ख़ुदगर्ज़


“सिस्टर जल्दी करो पेशेंट को ऑपरेशन थियेटर पहुंचाओ, फौरन ऑपरेशन करना पड़ेगा।” बदहवास से डॉक्टर रवि नर्स से कह रहे थे।

उनके सहकर्मी देख रहे थे कि सदैव संयत रहने वाले डॉक्टर रवि इस पेशेंट के आने से काफ़ी परेशान थे।

“विमल, देख यार इस पेशेंट का ऑपरेशन पूरे ध्यान से करना।” डॉक्टर रवि अपने मित्र व सहकर्मी विमल से यूं कह रहे थे मानों यह विमल का पहला ऑपरेशन हो। विमल उन्हें सांत्वना दे कर ऑपरेशन थियेटर में घुस गया।

रवि बाल-बाल करके सोच के दलदल में डूबने लगा था। उसका दिल और दिमाग़ उसकी तमाम याद्दाश्त को एक चलचित्र की भांति उसकी आंखों के सामने से गुज़ार रहे थे। पता ही नहीं चला कितने पलों, घड़ियों, घंटों की हत्या के बाद रवि को सोच के दलदल में डूबने से विमल की आवाज़ ने उभार लिया, “मुबारक हो रवि, ऑपरेशन क़ामयाब रहा।” विमल के इतने से वाक्य ने रवि के चेहरे पर कई-कई कमल खिला दिए थे। विमल बोला ‘ … अभी पेशेंट बेहोश है होश आने पर बात कर लेना।’

रवि की सोच अब आकाश में उड़ान भर रही थी। रवि का गोरा गोल चेहरा चमकने लगा था।

“रवि इसका कोई वारिस नहीं आया क्या?”

“तो क्या हुआ? मैं हूं इसका वारिस।” इतना कहते हुए रवि की आंखें चमक उठी थी। वह कोई बहुत बड़ा फ़ैसला ले चुका था।

तारे भगवान भास्कर को विदाई दे रहे थे। नटखट चांद बादलों के आंचल में नई नवेली दुलहन सा शर्माया सकुचाया-सा दिखाई पड़ने लगा था। पेशेंट अभी तक होश में नहीं आया था। विमल के कहने पर अनमने मन रवि घर वापिस चल दिया। जहां उसका नन्हा प्रकाश उसे दीन दुनियां से बेख़बर सोता हुआ मिला करता था।

सुबह हॉस्पीटल, शाम हॉस्पीटल, रात हॉस्पीटल, एक समर्पि‍त डॉक्टर होने के नाते डॉक्टर रवि अपने प्रकाश को सुबह सोता हुआ ही छोड़ आते रात को जब लौटते तो प्रकाश सो चुका होता।

“छाया! प्रकाश सो गया क्या?”

नाईट सूट पहनते हुए रवि ने धीमे से अपनी पत्‍नी से पूछा।

“यह कोई नई बात तो नहीं है।” छाया का संक्षिप्‍त-सा उत्तर था।

हाथ-मुंह धोकर खाना खाकर रवि ने एक पत्रिका उठाई और अपने बिस्तर में घुस गया। वो पत्रिका के पन्ने पलटते-पलटते कब अतीत के पन्ने पलटने लग गया यह उसे भी पता नहीं चल पाया, उसने देखा उसके अतीत के पन्नों में से सब से हसीन पन्ना वही था जो आज अस्पताल में ज़िंदगी मौत से जूझ रहा था। उसकी तलाश के पौधे को बौर पड़ चुके थे।

सुबह फ़ोन की घंटी ने जब उसे जगाया तो भगवान् भास्कर पूर्व की देहली पर खड़े यूं दिखाई दे रहे थे मानों किसी षोडशी को उसके प्रियतम ने मधुमास में प्रथम अभिसार का निमन्त्रण दे डाला हो।

आनन-फानन में तैयार हो कर रवि अस्पताल को चल पड़ा। वो सुबह का फ़ोन को ही कई बार चूम चुका था। उस फ़ोन को जिसने उसके होश में आने की ख़बर उसे दी थी।

अस्पताल में रवि ने देखा उसके अतीत के पन्नों में से सब से खूबसूरत पन्ना बिस्तर पर लेटा था।

आंखें चार हुईं भाव एक हुए।

“आपने अपनी क़सम तो नहीं तोड़ी?” उधर एक शंका जन्म ले चुकी थी।

“तुम्हारी क़सम मुझे अपनी जान से प्यारी है।”

अब शंका, विश्‍वास जितनी गहरी दफ़नाई जा चुकी थी।

“मैंने तुम्हें बहुत ढूंढ़ा कहां खो गई थी तुम?”

“समय की गर्दिश में, हालात के थपेड़े जहां ले गए चली गई।”

“अब समय की गर्दिश, हालात के थपेड़े तुम्हारा कुछ भी न बिगाड़ सकेंगे। अब तुम मेरे पास रहोगी, अपने प्यारे के पास रहोगी।”

“छाया पूछेगी तो क्या कहोगे?”

“कोई घबराने की बात नहीं, कह दूंगा तुम मेरी बहन हो।”

वो मरमरी मूर्ति वो नीली आंखें जो किसी का ईमान बेईमान कर सकती थी। अब डॉ. रवि के साथ उसके घर जा रही थी।

अब डॉ. रवि देर रात तक घर से बाहर नहीं रहते थे। छाया देखती, समझती, कुढ़ती रहती। अब तो डॉ. रवि ‘उस’ के साथ घंटों चहक कर बातें करते थकते नहीं थे। छाया को अपनी गृहस्थी उजड़ती दिख रही थी। वो छिपकली छाया के रवि को प्रेम-पाश में जकड़ती ही जा रही थी। कहने को तो भइया-भइया कहती है कलमुंही ख़ुदगर्ज़ वैसे ये गन्दी मक्खी मेरे सुहाग पर भिनभिनाती फिर रही है। मैं इस ख़ुदगर्ज़ का नामो-निशान मिटा दूंगी। मैं अपनी गृहस्थी को ग्रहण लगाने वाली को डस लूंगी। छाया एक ख़तरनाक फ़ैसला कर चुकी थी।

एक दिन छाया अंदर किचन में थी। प्रकाश अपने पापा के साथ घूमने गया हुआ था। ‘वो’ लॉन में पानी दे रही थी कि एक लम्बी गाड़ी कोठी के पोर्च में आकर रुकी। उस गाड़ी में आने वाले आगंतुक को देखकर उसका चेहरा फक्क हो गया।

गाड़ी के रुकने की आवाज़ सुन कर छाया बाहर निकली तो उसने देखा कि वह लपक कर गाड़ी वाले आगंतुक से कुछ कह रही थी।

“भाभी! प्रणाम” आगंतुक बाक़ायदा झुक कर छाया को प्रणाम कर रहा था।

“अब की बहुत देर में याद आई भाभी की?” छाया पूछ रही थी।

“भाभी तुम तो जानती हो कि तुम्हारा देवर डॉ. प्रेम शहर का माना हुआ गाइनकालजिस्ट है बस काम से फुर्सत ही नहीं मिलती,” प्रेम कह रहा था।

“अच्छा चलो, हाथ मुंह धो लो फिर नाश्ता लगा देती हूं।” छाया आलू कुकर में डालते हुए बोली, “बस पांच मिनट और तुम्हारे मन पसंद आलू के पराठे तैयार हो जाएंगे।”

छाया ने किचन की खिड़की से देखा वो प्रेम को कुछ इशारा कर के अपने कमरे में चली गई थी। छाया मन ही मन बिलबिला उठी, “कलमुंही, कुलटा, नीच, मर्दख़ोर मेरे पति के बाद मेरे देवर से …”

“क्यों रहे यह नीच इस धरती का भार अब और नहीं रहने दूंगी इस कलमुंही को। मैं आज ही अभी इस कांटे को हमेशा-हमेशा के लिए साफ़ कर दूंगी।”

छाया लपक कर अपने बेडरूम में गई रिवॉल्वर निकाला गोलियां चैक की और चल पड़ी ‘उस’ कलमुंही का नामो निशान मिटाने को।

दबे पांव जैसे ही छाया ‘उसके’ कमरे तक पहुंची अंदर से आने वाली आवाज़ों ने जैसे उसके पांव रोक लिए हों।

“तुम यहां इस हाल में?” 

“मुझे अपने प्यारे के पास रहने की चाह थी प्रेम, मेरी चाह को रवि ने वास्तविकता दी।”

“तुम्हारा पति, परिवार”

“सब छूट गए। मैं बंजर थी न बंजर ज़मीन किसी के किस काम की।”

“नहीं तुम बंजर नहीं हो।”

“भगवान् की क़सम कुछ मत कहना।”

“मैं यह अन्याय नहीं होने दूंगा।”

“मैंने तुम्हें और तुम्हारे भाई रवि को जो क़सम दी थी देखो वो क़सम टूटने न पाए।”

“तुम क्या हो? देवी हो या देवियों की भी पूज्य हो? तुम्हारे आंगन में खिलने वाला फूल तुमने छाया भाभी की गोद में डाल दिया, छाया भाभी का मुर्दा बच्चा मैंने तुम्हारे कहने पर अपने हाथों से तुम्हारे बच्चे के साथ बदला था। यह जानते हुए कि तुम्हें और बच्चा नहीं हो सकता, तुमने अपने हाथों अपनी बेहाली अपने नाम लिखवा ली। मुंह बोली बहन हो या कि त्याग की साक्षात् देवी के लिए भी परम पूज्य, तुम क्या हो?”

“मैं सिर्फ़ बहन हूं तुम्हारी, तुम्हारे रवि भैया की बड़ी बहन ख़बरदार मुझे मुंह बोली बहन कहा तो।” अब उसकी आवाज़ सिसकियों में नहा कर आ रही थी। सिसकियां दरवाज़े के बाहर भी दस्तक दे रहीं थीं। दरवाज़ा खुला बरसों से अटकी बरसात खुल कर बरसी फिर कमरे में मानों अनगिनत इन्द्र धनुष खिल उठे हों।

 

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