बेगम फिर तो हो ली नौकरी

-डॉ. अशोक गौतम

मैं जब भी दफ़्तर जाता हूं अंतरात्मा को घर ही छोड़ आता हूं। वह इसलिए कि दफ़्तर के गोरख धन्धों को देख आत्मा तो मर गई है अब कहीं अंतरात्मा भी मर गई फिर तो मैं कहीं का न रहूंगा।

पर पता नहीं इस अंतरात्मा को कभी-कभी न जाने क्या हो जाता है कि दफ़्तर साथ जाने की ज़िद्द कर बैठती है। आज भी कर बैठी और उसे मनाते-मनाते बारह बजने को आ गए थे। पर एक अंतरात्मा थी कि मान ही नहीं रही थी। मैंने उसे समझाया भी ‘अच्छे गुण सरकारी कर्मचारी के साथ दफ़्तर नहीं जाते। तुम घर में ही खेलती रहो। वहां तुम्हारे साथ खेलने वाला भी कोई नहीं होगा।’

‘साथ वाले अंकल की रिश्वतखोरी के साथ वहां खेल लूंगी। बग़ल वाले अंकल की सजी-धजी बेईमानी के साथ खेल लूंगी। आपसे कुछ भी नहीं मांगूंगी सारा दिन। बस आज मुझे अपने साथ ले चलिए न।’ कहना तो चाहता था कि तुम्हारी और उनकी ज़ात अलग है पर डरा, अगर धर्म सापेक्ष, जात सापेक्ष होने का किसी को पता चल गया तो लोग नौकरी छुड़वा चुनाव में खड़ा करने को अामादा हो उठेंगे। इसलिए उसे पुनः मनाया, ‘अच्छा चलो, तुम्हें नुक्कड़ से चॉकलेट ले देता हूं।’ ‘नहीं, मैं तो बस आपके साथ आज दफ़्तर जाऊंगी।’ अंतरात्मा ने मेरी पैंट खींचते हुए अपनी ज़िद्द दोहरायी।

‘देखो, ज़्यादा ज़िद्द ठीक नहीं। मैं वैसे भी दफ़्तर के लिए कुछ लेट हो गया हूं। सीधी तरह मानती हो या …’ मेरा ग़ुस्सा पड़ोसन की सीढ़ियां चढ़ने लगा था। हद हो गई। मानती ही नहीं। इतने बरस हो गए साथ रहते-रहते। कोई समझता ही नहीं। कितना भी शाम को दफ़्तर से इक्ट्ठा करके लाओ। पत्नी का मुंह फिर भी फूला का फूला। अरे यार! जेब ही काटी जा सकती है न। आदमी को तो नहीं काटा जा सकता। पर नहीं। सभी को घर में लगता है कि ऊपरी कमाई करने में मैं निकम्मा हूं। भेड़ की ऊन ही काटी जा सकती है न। सो काट रहा हूं। भेड़ काटना अपने असूल के ख़िलाफ़ है। सर्दियां ज़िंदगी में एक ही बार थोड़े ही आती हैं भाई साहब!

बन्धु, जितना हो सकता था, अंतरात्मा को समझाया। नहीं मानी तो डराया। फिर भी न मानी तो धमकाया पर तब अंतरात्मा बेशरमी पर ही उतर आई थी। अतः मैंने उसे बाजू से पकड़ा और शौचालय में बंद कर दिया। अंतरात्मा को शौचालय में बंद कर दफ़्तर की ओर क़दम बढ़ाया था कि सामने से चिर परिचित बिल आता दिखा, लंगड़ाता हुआ।

‘क्यों, क्या हो गया भाई बिल, कहां गिर गए? पांव-वांव में मोच-वोच तो नहीं आ गई क्या?’

‘संसद में गिर गया। बड़ी चोट आई है।’ बिल कहते हुए रोने को हुआ।

‘तो यार एम्स चले जाते। एक्सरे-वैक्सरे करवा लेते। कहीं फ्रेक्चर-वेक्चर न हो।’

‘अकेले कैसे जाऊं।’

‘प्रधान मंत्री सड़क योजना से।’

‘मज़ाक मत करो।’ बिल ने अश्रुपूर्ण नज़रों से मेरी ओर देखा। संसद में चाहे बिल गिरे या संसद, मुझे क़तई पसन्द नहीं। गिरने के लिए तो और जगहें हैं भाई साहब। आप दफ़्तर में गिरिए, आप घर में गिरिए, आप सड़क पर गिरिए। संसद में तो कम से कम मत गिरिए।

‘कुछ सांसद तो साथ होंगे।’

‘रोटियां सेंकने के लिए। कुछ हमदर्दी चाहता हूं।’

‘यार, गिरे हुए से हमदर्दी की चाह रख क्यों मुझे और गिरा रहे हो। अभी दफ़्तर जाना है। लेट हो रहा हूं। वहां भेड़ें ऊन कटवाने के लिए इन्तज़ार कर रही होंगी।’ मैं चलने को हुआ।

‘कमाल है यार, मैं दीन-हीन तुम्हारे पास आया हूं और एक तुम हो कि…’

‘भैया! दीन-हीन इस देश में कौन नहीं? क्या मैंने दीन-हीनों की सहायता करने का टेंडर भरा है? जन सेवक मर गए क्या इस देश के। गिरों हुओं को यहां कोई जगह नहीं।’ मैं बिल को धकेलने लगा। कमबख़्त गिरने के बाद भी काफ़ी भरा था। संसद में जो गिर जाए उसे घर के सामने बैठाना भी अपशकुन होता है।

‘भैया! गिरे हुए को और न गिराओ।’ बिल दोनों हाथ जोड़ गिड़गिड़ाया।

‘पानी का एक गिलास तो पिला दो।’

मैंने पत्नी को पानी का गिलास लाने के लिए आवाज़ दी तो वह गालियां देती पानी का गिलास ले आई। वह पानी का गिलास मेरे मुंह पर मारने ही वाली थी कि सीढ़ियों पर अजनबी को देख मैनर वाली बनी ‘ये कौन साहब हैं जी?’

‘बिल’

‘कहां से आए हैं?’

‘संसद से।’

‘क्या वहां फिर ज़ुल्म पैज़ार हो गई है?’

‘नहीं गिर गए।’

‘तो इन्हें दफ़्तर जाते-जाते अस्पताल…’

‘पागल हो गई हो क्या? मैं दफ़्तर के काम छोड़ जो … मैं कल्याण विभाग का कर्मचारी तो हूं नहीं जो … सबको उठा अस्पताल ढोता फिरूं। अस्पताल उठाने के लिए तुम ही क्या कम हो।’ पत्नी अगर अपने वज़न से ज़्यादा हो तो मुश्किल ही मुश्किल। भले ही मायके वाले कितने ही सॉलिड क्यों न हो।

श्रीमति जी! आज इसे अस्पताल ले गया तो कल कहोगी इन्सानियत को अस्पताल ले जाओ। परसों भाईचारे को तो चौथे रिश्तों को। यहां तो सब कुछ गिरा, टूटा-फूटा है। ऐसी समाज सेवा में लगा बेगम, फिर तो हो ली नौकरी। मैं तो रह गया गिरे हुओं को ढोता। इस देश में गिरने के सिवाय और काम ही क्या है? कोई यहां गिर रहा है तो कोई वहां। गिरना इस देश का धर्म है भाई साहब। भले ही हम धर्म-निरपेक्ष हों।

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