देती, “मेरे विवाह के प्रारंभिक वर्षों में वह बहुत उदास था। जब मैंने ससुराल की ओर से पूरी निराशा बताई थी तो वह रात दिन परेशान रहने लग पड़ा था।”

“तुम वहां पर ऐडजस्ट क्यों न कर सकी?” मैंने पूछा था। वह कुछ क्षण रुक कर बोली- “उन्नीस-इक्कीस तो ऐडजस्ट हो सकते हैं लेकिन पांच-पचानवें की ऐडजस्टमेंट मुझे भी नहीं आती थी।”

“फिर इतना समय वहां पर तुमने कैसे निकाल लिया?” मैं फिर पूछता हूं।

“पहले दो वर्ष ही कठिन थे, फिर तुम मिल गए। तुम्हारे साथ बिताये कुछ क्षणों के कारण तो मैं काले पानी में भी रह सकती थी। चार वर्ष व्यतीत होने पर भी जब मैं मां न बन सकी तो ज़िंदगी लैबॉरटरी के अधीन हो गई। भला हो उस डॉक्टर का जिसने सीधे ही लिख दिया कि मैं मां बनने के योग्य ही नहीं हूं। उसके घर वाले भी चाहते थे, कुछ मैंने भी ज़ोर देकर उसे नई शादी के लिए मना लिया और मैं अकेली रहने लगी। यह अकेलापन मालूम है मैंने किस प्रकार सह लिया?” वह मेरी आंखों में झांकती हुई पूछती। “बस तुम्हारे कारण, कभी-कभी तुम मेरे साथ होते थे और जब साथ नहीं होते तब भी बस साथ ही होते थे।” बातें करते-करते इस तरह भावुक हो जाना उसकी आदत है और मुझे यह आदत अच्छी लगती है। कमरे में लगा हुआ ए.सी. आवाज़ ज़्यादा दे रहा है और ठंडक कम, मैं पंखा भी चला देता हूं।

“नहा न लें?” मैं मिड्डी से पूछता हूं, “ज़रा तरो-ताज़ा हो जाएंगे।”

“ठीक, पर – – – ।” मिड्डी थोड़ा-सा मुस्कुराकर, मुझे शरारती-सा बना देती है।

“तुम्हारी शर्त सिर माथे पर, पर बताओ तो सही आने वाला है कौन? मैं आग्रह करता हूं।”

“चलो पौने सात बजे बता दूंगी ताकि आप मानसिक तौर पर तैयार हो सकें।”

नहा कर आए तो परछाइयां ढल चुकी थीं। बाहर हरी कचूर घास की पटड़ी के सिर के ऊपर लोहे का जंगला बना था और जंगले के साथ-साथ जा रही बड़ी व चौड़ी नहर के जंगले के साथ स्पर्श कर रही मेज़-कुर्सियां। हमारे कमरे वाली मेज़ और कुर्सियां अभी भी ख़ाली थीं। हम वहां आकर बैठ गए। यहीं पिछली बार आधी रात तक मैं, मिड्डी और पाली बातें करते रहे थे। मिड्डी ने कहा था, “पहाड़ पर बहता पानी देखकर मालूम नहीं मुझे क्या हो जाता है, जैसे कुछ भी मेरे वश में नहीं रहता। पहाड़ों के मोड़ मुझे ज़िंदगी जैसे दिखाई देते हैं और मेरा मन करता है कि इन मोड़ों को काटती मैं चलती रहूं और बहते पानी को देखकर मन करेगा कि मैं इसकी विशालता में कूद जाऊं और फिर तैरती-तैरती दूर पूरी धरती की परिक्रमा कर आऊं।” शराब के नशे में चूर होते हुए पाली ने कहा था, “रुको महाराज रुको, मुझे यह बात नोट कर लेने दो, मुझे मेरे नावल, कहानियों के लिए आप से बहुत कुछ मिल जाता है। और फिर कांपते-कांपते हाथों से कुछ नोट करने लग पड़ा था।”

मुझे फिर पाली की कमी सताती है। उसने इन्हीं दिनों में किसी ज़रूरी काम के लिए बाहर जाना था। और फिर मिड्डी की इच्छा के कारण उसे इस दिन तक वापिस लौट आने के लिए अधिक कहा भी नहीं था। कमरे से बाहर निकल कर देखा तो पश्‍चि‍म की ओर से आंधी के साथ काली घटा चढ़ी आ रही थी। बारिश से भीगी हुई हवा ने मौसम को बहुत खुशनुमा बना दिया था। काली घटा की पृष्‍ठभूमि में हमारे कमरे के साथ लगी सफ़ेद बोगनविलिया की बेल और भी खूबसूरत लगने लगी थी। मिड्डी कहने लगी, “पिछली बार इस बेल के बारे में भी हमने बहुत बातें की थीं।” पाली कहता था कि यदि यहां पर गुलाबी फूलों वाली बेल होती तो ज़्यादा खूबसूरत दिखाई देनी थी। इस तरह आप कितना समय रंगों की बहस में उलझे रहे थे। तुम कह रहे थे, मुझे सभी रंग पसंद हैं। जो एक दो रंगों के साथ बात कही जा सकती होती तो प्रकृति शायद इतने रंग ही पैदा न करती। और थोड़ी देर बाद पाली कहने लगा, “ठीक है दोस्तो ठीक, यह भी फूल ठीक, सभी फूल ठीक हैं।” मैंने देखा मिड्डी अभी भी जारी थी, आप दोनों बहुत-सी बातों पर सहमत हो जाते हो, पर मुहब्बत के बारे में वह तुमसे बहुत भिन्न है।

“दोस्ती में अलगाव का भी अधिकार होता है।”

“परन्तु उसके मुहब्बत के विचारों के साथ सहमत नहीं हुआ जा सकता?”

“सहमति और असहमति का भी अपना-अपना अधिकार होता है।”

“कभी वह कहता है कि मुहब्बत में कोई भी स्त्री मेरे लिए आख़िरी नहीं, फिर कहेगा- जब मैं किसी स्त्री से प्यार कर रहा होता हूं बस उस पल वह मेरी होनी चाहिए। फिर कहेगा कि मैं किसी को ज़िंदगी भर के लिए नहीं सिर्फ़ पल भर के लिए मुहब्बत कर सकता हूं। फिर वह दिल्ली, लुधियाना, जालंधर और न जाने अन्य कौन-कौन से शहर गिनाएगा, जहां पर उसके कहे अनुसार उसकी प्रेमिकायें रहती हैं।”

“यह भी हो सकता है कि उसे अब तक औरतें ही इस प्रकार की मिली हों- उन्होंने एक दूसरे का इस्तेमाल तो किया हो परन्तु समझा न हो,” मैं कहता हूं।

“शायद – – – – !” मिड्डी ने एक लम्बी सांस छोड़ी, “नहीं तो तपस्या के बाद हासिल की मुहब्बत को कोई पल भर की मुहब्बत कैसे कह सकता है? फिर उसने आंखें मूंद लीं और जब बोली ऐसे लगा जैसे कोई समाधि में से बोल रहा हो, “मैं तुम्हें बताना चाहती हूं, मीते। तुम मुझे जब पहली-पहली बार मिले तो लगा कि मैं अब तक जैसे तुम्हें ही ढूंढ़ रही थी। परन्तु तुम्हें मिल कर यह डर भी लगा कि जैसे तुम हाथों से फिसल जाने वाली कोई वस्तु हो, जैसे मेरी पकड़ से बाहर हो। तेरी मुस्कुराहट अपनी भी लगती पर क्षण में आलोप होकर पराई सी भी बन जाती। तुम्हारी बातें मोहित कर लेतीं, परन्तु तुम खुद मोह से जैसे कोरे और ख़ाली। तुम मुझे एक चैलेंज जैसे लगे थे और सोच लिया था कि चाहे कितनी भी साधना करनी पड़े, मैंने तुम्हें जीतना है और जब मैंने तुम को पा लिया, महसूस हुआ कि इसके आगे कुछ भी नहीं होता है।” उस समय मैं उससे कुछ कहना चाहता हूं कि अन्तिम भी कोई होता है। उसने अपनी पहली अंगुली के साथ हवा को सहलाते हुए कहा, “वह मेरे पास है मेरा मीता।” मुझे मालूम था कि वह इस समय अपनी पूरी जज़बाती धुन में थी। मैंने जैसे थोड़ी बहुत रुकावट पैदा करनी चाही, “मिड्डी बात यह भी है कि अब तक जिस भी औरत को उसने चाहा भोग भी लिया। उसने तय कर लिया कि स्त्री को हासिल करना कोई कठिन नहीं है। मैं जानता हूं जो स्त्री अपने पति के मरने पर उसके साथ चिता में बैठ गई और लोगों ने खींच कर उसे बाहर निकाला अन्त में इस व्यक्‍त‍ि ने उसे पूरे का पूरा हासिल कर किया। ऐसे उसकी धारणा यह बन गई है कि हर स्त्री को प्राप्‍त किया जा सकता है।”

“बस-स्त्री को पा लेना, भोगना और फिर नई खोज में आगे बढ़ जाना।”

“इस प्रकार कई स्त्रियां भी तो करती हैं?” मैंने उसके जज़बातों के बहाव के आगे एक रोक लगाते हुए कहा, “बात स्त्री और पुरुष की नहीं बात तो शिद्दत से मुहब्बत करने की है। जो भी इस तरह नहीं कर सकता उसे तृप्‍त‍ि का एहसास हो ही नहीं सकता। और मेरे ख़्याल से इसके बिना व्यक्‍त‍ि भटकता फिरता है।”

परिचित वेटर सामने खड़े होकर पूछ रहा है, “साहिब कुछ चाहिए?” मैं मिड्डी से कहता हूं, “चाय या कॉफी लोगी?” वह हां में सिर हिलाती है। मैं वेटर को चाय लाने के लिए कहता हूं। मुझे पाली याद आता है और मैं स्वयं ही हंस पड़ता हूं। मिड्डी हंसी का कारण पूछती है। मैं बताता हूं, “यदि पाली साथ होता तो, उसने इस समय की मंगवाई हुई चाय के बारे में कहना था तुम्हारे में भी ठहराव आ गया है- यह कोई चाय पीने का समय है?” मिड्डी भी हंसती हुई कहती है, “उसे तो बहुत-सी बातों में ठहराव ही नज़र आता है- हां वह तो अपनी मुहब्बत को भी ठहराव ही समझता है।”

काली घटा सारे आसमान पर फैल चुकी है। रात होने का भ्रम हो रहा है।

आस-पास का सारा वातावरण रोचक हो गया है। तेज़ हवा के साथ मिड्डी की लाल किनारी वाली चुनरी नहर की दिशा की ओर उड़ती हुई बहुत खूबसूरत प्रभाव बना रही है। नहर के पानी में हवा के कारण छोटी-छोटी तरंगें पैदा हो रही हैं।

वेटर चाय रखता हुआ पूछ रहा है, “वह आपके साथ वाले सरदार जी नहीं आए इस बार?”

“हां, वह इस बार नहीं आ सके,” मैं कहता हूं।

“बड़े रंगीले व्यक्‍त‍ि हैं जी वह, पिछली बार उन्होंने मुझको दो ज़बरदस्त पैग भी पिलाए थे, स्वयं तो उन्होंने बहुत ही पी हुई थी। मुझे कहने लगे, उतार दे यह सुनहरी धारियों वाली वर्दी और आज़ाद हो जा- नौकरी सिर्फ़ ग़ुलामी होती है। रात को तो मैं चुप रहा था। सुबह पूछा, वर्दी तो मैं उतार दूं, बाल-बच्चों को रोटी कहां से खिलाऊंगा?” कहने लगे, “कौन-सी वर्दी? यह तो तुझ पर जंचती ही बहुत है- भई जो बाल-बच्चे पैदा किए हैं पालने नहीं?” सचमुच ही बड़े रंगीले व्यक्‍त‍ि हैं जी वह।

वेटर के जाने के बाद मिड्डी ने कहा, “सचमुच ही बड़ी अजीब चीज़ है अपना पाली भी। थोड़े दिन पहले मुझे लाइब्रेरी में मिल गया और कहने लगा, “आ, आज बैठ कर कुछ बातें करें।” हम दोनों लाइब्रेरी में ही बैठ गए। बड़े ही सहज भाव के साथ कहने लगा, “दरअसल मैं तुझको भी पूरी की पूरी प्राप्‍त करके देखना चाहता हूं” वह इस तरह कह गया था जैसे चाय का प्याला पीने की बात कर रहा हो। मैंने भी वैसे ही सहज भाव के साथ कहा, “जिन स्त्रियों को तुम अब तक पा चुके हो, उन से अलग मुझ में क्या हासिल कर लोगे?”

कहने लगा, “मीता अकसर बताता है कि मुहब्बत की लहरों में तुम आंधियां झुला देती हो जैसे वह बताता है, इस तरह की तो मैंने किसी भी स्त्री को नहीं पाया।” मैंने उसे कहा, “देख घर अपने मर्द के बिस्तर में मैं भी उमस की तरह सहमी सी पड़ी होती थी, परन्तु मीते के साथ मैं सावन की फुहार की भांति बरसने लगती हूं- यह चमत्कार मेरे में नहीं मीत की मुहब्बत में है। जा किसी के साथ टूट कर मुहब्बत कर तुम्हें सभी कुछ उसी में मिल जाएगा।” और मुझे कहने लगा, “मैं व्याख्यान नहीं सुनना चाहता हूं- मैं किसी की मुहब्बत का ग़ुलाम होकर अपनी आज़ादी नहीं गंवा सकता- मेरा और स्त्री का रिश्ता सिर्फ़ बाज़ की झपट वाला है।” मैंने कहा, “फिर तो तुम्हें शिकार चाहिए, औरत नहीं और रही बात ग़ुलामी की- मुहब्बत ग़ुलामी नहीं, स्वेच्छा के साथ अपने आप को किसी मनचाहे को अर्पण करना है।”

“वाह! ऑफ़र तो अच्छी थी, फिर हो जाना था, उसके नए तजुर्बे में शामिल।” मैं चिढ़ाने की ख़ातिर मिड्डी से कहता हूं।

“मीते!” वह गुस्से से मेरी तरफ़ देखती हुई मुक्का दिखाती है।

“पिटाई होगी, यदि फिर ऐसी बात की तो।” मैं उसको इस मुद्रा में देखकर हंस पड़ता हूं। वह भी मुस्कुराकर तने हुए हाथ नीचे कर लेती है।

वेटर ख़ाली प्लेटें मेज़ से उठाता हुआ पूछ रहा था, “चाय अच्छी थी न साहिब?” मैं हां में सिर हिलाता हुआ मिड्डी की कलाई की तरफ़ देखता हूं। उसकी कलाई भी सूनी है। नहाने के बाद उसने भी मेरी तरह घड़ी नहीं लगाई। मैं वेटर से टाइम पूछता हूं। “साहिब टाइम तो अभी कुछ भी नहीं- इन बादलों के कारण अंधेरा लगता है। टाइम तो अभी साढ़े छः भी नहीं हुए हैं।” वह बताता हुआ चला जाता है।

मैं मिड्डी से कहता हूं, “सच में तुमने तो सूली पर चढ़ाया हुआ है मुझे, बताओ तो सही कौन आ रहा है सात बजे?”

“उठो अंदर चलें।” मिड्डी मेरा हाथ पकड़कर अंदर खींचती है।

अंदर जाकर वह मुझे आलिंगन में लेकर कहती है, “मेरा माथा चूमो, मेरी आंखें, मेरे होंठ – – – – ” और इस तरह कहते हुए मेरे कानों के निकट अपने होंठ इस तरह करती है, जैसे कानों को चूमना हो और फिर धीरे से कहती है, “सात बजे आ रहा है मेरा भाई।” मेरा कसा हुआ आलिंगन एक दम ढीला पड़ जाता है। उसका कसा हुआ आलिंगन और भी कस जाता है। मिड्डी का इकलौता भाई सेना में मेजर है। मगर उसकी पोस्टिंग तो लेह-लद्दाख में है। मैं सोच रहा था पर मिड्डी कह रही है, “पन्द्रह दिन पहले उन्होंने यहां आकर ज्वाइन किया है, उन्होंने ही मुझे फ़ोन किया था और इस तरह दो दिन इकट्ठे मिल बैठने का तय हुआ था।”

मुझे अभी तक भी समझ नहीं आ रही थी कि यह सारा कुछ ठीक है या ग़लत, मैं जिस व्यक्‍त‍ि को पहले भी कई बार मिल चुका हूं, उसका सामना करने का जैसे साहस नहीं हो रहा है। मिड्डी कह रही है, “अच्छी तरह तैयार हो जाओ उन को बने-संवरे व्यक्‍त‍ि बहुत अच्छे लगते हैं और वह समय के भी बड़े पाबंद हैं।” मेरा मिड्डी की बातों की तरफ़ कोई ध्यान नहीं। मैं अभी भी बौखलाया हुआ कई कुछ सोच रहा हूं, लेकिन मिड्डी खिली-खिली नज़र आ रही है। मैं कहता हूं, “मिड्डी, कोई भी भाई अपनी बहन को इस प्रकार की छूट नहीं दे सकता?” मेरी हैरानी अभी असीम होती जा रही है।

“तुम शायद सच कह रहे हो, परन्तु मेरी खुशी के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं।” मिड्डी कह रही है, परन्तु मुझे अभी भी यह बात किसी और धरती की लग रही है।

“मीते। जब मैं शादी-शुदा ज़िंदगी से मायूस हो गई तो कहने लगे यह पूरी की पूरी ज़मीन आधी तुम्हारी जब भी चाहो यहां आकर रहने लग जाना।” “भइया! जीने के लिए सिर्फ़ ज़मीन जायदाद की आवश्यकता ही तो नहीं होती?”

“मुझे मालूम है- अपनी खुशी के लिए और जीने के लिए तुम जिस किसी का भी हाथ पकड़ो- मुझे मंज़ूर है।” और जब मैंने बताया तो मैंने यह भी बताया कि तुम शादी-शुदा हो तब उदास होकर कहने लगे, “अपनी खुशी के लिए किसी का घर मत उजाड़ना।”

“उसके पहले ही अधिकृत हिस्से पर मेरी कोई दख़लंदाज़ी नहीं होगी।” मैंने उन्हें भरोसा दिया था।

“चल, सब कुछ माना परन्तु आज तुमने उन्हें यहां बुलाने का हौसला कैसे कर लिया?” मैं अभी भी उसी तरह हैरानी ग्रस्त हूं।

“मीते, वह कहते थे जिसके कारण तुम इतनी बढ़िया हो रही हो- मैं उसके और तुम्हारे साथ कुछ पल बिताना चाहता हूं। अब वह इसी शहर में बदल कर आए तो उन्होंने ही मुझे फ़ोन किया था, “आओ मेरे मेहमानो- मैं तुम्हें जीवन जीते हुए देख कर जीना चाहता हूं।” बहुत समय से यह उनकी इच्छा थी। तुम्हारे साथ मेरी खुशी जुड़ी देख कर वह कहने लगे, “ज़िंदगी देने वाला हमेशा ही ग्रेट होता है- मैं उस को मिल कर सलाम करना चाहता हूं।” मिड्डी की बातों को सुन-सुन कर मेरी घबराहट को सहारा मिल रहा था। वह भी किसी इलाही जलाल में बोलती जा रही थी और मैं किसी सरूर में मिड्डी की बातें सुन रहा था कि वेटर एक स्लिप लेकर हाज़िर हुआ, “आप का एक मैसिज है साहिब।” और उसने अंग्रेज़ी में लिखी स्लिप मेज़ पर रख दी, “अभी ही मैनेजर साहिब का फ़ोन आया था,” वह बता रहा था। मैंने स्लिप को रौशनी की तरफ़ करते हुए पढ़ा। मिड्डी के मेजर भाई का संदेश था किसी ज़रूरी डियूटी पर जाने के कारण वह नहीं आ सकता इसलिए क्षमा चाहता है। अब तक मैंने पूरा संकोच उतार कर अपने मन को मिड्डी के भाई के साथ मिलने के लिए तैयार कर लिया था। जिसके आने की सूचना मेरी घबराहट का कारण बन रही थी, अब उनके न आने की सूचना से झटका लगा। मिड्डी, जो कि अब तक पूर्ण जलाल की अवस्था में थी, स्लिप पढ़ कर उदास हो गई और काफ़ी देर कुछ न बोली। फिर मेरा हाथ पकड़ कर बोली, “चलो इस बहाने आज मैं तुम्हारे लिए मोमबत्ती अपने हाथ से जलाऊंगी।” और उसकी हलकी-सी मुस्कुराहट अंधेरे में चमकते सफ़ेद बोगनविलिया के फूलों जैसी लगी।

“मीते तुमको पता है न मैं तुम्हें बहुत मुहब्बत करती हूं- उसने ‘बहुत’ पर ज़्यादा ही ज़ोर देकर कहा। मैंने कोई भी उत्तर देने की बजाय मुस्कुराकर उसकी तरफ़ देखा। मुझे मालूम है कि यह उसकी भावुकता का समय है। वह उदासी तथा खुशी में अक्सर जज़बाती हो जाती है।”

“देखो, आज हमें सबसे अधिक चाहने वाले भी हमारे साथ नहीं – – – और मीते आज की तरह जब अन्य कोई भी हमारे साथ नहीं होगा, तब भी हम तो होंगे ही?” मैंने हां में सिर हिलाते उसके हाथों को कस कर चूम लिया। उसने मेरे हाथों को पकड़कर खींचा, “आओ उठो, अंदर चलें- मैं मोमबत्ती जलाकर खुदा से कहना चाहती हूं- “ज़िंदगी में हर एक औरत को मेरे जितना प्यार ज़रूर देना।” स्वयं से सर्वत्र तक फैलती मिड्डी मुझे और भी प्यारी लगी।

मोमबत्ती जलाकर उसने अपने हाथों को दुआ की तरह फैला दिया, “ऐ मेरे खुदा! मुहब्बत के चिराग़ सारी दुनियां के लिए इसी तरह जलाए रखना।” और उसने मेरा माथा चूम लिया। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाज़ा खोला- सामने पाली बांहें खोलकर खड़ा था।

“यारो! मर गया कार दौड़ा-दौड़ा कर, एक अंधेरा, दूसरी आंधी लगता था शायद आप तक पहुंच ही न पाऊं, परन्तु तुम्हारी मुहब्बत की पकड़ खींच ही लाई यहां पर।” वह एक ही सांस में सब कुछ बताने की जल्दी में था, “मुझे याद आई तारीख़ और मैंने सोच लिया, आप यहां ही होंगे। और जब आप के यहां होने का पता चला तो मेरी सारी थकावट उतर गई।”

“पाली और फिर कौन-कौन से शहर हाज़िरी लगवा कर आए हो?” मिड्डी ने बड़े ही शरारती और व्यंग्य भाव से पूछा। “मिड्डिया! तू छेड़ने से बाज़ नहीं न आती- वैसे मैं सुबह दिल्ली से चला हूं – – – ” पाली ने अभी बात पूरी भी नहीं की और मिड्डी बीच में ही बोल पड़ी, “सुबह दिल्ली, दोपहर लुधियाना, शाम जालन्धर है न?” मिड्डी ने वह सभी जगह गिनवा दीं जिन के बारे में पाली कहता रहता था कि इन शहरों में फूल कुछ ज़रूरत से अधिक ही खिलते हैं।

“मिड्डी मैं आज इस रौ में नहीं” पाली जिन बातों को करके खुश होता था आज उन से ही चिढ़ रहा था। “बस जो बात तुम्हारे पास आकर बनती है और कहीं नहीं- इस तरह लगता है कि जैसे व्यक्‍त‍ि सारी दुनियां का भ्रमण करके फिर घर लौट आए।”

पाली की बातों पर जैसे मिड्डी को यक़ीन नहीं आ रहा था, शायद इसीलिए वह मुस्कुराई, “आज हमारे बहते पानी को क्या हो गया?”

“मिड्डी, व्यक्‍त‍ि, व्‍यक्‍त‍ि ही है और चलता-चलता थक ही जाता है और आख़िर में उसे एक ऐसी जगह चाहिए- जो उसकी प्रतीक्षा कर रही हो।”

“यह आख़िरी और प्रतीक्षा वाली जगह सिर्फ़ मुहब्बत ही हो सकती है, पाली – – – ” मिड्डी बड़े वेग के साथ कहती है।

“परन्तु मुहब्बत और प्रतीक्षा है कहां पर? सब बकवास, पाली जैसे और भी चिढ़ गया, “लाओ डालो कोई पैग-शैग सिर्फ़ मोमबत्तियों को जलाने से ही दिलों में रौशनी नहीं हो जाती। पैग पीकर आओ बाहर खड़े हों- बहते पानी के किनारे।” और हम तीनों नहर के किनारे लगाए जंगले के पास आ खड़े हुए।”

“मिड्डी! इधर आओ – – – ।” उसने मिड्डी को मेरे से तोड़ कर अपने बाएं तरफ़ खड़ा कर लिया और हमारे दोनों के कंधों पर अपनी भुजायें इस प्रकार बिछा दी जैसे तसवीर उतरवानी हो।

“मिड्डे! मुहब्बत के बारे में आज के बाद कोई बहस नहीं- मुझे बहते पानी भी अच्छे लगते हैं, खड़े पुल भी और मेरे गुगलियो, तुम भी जिसके पास मुहब्बत भी है और प्रतीक्षा भी।” मैंने देखा कि पाली की आवाज़ रोने जैसी हो रही थी।

“ये दोनों वस्तुएं धरती पर बहुत कम हैं।”

वह उदास सी नज़रों के साथ जैसे दूसरे छोर को देख रहा था। “कभी फुर्सत मिले तो ज़िंदगी के क्रूर चेहरे की तरफ़ भी देखना- दोस्तो दहाड़ें मार कर रो उठोगे, बड़ी वहशियत बिखरी पड़ी है धरती के कोने-कोने में।”

“मुझे लगा जैसे इस फेरी दौरान उसकी सोच किसी असंभावित हादसे के साथ छीली गई हो।”

“पाली जितने भी लोग मुहब्बत की तलाश में हैं, सभी को इसकी क्रूरता का एहसास है और इसलिए मुहब्बत उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत है।” मिड्डी ने बड़े ही शायराना अंदाज़ में कहा।

इस तरह हम अपनी बातों में व्यस्त थे कि पीछे से वेटर की आवाज़ सुनाई दी। मुड़कर देखा तो वेटर के साथ सैनिक की वर्दी में खड़े जवान ने सलूट बजा दिया, “साहिब, मेजर साहिब खुद तो नहीं आ सके पर यह आपके लिए – – – ” और एक ग्रीटिंग कार्ड व सुर्ख़ फूलों का गुलदस्ता मेरे हवाले कर दिया। रोकते-रोकते ही उसने दूसरा सलूट बजा दिया और चलता बना।

“कमाल है भई, यह गुलदस्ता भेजने वाला कौन हो गया?” पाली ज़रूरत से अधिक हैरान था।

“बस इन जैसे लोगों की वजह से धरती के ज़ख़्मों को राहत मिलती है, पाली।” मैंने गुलदस्ते को सहलाते हुए कहा।

“यार मुझसे भी मिला दो ऐसा कोई?” पाली के इस आग्रह को सुनकर मिड्डी मुस्कुराई, “पाली, इस तरह के व्यक्‍त‍ि मिलाये नहीं मिलते, इनको तो ढूंढ़ना पड़ता है, ढूंढ़कर जीतना पड़ता है, फिर अपना आप इनको अर्पित कर देना पड़ता है, इसके बाद व्यक्‍त‍ि ग़ुलाम नहीं आज़ाद हो जाता है- पूर्ण मुक्‍त।” मिड्डी मेरी दाहिने तरफ़ आ खड़ी हुई और उसने अपना सिर मेरे कंधे के साथ टिका दिया।

“मिड्डिया! मैंने तुम्हें कहा था न कि मुहब्बत के बारे में आज के बाद कोई बहस नहीं।” पाली ने अंगुली के साथ हवा काटी।

“मुझे बहते पानी भी अच्छे लगते हैं, खड़े पुल भी, सुर्ख़ फूल भी, बाग़ी व्यक्त‍ि भी, अर्पित लोग भी और घुग्गियों तुम भी जिन के पास मुहब्बत भी है और प्रतीक्षा भी।” वह अपने ही अंदाज़ में झूम रहा था, “लाओ कोई दारू-शारू डालो, अपने ज़ख़्मों को भी मलहम लगा कर देख लें।” वह ज़ोर से हंसा परन्तु लगा जैसे बहता पानी फटा हुआ बादल बनकर रो रहा हो।

 

 

 

 

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