मफ़लर

Maflar Story File

-सुरेन्द्र कुमार ‘अंशुल’

ऑफ़िस जाने के लिए मैं तैयार हो चुका था। रूमाल लेने के लिए मैंने अलमारी खोली तो मेरी नज़रें अलमारी में कपड़ों के नीचे झांकते एक ‘पैकेट’ पर पड़ी। मैंने पैकेट बाहर निकाला और खोल कर देखा तो उसमें एक खूबसूरत मफ़लर था। मैंने धीरे से उस पर हाथ फिराया। प्यार की एक अद्भुत अनुभूति का मुझे एहसास हुआ। पत्नी ने यह मफ़लर मेरे जन्म दिन पर मुझे उपहार देने के लिए ख़रीदा होगा। ऐसा मैंने सोचा। कल ही तो मेरा जन्म दिन है। सर्दी में भी मुझे पत्नी के प्यार की गर्मी का अहसास अन्तर्मन से महसूस होने लगा। पत्नी की खुशबू मेरे तन मन में फैलने लगी थी। तभी पत्नी ने रसोई में से ही ‘रूमाल मिल गया क्या?’ पूछा।

मैंने झट से मफ़लर पैकेट में डाला और अलमारी में कपड़ों के नीचे रख कर अलमारी बन्द करते हुए बोला, “नहीं! मुझे नहीं मिला।” मैं पत्नी की खुशी को कम नहीं करना चाहता था।

आटे सने हाथों से पत्नी अन्दर आई और फिर मेरी पर्सनल दराज़ में से रूमाल निकाल कर मुझे पकड़ाते हुए बोली, “आपको तो कुछ मिलता ही नहीं।” कृत्रिम क्रोध की रेखाएं उसके सुन्दर सलोने चेहरे पर देख कर मुझे हंसी आ गई। और मैं बोला “गुस्से में तो तुम और भी ज़्यादा अच्छी लगने लगती हो।”

“अच्छा रहने दो बस। बातें बनाना छोड़ो। क्या ऑफ़िस को देर नहीं हो रही?” पत्नी बालों की लट पीछे धकेलते हुए बोली।

“अच्छा बाबा जाता हूं।” कह कर मैं ऑफ़िस की ओर निकल पड़ा। सारा दिन मैं पत्नी के बारे में ही सोचता रहा। पत्नी के प्यार के समक्ष मैं नतमस्तक था। सायं घर लौटा तो पत्नी के कॉलेज का कोई मित्र वहां आया हुआ था, जिसके बारे में पत्नी ने मुझे पहले से बताया हुआ था। मैंने बात को सहज भाव से लिया था, क्योंकि कॉलेज में इस तरह के मित्र बनना स्वाभाविक है।

“आ गए आप?” पत्नी ने मुस्कुरा कर पूछा।

“हां।” मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया। तभी मेरी नज़रें मित्र के गले में पड़े मफ़लर पर पड़ी। मैं चौंक पड़ा। यह तो … यह तो वही मफ़लर है जो कि अलमारी में आज सुबह मैंने … ? मैं इससे आगे कुछ और नहीं सोच सका। पत्नी मित्र का परिचय करवाती जा रही थी, जबकि मैं वहां होकर भी वहां नहीं था। मुझे सारी दुनियां घूमती-सी नज़र आ रही थी। मुझे लगा कि वह मफ़लर मित्र के गले में नहीं, बल्कि अब मेरे गले में लिपटा है जिसका एक सिरा पत्नी के हाथ में तथा दूसरा सिरा उस तथाकथित मित्र के हाथ में है, जो धीरे-धीरे कसता जा रहा है, कसता जा रहा है।

मैं वहीं पर एक सोफ़े पर धम्म से बैठ गया। पत्नी और मित्र अपने कॉलेज के समय की यादों में खोए हुए थे। कुछ देर बाद पत्नी चाय बना कर ले आई थी।

मैंने चाय पीने से मना कर दिया था। मेरे मन-मस्तिष्क पर अभी भी मित्र के गले में लिपटा मफ़लर सिर उठाए था।

मित्र यहां किसी कार्यवश आया था। ‘सोचा, मिलता चलूं,’ ऐसा मित्र ने ही बताया था, जबकि मेरा मन अब इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं था। मुझे अब पत्नी के चरित्र पर भी शक होने लगा था।

कुछ देर के बाद मित्र जाने की बात करता है। मैं औपचारिकता से कह उठता हूं कि “रात का खाना खा कर जाएं।”

“नहीं … नहीं … । मैं खाना नहीं ले सकूंगा। मेरी ट्रेन छूट जाएगी। फिर इसके बाद सुबह ही … ?” वह विवशता प्रकट करते हुए बोला।

Maflar Story File Image1“तो क्या हुआ? आज रात यहीं ठहर जाओ।” पत्नी ने हंसते हुए कहा तो मैं चौंक पड़ा। पत्नी का व्यवहार मेरे मस्तिष्क में संदेह की जड़ों को मज़बूत करता जा रहा था।

“आप भी कुछ कहें न!” पत्नी ने मुझे टोका था। मैं बौखला गया और बोला, “अरे! मित्र तुम्हारा है, तुम्हीं जानो।” कह कर मैंने अपना पल्ला झाड़ लिया था।

लेकिन मित्र ने जाने की ठान ली थी। उसे जाता देख मैंने पत्नी को उसे दरवाज़े पर छोड़ आने के लिए कहा। वह मुझसे हाथ मिलाकर दरवाज़े की ओर बढ़ा, पीछे-पीछे पत्नी भी। वे हंस-हंस कर दरवाज़े पर खड़े होकर बातें करने लगे थे और मैं … ?

मैं स्वयं को संयत करके अपने कमरे में गया। धीरे से अलमारी खोली वहां वह ‘पैकेट’ नहीं था, जो मैंने सुबह देखा था। शक की कोई गुंजाइश नहीं थी। पत्नी और मित्र की ‘मित्रता’ को मेरा दिल किसी और ‘सम्बन्ध’ से जोड़ रहा था।

मित्र कब गया? मुझे नहीं पता चला। मैं ‘बेड’ पर लेट गया। मस्तिष्क पर अजीब से सवाल कुलबुला रहे थे। तभी पत्नी की आवाज़ कानों में पड़ी थी, “क्या बात? तबीयत ठीक नहीं है क्या?”

“नहीं ठीक है। बस थोड़ा थक गया हूं।” कह कर मैंने ‘बेड’ पर करवट बदल ली थी।

“तुमने सायं की चाय भी नहीं ली? ऐसा तो पहली बार हुआ?” पत्नी ने अपनत्व जताते हुए पूछा।

“बस मेरा मन नहीं था।” मैंने पत्नी को टालना चाहा। लेकिन उसने बात जारी रखी और पूछा, “कहो तो खाना लगा दूं?”

मैं मुंह फेरे ही बोला, “नहीं, मुझे भूख नहीं। तुम खा लो।”

“जब तुम ही नहीं खाओगे तो मैं भी क्या करूंगी खा कर … ?”  अगर तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है तो किसी डॉक्टर को … ?” पत्नी की व्याकुलता स्वर से स्पष्ट नज़र आ रही थी।

“नहीं मैं ठीक हूं। तुम मेरी चिन्ता न करो।” मन में तो आया था कि कह दूं तुम अपने मित्र की चिंता करो बस। पर मन की घुटन मैं होंठों तक नहीं ला पाया था।

इसके बाद पत्नी कुछ नहीं बोली। मैं करवट लिए सोने की कोशिश करने लगा। लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी। मस्तिष्क में रह रह कर मफ़लर घूम रहा था। पत्नी ने खाना खाया या नहीं, मुझे नहीं मालूम। थोड़ी देर बाद ‘बत्ती’ बुझा कर ‘बेड’ पर उसके लेटने का एहसास मुझे होने लगा।

मैं सर्दी के बावजूद बिना ‘रज़ाई’ के लेटे हुए था। मैंने महसूस किया के पत्नी ने आहिस्ता से मेरे ऊपर रज़ाई डाल दी उसने मुझे दो बार पुकारा था मैं सोने का नाटक करता रहा। पत्नी भी तब शायद मुंह फेर कर लेट गई।

मैं सारी रात पत्नी और मित्र के ‘सम्बन्ध’ में उलझा रहा। गले में लिपटा ‘मफ़लर’ मेरी नींद उड़ाए था।

सुबह आलार्म घड़ी ने पांच बजने का संकेत ‘ट्रिन-ट्रिन’ से दिया तो मैं ‘बेड’ से उठ गया। सुबह सैर करने की अपनी चिर-परिचित आदत के तहत मैंने ‘जॉगिंग सूट’ पहना। अचानक मेरी निगाह पत्नी पर चली गई। वह भी उठ गई थी। उसके होंठों पर मुस्कुराहट फैली थी। मुझे देख कर बोली, ‘हैप्पी बर्थ डे डार्लिंग।’

मैं खामोश खड़ा पत्नी की तरफ़ देखता रहा। मुख से बोल नहीं फूट रहे थे।

फिर मैंने झुककर ‘फ्लीट’ उठाए और पैरों में डालने लगा।

“जॉगिंग पर जा रहे हो?” पत्नी ने पूछा था।

उसके मूर्खतापूर्ण प्रश्न पर मुझे हंसी आने लगी थी। जानती तो हो कि मैं हर रोज़ सुबह जॉगिंग पर जाता हूं। फिर यह प्रश्न … ? मैंने फिर भी उसे कोई जवाब नहीं दिया।

“लगता है तुम मुझ से नाराज़ हो।” पत्नी बोली थी।

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।” मैं झट से बोला था। “तुम्हें ऐसा क्यों लगा?” मैंने भी ऐसे ही पूछ डाला।

“तुम मेरी किसी भी बात का उत्तर नहीं दे रहे, इसलिए मुझे लगा कि तुम … ?”

मैं चुप ही रहा। फ्लीट के फीते बांधने में लगा रहा।

“देखो! बाहर बहुत सर्दी है। मैं चाहती हूं कि आज आप ‘यह’ डाल कर जाएं।” कहते हुए उसने तकिए के नीचे से एक पैकेट निकाला और पैकेट खोल कर एक मफ़लर निकाल कर मेरी ओर बढ़ाया था।

मेरी निगाह जैसे ही पैकेट पर पड़ी, मैं चौंक पड़ा यह तो वही पैकेट है जो कल सुबह मैंने अलमारी में देखा था। और .. और यही तो वह ‘मफ़लर’ है जो मैंने … ? तो जो मफ़लर मित्र के गले में सुशोभित था, वह पत्नी ने नहीं दिया था। यह तो मात्र संयोग रहा होगा। और मैं … क्या-क्या नहीं सोच गया था पत्नी के चरित्र को ले कर। मैं भी कितना बड़ा बेवकूफ़ हूं। क्या बाज़ार में एक जैसी चीज़ें उपलब्ध नहीं? लेकिन … इसमें मेरा क़सूर भी तो नहीं हैं। परिस्थितियां ऐसी बन पड़ी थी कि मुझे पत्नी के चरित्र पर … ? ‘ओह माई गॉड’। अच्छा हुआ मैंने अपना आक्रोश पत्नी पर नहीं उतारा। अपने मन में उठ रहे ‘ज्वार-भाटे’ को पत्नी को नहीं बताया। नहीं तो वह मेरे बारे में क्या सोचती? मुझे संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त … एक रोगी … ?

तभी पत्नी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी, “क्या सोच रहे हो तुम? क्या जन्म-दिन का यह छोटा-सा उपहार आपको पसंद नहीं आया?” पत्नी की आंखों में प्यार छलक रहा था।

‘नहीं … नहीं … यह बात नहीं है।’ मैंने पत्नी के हाथ से मफ़लर लेते हुए ‘थैंक्यू’ कहा और मफ़लर को गले में लपेट लिया और कहा, “यह तो मेरे लिए अनमोल है।” फिर मैंने पैरों में डाले ‘फ्लीट’ उतारे। धीरे-धीरे मैं ‘बेड’ की ओर बढ़ा। ‘जॉगिंग सूट’ सहित दोबारा ‘बेड’ पर पड़ी रज़ाई में मैं घुस गया और इस बार मैं और पत्नी एक-दूसरे की बांहों में बंधे पड़े थे। मेरे गले में पड़ा ‘मफ़लर’ हम दोनों के बीच अपनी उपस्थिति का अहसास करवा रहा था।

 

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