लेखक का दुखांत

-बिपन गोयल

सुबह उठते ही वह बुक स्टॉल पर जा कर पंजाबी की अख़बार का एक-एक पन्ना टटोल मारता। शायद किसी संपादक ने उस की कहानी प्रकाशित कर के खुशी प्राप्त कर ली हो। सभी पंजाबी पत्र-पत्रिकाएं देखने के बाद वह अंग्रेज़ी के अख़बारों का पन्ना-पन्ना टटोलता। यही सोचता शायद किसी अक्ल के अन्धे लेखक या आलोचक ने किसी लेख में उसका ज़िक्र कर दिया हो, पर आधे घंटे की मगज़मारी के बाद बेचारा उदास हो जाता, मन खट्टा हो जाता। वह संपादकों को गालियां निकाल कर मन की अग्नि शांत करता ‘साले संपादक होते ही चमचेबाज़ हैं… प्रशंसा करते जाओ तो खुश हैं… नहीं तो किसी बढ़िया रचना को भी नहींं प्रकाशित करते।’ वह मन ही मन कुढ़ता और रोज़ इसी तरह बुक स्टॉल से घर वापिस लौट आता। कई बार तो उसे बुक स्टॉल वाले पर भी दया आने लगती, जो उस के मुंह की ओर झांकते हुए उसे बार-बार अख़बारों के पन्ने पलटता देख अवश्य सोचता होगा, शायद आज ही दो रुपये की बिक्री करा दे…? अथवा यह भी सोचता होगा कि आज से इसे अख़बार मुफ़्त देखने से मना कर दूं … परन्तु नहीं यार! … एक बार तो दो रुपए की बिक्री करवा दी थी … फिर इस तरह अख़बार देखने से कैसे रोक सकता है? साथ ही घर का एक अख़बार भी तो लगवाया हुआ है अंग्रेज़ी का…।

“प्यासा जी…।” वह अभी कुछ समय पहले ही तो बुक स्टॉल से लौट कर आया था कि उस के कानों में आवाज़ पड़ी। वह भागता हुआ बाहर गया।

“यार, पार्टी हो गई … ।” मेहमान ने बहुत खुशी से उछलते हुए कहा।

वह बहुत हैरान, भई पार्टी किस बात की? मेरे बेटा भी नहीं हुआ … न ही मेरा कोई रिज़ल्ट आया है उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। चेहरे पर आधी मुस्कुराहट और आधी हैरानी पसरी होने के कारण ऐसा लगता था जैसे उसे थप्पड़ मार कर पूछा हो “भाई, चोट तो नहीं लगी…?” और बाद में हंस पड़ा हो।

‘किस चीज़ की…?’ उस के अवरुद्ध गले से रुंधी-सी आवाज़ आई।

‘यार, तेरी कहानी जो छपी है…।’

‘हैं अ … क्यों मज़ाक करता है यार …।’ उसकी स्थिति बहुत नाज़ुक थी।

‘सच में यार … तूने नहीं देखा …?’

उसे इस खुशी ने पगला बना दिया था। अगर अभी कोई कुआं चलकर उस के समीप आ जाता तो पल भर में या तो वह डूब सकता था या छलांग लगा कर लांघ सकता था।

‘तुझे यक़ीन नहीं हो रहा…?’ उस की चुप्पी देखते मेहमान ने पूरे यक़ीन से कहा।

‘आज … और तो सभी अख़बार देख लिए थे … परन्तु ज्यों ही यह अख़बार उठाने लगा तो बुक स्टॉल वाले ने रोक दिया।’ वह यह सब एक सांस में कह गया।

उसने उसी समय साइकिल उठाई और मेहमान दोस्त को साथ लेकर स्टॉल की तरफ़ भाग लिया।

‘तूने कैसे देखा…?’ रास्ते में बात उसी ने आरम्भ की।

‘दरअसल, मैंने भी एक कहानी भेजी थी … मैं तो अपनी देखने गया था भई छपी या नहीं…? परन्तु तुम्हारी कहानी पर नज़र पड़ गई…।’ दूसरे मित्र ने कुछ निराशा से कहा।

‘तुम्हारी छप गई…?’

‘हां … आज दोनों की इकट्ठी छपी हैं…।’

बिना अख़बार देखे उस ने दो रुपए पकड़ाए। अख़बार उठाई और जल्दी-जल्दी नज़र घुमाने लगा। कहानी प्रकाशित देख उस के चेहरे की रौनक़ बढ़ गई। खुशी में साइकिल उठाई और दोनों वापिस भाग लिए।

‘क्यों भई दुःखी… आज तो फिर इस अख़बार की प्रतियां अवश्य ही ज़्यादा बिकी होंगी…?’ उस ने छाती फुलाते हुए खुश होते हुए कहा।

‘क्यों…? आज ऐसा क्या विशेष है…?’ दोस्त ने बीच में ही टोकते, मित्र के चेहरे को पढ़ने की कोशिश की।

‘छोड़ो यार…!’ तुम भी हद करते हो … आज हमारी रचनाएं जो छपी हैं इसमें…।’

‘क्यों पगला गए हो…?’ मेहमान मित्र को लगने लगा था, सचमुच में पगला गया है। वह हंसा और चुप कर गया।

आज मैं बहुत खुश हूं। उल्टी-सीधी योजनाएं बनाते उस के मन में विचार आया क्यों न अब यहां साहित्य सभा की स्थापना की जाए? अब तो हम भी लेखकों की क़तार में खड़े हो गए हैं। नहाने-धोने और नाश्ते के बाद उस ने अख़बार उठा कर बगल में दबाया और साइकिल लेकर बाज़ार की ओर चल पड़ा। दोनों ने मिलकर आठ-दस मित्र इकट्ठे किए। सभा बनाई और चुनाव कर लिया। प्रधान का पद ‘प्यासा’ जी ने संभाल लिया। अब तो वह पहले से भी अधिक सरगर्म हो गए थे। झटपट-लगातार कहानियों की रचना आरम्भ की और साहित्य सभा के लैटरपैड पर प्रधान की मोहर लगा कर संपादकों को भेजना शुरू कर दिया। परन्तु अक्सर उसे निराश ही होना पड़ता। क्योंकि स्वीकृति की सूचना के लिए, कहानी के साथ संलग्न लिफ़ाफ़े में, उन की कहानी वापिस घर लौट आती। प्रधान बन कर उसने बहुत रचनाएं लिखी, परन्तु छपने का अवसर कम ही हाथ लगा। कम छपने के कारण उसे पंजाबी पत्र-पत्रिकाओं पर बहुत क्रोध आता ‘हर पर्चे की गुटबंदी है … सभी अपने गुट के लेखकों की रचनाएं छापते हैं … सिफ़ारिश के बिना कोई मामला हल ही नहीं होता … देखो … उसी को देख लो … पारिश्रमिक क्या देना शुरू कर दिया, बार-बार वही घिसी-पिटी रचनाएं … कई बार इतनी बढ़िया रचनाएं भेजी हैं … संपादक छापने का नाम ही नहीं लेता…।’

इस कुण्ठा की चर्चा वह एक आलोचक से कर बैठे। आलोचक ने जो ढंग बताया, वह भी उसे जंच गया और वह उसे पूरा करने पर उतारू हो गया। ‘सम्पर्क’ हां, यही सम्पर्क क़ायम करने की योजना भी बनाई गई … भई दोस्ती बढ़ाई जाए … मेल-जोल बढ़ाया जाए … हां … वार्षिक समारोह…।

दिमाग़ की इस दूर की सोच की, सूझ की दाद देते हुए सभी के साथ मिल कर वार्षिक समारोह की तैयारी आरम्भ कर दी गई। तारीख़ निश्चित हो गई। आव-भगत बढ़ गई। परन्तु थोड़े ही समय बाद मन फिर खट्टा हो गया। एक संपादक से उन्होंने अकेले में बात की। उस का उत्तर सुन कर वे हड़बड़ा गए ‘आख़िर रचना का भी स्तर होता है …। उस की अच्छाई भी कोई चीज़ है…। और फिर उन्होंने उसी समय उस संपादक से सम्पर्क तोड़ने का निर्णय भी ले लिया। (यह अलग बात है कि संपर्क अभी स्थापित ही कहां हुआ था)’

साहित्य सभा के कुछ नए लेखक जिन्होंने उन के बाद लिखना शुरू किया था, उन की ऐसी हरकतों के कारण उन से अलग हो गए। इस का भी उन्हें भारी दुःख था। अब इस शहर में कई लेखक जन्म ले चुके थे।

अचानक एक दिन, एक रविवार को कुछ साहित्यिक मित्र बाज़ार के बड़े चौक में इकट्ठे हो गए। प्रधान जी भी बाज़ार से निकलते हुए उन के पास जा खड़े हुए। राजनैतिक, सामाजिक बातचीत के बाद साहित्यिक बातचीत शुरू हो गई।

‘क्यों यार … तूने आज के अख़बार देखे हैं…? कोई अपने शहर का लेखक भी छपा है क्या…?’ एक कथित साहित्यकार ने दूसरे कथित साहित्यकार से पूछा।

‘नहीं यार … हम ने तो किसी भी अख़बार में कुछ नहीं भेजा … प्रधान जी को पता होगा … क्यों प्रधान जी…?’ उन्होंने प्रधान जी की तरफ़ मुड़ते हुए पूछा।

प्रधान जी ने एक अख़बार को छोड़ कर, शेष सभी अख़बारों के बारे में बता दिया, भई आज इस अख़बार में यह लेखक छपा है और इस अख़बार में अमुक लेखक।

‘नहीं जी … उस पारिश्रमिक वाले अख़बार की बात कर रहें हैं हम…?’

किसी ने टोका!

‘क्या रखा है उस अख़बार में …? हमने तो उसे रचना भेजना ही बंद कर दिया है … सत्यानाश कर रखा है अख़बार का …।’

 क्यों? क्या बात हुई…?

‘वैसे ही यार … उस के पास वही लेखक बार-बार छपते हैं … निम्न स्तरीय रचनाएं प्रकाशित होती हैं … सोचते थे संपादक समझदार हैं … अच्छे लेखकों की अच्छी रचनाएं प्रकाशित करेगा … पर कहां…? अंधेरगर्दी मचा रखी है उसने…।’

‘क्या मतलब प्रधान जी…?’ उन के निकटतम मित्र ने रहस्य जानने की गर्ज़ से पूछा।

‘और यार, … जब तक हमारी रचना नहीं छपती … तब तक अख़बार की क्या सार्थकता…? इतनी दफ़ा रचनाएं भेजी हैं … परन्तु छपने का नाम ही नहीं … मिलने-जुलने वाले सिफ़ारिशी लोगों से फुर्सत मिले, तब ही हमारी बारी आए … बस, हमने तो लिखना ही छोड़ दिया…।’ प्रधान जी ने मुंह बनाते हुए आख़िरी अक्षर बड़े दुःख से कहे और चल दिए।

शेष सभी मित्र व्यंग्यपूर्ण मुस्कुराहट से प्रधान जी के रूठी बंदरिया जैसे बने चेहरे को कनखियों से देखते रहे।   

 

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