नारी को पूर्ण बनाते हैं सोलहों सिंगार

-पूनम दिनकर

नारी के सौंदर्य में सिंगार का एक अलग ही स्थान है। प्राचीन काल से ही नारियों के सम्पूर्ण सौंदर्य के लिए सोलह सिंगारों का वर्णन मिलता आ रहा है। नारी के वे सोलह सिंगार क्या हैं, आइए इसे जाने।

1. मालिश:- इससे शरीर की कांति बढ़ती है। त्वचा का रख-रखाव हर मौसम में बेहद ज़रूरी है। त्वचा में नमी की कमी हो जाती है। नमी व चिकनाई का संतुलन बनाए रखने के लिए मालिश सर्वोत्तम विधि है। इसमें बादाम का तेल, चंदन का तेल (पुराने समय में, आज ऑलिव ऑयल) कुनकुना करके कन्या के सारे बदन की मालिश (मसाज) की जाती है। चंदन की सुगंध शरीर में रच-बस जाती है। त्वचा की कांति बढ़ती है और थकान दूर करके मालिश नई स्फूर्ति भरती है। इसे आज की परिभाषा में ‘क्रीम मसाज, या ऑयल मसाज भी कहते हैं।’

2. उबटन:- सुगंधित, पौष्टिक प्राकृतिक वस्तुओं से तैयार किया लेप, जो कन्या के शरीर पर लगाया जाता है इसे हल्के हाथों से रगड़कर छुड़ाने से रक्तसंचार में सहायता मिलती है। काया निरोगी होगी। यह सौंदर्यवर्द्धक भी है।

3. चंदन का लेप:- उबटन छुड़ाने के बाद चंदन में हल्दी और गुलाब की पंखुड़ियां मिलाकर तैयार किया लेप फिर से कन्या के शरीर पर लगा दिया जाता है। जब साबुन का युग नहीं था स्नान द्वारा इसे छुड़ाया जाता था। कलींज़र कई तरह के हैं जैसे दूध, क्रीम, जैल साबुन वाले टोनर, मॉइस्चराइज़र।

4. स्नान:- मौसम के, ऋतु के अनुरूप नहाने के पानी का ताप हो। उसमें गुलाब की पंखुड़ियां, गुलाबजल की कुछ बूंदे डालते हैं। फिर संतरा व नींबू के सूखे छिलकों को पीस कर पीठ, हाथ से लेकर सारे शरीर पर मलें। अब सिर से स्नान करें। पुराने समय में होने वाली बहू के सिर को सुगंधित लेप से धोते थे। पानी में थोड़ा दूध डाल कर स्नान करना, दही लगाकर बाल धोना, बेसन से रगड़-रगड़ कर बाल धोना, कई तरीक़े हैं बाल सुंदर व चमकदार बनाए रखने के लिए। चेहरे पर साबुन का प्रयोग कम से कम करने से त्वचा की कांति बनी रहती है। आज के समय के अनुसार मृदु साबुन से झाग बनाकर सारे शरीर पर लगाने के बाद ऋतु के अनुकूल जल से पूर्ण स्नान करें, चेहरा थपथपा कर व बाक़ी शरीर थोड़ा रगड़ कर पोंछा जाए ताकि मृत त्वचा के हटने के बाद वहां नया रक्तसंचार हो। त्वचा की स्वाभाविक कांति बनी रहे। स्टीम बाथ, शावर बाथ, मड बाथ, स्वीमिंग, आजकल के युग में इनका प्रचलन है चीज़ वही, नाम नया।

5. केश सज्जा:- बालों के सूख जाने पर उन्हें सुविधाजनक रूप से बांधना, जूड़ा, चोटी और इसे फूलों व सोने-चांदी-मोती के आभूषणों से सुसज्जित करना। झूमर, मांग टीका, जूड़े के कांटे, फूल, क्लिप आदि से अलंकृत होना। हेयर ड्रेसर आपकी इस बारे में मदद कर देती है।

6. पुष्प सज्जा:- चाहे कितने भी सम्पन्न घराने की गोरी हो, बिन फूलों के उसका सिंगार अधूरा-सा है। बालों में फूल, गले का हार तो आम बात है। इसके इलावा पूरा सिंगार सिर्फ़ पुष्प से भी कर बैठती थी हमारी वन देवियां। वेणी, गजरा से जूड़ा सजा लेते हैं।

7. अंगवस्त्र:- सुंदर परिधान किस नायिका का सौंदर्य द्विगुणित न कर देगा। लहंगा चोली, चुनरी भारतीय संस्कृति की द्योतक हैं। कामदार लहंगा, चोली पर पारदर्शी ओढ़नी यही सामंतवादी युग में प्रचलित थी। इसी का प्रचलन आज भी है। आज खूबसूरत साड़ी, सलवार-कमीज़ आदि भी चलते हैं।

8. सिन्दूर:- विवाहोपरांत वधू की गरिमा का प्रतीक सिन्दूर है। सिन्दूर में कुछ ऐसा प्रभाव होता है, जो सिर को शांति प्रदान करता है, चंचलता को क़ाबू में रखता है। तभी विवाहोपरांत इसको धारण करने वाली अपनी घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाती हैं। यह किसी भी विवाहिता की अमूल्य निधि है। हमारी परम्पराओं की सोंधी महक समेटे दोनों भौंहों के बीच सोहे है बिंदिया। बुट्टी, योग साधना व चिंतन का केन्द्र बिन्दु भी यही स्थान है।

9. बिंदी:- सुहागिनों के सौभाग्य चिन्ह का एक प्रमुख अंग है। सोलह सिंगार में इसका बहुत महत्त्व है। बिना बिंदी के मुख सूना लगता है। आजकल तो नए फ़ैशन की बिंदी की भरमार है।

10. काजल:- बड़ी-बड़ी और काजल से कजरारी आंखें, ज़ुल्म न ढाएंगी तो और क्या करेंगी। कपूर, तेल, दीपक की लौ से बनाया काजल, सुरमा आंख के लिए एक ओर फ़ायदेमंद तो है साथ ही साथ अपनी सजीली चितवन के लिए मशहूर है। साजन नैनों के डोरों में अटक कर रह जाते हैं। कटाक्ष किया और हो गए घायल। सिर्फ़ नैनों के तीर मारे कस-कस के और साजन रह गए फंस-फंस के। यही काम आई-लाइनर आज करता है।

11. लाली:- इतनी मेहनत से सिंगार हो रहा है और होंठ बेरौनक़ उपेक्षित ही रह जाएं, ये कैसे हो सकता है। कुछ चिकनाई, जैसे मलाई या घी पहले लगाती थी आपकी सजनी। अब कोल्डक्रीम, वैसलीन से होंठ नरम करके लिप ग्लॉस लगाती हैं, फिर लिपस्टिक के मनचाहे रंग से उसे सजा लेती हैं। पहले तंबाकू खाकर मुंह सुवासित करती थी और तंबाकू की लाली ही होंठ रंगने के काम आ जाती थी। अब च्युंगम भी सुवासित या मुखवास के लिए चबा लेती हैं।

12. मेहंदी:- मेहंदी का सोलह सिंगार में विशेष महत्त्व है। यह विवाहित व अविवाहित दोनों का ही प्रमुख सौंदर्य प्रसाधन है हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही विवाह के अवसर पर इसका इस्तेमाल करते हैं।

दुलहन बिना मेहंदी के अधूरी-सी लगती है। यह प्रेम और भाईचारे की द्योतक मानी जाती है। इसमें चिकित्सीय गुण भी हैं। इसका रंग जीवन के रंग के साथ घुलमिल गया है। मेहंदी लगाना शुभ और मंगलमय माना जाता है।

13. आलता:- सुंदर-सी गोरी पैरों में आलता लगाए जब चलती है, तब उसका थोड़ा-सा जो पैर दिखता है, चलने से वो कमल समान लाल हो, खूबसूरत हो तो किस साजन का मन न मचलेगा? यह परम्परा बंगाल में अभी भी प्रचलित है। अन्य प्रांतों में यानी उत्तर प्रदेश, बिहार में भी प्रथा है विवाह के समय आलता लगाने की। अब भागदौड़ की ज़िंदगी में वर्किंग गर्ल्ज़ शादी पर आलता कम ही लगाती हैं। हां नृत्य समारोहों में दक्षिण में अभी इसका प्रचलन है। इसे महावर, जावक भी कहते हैं।

14. इत्र-सुगंध:- पुष्पगंध, कस्तूरी गंध का बना द्रव्य, जो सिंगार के बाद कपड़ों और कलाई, कान के पीछे, घुटनों के पीछे व स्तनों के बीच लगाना चाहिए। इससे भावना प्रभावित होती है। इसका चुनाव सोच समझ कर करें। आजकल परफ़्यूम का काफ़ी प्रचलन है।

15. आभूषण:- नारी का प्रिय सौंदर्य प्रसाधन, सिंगार की चरम सीमा है गहना। बिना आभूषण हम किसी वधू की कल्पना नहीं कर सकते। आभूषण शरीर सज्जा के साथ रोग निवारक, रोग नियंत्रक, बुद्धि और बलवर्द्धक भी है। स्त्रियां इसे धारण कर स्वयं को जितना सुंदर होने का एहसास करती हैं, ठीक उतना ही शालीन होने का। बालियां या टॉप्स पहनने पर टांसिल, आंख गले या बहरापन का रोग नहीं होता। चूड़ियां-कंगन धारण करने से ओजस्विता का विकास होता है। हकलाना, तुतलाना तथा वाणी दोष नहीं होते मुंह का लकवा, बहरापन, दांत के दर्द में भी लाभकारी है। मानसिक रोग, उल्टी, उबकाई जैसी प्रवृत्ति पर नियंत्रण होता है।

कनिका में अंगूठी पहनने पर घबराहट, छाती का दर्द, मानसिक आघात से राहत, दसों उंगलियों में रत्नजड़ित अंगूठी पहनने से ग्रहों का दुष्प्रभाव कम होता है। सुहाग का प्रतीक हैं चूड़ियां। कहते हैं स्वयं शिव ने अपने हाथ से लाख की चूड़ी बनाकर पार्वती को पहनाई, उन्हें दीर्घायु और सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया। मंगलसूत्र सुहागिन का ख़ास आभूषण है। नथ का प्रचलन बहुत पुराना है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक नथ का रिवाज़ है। इनके रूप, आकार अवश्य भिन्न हैं। झूमर, टीका, कर्णाभूषण, नथ, हार, चूड़ी, कंगन, करधनी, अंगूठी, पायल, बिछुआ के अतिरिक्त ढेरों आभूषण हैं, जिनका रिवाज़ आदिकाल से शुरू हुआ और आज भी चल रहा है।

16. पादुका:- नायिका के कोमल पैरों में छाले न पड़ जाएं, इनके लिए लता, छाल, पुष्प की चरण पादुकाएं बनती थी। लकड़ी, कपड़े की चट्टी बनाई जाती थी। अब नए-नए तरीक़ों से पैरों की सुरक्षा करने की दृष्टि से वे सौंदर्यवर्द्धन के लिए भांति-भांति के चप्पल, सैंडल, जूते बनाए गए हैं।

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