मरसिये की उम्र

मीरा के जाते समय उसने मीरा का हाथ छोटे बच्चे के सिर की तरह सहलाया। जिस मीरा के साथ उसने घर बसाने का सपना देखा था, उसी मीरा के लिए उसके बनवासी बोल उभरे, “अपनी कहानी लोरी से शुरू हो कर मरसिया पर ख़त्म हो गई है।”

चलती लुओं में मीरा की खामोशी शीत बनी रही। उस के हाथों का चूड़ा कांप उठा। उसकी मांग का सिंदूर थोड़ा-सा झड़कर बरौनियों पर अटक गया। बात करते हुए उसने अपने दोनों हाथ मीरा के आगे पसार दिए, “देख, इन हथेलियों की कोई भी लकीर तुम्हारे लिए नहीं है।”

मीरा के लिए उसके उदास बोलों का यह आख़िरी तोहफ़ा था।

मीरा पराई मौत की तरह बहुत दूर थी, और वह ग़लत सवाल के हासिल की तरह एक शाम मेरे पास पहुंच गया।

अंधेरी रातों में रौशनी की कतरन जैसे किसी टहनी के साथ उलझी रह जाती है। अपनी भटकन की परेशानी से बौखलाया हुआ सा बोला, “रावी, मीरा की मांग का सिंदूर मेरे लिए नहीं था और न ही मेरी दहलीज़ पर चुआया हुआ शगुनों का तेल मीरा के लिए था। …. यह मेरी मौत थी रावी! …. मेरी अपनी मौत! इस मौत का ज़िम्मेदार कोई भी और नहीं, सिर्फ़ मैं हूं।”

हम दोनों पैदल ही यूनिवर्सिटी की ओर चल दिए। सारे रास्ते वह मीरा की बातें किसी ग़रीब की अनसुनी शिकायत की तरह करता रहा। कुएं में दी हुई आवाज़ की तरह वह जवाब में अपनी ही आवाज़ मेरे मुंह से सुनना चाहता था। मैं भी सारे रास्ते अपने बोलों को मरहम की तरह बरतती रही।

जब वह पहली बार मिला था, असल में मुझ से नहीं मिला था, मीरा बहन से मिला था। मैं छोटी थी उन दिनों। उसने मेरा सिर सहला दिया। तब यह ख़्याल तक भी नहीं था कि मैं कभी उसके बराबर की हो कर उसके साथ-साथ चलूंगी।

यूनिवर्सिटी में उसका कुछ नहीं था। वहां मेरा भी कुछ नहीं था, पर दोस्ती के दूसरे बरस वह छुट्टी पर आया तो यूनिवर्सिटी का रास्ता हमारे पैरों की आदत हो गया। हम सुस्ताने के लिए वहां बैठते, पानी पीते, चाय पीते और लौट आते। बहुत चले थे हम, पर मुझे इस बात का गुमान तक भी नहीं था कि हम एक-दूसरे की ओर भी चल पड़ेंगे। उसने सहज ही मेरे चेहरे पर मीरा का चेहरा चिपका दिया था और फिर उसी चेहरे को वह मुझमें देखता रहा था। उस शाम से पहले मुझे पता भी नहीं था कि मीरा का चेहरा मेरे चेहरे में ही समा चुका था और उसने अब मुझमें से मुझे देखना शुरू कर दिया था।

उस शाम हम यूनिवर्सिटी से वापिस लौट रहे थे। उस शाम भी सड़क के गंदे नाले की बदबू की ओर हमारा कोई ध्यान नहीं था। उस शाम भी गुज़रती हुई ट्रकें हमारे ऊपर धूल डाल गई थीं। उस शाम उसके बोल ऐसे थे जैसे कच्ची टहनी ओस के बोझ से कांपती है। दुविधा के विलम्ब के बाद उसने कहा, “मुझे नदियां शायद इसलिए अच्छी लगती हैं क्योंकि तुम्हारा नाम रावी है। …. जानती हो, मेरी जन्मपत्री में लिखा हुआ है कि मुझे पानी से डरना चाहिए। नदी में मेरी मौत भी हो सकती है, पर ….।” उसने झिझक के कारण बोल दबा लिए और बेमतलब आसमान की ओर देखते हुए धीरे से बोला, “रावी! मेरा दिल डूबने को करता है।”

उसके कांपते हुए बोलों का बोझ मैंने भारी पत्थर की तरह उठाया। मेरा मन इन्द्र का सिंहासन नहीं था पर डोल गया। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था, जवाब के इन्तज़ार में उसकी नज़रें मेरे पैरों से लेकर सिर तक फैल गई।

उसकी आंखों में उस नन्हे बालक सी उत्सुकता थी, जो कपड़ों से ढकी मंदिर की मूर्ति को कपड़ों के बिना देखने की अभिलाषा रखता है। उस पल उसकी आंखों में कुछ उस तरह की पवित्रता थी जो हव्वा के साथ किए पहले गुनाह के समय शायद आदम की आंखों में रही होगी।

इससे पहले मैंने अपने जिस्म पर कभी ध्यान नहीं दिया था। मुझे अपने ही जिस्म के तिलिस्म के बारे में कुछ पता नहीं था। मैंने जैसे पल-छिन में ही उसकी आंखों के ज़रिये अपने जिस्म को जान लिया हो।

मैंने अपनी मुस्कुराहट के इर्द-गिर्द तसल्ली की मलमल लपेट ली।

उसने इस तसल्ली की उंगली भी उसी सहज भाव से पकड़ ली जितने सहज भाव से उसने कभी मेरा हाथ पकड़ लिया था। वह सारे काम ही सहज भाव से करता था, बस मेरे होंठ ही उसने कुछ जल्दी में चूमे थे।

उस दिन हम रिश्ते का बुरक़ा पहन कर उस के किसी दोस्त के यहां चले गए थे।

बैठक के एकांत में मेरे होंठों पर मीठी-सी झनझनाहट बाक़ी रह गई थी, उस पल मैं सिर से पांव तक उसकी नंगी कामना थी। उसकी नज़र चुम्बन बन कर मेरे होंठों पर चिपकी रही । वापिस लौटे तो मैं बहुत चुप थी। वह जुर्म का इकबाल करने की तरह नीची निगाह किए बोला, “रावी, मेरा गुनाह एक कमज़ोर इन्सान का गुनाह है। मुझे माफ़ कर देना। …. मैं इसका हक़दार नहीं हूं शायद, पर यह जुर्म मैं तब तक करते रहना चाहूंगा जब तक मर न जाऊं।” उस रात अपनी खामोशी का मैंने गहरे अन्तर में बहुत शोर सुना। मैं खुल कर सांस लेना चाहती थी, पर बहुत से डर थे, बहुत से संस्कार थे, जो सांस लेते समय सांस की नली के आगे आ जाते थे।

उस रात उसकी कल्पना बन्द दरवाज़े के रास्ते से आकर मेरे साथ लेट गई। मैंने अपनी उंगली से उसकी नंगी छाती पर नाम लिख दिया और उसने ….

उस रात मेरा तसव्वुर दिल की तरह धड़कता रहा था और दिन के उजाले में मुझे औरत की शर्मसारी मार रही थी।

हमारे रास्ते के आगे कोई घर नहीं था, जानती तो मैं भी थी और बेख़बर वह भी नहीं था, पर फिर भी उसने मेरी बांह पकड़ कर मुझे रोक लिया। मेहंदी की बाड़ वाली खुली जगह की ओर इशारा करते हुए बोला, “हम अपना घर वहां बनाएंगे …. और वह जो पेड़ों का झुंड है वहां हम शाम को बैठा करेंगे। सामने घास पर मेरी रावी के नन्हे मुन्ने खेला करेंगे …. और वह जो ऊंची जगह है वहां ….।”

यह उसकी बेहोशी का आलम था। …. और मैं जो होशमंद थी, मेरी आंखें गीली हो गई। बेबसी में मेरा शरीर कांपने लगा। मेरे लिए यह सपना वर्जित था। उसे भी याद नहीं था कि उसके सारे सपने सतवांसे थे, वह सपने उसके बोलों से परे जी नहीं सकते थे। पता नहीं वह कैसे भूल जाता था कि ब्याहे हुए आदमी को मनचाहे सपने देखने का कोई अधिकार नहीं होता। मैंने उसकी बांह हिलाई, “राजे! तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न?”

उसने जवाब देने के बजाय परेशान होकर मेरी ओर देखा और फिर रुआंसा सा हो गया।

बेबसी के इन पलों में वह इतना छोटा हो गया था कि मेरे बराबर का भी नहीं रहा था। ऐसे पलों में मुझे उसकी मां बनना होता था। मेरा मन किया, मैं उसे कसकर छाती से लगा लूं, उसके चेहरे की उदासी पर अपने तपते हुए होंठ रख दूं। मैं बस इतना भर कर सकी कि सूनी सड़क पर उसका हाथ पकड़ लिया, अपने आंसू पीकर मुस्कुराई और बोली, “अगले जन्म में हम अपनी सारी इच्छाएं पूरी कर लेंगे …. वायदा रहा …. बस!”

वह आज्ञाकारी बच्चे की तरह चुपचाप चल दिया और फिर धीमी आवाज़ में बोला, “वह ठीक ही कहती थी।”

उसके चेहरे पर उदासी के बादल थे। मैंने एक निगाह उसकी ओर देखा और चुप रही।

“…. जानती हो रावी!” एक दिन वह कहने लगी, “तुम्हारे पास तो सिर्फ़ गिनती के दिन होते हैं। तुम सारी उम्र भी भटकते रहो तो लौटकर मेरे पास ही आओगे। अपने मुल्क में ख़ाविन्द कहीं नहीं जा सकता उसे लौटकर अपनी बीवी के पास ही आना पड़ता है।”

मरघट के साए जैसे बोल उसके अन्तः की वीरानी का संकेत थे। रात के समय ख़ामोश बहते हुए पानी सा शून्य मेरे मन में भी फैल गया। 

हल्का सा अंधेरा धुएं की तरह फैल रहा था। एक फ़ौजी जीप तेज़ी से हमारे पास से गुज़र गई। अंधेरे में गुम हो रहे रास्ते पर किसी घर का कोई नामोनिशान नहीं था। हमें चलना था और बस चलते रहना था।

अचानक मुझे अपनी जगह भी समझ में आ गई और उसकी बेबसी भी।

वह हर बार झरने की तरह मुझ तक पहुंचा था और लहर की तरह लौट जाता रहा था। आज भी उसका अपने खूंटे की ओर लौट जाने का दिन था।

गाड़ी आने में अभी बहुत समय था। हम स्टेशन के बाहर एक रेस्तरां में जा बैठे।

हमारी परेशान-सी चुप चौमासे जैसी थी।

उदासी को फूंक मारने के यत्न में मैंने आंखों में शरारत भर ली, “राजे! अब तुम चले जाओगे, तो मेरे साथ बेमतलब यूनिवर्सिटी तक कौन जाया करेगा।”

पानी का एक घूंट भरकर उसने गिलास रख दिया। छलके हुए पानी से उसने मेज़ पर पहले मेरा नाम लिखा और फिर अपना। सिर ऊपर उठाते हुए वह अपने ध्यान से टूटा और खिल-खिलाकर हंस पड़ा।

मुझे छोड़ उसने कहीं नहीं जाना था, बस मेरे पास से जाना था। अगले साल मुझे खोजते हुए उसने फिर मेरे पास पहुंच जाना था। अपनी बाड़ के अन्दर वह हमेशा के लिए नहीं बैठ सकता था। चलती लुओं में बीतते समय का एहसास उसे बुरी तरह बेचैन किए रखता था। उम्र ख़त्म होने के पहले वह जी लेना चाहता था …. किसी भी क़ीमत पर जी लेना चाहता था। जीने के यत्न में ही उसने पैरों से सफ़र जोड़ लिया था। जीने के यत्न में ही उसने अपने माथे से चक्रवात बांध लिए थे।

मेरे अकेलेपन को हर पल उसकी आवश्यकता थी और उसकी भटकन को मेरी। …. पर मैं नहीं जानती थी कि मेरे पास आकर वह कुछ घड़ियां जी भी लेता था या नहीं।

उसकी उम्र रिश्तों के अभिशाप की उम्र थी। वह बहुत समय से अपने सपनों के ताबूत के पास सिर झुकाए खड़ा था और अब मरुस्थल की प्यास जैसा चेहरा लेकर चलने के बारे में सोच रहा था।

कॉफी लाकर रखने वाले वेटर ने मेरे और उसके नाम पर मैला कपड़ा फेर दिया। वह कपड़ा न भी फेरता तो पंखे की हवा में पानी से लिखे नाम मिट ही जाते। मुझे उस पल उसके उलझ गए ताने बाने की गांठों का ख़्याल आया। सोचा धागा तोड़कर खुद को अलग कर लूं, पर अपने फ़ैसले पर खुद ही रूठ कर बैठ गई। उसकी राह के आगे तो पहले ही कोई घर नहीं था, फिर पड़ाव भी नहीं आएगा। न जाने कहां बैठ कर सांस लिया करेगा।

मैंने सदा की तरह अपना प्याला जूठा करके उसकी ओर सरका दिया।

उसने जूठे प्याले पर मेरे होंठों वाली जगह पर अपने होंठ रखे और फिर कसैली कॉफी का एक घूंट भर लिया।

उसका जूठा प्याला अपनी ओर करते हुए मैंने ताकीद की, “राजे! ख़त समय से डाल दिया करना। ख़त जल्दी नहीं आता तो फ़िक्र हो जाती है। …. जाकर अपना ख़्याल रखना। जाड़े शुरू होने तक मैं तुम्हारे लिए स्वेटर बना कर भेज दूंगी। …. देखो, साफ़ रूमाल लेकर दफ़्तर जाया करना। गुम हो जाएंगे तो मैं और भेज दूंगी और हां ….।”

मैंने जल्दी से अपनी बात बीच में रोक ली। जिसे ये सारी बातें कहनी थी, वह तो वहां ही थी, जहां वह जा रहा था। मैं तो कोई और थी।

हम स्टेशन पर आ गए।

गाड़ी आई और वह अपनी अटैची बर्थ पर टिकाकर फिर प्लेटफ़ार्म पर आ गया।

“अब तुम शायद अगले साल आओगे और शायद नहीं भी आओगे।” उदासी का अंधेरा मुहब्बत की बेबसी की तरह बहुत गहरा था। उसने मेरे सिर पर हल्के से एक थपकी दे दी, “तुम अगले साल का क्यों सोचती हो? जब गाड़ी चलने लगेगी तो मैं तुम्हारी बांह पकड़ कर तुम्हें गाड़ी में बिठा लूंगा और फिर उतरने नहीं दूंगा।”

मैंने बनावटी गुस्से से कहा, “मैं शोर मचा दूंगी।”

…. और हम हूकड़े मार कर रोने की तरह खुलकर हंसे।

इंजन ने लम्बी चीख़ मारी तो उसने मुझे अपनी बांहों में भर लिया, “…. अच्छा फिर।”

उसके होंठ एक चुम्बन का सफ़र तय करने के लिए मेरी ओर बढ़े। अचानक मेरे और उसके बीच की दूरी पथरा गई। वह दौड़ कर सरकती हुई गाड़ी पर चढ़ गया।

वह झक्कड़ की तरह आकर चला गया था और मैं बेचारे पेड़ की तरह खड़ी रह गई थी।

मैं आज से ही उसके लौट आने की प्रतीक्षा में लग जाऊंगी, जैसे फूल को उस हाथ की चाहत होती है जो आगे बढ़ कर उसे तोड़ ले।

…. पर क्या पता किसी सुबह ने अब सूरज लेकर लौटना भी था या नहीं।

मीरा बहन को विदा करने के बाद मां को मुझे भी विदा करने की बड़ी जल्दी थी। शायद राजे के लौटने से पहले-पहले मेरे लिए भी वह समय आ जाए। जब औरत हंस रही हो तो नफ़रत कर रही होती है। उसी नफ़रत से नंगी सोकर, उसका मुंह चूमकर, उसी के बच्चे की मां बन जाती है। यह सब कुछ इतने सहजभाव से हो जाना था जैसे कहीं कुछ नहीं टूटा जैसे मुस्कुराहट में कहीं कोई दरार नहीं आई। जा रही गाड़ी की काली पीठ मैं अब नहीं देख सकती थी, पर इस पल का सच देख सकती थी।

इस पल का सच यह था कि मैं एक औरत थी। इस पल का सच यह था कि वह मर्द था। एक औरत एक मर्द को प्यार करती थी। इस में कुछ भी ग़ैर क़ुदरती नहीं था, कुछ भी अजीब नहीं था।     

 

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