तलाश का सफ़र

 -दलबीर चेतन

चारों तरफ़ शोक-सा बना हुआ था कि श्रद्धामठ डेरे के स्वामी प्रकाश नंद नहीं रहे। ख़बर सुनते ही श्रद्धालु एक ख़ास तरह के मानसिक संताप में ग्रस्त हो गए। वह उनके साथ, उनकी शख़्सियत के साथ, उनके प्रवचनों के साथ श्रद्धा की पूर्णतः तक जुड़े हुए थे वे उनकी मृत्यु की ख़बर सुन कर स्तब्ध हो गए।

इस मठ को पूजने वाले सोच रहे थे कि उनका अगला स्वामी कौन होगा, कि इस डेरे का इतना बड़ा भार वह भी पहले जैसे स्वामी की तरह मज़बूती से उठा सकेगा?

पहले स्वामी की रूहानी शख़्सियत, प्रभावशाली व्यक्ति‍त्व का चुम्बकीय आकर्षण बहुत निराला था। सिर के सफ़ेद बाल कंधों के नीचे तक फैले हुए और सफ़ेद दाढ़ी एक जादुई प्रभाव दर्शाती थी। क्या यह सब नए स्वामी के हिस्से में आएगा? बहुत सारे लोग अपने-आप से सवाल करते।

सदमे से ग्रस्त श्रद्धालुओं को लग रहा था कि यह घाटा कोई दुर्लभ शख़्सियत ही पूरा कर सकती है। वे डेरे के कई स्वामियों के बारे में खुद ही अंदाज़ा लगाने लगते और जब बात किसी तरफ़ न बनती तो वे उतावले होकर पहले वाले स्वामी के प्रवचनों का उच्चारण करने लग जाते।

बाहर बहुत बड़ी भीड़ नये स्वामी के नाम के इन्तज़ार में थी और डेरे के अन्दर एक छोटी-सी सुलझी हुई भीड़ जिस को ‘धर्म संसद’ कहते हैं, मठ के नये स्वामी की तलाश में सिर जोड़े बैठी थी।

सबसे बड़ी समस्या यह थी कि ‘धर्म संसद’ के कई सदस्य खुद ही गद्दी के दावेदार थे। अगर इस बात की भनक बाहर बेसब्री के साथ इन्तज़ार कर रहे श्रद्धालुओं के कानों में पड़ जाए तो उनकी श्रद्धा में दरार पड़ने का भी डर था। अगर यह फ़ैसला चुपचाप और गुप्त नहीं होता तो बाहर बैठी संगत ने पूरी तरह सफ़ाया कर देना था।

अन्दर बैठी हुई धर्म संसद ने कई नामों के बारे में सोचा और विचार किया परन्तु उनकी दिव्य दृष्ट‍ि जानती थी कि बाहर लोगों की भीड़ के लिए स्वीकार्य नाम पहले स्वामी की ज़िंदगी के साथ जुड़ा हुआ या उनकी तरफ़ से नामज़द किया हुआ ही हो सकता है।

कई श्रद्धालु दलील देते भी सुने गये कि मठ के सारे स्वामी उच्चकोटि की शख़्सियतें हैं पहले स्वामी जी अपने बराबर वालों में अव्वल थे। ऐसे ही कोई मौजूद स्वामियों में से अब यह सेवा संभाल लेगा।

परन्तु बहुत सारे लोग यह कह रहे थे कि हम तो उनको ही इस डेरे का स्वामी मानेंगे जिनको हमारे जाने वाले स्वामी जी अपना आशीर्वाद देकर गये होंगे।

एक फक्कड़ से बाग़ी आदमी ने कहा, “सुना है पहले स्वामी अचानक ही स्वर्ग सिधार गये हैं हो सकता है वो किसी को आशीर्वाद दे ही न सके हों?”

बहुत सारी आवाज़ों ने उस बाग़ी दलील को डांट कर कहा, “यह धर्म है दलील बाज़ी की कचहरी नहीं। हमारे स्वामी जी सर्वकला सम्पूर्ण, धर्म के परिपक्व और लोक-परलोक के पूर्ण ज्ञाता थे। यह कैसे माना जा सकता है कि उनको अपने अन्तिम श्वासों का भी पता न हो?”

“धर्म में सर्वकला सम्पूर्ण से कम होता ही कौन है?” बाग़ी आदमी ने बड़े ही व्यंग्यमयी अंदाज़ में कहा। लगता था कि उसकी बात को समझदार श्रद्धालुओं ने स्वीकार कर लिया था। नहीं तो यह कैसे हो सकता है कि वह चुप ही रहते?

अन्दर चल रही धर्म संसद की मीटिंग बाहर की नोंक-झोंक से अलग थी। दावेदार अपने-अपने पक्ष बड़े ज़ोर-शोर के साथ पेश कर रहे थे। परन्तु किसी एक नाम पर सहमति नहीं हो रही थी।

संभावित गद्दी नशीन, अपने नाम की सहमति न होती देख, कई बार क्रोध में आते परन्तु फिर भी वे धार्मिक शब्दावली का पल्ला न छोड़ते।

उन सभी को यह पता था कि यह वो शब्दावली थी जिसके साथ वह अकसर अपने श्रद्धालुओं को तो बस में कर लेते थे परन्तु अब सब को वश में करने वाले को कौन वश में करे?

‘धर्म संसद’ के एक सदस्य ने नारा लगाया और अपने गले के केसरी साफ़े को दोनों हाथों से दबाते हुए बाक़ी सदस्यों के आगे नतमस्तक होते हुए बोला, “हम इस समय बहुत ही मुश्किल घड़ी से गुज़र रहे हैं।” स्वामी जी के बेवक्त गुज़र जाने से मेरा हृदय बहुत ही पीड़ित है। स्वामी जी अकसर मुझ से कहा करते थे, “श्रद्धानंद इस मठ के प्रति तेरी लगन, मेहनत, ईमानदारी और श्रद्धा देखकर मैं बहुत आनन्दमय हो जाता हूं। मैं कई बार सोचता हूँ कि क्यों न इस मठ की ज़िम्मेदारी, अपने जीते जी आपको सौंप दी जाए।”

धर्म संसद के सदस्यों में खुसर-पुसर-सी होने लगी। मठ के एक और दावेदार को लगा कि जैसे इस तरह कह कर श्रद्धानंद ने अपने हक़ में मोर्चा फ़तह कर लिया हो। मौक़े की नज़ाकत को समझते हुए वह उठ खड़ा हुआ।

वह भी उसी तरह पूरी धार्मिकता के साथ खड़े होकर मठ की मूर्ति को दण्डवत् वन्दना करने के लिए झुक गया और फिर धर्म संसद के सदस्यों के आगे सिर झुकाते हुए कहने लगा, “इस तरह के प्रवचन तो स्वामी जी अकसर मेरे साथ भी करते थे।”

इतनी बात कहकर उसने धर्म संसद के सदस्यों की सूक्ष्म दृष्ट‍ि से जांच करते हुए कहा, “एक दिन उन्होनें ख़ास तौर पर मुझे अपने पास बुलाया। वो बड़े चिन्तित होकर कहने लगे परमानंद, इस कलयुग में धर्म कार्य को आगे बढ़ाना बड़ा कठिन है परन्तु मुझे यक़ीन है कि तुम अपनी समझदारी से संगत के सहयोग से इस काम को बखूबी आगे बढ़ा सकते हो। तेरे होते मुझे मठ के भविष्य के बारे में कोई चिन्ता नहीं।”

परमानंद की बातें श्रद्धानंद को हज़म नहीं हो रही थी पर यह समय जल्दबाज़ी का नहीं बल्कि धर्म संसद के सदस्यों की हमदर्दी अपने पक्ष में करने का था। इसलिए उसने भी बड़ी विनम्रता के साथ ज़बरदस्त जवाबी हमला किया, “माननीय परमानंद जी, आपके साथ किये गये प्रवचन भी सही होंगे परन्तु मुझे स्वामी जी कुछ दिन पहले कहने लगे, स्वामी श्रद्धानंद, अपने कंधे मज़बूत कर, अपने आप को श्रद्धामठ को सम्पूर्ण समर्पित कर दे। समूचे रूप में कर्मयोगी बन जा। मैं सारे मठ का भार तुम पर डालने वाला हूं।”

धर्म संसद में बैठे कई सदस्य अजीब-सी हंसी हंसे। पर श्रद्धानंद ने सब कुछ समझते हुए कुछ भी न समझने का नाटक-सा रचा, “मैं स्वामी जी के आगे नत-मस्तक हो गया और कहा स्वामी जी, यदि आपका आशीर्वाद मेरे ऊपर होगा तो मैं सारी सृष्ट‍ि का भार आप की कृपा से इन कन्धों पर उठा सकता हूं।”

स्वामी श्रद्धानंद की बात सुनकर कई सदस्यों ने अजीब तरह से मुस्कुराते हुए एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

धर्म संसद के सभापति ने कार्यवाही में दख़ल देते हुए कहा, “यह समय अपने-अपने अस्तित्त्व को जताने का नहीं बल्कि बड़ी ही युक्त‍ि के साथ मौक़े को संभालने का है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मठ के बाहर श्रद्धावान लोगों की भारी भीड़ उतावली हुई, अपने नये स्वामी के नाम के इन्तज़ार में है।”

“इसलिए मैं विनती करता हूं” श्रद्धानंद फिर विनम्रता की मुद्रा में खड़ा था, “मैंने स्वामी जी को कहा था कि सम्पूर्णता तो सिर्फ़ परमात्मा में ही हो सकती है पर फिर भी आपकी छत्र-छाया के नीचे, मैं अपने-आप को हर तरह से तैयार करूंगा और जब आप मुझे इस योग्य समझें मैं मठ की सेवा संभालने के लिए तैयार रहूंगा।”

“मैं पहले भी विनती कर चुका हूं कि हमें इस फ़िजूल बहस में नहीं पड़ना चाहिए।” धर्म संसद के सभापति के शब्दों में अभी भी पूरा ठहराव था।

“मैं आपसे सहमत हूं” श्रद्धानंद ने कहा, “पर कुछ दिन पहले स्वामी जी बहुत गंभीर हो कर कहने लगे- यह शरीर नाशवान है, श्रद्धानंद- मेरा समय आ चुका है माघ की संक्रान्ति को पहले पहर ही इस संसार से कूच कर जाऊंगा परन्तु जाने से पहले अपने हाथ से नारियल, केसर, एक सौ आठ मनकों की माला, केसरी पगड़ी और अपने हाथ से लिखी वसीयत ‘गुरु अलमारी’ में छोड़ जाऊंगा।” उनकी इन बातों को सुनकर मेरे आंसू निकल आए। उन्होंने मुझे दिलासा देते हुए कहा, “नहीं, बिल्कुल उदास नहीं होना, श्रद्धानंद- इस संसार से हर एक ने एक न एक दिन चले जाना है फिर उन्होंने मुझे नसीहत भी दी थी कि उनके स्वर्गवास होने की तिथि, दिन का भेद किसी को मत बताना और न ही मठ की ज़िम्मेदारी संभालने से इन्कार करना।”

स्वामी श्रद्धानंद की यह बात सुनकर सारे हैरान रह गये। एक हैरानी भरी चुप्पी सारी संसद में छा गई। संसद में रहस्यमयी माहौल बन गया। इस करामाती ब्यान का खण्डन करने का साहस किसी में भी नहीं था। स्वामी श्रद्धानंद को लगा कि उसका छोड़ा हुआ अग्नि बाण बिल्कुल सही निशाने पर लगा था और परमानंद की चिंगारियों की भांति जलती आंखों की रौशनी, जैसे एक ही बार में मद्धम पड़ गई थी। उसे पता था कि अब बौखलाहट में आया स्वामी परमानंद, इस बात की पुष्ट‍ि मांगेगा और ‘गुरु अलमारी’ में सभी सामग्री मौजूद देखकर पूरी तरह चित्त हो जायेगा।

वही बात हुई। स्वामी परमानंद ने भड़ककर काफ़ी कुछ कह दिया और यह भी कह दिया कि इस बात का अभी ही फ़ैसला होना चाहिए।

दोनों पक्षों ने सभापति को यह हक़ दे दिया कि दोनों तरफ़ के दो सदस्य उनकी अगुआई में इस तथ्य की पड़ताल करें कि क्या यह सारी सामग्री सचमुच ही ‘गुरू अलमारी’ में मौजूद है।

“स्वामी जी, अकसर मुझे कहा करते थे हृदयपाल, निष्काम सेवा सबसे बड़ा धर्म है। तू ही बता, तूने क्या लेना है इस डेरे से? तेरी अच्छी भली वकालत चल रही है ठीक है, तू धर्म-कर्म का बंदा है, जब भी इस डेरे को तुम्हारी ज़रूरत पड़े तो तू भागा आता है। तेरे सौ बार मना करने पर भी मैंने तुझे इस डेरे का धर्म संसद का सभापति बनाया। जिसके नेतृत्व में डेरे का प्रबन्ध बहुत सही-सलामत चल रहा है।” हृदयपाल ने बड़े ग़ौर से सदस्यों की तरफ़ देखा और उसको लगा कि धर्म संसद के सदस्य एकाग्रचित बैठे उसे सुन रहे थे। उसने अपना व्याख्यान जारी रखा।

“जब से उनकी सेहत कुछ ख़राब रहने लगी थी वो कहने लगे थे, “इस मठ की सेवा मैं उस व्यक्त‍ि को सौंप कर जाऊंगा, जिसमें कोई लोभ, मोह, या लालच न हो।” धर्म की सीढ़ी के पहले डंडे पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को मारकर ही चढ़ा जा सकता है। जैसे आप सभी जानते हो, स्वामी जी ने अन्तिम समय में सभी को कमरे से बाहर जाने के लिए कहते हुए मुझे रोक लिया था। अन्तिम समय में सिर्फ़ मैं ही उनके पास था। वो मुझे शायद काफ़ी कुछ कहना चाहते थे पर ज़ुबान ने उनका पूरा साथ नहीं दिया। हां, आख़िरी बार दायें हाथ की पहली अंगुलि गुरू अलमारी की तरफ़ करते हुए कहा था “अगला स्वामी” और यह कह कर उनकी गर्दन एक तरफ़ लुढ़क गई थी।”

“सभापति की बात सुनकर परमानंद निराश-सा हो गया और श्रद्धानंद मन ही मन मुस्कुराया कि स्वामी जी के कहे प्रवचन की पुष्टि मठ का एक माननीय सेवक कर रहा था जिसका मठ के लिए बहुत बड़ा योगदान था परन्तु जो मठ की राजनीतिक लाग-लपेट से बिल्कुल ही निष्पक्ष और बाहर था और इसी गुण के कारण धर्म संसद के सभी सदस्य उनका पूरा आदर करते थे।”

मठ का धार्मिक और प्रबन्धकीय कार्य अच्छे ढंग से चलाने के लिए ‘धर्म संसद’ का सुझाव हृदयपाल ने ही दिया था। उन्होंने स्वामी प्रकाश नंद को समझाया था कि इसके साथ धर्म संसद में हुई विचार चर्चा से दूसरे स्वामियों के विचारों का भी पता लगता रहेगा और एक ख़ास तरह की महत्ता बनी रहने के कारण उनके अहंकार की पूर्ति भी होती रहेगी जोकि अकसर इस तरह के धार्मिक व्यक्त‍ियों में आ जाता है।

पता नहीं क्या देख सोच कर धर्म संसद के सदस्यों ने ही स्वामी जी पर ज़ोर डालकर हृदयपाल को इस संसद का सभापति बना लिया था।

हर महीने होने वाली मीटिंग में ख़ास तौर पर हृदयपाल सभापति की हैसीयत से आता। मठ के कार्यों की कारगुज़ारी को बेहतर बनाने के लिए सलाह मशवरा करता और अपने सुझाव भी देता और चला जाता। इससे ज़्यादा उसने कभी भी किसी तरह की लालसा ज़ाहिर नहीं की थी।

उसके इन गुणों के कारण, सभी सदस्य उसकी इज़्ज़त और आदर करते थे। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सभापति ने कहा, “संस्कार का समय हो चुका है मेरे ख़्याल के अनुसार अब सबसे पहले मठ की मान-मर्यादा अनुसार स्वामी जी का संस्कार होना चाहिए। बाक़ी फ़ैसले हम बाद में करते रहेंगे। सभी ने सभापति के फ़ैसले पर सहमति प्रकट की।”

उस दिन एकाकी में मरने वाले स्वामी ने हृदयपाल के साथ कुछ और बातें भी की थी। जो कभी भी जग ज़ाहिर नहीं होनी थी। उन्होंने हृदयपाल के हाथों को प्यार से सहलाते हुए कहा था,”तू सारी उम्र मेरे साथ विवादों और तकरारों में ही उलझा रहा अकसर कहा करता था, “धर्म एक पाखण्ड है।”

“यह तो पाशे तू ही कहता था।”

स्वामी प्रकाशनन्द का स्कूल का नाम प्रकाश ही था और हृदय उसको हमेशा ‘पाशे’ ही कहा करता था। स्वामी ने बहुत सहज स्वभाव से कहा, “देख हृदय, लोगों को धर्म के साथ जोड़े रखने के लिए पाखंड भरी ड्रामेबाज़ी बड़ी ज़रूरी है।”

“यह तू कह रहा है पाशे?” हृदय ने हैरानी प्रकट की, “अगर तू ही इस तरह सोचने लग गया तो बताओ इन की आंखें कौन खोलेगा?”

स्वामी ने अपनी जीभ दो-तीन बार अपने होंठों पर फेरी और फिर मुंह की कड़वड़ाहट को अन्दर निगलते हुए कहने लगा, “बड़ी कोशिश की थी इनकी आंखें खोलने की, फिर मैं खुद ही सोचने लग गया कि क्या दिखाएंगे इन खुली हुई आंखों को?” उसने एक लम्बा सांस लेते हुए कहा “इनको कुछ भी अच्छा दिखाने के लिए है नहीं इनकी आंखें बंद ही रहने दो।” फिर उसने अपने स्वर को मद्धम करते हुए कहा, “देख लोग इस मठ में आंखें बंद करके आते हैं। और बंद आंखें श्रद्धा से भरी होती हैं। इसलिए यह लोग बड़े साधारण होते हैं और ज़्यादा स्वाल नहीं पूछते।”

“और खुली आंखों वाले …… ?” हृदय ने पूछा था। “विवेक के बिना खुली आंखों वाले लोग बड़े ख़तरनाक होते हैं। वे धर्म, समाज, कानून, राजनीति सब को गालियां निकालते हैं। परन्तु सुख-शांति उन्हें कभी भी नसीब नहीं होती।”

“क्या बंद आंखों वालों को सुख-शांति हासिल हो जाती है?” हृदय ने पूछा।

“सुख-शांति तो उनको भी हासिल नहीं होती पर वो अपने दुःख, दर्दों को धर्म के साथ ढाढ़स देकर राहत-सी महसूस करते हैं।”

“पाशे, सिर्फ़ वक़्त और हालात की बात नहीं है, तू मुझे यह बता कि इस मठ के स्वामी के तौर पर तूने कितने लोगों का दुःख दर्द दूर किया है?” हृदय पता नहीं क्यों आज उसका अन्त लेने के लिए तुला हुआ था।

“अगर मैं यह कर सका होता तो आज अपने आप को इतना हारा हुआ महसूस करके आत्महत्या की राह पर न चलता।”

‘आत्महत्या’ का नाम सुनकर हृदय को करंट की तरह झटका लगा।

“हां हृदयपाल, लोगों के दुःख दर्दों का कोई अन्त नहीं। मैं किसी का दुःख दर्द तो शायद दूर न कर सका पर प्रवचनों के साथ उनको धीरज देता रहा। फिर मैं खुद महसूस करने लगा कि यह प्रवचन किसी बच्चे को बहलाने के लिए दिए गये चॉकलेट से ज़्यादा कुछ नहीं। कई बार माइक के आगे बैठा जब मैं इन श्रद्धालुओं के साथ अपने विचार बांटा करता था तो मेरा दिल करता था कि मैं उन को ज़ोर से कह दूं- जाओ, अपना समय बर्बाद न करो, आपकी किसी भी समस्या का मेरे पास कोई भी हल नहीं।”

“पर क्या करता?” वह बहुत दुःखी होकर कह रहा था, “जिस बुलन्दी पर इन्होंने मुझे पहुंचा दिया था और जैसे दुःख की दवा मुझ में ढूंढ़ने लग पड़े थे, मैं भाग भी नहीं सकता था। मुझे यह भी पता था कि मेरा सच, श्रद्धालु कभी भी सुनने के लिए तैयार नहीं हो सकते।” बातें करते-करते स्वामी की सांस फूलने लग गई और वह लम्बे-लम्बे सांस लेता, एकदम चुप-सा हो गया। थोड़े समय बाद उसने अपने आप को फिर ठीक महसूस किया और नये सिरे से पहले की तरह बातें करने लग गया। हृदयपाल को लगा जैसे अपनी सारी ज़िंदगी को कुछ पलों में समेटकर और पेश करके वह हर तरफ़ से मुक्त  हो जाना चाहता था।

शायद हृदय भी वह सब कुछ जान लेना चाहता था जिसका उसे भी अब तक कोई इल्म नहीं था। हृदयपाल ने कहा, “तुझे याद है पाशे कि हम लोगों के दुःख दर्दों को दूर करने की अकसर बातें किया करते थे।”

स्वामी ने हृदयपाल के दायें हाथ को पकड़ कर सहलाया, प्यार किया और फिर धीरे-धीरे कहने लगा, “वाक़ई ही हम लोगों के दुःख दर्द को दूर करने के लिए चले थे,” स्वामी की आंखें नम हो गई, “पर अब मुझे लगता है जैसे मैंने उन लोगों के दुःख दर्दों को कुछ पल के लिए एक बच्चे को थपकी देकर सुलाने जैसा काम तो कर लिया पर उनको मां के दूध जैसी प्राथमिक ज़रूरतें मुहैया न करा सका। तू ही बता कि कितने समय तक थपकी देकर सुलाया जा सकता है किसी को?”

हृदय भी जज़्बाती हो गया था, उसने कहा, “पाशे, मैं हैरान भी हूं और खुश भी कि तूने अभी तक जवानी वाली आदर्शवादी सोच अपनी सोच से कम नहीं की।”

“आदर्श तो हम इकट्ठे लेकर ही चले थे पर, मुझे दुःख है कि इतने लोगों को साथ जोड़ कर भी मैं इसकी पूर्ति नहीं कर सका।”

उसने दुःखी होकर अपना सिर दाएं-बाएं पटका और कहा, “बस इस तरह की सोचों में डूबे हुए को इस नामुराद बीमारी ने आ घेरा। डॉक्टर इस बीमारी को ‘टाइम बाऊंड डैथ’ कहते हैं। मैं घिसट-घिसट कर अपनी मौत को रौंदना नहीं चाहता था। इसलिए मैंने पिछले दिनों कोई ऐसा ज़हर खा लिया कि अब मैं बस घड़ी, दो घड़ी का ही मेहमान हूं बस शायद आज ही …. ।” उसने मुश्किल से श्वास लेते हुए बात जारी रखी।

“आज माघ की संक्रान्ति है मैंने अपनी मौत को इस तरह चुना कि यह किसी ख़ास महत्वपूर्ण दिन के साथ जुड़ी हो …. तुझे पता होना चाहिए कि धर्म में इस तरह की मौत की महत्ता बहुत बढ़ जाती है ….” स्वामी से बात पूरी न हो सकी और उसका गला भर आया ….।

हृदयपाल भी उसकी बात सुनकर पूरी तरह से हिल-सा गया। उसने स्वामी के हाथ को पकड़ कर सहलाया और चूम लिया। स्वामी बड़ी मद्धम-सी आवाज़ में बोला, “हृदय, मैं लोगों को मौत से बेख़ौफ़ होने का उपदेश देता रहा पर मरना बड़ा मुश्किल लगता है अन्त सामने आता देखकर कई बार सोचता हूं डॉक्टरों ने फिर भी छः – सात महीने का समय दे दिया था पर इसको अपने ही हाथों सिर्फ़ कुछ दिनों की क्यों कर लिया। सच मानों मैं मौत से डरने लग गया हूं और यही हारे हुए आदमी की निशानियां होती हैं …. “उसके आंसू निकल आए और वह चुप-सा हो गया हृदयपाल भी रुआंसा-सा हो गया, “यह तूने क्या कर लिया पाशे …. ?”

“जो होना था सो हो चुका अब चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकता पर हां, जो तू कर सकता है उस की रूपरेखा ज़रा ध्यान से सुन। मैं तुझे इस मठ का स्वामी बना कर जा रहा हूं।”

हृदयपाल के लिए यह करंट जैसा दूसरा झटका था। वह धार्मिकता में सम्पूर्ण होते हुए भी धर्म विद्रोही भी था। कर्म-कांड, दोगलापन, पाखंड, दिखावा उसे धर्म का हिस्सा बन गये दिखाई देते पर वह इन सब को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बना सका था।

मानसिक द्वन्द्व में उलझे, उसने स्वामी की बात सुनी, “मुझे पता है तेरे लिए यह सब कुछ बहुत मुश्किल है पर मेरी ख़ातिर ही सही। तुझे मेरी बात माननी पड़ेगी। मैं इस मठ को किसी और के हाथों में सौंपने के बारे में सोच भी नहीं सकता। मुझे पता है तू ही इस मठ को और मुझे ज़िन्दा रख सकता है।” उसकी सांसों की गति तेज़ हो गई और उसने पानी का घूंट भरकर अपने आप को सहज व सामान्य किया, “मैं इस मठ को बहुत प्यार करता हूं इसके प्यार की ख़ातिर ही मैंने ज़हर खाया कि मेरी लम्बी बीमारी वाली मौत, इस मठ की और मेरी मान्यता को कम न कर दे।” वो बोलता-बोलता चुप हो गया और फिर हृदयपाल की आंखों में झांकता हुआ नाटकीय अंदाज़ में मुस्कुराया, “तुझे मठ का स्वामी बनाने के लिए कुछ नाटक मैंने खेला और बाक़ी मेरी मौत के बाद तुम खेल लेना।” बातें करते-करते स्वामी को हिचकी-सी आई और उसकी सांसें उख़डने लगी।

हृदय ने स्वामी को पानी पिलाया। उसने अपने आप को संभाल कर हृदय को बड़ी ही मद्धम आवाज़ में कुछ रहस्यमयी बात समझाई और कहने लगा, “मुझे, मेरा अन्त समय आ गया दिखाई पड़ता है।”

स्वामी की बात सुनकर हृदय ने एक दुःख भरी लम्बी सांस ली। उसे लग रहा था कि स्वामी से जैसे बात साफ़ और स्पष्ट नहीं हो रही थी और उसकी आवाज़ कांप रही थी।

स्वामी ने धीमे से कहा, “अपने लम्बे अर्से के दौरान, मैं श्रद्धालुओं की एक अच्छी खासी भीड़ इस मठ के साथ जोड़ने में क़ामयाब हो गया हूं, “तुम मेरे श्रद्धालुओं को अकसर भीड़ ही कहा करते थे? वैसे मुझे भी पता था कि श्रद्धा से बन्द की हुई आंखों वाले लोग भीड़ से ज़्यादा कुछ भी नहीं होते।”

स्वामी बोलता-बोलता रुक गया और चिन्तित होते हुए कहने लगा, “मठ का अगला स्वामी बनने की दौड़ बहुत तेज़ हो चुकी है। मुझे रात-दिन यही चिन्ता रहती है कि अगर यह लड़ाई श्रद्धालुओं के सामने आ गई तो लोगों का मठ से विश्वास ही उठ जायेगा और तुझे तो पता ही है कि धर्म विश्वास के सहारे ही खड़ा है। मुझे पता है मठ के सारे स्वामी तेरा बड़ा आदर करते हैं इसलिए जब तेरे नाम के ऊपर मेरी मोहर लग जायेगी तो वह और श्रद्धालु, तुम्हें हंसकर स्वीकार कर लेंगे।”

इतनी-सी बात करके स्वामी का सारा शरीर कांपने लग गया। हृदय ने झुककर उसकी कलाई पकड़कर नब्ज़ टटोली। नब्ज़ बहुत ही धीरे चल रही थी। फिर भी पता नहीं कैसे स्वामी ने, अपनी सारी हिम्मत जुटा कर हृदय का कन्धा थपथपाया, “तुम इस भीड़ की श्रद्धा को विवेक में बदल देना, मुझे पता है सिर्फ़ तुम ही यह काम कर सकते हो।”

स्वामी की बात सुनकर हृदय सोच में पड़ गया। सोचते-सोचते जैसे वह बहुत ही दूर पहुंच गया। उसे लगा जैसे एक बहुत बड़ा प्लेटफार्म उसके सामने था, जहां खड़े होकर वह अपनी उम्र भर की सोच को सच में बदल सकता था।

उसने स्वामी का हाथ दबाया ‘हां’ में सिर हिला दिया। स्वामी से कुछ भी न बोला गया। उसने दो-तीन बार तू …. तू …. तू कहा और उसका सिर एक तरफ़ लुढ़क गया।

स्वामी के संस्कार पर लोगों की भीड़ बाढ़ बनकर उमड़ पड़ी सैंकड़ों लाउडस्पीकरों में स्वामी जी की नसीहत बार-बार दोहराई जा रही थी कि किसी ने रोना नहीं है पर फिर भी लोग दहाड़ें मार-मार कर रो रहे थे।

संस्कार के समय चिता के चारों तरफ़ मानव रूपी दीवार के तीन घेरे न बनाए होते, तो पता नहीं कितने ही श्रद्धालुओं ने स्वामी की चिता में छलांग लगाकर दाह-संस्कार कर लेना था।

परम्परा के अनुसार संस्कार के बाद, बहुत बड़े पंडाल में शोक में डूबे हुए श्रद्धालु अपने मठ के नये स्वामी का नाम सुनने के इन्तज़ार में चुपचाप बैठे थे। ऐसा लग रहा था कोई भी ऊंची सांस न ले रहा हो।

घड़ी, पल, आधा घंटा, घंटा श्रद्धालु बेचैन हो रहे थे। स्टेज पर कोई भी ज़िम्मेदार व्यक्त‍ि कुछ भी नहीं बता रहा था। श्रद्धालुओं की बेचैनी को दूर करने के लिए स्वामी के प्रवचनों की वीडियो कैसेट अनेकों ही क्लोज़ सर्कट टेलीविज़नों पर दिखाई जा रही थी।

बाग़ी स्वभाव वाले व्यक्त‍ि ने कहा, “मुझे लगता है इस मठ का स्वामी बनने के लिए कई दावेदार होंगे, इसलिए कोई भी बात बनती हुई नज़र नहीं आ रही।” भीड़ में से कई व्यक्त‍ि उस पर टूट पड़े। ‘तुम इस समय मुश्किल की घड़ी में भी चुप नहीं बैठ सकते हो।’

उसने सभी की तरफ़ घूर कर देखा और अजीब-सी रहस्यमयी हंसी हंसते हुए चुप हो गया। इतने में ही धर्म संसद के सदस्य लम्बे-लम्बे गेरुए वस्त्र पहने स्टेज पर आ बैठे।

श्रद्धालुओं ने तो जैसे सांस ही रोक ली। अहम ऐलान सुनने के लिए उनका रोम-रोम जैसे कानों में तबदील हो गया। स्टेज से सूचना दी गई, “जैसे कि हम सभी जानते हैं। अपने स्वामी जी लोक-परलोक यानी दोनों जहां के स्वामी हैं। उनको ज़र्रे-ज़र्रे और पल-पल की जानकारी थी। इस मठ के श्रद्धालुओं की उम्मीद के अनुसार वो इस मठ के स्वामी की नियुक्त‍ि, अपने आख़िरी सांसों के समय खुद ही कर गए थे। हमारे मठ के नए स्वामी जी की बांहों में ही उन्होंने आख़िरी श्वास लिए। पर इससे भी पहले ताजपोशी की सारी सामग्री और अपने हाथ का संदेश ‘गुरू अलमारी’ में उन्होंने अपने हाथों से ही रख दिया था। और अब स्वामी जी का अपने कर कमलों से लिखा और हस्ताक्षर किया आख़िरी संदेश, डेरे के प्रमुख कथावाचक स्वामी रामानंद जी पढ़कर सुनायेंगे।” माइक पर डेरे के प्रमुख कथावाचक की भारी-भरकम और ठहराव वाली आवाज़ गूंजी।

परम आदरणीय श्रद्धामठ के प्रेमियों,

जय श्रद्धामठ!

श्रद्धालुओं ने ऊंची आवाज़ में एक सुर होकर जोश में ‘जय श्रद्धा मठ’ के जयकारे को तीन बार दोहराया। कथावाचक ने थोड़ा रुककर स्वामी का संदेश पढ़ना शुरू किया, “परमात्मा के द्वारा बख़्शे श्वास भोग कर मैं इस संसार से जा रहा हूं। सतगुरु ने इस मठ की जितनी सेवा मुझे दी थी, वह मैं आपके सहयोग से पूरी तरह निभाता रहा हूं। नये सिरे से मैं यह सेवा एक धर्म-कर्म और मठ के साथ जुड़े, आप सभी के चहेते, हृदयपाल, जो आज इस मठ के गद्दी नशीन बन कर मठ की परम्परा अनुसार स्वामी हृदयनंद होंगे, को सौंप रहा हूं। आप सब ने स्वामी हृदयनंद जी को अपना नया स्वामी मान कर सहयोग देना है।”

श्रद्धालुओं ने ज़ोर-ज़ोर से “जय श्रद्धामठ,” “जय हृदयनंद” के नारे बुलन्द किए।

कथावाचक ने अपने दोनों हाथ खड़े करके आगे-पीछे करते हुए चुप रहने की जैसे अपील की। श्रद्धालु फिर ध्यान से अगली बात सुनने के लिए जैसे तैयार हो गये।

कथावाचक बता रहा था, “आप सभी की उपस्थिति में मठ की महान् परम्परा के अनुसार, धर्म संसद इनकी ताजपोशी करेगी। इनकी ताजपोशी की रसम इस मठ के परम आदरणीय स्वामी श्रद्धानंद जी अपने कर कमलों से करेंगे।”

श्रद्धालुओं ने हाथ खड़े करके ज़ोर-ज़ोर से “जय श्रद्धामठ,” “जय स्वामी हृदयनंद” के जयकारों से जैसे मठ के नये स्वामी को मान्यता दे दी।

स्टेज पर स्वामी श्रद्धानंद ने नारियल तोड़ा। हृदयनंद के माथे पर केसर का टीका लगाया। एक सौ आठ मनकों की माला उसके गले मे डाली और धर्म संसद के सारे सदस्यों का हाथ लगवा कर उसके सिर पर केसरी रंग की पगड़ी बांधी गई। इकट्ठी हुई संगत को यह बताया गया कि प्राण त्यागते समय इस संदेश पर पहले स्वामी जी ने अपने हाथों से तिथि और समय भी डाली हुई है।

“इस संदेश की फ़ोटो कापियां हमने मठ की दीवारों पर, जगह-जगह लगवा दी हैं ताकि दर्शन करने की चाहवान संगत उनके आख़िरी संदेश के दर्शन भी आसानी से कर सके।”

ताजपोशी के बाद हृदय ने ग़ौर से श्रद्धानंद और परमानंद की तरफ़ देखा। सभी धार्मिक रस्मों को निभाते हुए भी उनके चेहरों पर मायूसी की गहरी रेखाएं उभरती हुई उसको साफ़ नज़र आईं। श्रद्धानंद तो ताजपोशी की रस्म निभाते ही चक्कर खा कर गिर पड़ा। सेवकों ने उसे जल्दी-जल्दी संभाला और ऐबुलेंस में डालकर अस्पताल ले गये। माइक पर कथावाचक श्रद्धालुओं को बता रहा था, “स्वामी जी ने इस आकस्मिक मृत्यु के बाद पानी का एक घूंट भी नहीं पिया। इतना बड़ा सदमा सहन करना भी कौन-सा आसान है?”

“वैसे तो हम जानते हैं स्वामी श्रद्धानंद जी का अपने स्वामी जी के साथ बहुत प्रेम था।” यह सब सुन कर बाग़ी व्यक्त‍ि, बहुत ज़ोर से हंसा। पास खड़ी भीड़ ने उसकी तरफ़ तीखी नज़र से देखा।

वह ज़ोर-ज़ोर से हंसता और ज़ोर-ज़ोर से बोलता जा रहा था, “इसलिए उसने सोच लिया होगा कि मठ की गद्दी उसे मिलेगी पर मिल गई किसी और को। फिर दौरा तो पड़ना ही था।”

भीड़ में बहुत सारी आवाज़ें इस बाग़ी व्यक्‍त‍ि के विरोध में इकट्ठी होकर और भी ज़ोर से गूंजी, “तू हमें इस मठ का श्रद्धालु ही नहीं लगता, तेरी सारी बातें क़ाफ़िरों वाली हैं हम पूछते हैं कि तू फिर यहां लेने क्या आया है?”

उसने ऊंची आवाज़ में हंसते हुए कहा, “बस धर्म का तमाशा देखने।”

“साला जासूस कहीं का। कई आवाज़ों ने जैसे इकट्ठे होकर उसे फटकार लगाई।”

स्टेज पर बताया जा रहा था,

“अब तक की मिली सूचनाओं के अनुसार अन्य तेरह श्रद्धालु भी इस सदमे को न बर्दाशत करते हुए बेहोश हो चुके हैं इन सभी को अस्पताल पहुंचा दिया गया है।”

इस तरह की बातें सुनकर स्टेज पर खड़े-खड़े ही हृदयनंद को पहले स्वामी की बातें याद आई, “धर्म, पाखंड के बिना आगे नहीं चलता।”

पागलों की तरह ऊंचे-ऊंचे नारे लगाते श्रद्धालु, गेरुए चोले, शोकग्रस्त लोग, अन्धी श्रद्धा और ताजपोशी उसे सब कुछ एक बहुत बड़ा पाखंड लग रहा था।

उसे याद आया कि स्वामी ने तो इनकी श्रद्धा को विवेक में बदलने का उससे वायदा लिया था। ‘श्रद्धा और विवेक?’ वह गहरी सोच में पड़ गया और फिर श्रद्धालुओं की भीड़ की तरफ़ देख स्वयं ही, अपनी सोच पर मुस्कुरा दिया।

हर दिशा नारों से गूंज रह थी। ‘जय श्रद्धामठ,’ ‘स्वामी प्रकाशनंद अमर रहें,’ ‘स्वामी हृदयनंद ज़िन्दाबाद-ज़िन्दाबाद।’

कोई श्रद्धालु उस बाग़ी स्वभाव वाले व्यक्त‍ि को कह रहा था, “अब सुना, तुझे कहा था न कि इस तरह के महापुरुष रोज़-रोज़ नहीं पैदा होते। उन्हें सिर्फ़ अपनी अन्तिम घड़ी का ही नहीं बल्कि आने वाले समय का भी पूरा ज्ञान होता है। देख ले, वह मठ के किसी स्वामी को नहीं बल्कि बाहर वाले भक्ति‍ करने वाले महापुरुष को अपने हाथों से इस मठ का स्वामी बना कर गये। बाग़ी व्यक्त‍ि ने बड़ी तीखी नज़र से उस श्रद्धालु की तरफ़ देखा। वह व्यंग्यमयी हंसी हंसा और फिर अपने आप ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगा, “धर्म निरा पाखंड है, यह सब कुछ बकवास है। मैं किसी स्वामी को नहीं मानता, यह ताजपोशी एक ढोंग है। यह श्रद्धामठ एक जालसाज़ी है।”

पता नहीं कितने ही श्रद्धालु उस पर टूट पड़े। कहां-कहां लगी, किस-किस ने मारा कोई हिसाब-किताब ही नहीं था।

वह बेहोश हो कर गिर पड़ा। हां, माइक पर फिर सूचना दी जा रही थी कि एक और श्रद्धालु, स्वामी जी की मौत का सदमा बर्दाशत न करते हुए बेहोश हो गया है। उसको भी अस्पताल पहुंचा दिया गया है।

पर स्वामी हृदयनंद की नज़र अचानक उस श्रद्धालु पर पड़ गई जिसको पीटा जा रहा था। उसने किसी ज़िम्मेदार सेवादार को घटना वाली जगह पर भेज कर पूरी सच्चाई का पता लगाने के लिए कहा। सेवादार ने स्वामी को आकर बताया, “जी कोई पागल क़िस्म का आदमी धर्म, मठ और आपके बारे में बेमतलब-सा बोल रहा था। श्रद्धालु कहां बर्दाशत करते हैं? इस तरह के अपमान को? उन्होंने चार लगा दी बस इतनी-सी बात थी स्वामी जी।”

ताजपोशी की रस्म पूरी हो जाने पर कुछ सोचकर स्वामी हृदयनंद सबसे पहले अस्पताल पहुंचा। वो उनको, स्वामी श्रद्धानंद के वी. आई. पी. रूम में ले गये। जहां स्वामी जी की सेवा के लिए अस्पताल के कई कर्मचारी जुटे हुए थे। उसका हाल-चाल पूछने के बाद वो जनरल वार्ड में आ गया जहां आज बेहोश हुए लोगों में से बहुत सारे अब होश में थे। अपने नये स्वामी को देखकर, उनके सिर श्रद्धा से झुक गये।

वार्ड की आख़िरी चारपाई पर वह बाग़ी व्यक्त‍ि, बड़ी बुरी तरह से ज़ख़्मी हुआ कराह रहा था। उसके नाक, मुंह और सिर में से अभी भी रक्त बह रहा था, पर अस्पताल का कोई भी कर्मचारी उस के रक्त को पोंछने के लिए तैयार नहीं था। हां, जब स्वामी हृदयनंद, उसके सामने आ खड़ा हुआ तो अस्पताल के डॉक्टरों के लिए वह चारपाई भी सर्वश्रेष्ठ बन गई।

स्वामी हृदयनंद ने अपना हाथ उसके माथे पर रखा। उसने बड़ी मुश्किल से अपनी आंखें खोली और स्वामी जी को देखकर मुस्कुराने की कोशिश की। पर उससे अच्छी तरह मुस्कुराया न गया। स्वामी जी को उसकी खुली आंखें बड़ी ही जुरअत भरी लगी।

स्वामी ने धीरे से पूछा, “ऐ रब्ब के बन्दे, तू धर्म विरोधी है?” बाग़ी व्यक्त‍ि ‘न’ में सिर हिलाते हुए बड़ी ही पीड़ित-सी आवाज़ में कह रहा था, “स्वामी मैं विरोधी नहीं विद्रोही हो सकता हूं। पता नहीं क्यों ग़लत बर्ताव से मैं बाग़ी हूं। मेरा मन करता है कि धर्म, समाज, राजनीति में जो ग़लत-सलत है, सबको मसल कर रख दूं। बातें करते हुए उसका सारा वजूद ही जैसे कांपने लग पड़ा। फिर उसने अपने आप पर क़ाबू पाते हुए धीरे से कहा, मैं धर्म और सच की तलाश में घर से चला था। मुझे धर्म तो बहुत मिले पर सच और धार्मिकता कहीं भी नहीं मिली।”

उसकी बात सुन, स्वामी हृदयनंद सिर से पैर तक हिल-सा गया। उसे याद आ रहा था कि उसने तो स्वामी प्रकाशनंद के साथ, भीड़ की श्रद्धा को विवेक में बदलने का वायदा किया था।

उसे महसूस हो रहा था जैसे उसने प्रकाशनंद के साथ बड़े ही मुश्किल काम का वायदा किया हो। उसे हमेशा लगता था कि श्रद्धा के साथ बंद आंखों वाली भीड़ जैसे आदमियों की नहीं डंडों, बरछियों और तलवारों की ही होती है और विवेक हमेशा इस तरह की चारपाई पर लाचार अवस्था में, अपने बहते रक्त को देख, आम लोगों के रक्त की तासीर पर हंस रही होती है।

स्वामी हृदयनंद सोचते-सोचते बाग़ी के पैरों की तरफ़ खड़ा हो गया। उसका दिल किया कि वह अपने गले वाले साफ़े को उस बाग़ी के पैरों पर रख कर, सारे मठ की तरफ़ से अपने किये की माफ़ी मांग ले। “ऐ रब्ब के सच्चे बंदे, मैं तेरा आदर करता हूं मैं चाहूंगा कि एक दिन यह मठ भी तेरा आदर करे।” उसने मन ही मन कहा और जैसे नज़रें बचाते हुए अपने हाथ से उसके पैरों को छुआ।उसे एक अजीब-सी तसल्ली महसूस हुई। 

उसे लगा जैसे वह विवेक के दर पर सिर झुका कर अपनी तलाश का सफ़र शुरू कर रहा हो।

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