पत्रकारिता की पौध

-माधवी रंजना

पत्रकारिता के गरिमापूर्ण धंधे से उपजी शौहरत व सुविधा सम्पन्नता के आकर्षण से उग रही आधुनिक पत्रकारिता के नायकों की पौध आजकल अपनी मूल जाति से अलग हो कर कई उपजातियों में विभक्त हो गई है। पत्रकारिता की इस नई पौध-पनीरी से असली पत्रकार छांटना कोई सरल कार्य नहीं। नई पौध-पनीरी के वैज्ञानिक विश्लेषण से इस जाति की कुछ नई उपजातियां सामने आई हैं जिनकी जड़ें हमारे समाज में काफ़ी गहरी नहीं बल्कि खूब फैल भी चुकी हैं। इन पर नियंत्रण करना तो आप जैसे सुधी पाठकों के हाथ में हैं लेकिन फ़िलहाल मैं पहचान ज़रूर करवा सकता हूं। पत्रकारिता की पौध की झाड़-झंखाड़ करने के बाद हुए गहन विश्लेषण में इसकी चार प्रमुख क़िस्में सामने आईं हैं।

1. दिखावटी पत्रकारः- पत्रकारिता की पौध से निकली पहली क़िस्म है दिखावटी पत्रकार। दिखावटी पत्रकार बनना काफ़ी चातुर्य का काम है। पत्रकारिता के क, ख, ग से अनभिज्ञ यह पौध स्थापित पत्रकारों की नक़ल कर जनसाधारण से लेकर व्यक्ति विशेष को लुभाने-रिझाने तक सीमित रह कर अपने काम निकालने में माहिर माने जाते हैं। पुराने व स्थापित पत्रकारों के क्रियाकलापों का अनुसरण कर या किसी को अपना गुरू बना कर यह चेले क़िस्म के दिखावटी पत्रकार अपने राजकीय व शासकीय काम बड़ी निपुणता से निकाल लेते हैं। हाव-भाव से यह अपने आप को एक श्रेष्ठ पत्रकार सिद्ध करने का कोई मौक़ा नहीं चूकते। राजनीति से जुड़ी छुट भैया टाइप पौध इस क्षेत्र में आजकल खूब फल-फूल रही है। अपने सम्पर्क सूत्रों द्वारा यह यदा-कदा छोटी-मोटी अख़बारों तक ख़बरें पहुंचा कर अपनी पत्रकारिता निभाती है। सुविधाओं को भोगने के प्रयास में कई बार इन्हें कुछ ढीठ क़िस्म की राजकीय या शासकीय खरपतवार व प्रदूषण का सामना करते हुए मैदान छोड़कर पतली गली से निकलना पड़ता है।

2. बनावटी पत्रकारः- पत्रकारिता की पौध से निकली दूसरी प्रमुख क़िस्म है बनावटी पत्रकार। जिस तरह बनावटी फूल हर जगह टंगे रहते हैं उसी तरह प्रेस क्लबों, प्रेस वार्ताओं तथा प्रेस के लिए आमंत्रित प्रीति भोज में यह पौध टाइमटेबल अनुसार सही वक़्त पहुंच जाती है। प्रेस से इनका बड़ी दूर का रिश्ता तो नहीं होता मगर इतना नज़दीक भी नहीं होता। ऐसे मौक़ों पर यह पौध बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है। क्लबों की शोभा बढ़ाती है तथा प्रेस वार्ताओं में एक से बढ़कर एक प्रश्न पूछती है फिर छक कर खाने-पीने के बाद इनका काम यहीं समाप्त हो जाता है इस क़िस्म की पौध अकसर छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं से जुड़ी निष्क्रिय प्रजाति होती है। अपने काम निकलवाने व छोटे-मोटे कॉन्ट्रैक्ट लेकर आजीविका उपार्जन करते हुए यह पौध नेताओं से नज़दीकी बनाये रहती है। किसी तरह के खरपतवार व प्रदूषण से अपने बचाव का जुगाड़-भिड़ा लेने में यह पौध सक्षम मानी जाती है। इस पौध को पत्र-पत्रिकाओं से कोई मेहनताना अथवा मानदेय नहीं के बराबर ही मिलता है फिर भी तथा कथित पत्र-पत्रिकाओं द्वारा जारी परिचय पत्रों से अपना रौब प्रदर्शन कर दाना-पानी की जुगत भिड़ा ही लेते हैं। अपने अन्य धंधों को यह पौध बनावटी पत्रकारिता की खाद दे कर उनकी उर्वरता बढ़ाती है।

3. सजावटी पत्रकारिताः- पत्रकारिता की पौध से निकली तीसरी क़िस्म सजावटी पत्रकारिता अति महत्वपूर्ण है। यह पौध पत्रकारिता का अभिन्न अंग है तथा अन्य दूसरी क़िस्मों से काफ़ी शक्तिशाली होती है। किसी भी प्रेस वार्ता, समारोह या प्रेस के लिए आयोजित प्रीति भोज में प्रथम पंक्ति में सुसज्जित यह पौध पत्रकारिता की शान मानी जाती है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़ी यह पौध प्रेस वार्ताओं में जहां सबसे ज़्यादा प्रश्नों की बौछार करती है वहीं नेताओं-अभिनेताओं के व्यक्तित्व से अपनी डायरियां भर देती है। यह बात अलग है कि दूसरे दिन इन महापुरुषों के लेख कहीं पढ़ने को मिलें अथवा नहीं। यदा-कदा मतलब गुज़ारे लायक़ अपनी उपस्थिति पत्र-पत्रिकाओं में करा कर राजदरबार में यह अपनी पैठ बनाये रखते हैं। अपने निजी अहंकार की रक्षा के लिए कभी कभार आक्रामक रुख भी अख़्तियार कर सक्रिय हो उठते हैं। राजकीय व शासकीय संचालनों में घुसकर यह पौध जहां अपना सर्वांगीण विकास करती है। वहीं अपने रिश्ते-नाते, यारी दोस्ती का पूरा ख़्याल रखती है। पत्र-पत्रिकाओं से भी यह कुछ मेहनताना अर्जित करती है। किसी तरह की खरपतवार या प्रदूषण से इसे कोई ख़ास हानि नहीं पहुंचती क्योंकि अपने बचाव में यह पौध पूर्ण सक्षम होती है। इस क़िस्म की पौध का समाज में काफ़ी दबदबा होता है।

4. लिखावटी पत्रकारः- उच्च शिक्षित तथा प्रशिक्षित पौध की सबसे असरकारक क़िस्म है लिखावटी पत्रकार। लिखावटी पत्रकारिता की यह पौध काफ़ी ज़हरीली प्रजाति है। ऐसी पौध तथाकथित असामाजिक तत्वों के लिये स्वयं एक शक्तिशाली खरपतवार एवं प्रदूषक है। यह पौध अकसर बड़े-बड़े घूसखोरों तथा भ्रष्ट लोगों का मुंह काला करके उन्हें नंगा दिखाकर खुद अपने लिये आफ़त मोल लेती है। प्रेस वार्ताओं में यह सबसे पीछे की पंक्तियों में बैठ कर क़लम घिसती है तो समारोहों में अकसर उनके पहुंचने से पहले ही प्रेस गैलरी अन्य पत्रकारों से खचाखच भरी होती है कार्य की अधिकता और समय पर सारा काम निपटाने की ज़िम्मेवारी का वहन करते हुए यह पौध अकसर प्रीति भोजों में जा कर सौहार्दता बढ़ाने में नाकामयाब रहती है। तथाकथित सफ़ेदपोश चोर-उच्चकों के लिए हर वक़्त खड्ढा तैयार रखने वाली इस पौध के दुःख भी बड़े-बड़े हैं।

इनकी ख़बर लेने वाले भी दिन रात ताक में रहते हैं। कई बार पिटने-पिटाने के बाद यह पौध और विषैली हो जाती है। राजकीय व शासकीय तंत्र में इनकी गहरी पैठ बनी रहती है लेकिन कई बार जल-भुन कर राख हुआ सरकारी तंत्र इनका भीतर घुसना भी वर्जित कर देता है। कुल मिलाकर इस कसैली-विषैली पौध से ज़्यादातर सरकारी व ग़ैरसरकारी मलाईचाटक दूरी ही बनाए रखते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित ज़्यादातर सामग्री इन के खुराफ़ाती दिमाग़ की उपज होती है।  

 

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