मंझदार

“बाई जी! कुछ खाने को दे दो बाई।”

पीछे से आये कोमल स्वर ने मुझे चौंका दिया! मैं बहुत देर से झील की नैसर्गिक सुन्दरता को निहार रही थी। उसकी आवाज़ ने मेरी एकाग्रता तोड़ दी, मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वह मेरे पैरों में झुक गई। उसने फिर रटा-रटाया वाक्य दोहराया।

“अरे! पैर तो छोड़।” मैं दो क़दम पीछे हटी। वो फुर्ती से उठी। उसने मेरे बाजू को सख़्ती से पकड़ते हुए कहा, “कुछ खाने को दो न।”

मैंने झटके से अपना हाथ छुड़ाया ही था कि वो सहम गई। हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई। वो नंगे पैर थी। दिसम्बर के माह में एक फटी-पुरानी फ़्रॉक पहने हुए सात-आठ बरस की लड़की मुझे सयानी नज़र आई। उसकी पीठ और पेट एक हो गए थे। मैं उसे क़रीब से देखने के लिए उसके समीप जा पहुंची।

“बाई जी! माफ़ कर दो। अब नहीं करुंगी ऐसा।” यह कहकर वो तेज़ी से पलटी और भागने लगी।

“अरे! सुन तो। क्या नाम है?” मैंने पुकारा।

“मेरा नाम।”

उसे यक़ीन नहीं हुआ था कि मैं उसका नाम भी पूछ सकती हूं।

“नाम! सब मुझे छुटकी बोलते हैं।”

“क्या करती हो?”

यह सवाल शायद उसके लिए अजीब था।

“मेरा मतलब दिन भर क्या करती हो?” मैंने उसके पास जाकर पूछा।

“यहां आने वालों से खाना मांगती हूं।”

“मांगती हो! स्कूल नहीं जाती।”

“अम्मा कहती है, पढ़कर क्या होगा? छोटू को कौन सम्भालेगा? अम्मा काम पे गई है। छोटू सोता है। अभी जागेगा तो खाने को मांगेगा।”

“कहां रहती हो?”

“उस टीले के पार।” उसने एक हाथ से इशारा किया।

झील के किनारे से वो टीला काफ़ी दूर था।

पहाड़ पर दूरियां नापना कितना मुश्किल है। टेढ़े-मेढ़े रास्ते, ऊंची-नीची पगडण्डियां और बीच में घाटियां अक्सर भ्रमित कर देती हैं।

अंदाज़न उसे वहां से यहां आने में आधा घंटा तो लगता ही होगा।

जाने में तो एक घंटा! चढ़ाई जो है। नंगे पैर पहाड़ पर चढ़ना पहाड़ जैसा है।

“कुछ खाने को दो न।” उसने फिर कहा तो मेरा ध्यान टूटा।

“आओ! मेरे साथ चलो।” मैंने छुटकी से कहा।

छुटकी के चेहरे पर चमक आ गई। रेस्तरां में पहुंचने पर मैंने देखा, छुटकी के साथ मुझे देखकर आस-पास के दुकानदार मुस्कुरा रहे थे। छुटकी भी हौले-हौले मुस्कुरा रही थी। झेंपते हुए वो सामने बैठ गई।

“क्या खाओगी?”

“डबल रोटी। छोटू के लिए भी।”

मुझे यह समझते देर न लगी कि उसके मासूम से चेहरे में भाई के लिए चिन्ता एक बहन की कर्त्तव्य परायणता दर्शा रही थी।

“बाई जी! छोटू जाग गया तो रोएगा।”

उसके चेहरे में बेचैनी साफ़ झलक रही थी। नन्हीं अबोध बालिका भी चिन्ता की गठरी ढो सकती है। इसका एहसास मुझे पहली बार हुआ।

“मुझे अपना घर नहीं दिखाओगी?” मैंने कहा।

“घर! टीले के पार जाना होगा।” छुटकी ने तुरंत जवाब दिया।

“जब तुम नंगे पैर वहां से यहां आ सकती हो तो मैं वहां क्यों नहीं जा सकती? देखो, मैं तो तुमसे बहुत बड़ी हूं।”

वो यह सुनकर ज़ोर से हंसी। उसने मेरे चेहरे की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

“बाई, सब यहां झील के आस-पास घूमते हैं। वहां कोई नहीं जाता गिर जाओगी। तुम्हें चोट आ गई तो? यहां डॉक्टर भी नहीं है।”

मासूम बचपन ने प्रौढ़ समाज को मुंह चिढ़ाया। मैं हतप्रभ थी। अभी जो बच्ची भूख से गिड़गिड़ा रही थी, वो अब खिलखिला कर हंस रही है। बचपन मजबूरियों से घिरा हुआ हो तब भी उसका बचपना नहीं छिपता।

मैंने दुकानदार को एक ब्रेड पैकेट, टमाटर सूप, दो दर्जन केले और एक लिटर दूध के लिए सौ रुपये दिये। सामान लेकर मैंने छुटकी से कहा, “चलो तुम्हारे घर चलते हैं। वहां आराम से बैठकर खायेंगे।” अनमने भाव से वो उठी और चुपचाप मेरे आगे-आगे चलने लगी। उसके नपे-तुले क़दमों में ग़ज़ब की तेज़ी थी। जैसे-जैसे मैं उसके बगल तक पहुंचती तो अनायास ही मेरे क़दम सुस्त हो जाते। देखते ही देखते वो मुझसे बीस-पच्चीस क़दम आगे हो जाती। वो मुड़-मुड़ कर मुझे देखते हुए आगे बढ़ रही थी।

संवादहीनता के बावजूद भी उसकी आंखें मुझसे कह रही थी, “धत्! चार क़दम भी साथ नहीं चल सकती, पहाड़ का जीवन तो तुम चार दिन भी नहीं जी सकती। तुम शहर वाले केवल हाड़-मांस के पुतले ठहरे।”

मैं काफ़ी पीछे छूट गई थी। छुटकी बहुत पहले अपने घर पहुंच गई एक घंटा दस मिनट की खड़ी चढ़ाई के बाद जब मैंने टीला पार किया तो छुटकी अपने छोटे भाई को गोद में उठाकर अपने जर्जर मकान के सामने खड़ी थी।

सर्दी के दिनों में मैं पसीने से तर-ब-तर हो गई। छुटकी मेरी मनोदशा पर शायद हंस रही थी। मिट्टी-गारे और पत्थरों से बना कच्चा मकान छुटकी के परिवार की दयनीय दशा का साफ़ चित्रण कर रहा था।

चिथड़ों से सिला बेनाप का बिस्तर, पांच-छः बरतन, एक मिट्टी का चूल्हा, हरी और काई से बदरंग हो चुका घड़ा ही उस मकान की कुल जमा पूंजी का खुला खाता था। छुटकी और छोटू अभी डबल रोटी और केले खा ही रहे थे कि उनकी मां आ गई। मैंने उसकी मां को सारा क़िस्सा सुनाया। उसकी मां मुझे एक-टक देख रही थी। शक्ल-सूरत और हाव-भाव से वह मुझे अनपढ़ दिखाई दी। उसका थका हारा शरीर समय से पहले ही बूढ़ा हो चुका था। छुटकी के चेहरे में संतोष था। वह छोटू को लेकर कहीं खेलने चली गई।

“मैं छुटकी को गोद लेना चाहती हूं। वह मेरे साथ दिल्ली में रहेगी। हमेशा के लिए। मैं उसे पढ़ाऊंगी। उसकी शादी की ज़िम्मेदारी भी मेरी रहेगी। तुम्हें हर महीने पांच सौ रुपये भेज दिया करुंगी, बिना नागा।” मैंने छुटकी की मां से कहा। मैंने सोच समझकर सावधानी से एक-एक शब्द चबा कर कहा।

“बोलो सोच क्या रही हो?” उसके खामोश रहने पर मैंने छुटकी को गोद लेने का उद्देश्य बताना चाहा। बमुश्किल से होंठों ने वो कह दिया जो मन में कहीं था, “मेरे पास सब कुछ है। बस क़ुदरत ने मुझे मां बनने का सौभाग्य नहीं दिया। छुटकी के कारण मैं मां का दर्जा पा लूंगी। मां होने के एहसास का सुख हर लड़की चाहती है। देखो न मैं औरत हूं तो, पर मां नहीं। पति ने भी साथ छोड़ दिया यह कह कर कि मैं आधी-अधूरी औरत हूं।”

मैं चुप हो गई। न जाने क्या-क्या और कैसे कह गई। उसकी खामोशी मुझे परेशान कर रही थी। मैं सोचने लगी कि यह अनपढ़ और ग्रामीण औरत नहीं समझेगी मेरी भावनाओं को। तभी उसने चुप्पी तोड़ी, “ठीक है। लेकिन छुटकी को एक बार ले जाने के बाद तुम फिर यहां कभी नहीं आओगी, कभी भी नहीं।”

“मुझे मंज़ूर है, ये लो पांच सौ रुपये, ख़र्चे के लिए हैं, मैं एक जनवरी को आऊंगी। छुटकी को लेने। अब मैं चलती हूं।”

पहाड़ी टीला उतरने में मुझे एक घंटा लगा। बदन का सारा वज़न घुटनों पर आ गया। छुटकी में तीव्र बुद्धि के लक्षण मैं देख चुकी थी। मैं छुटकी के बारे में मन ही मन में सोचने लगी, छुटकी के आ जाने से अकेलापन भी दूर हो जाएगा। छुटकी घर का कामकाज भी संभालेगी, पढ़-लिख कर कुछ करेगी, बुढ़ापे का सहारा भी बनेगी।

“मैडम आपके बचे हुए रुपये, आप वापिस लेना भूल गई थी।”

दुकानदार ने मुझे आवाज़ लगाते हुए कहा। मुझे ध्यान आया कि छुटकी के खाने के लिए सामान ख़रीदते समय मैंने सौ रुपये का नोट दुकानदार को दिया था, मुझे हैरानी हुई। बचे हुए रुपये लौटाना दिल्ली जैसे शहर में महत्वपूर्ण घटना जैसा है।

“मैडम आप छुटकी को कैसे जानती हैं।” दुकानदार ने झिझकते हुए पूछा।

“बस, आज ही यहीं झील के पास मुलाक़ात हुई थी! लेकिन…..। तुम उसे जानते हो?”

“मैं क्या यहां का बच्चा-बच्चा उसे जानता है।”

“मैं कुछ समझी नहीं।”

“मैडम, छुटकी की मां हरिजन है। आठ-नौ बरस पहले कोई विदेशी उसे शादी का झांसा देकर छल गया। जिस आदमी ने बाद में छुटकी की मां को अपने पास रखा वो भी दो-तीन साल बाद साधु-सन्यासी हो गया।”

“वो कहां है? कोई नहीं जानता।”

मैंने दुकानदार से छुट्टे रुपये लिए और आगे बढ़ गई।

दिल्ली का सफ़र मुझे अपेक्षाकृत बहुत लम्बा लगा। छुटकी का चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहा। दिल्ली पहुंचने पर दिनचर्या फिर मशीन की भांति हो गई। शहर में आदमी चलती फिरती मशीन के समान है। भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में मानवीय संवेदनाएं पीछे छूटती चली जाती हैं। शहर का आदमी चौबीस घंटों में पल-पल का हिसाब रखता है। घड़ी अलार्म और सफ़र उसके साथी हैं। भीड़ में भी वो अकेला है।

आज भी छुटकी का ख़्याल हो आया। अनगिनत प्रश्न फिर उठे। हरिजन लड़की को गोद लेना ठीक होगा। यहां दिल्ली में कौन जान सकेगा कि छुटकी हरिजन है। विधिवत् गोद लेने के बाद वह स्वर्ण हो जाएगी। छुटकी ने फिर कभी वापिस जाने की ज़िद्द की तो क्या होगा?

समय अपने सधे हुए क़दमों से आगे बढ़ता है। हमारी योजनाएं ठहर सकती हैं। हमारे क़दम बहक सकते हैं। समय नहीं रुकता कभी बहकता भी नहीं है। मैंने दीवार पर टंगे कैलेंडर को देखा। आज पहली जनवरी है।

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