देश व नारी जाति का गौरव बढ़ाया कल्पना ने

-मुकेश विग

इतिहास रचने वालों को कब किसी की इजाज़त मिलती है। वक़्त उसके साथ न था, घरवालों का सहयोग भी न था। घरवालों को कहां अंदाज़ा होगा उसकी क़ाबिलीयत का! एक बार अपने सपने पूरे कर कल्पना मंगल ग्रह तक पहुंची तो दुनियां भर को नाज़ हो आया उसकी क़ाबिलीयत पर! कल्पना ने अपना इतिहास खुद लिखा ये बता दिया कल्पना ने कि मज़बूत इरादों के आगे आसमानों को भी झुकना पड़ता है। उसने उड़ते हुए ऊंचाइयों में अपने लिए एक नई ऊंचाई बनाई।

एक जुलाई 1961 को बी.एन.चावला के घर जन्मी कल्पना बुलंद इरादों वाली लड़की थी जिसे आकाश को पा लेने की चाहत ने नासा तक पहुंचाया। करनाल के टैगोर बाल निकेतन स्कूल में पढ़ने वाली कल्पना कुछ अलग व अनोखा करना चाहती थी। बचपन से ही आसमान उसके सपनों में था। हालांकि पिता बनारसी लाल बेटी के एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में दाख़िले के पक्ष में नहीं थे इसीलिए कल्पना चण्डीगढ़ के इंटरव्यू में अपनी माता के साथ पहुंची। पिता व कॉलेज टीचर भी उसके निर्णय को बदल नहीं सके। आख़िर कल्पना ने एशिया की अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम महिला के रूप में अपना नाम दर्ज़ किया। अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर 1997 में पहली बार 19 नवंबर से पांच दिसंबर तक पांच अन्य सदस्यों के साथ अंतरिक्ष में रही। 1984 में अपने ही उड़ान प्रशिक्षक जीन हैरीसन से कल्पना ने विवाह कर लिया। माता संयोगिता के संस्कारों के कारण ही विदेश में रहकर भी वतन की मिट्टी को नहीं भूली। इसीलिए आज कल्पना को झांसी की रानी सा सम्मान मिल रहा है।

1986 में चैलेंजर यान उड़ान भरते ही फट गया था जबकि इस बार कोलंबिया अपना अभियान पूरा कर धरती के समीप पहुंच कर हादसे का शिकार हो गया जिसमें कल्पना चावला सहित सात अंतरिक्ष वैज्ञानिक थे। केवल 16 मिनट पूर्व 2 लाख 7 हज़ार फुट की ऊंचाई एवं 12500 मील रफ़्तार से चल रहे यान का दुःखद अन्त शायद ही कभी भूल पाये। कोलंबिया की अपने 22 वर्षों के इतिहास में यह 28वीं उड़ान थी। शटल के इतिहास का भी यह 113वां अभियान था। मनुष्य की प्रगति व उसके स्वास्थ्य व घातक बीमारियों से रक्षा के लिए 80 से अधिक प्रयोग यह दल कर चुका था इनमें जीव-विज्ञान व कृषि उपज के बारे गहन प्रयोग मानव जाति के कल्याण व विकास से संबंधित थे। इस यान के पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर तेज़ तापमान इसके ध्वस्त होने का कारण रहा हो या कोई अन्य, लेकिन यह भी सत्य है कि शायद विधाता को यही मंज़ूर था। भारत की इस बेटी व अन्य सदस्यों पर पूरे विश्व को सदैव गर्व रहेगा।

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