चौबीस द्वार का पिंजरा

                                                                                                                           

-डॉ. अशोक गौतम

पिछली सांझ पत्नी की चिल्ल पों से तंग आकर चांदनी चौक के झुरमुरे अन्धेरे में आवारा कुत्ते की तरह इधर-उधर लपक रहा था कि अचानक सामने से कबीर आते दिखाई दिए। विस्मय भी हुआ। अब तो यहां धर्म-निरपेक्षता का राज है, ऐसे में कबीर? वह भी कंधे पर मेरी तरह गृहस्थी का फटा झोला लटकाए। तो कबीर को भी अबके गृहस्थी का झोला फाड़ ही गया! इन लेखकों की करनी और कथनी में एका रहा ही कहां अब भैय्या! – – मैं मन में ढेर सारा उल्लास लिए भीड़ में पूंछ हिलाता कबीर साहब के पास जा पहुंचा। गृहस्थी से गृहस्थी मिले पीटे अपना माथ।

‘नमस्कार कबीर जी!’ मैं हद से अधिक ही झुक गया। यह वह भी भांप गए। पर क्या करूं। आदत बना दी है समय ने।

‘आओ-आओ, बिन निब के पैन से लिखने वाले धुरंधर, कैसे हो?’ कबीर ने मुस्कुराते हुए लात मारी तो भी बुरा न लगा। क्योंकि मुझे मालूम था कि कबीर की वाणी महुए का शहद है। कबीर से रोज़ फूलों के शहद की उम्मीद अपने ही युग में न हो सकी तो आज क्या होती?

‘भगवान की दया से ठीक हूं।’

‘कौन से भगवान?’ फिर वही मुद्दा।

‘साकार जय श्री राम।’ मेरे यह कहने पर भी न जाने क्यों निराकार का उपासक मौन रहा। मैंने तभी साहब से पूछा, ‘अचानक साहब आप?’ अब तो देश स्वर्ण जयंती भी मना चुका। अब यहां जातीयता, साम्प्रदायिकता, आडम्बर, पाखण्ड कुछ नहीं। बस! ख़ालिस लोकतंत्र है। संविधान द्वारा देश में धर्म-निरपेक्षता की भी स्थापना हो चुकी है। ऐसे में….

‘लगता है किसी सरकारी पत्रिका से जुड़े हो?’ साहब ने फिर विष उगला। पर मुझ पर कोई भी असर न हुआ। रोज़ हर पल विषधरों से ही तो घिरा रहता हूं।

‘नहीं तो।’ मैंने हल्का सा विरोध किया।

‘तो ये सच क्यों बोले?’ साहब ने चोरी करके बची बिजली से काली चांदनी होते चांदनी चौंक के कालेपन को कम करने के लिए मुराड़ा जलाया और भभके-

कबीर खड़ा चांदनी चौक पर, लिए मुराड़ा हाथ।

जो जाने देश आपना, सो चले हमारे साथ।।

‘आप तो अब भी?’

‘फिर चौंक गए न?’

‘आपको देख मैं इसलिए चौंका महाशय कि इन दिनों केन्द्र में राम राज्य है। ऐसे में अगर संत शिरोमणि तुलसी आते तो रंग जमता।’ मेरा इतना कहना भर था कि उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हो गया। चाहे कोई भी हो, ग़लती का एहसास तो होना ही चाहिए। लोग-बाग यह एहसास चूल्हे में जला चुके हैं, सो और बात है। देश स्वतंत्र होने का यह मतलब कदापि नहीं कि देश में किस पार्टी का देश खाना राज है, देखे बिना ही रेल में चढ़ गए बिन टिकट ही। टी.सी. रेल में टिकट चैॅक नहीं करता वह तो उसकी ईमानदारी है भैय्या! वर्ना आज इस बात को चपरासी भी समझता है कि उसका तबादला किसके राज्य में होगा।

ख़ैर! जब साहब मिल ही गए तो शिष्टाचार भी ज़रूरी था। अतः उन्हें सामने के होटल पर ले गया। चाय बनाने का ऑर्डर दिया तो साहब ने दबी ज़ुबान में पूछा, ‘किसी शूद्र का होटल तो नहीं?’ मैं फिर चौंका। ग़ुस्सा भी आया कबीर पर! वोट की राजनीति के दौर में ये भी ऐसे हो जाएंगे, उम्मीद न थी।

‘ये सब आप कह रहे हैं जो आज भी धर्म-निरपेक्ष, जाति-निरपेक्ष समाज की स्थापना का सपना देखने के लिए बदनाम हैं?’

‘मैं तब मूढ़ था। अब यह ग़लती कदापि न करूंगा। उस समय का जाति-पाति का विरोध करने का खामियाज़ा आज तक भुगत रहा हूं।’ कहते-कहते कबीर साहब की आंखों में आंसू आ गए। जिसने भी सुधार के दो शब्द अपने यहां लिखे उसका हश्र अपने यहां यही हुआ है भैय्या! और लिखो समाज सुधार की बातें! चाय सुड़कते सोचा कि आज के लेखकों के लिए प्रिय विषय राजनीति पर दो चार गप्पें हो जाएं। राजनीति पर चर्चा करना हम भारतीयों का जन्म सिद्ध अधिकार है। हमें भर पेट भोजन मिले या न मिले, ग़म नहीं। पर राजनीति पर दो चार बेकार बहसें हुई तो गीता का निष्काम कर्म हो गया, पेट लबालब भर गया। चौबीस घोड़ों की संसद में सवार प्रधान मंत्री जी के बारे में भविष्य द्रष्टा को छेड़ा तो पुरानी शैली में बोले-

चौबीस द्वार का पिंजड़ा, तामै बिहारी मौन।

रहिबें को अचरज नहीं, उड़े अचंभा कौन।।

यह सुन लगा कि जनाब भी आज के लेखकों से हो गए हैं। बस! थोड़ा सा हेर फेर और नई स्टोरी तैयार। वाह रे कबीर! आज के लेखकों वाला काम तुम्हें भी मार गया?

‘अच्छा अब चलूं?’ कबीर साहब ने पैंट ठीक की।

‘कहां रुके हो आजकल?’

‘होटल ताज में!’ साहब ने इतने सहज कहा कि विश्वास ही न हुआ। मेरे मन की शंका भांप गए सो शंका निवारण करते बोले, ‘सपरिवार आया था तिकड़म जोड़ कर राज्य अतिथि हो सो – – ’

‘अब कहां जाना होगा?’

‘सोच रहा हूं अब निर्वाण तक काशी ही – – ’

‘आपका कोई नया पद?’ मेरे कहने पर उन्होंने झोले से राजमहल प्रकाशन से उपहार स्वरूप मिली कीमती डायरी निकाली और उनके पन्ने उलटते बुदबुदाए-

‘चलो इश्क लड़ाएं, चलो इश्क लड़ाएं हम – – 

अमेरिका हो आएं, जूतियां कुछ खाएं- चलो इश्क लड़ाएं – – – चलो – – -’

कबीर साहब ने जिस मस्ती में यह पद बुदबुदाया तो लगा कि राज्य अतिथि होने के बाद भी कुछ धार शेष है।

 

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