क्या कहूं तुम से सजन

-रेनू बाला

अपने सजन को जब भी देखती हूं, यही सोचती हूं कि ऐसा नमूना मेरी सखियों को भी क्यों न मिला। यक़ीन मानिए, मेरे सजन ने मुझे बड़ा दुखी कर रखा है। न … न … ग़लत मत समझिए। जिस्मानी तकलीफ़ देने की बात तो यह सपने में भी नहीं सोच सकते। बस इनमें कुछ ऐसी बुराई है जो मुझे रात-दिन परेशान करती रहती है।

अब इनका पतलापन ही लीजिए। जब भी मेरे साथ बाज़ार चलते हैं तो यूं लगता है, जैसे कद्दू, लौकी टहल रहे हों। हालांकि यह मुझे दोष देते हैं कि तुम मोटी हो पर मेरी राय में तो मोटापा अच्छी सेहत की निशानी है।

मेरा तो यही मानना है कि ‘खाया-पिया लगे, तो शरीर मज़बूत दिखे।’ पर इन्हें कौन-सी सोच खाए जा रही है, जो यह दिनों-दिन दुबले होते जा रहे हैं? कहीं किसी दुबली-पतली से गुपचुप इश्क तो नहीं लड़ा रहे? पर मैं भी देखती हूं, मेरे रहते कौन मुई इन पर डोरे डालती है। कचूमर न निकाल दूंगी उसका।

अब दोष केवल पतलेपन का हो तो भी चल सकता है पर मेरे सजन की तो बात ही निराली है।

पिछले दिनों जब हम बाज़ार घूमने गए तो मुझे जौहरी की दुकान पर एक हार पसंद आ गया। बोली, “सुनिए, मेरा गला काफ़ी खाली-खाली रहता है।”

मेरी बात सुनकर सजन ने फरमाया, “तुम चिंता मत करो।”

मैं खुश थी कि आज मनचाही मुराद पूरी होगी, पर यह क्या, जनाब ने तो मुझे सीधे डॉक्टर के सामने ले जाकर बिठा दिया, “अब बताओ इन्हें, तुम्हारे गले में क्या तकलीफ़ है?”

मैं बताती भी तो कैसे? अब कभी बाज़ार जाते वक़्त मैं इनसे कोई फ़रमाइश नहीं करती। क्या मालूम किस बात का क्या मतलब निकाल बैठें।

इन का भुलक्कड़पन तो तौबा-तौबा … काफ़ी दिनों बाद हमारा फ़िल्म देखने का प्रोग्राम बना। पूरा एक घंटा सजने-संवरने के बाद मैं इठलाते हुए इनके साथ बाहर निकली। अभी आधे रास्ते ही पहुंचे थे कि इन्हें लगा कि टिकटें तो घर भूल आए हैं। मुझे एक दुकान पर बिठाकर चले गए।

जब काफ़ी देर तक यह न आए तो मैं इन्हें कोसते हुए घर की तरफ़ बढ़ गई। वहां पहुंचकर देखा कि घर के दरवाज़े पर ताला लगाकर यह महाशय जाने कहां ग़ायब हैं। मुझे अपनी उस पड़ोसन के घर बैठ कर इन का इंतज़ार करना पड़ा, जो मुझे फूटी आंख नहीं सुहाती थी।

3 घंटे के बाद मैंने घर का दरवाज़ा खुला पाया। कमरे में झांका तो इन्हें मुझे आवाज़ें देता पाया। फिर मुझे देखते ही ग़ुस्से से बोले, “तुमने तो हद कर दी। तुम्हारी ही वजह से फ़िल्म देखने का प्रोग्राम बनाया था और तुम न जाने कहां थी। मुझे अकेले ही फ़िल्म देखनी पड़ी। बेकार में एक टिकट तुम्हारी वजह से बर्बाद हुआ।”

अब मैं इन पर रोऊं या ठहाके लगाऊं?

मेरी वही कमबख्त पड़ोसन अपनी बालकनी पर हर हफ़्ते नई साड़ी धोकर सुखाने के लिए लटका देती है। अपने कमरे की खिड़की से साड़ियां देखकर मुझे ऐसा लगता है कि वह मेरे जले पर नमक छिड़क रही है।

मैंने अपने सजन से कितनी बार कहा कि मुझे भी नई साड़ियां लाकर दो, पर उन्हें तो मेरी इच्छाओं का कोई ख़्याल ही नहीं। खैर, एक दिन बोले, “तुम्हारी पड़ोसन अब तुम्हें कभी नहीं चिढ़ा पाएगी।”

मुझे हैरानी के साथ-साथ खुशी भी थी कि चलो देर आए, दुरुस्त आए। अब मेरे पास भी खूब नए कपड़े होंगे। पर हाय रे सजन, तुमने तो खिड़की पर ही नया पर्दा टांग दिया। फिर आराम से बोले, “अब तो खुश हो? न तुम्हें उसके कपड़े दिखेंगे, न तुम्हारा खून जलेगा। देखो न, पहले से कितनी कमज़ोर लग रही हो। आज ही अपना वज़न जांचकर आना।”

सजना-संवरना हम औरतों का पैदाइशी हक़ है पर मेरे सजन को न जाने मेरे बनाव-सिंगार से किस बात की चिढ़ है। इनका क्या है, पैंट-कमीज़ पहनी, पैरों में जूते कसे और हो गए तैयार। बालों में कंघी इसलिए नहीं कहा, क्योंकि इनके सिर पर गिने-चुने केश हैं, जिनको यह अपने हाथ से ही सहला लेते हैं।

पर मेरी बात तो दूसरी है। अपनी ज़ुल्फ़ों का पूरा ख़्याल रखना पड़ता है। खुशबूदार तेल लगाकर वेणी बांधनी पड़ती है, गजरा लगाना होता है। चेहरे पर क्रीम, पाउडर की लीपा-पोती के बाद, आंखों में कजरा और कपड़ों पर इत्र छिड़कना होता है।

इतना सब मैं किसके लिए करती हूं, इन्हीं के लिए न। पर न जाने यह इस बात को कब समझेंगे? मुझे सिंगार करने से टोकते हैं। ज़रा खुद साड़ी पहनकर दिखाएं तो जानूं। नानी न याद आ जाएगी।

मेरी सखियां जब भी मिलती हैं, अपने शाैहरों की तारीफ़ करती हैं। पर मैं हमेशा यही सोचती रहती हूं कि किस बात को लेकर इनकी तारीफ़ों के पुल बांधूं।

रितु बता रही थी कि एक बार उसकी तबीयत ख़राब होने पर उसके मियां ने दिन-रात उसके सिरहाने बैठ उसकी सेवा की। लेकिन मेरे सजन की तो बात ही जुदा है। मेरी हालत जब एक बार ढीली हुई तो तपाक से बोले, “चलो, तुम्हें मायके छोड़ आऊं।”

इनके मुंह से यह लफ़्ज़ सुनने थे कि मुझे न चाहते हुए भी बिस्तर से उठना पड़ा। इनके अफ़सर की बीवी एक दिन बता रही थी कि उनके जनाब चाय से लेकर खाना तक बना लेते हैं और हर ज़रूरी काम में हाथ बंटाते हैं। एक मेरे सजन हैं कि चाय बनाएं तो चीनी भूल जाएंगे और शरबत में नींबू।

इनसे दुखी होकर कभी-कभी तो जी करता है कि मायके चली जाऊं। लेकिन मेरे मायके जाने की बात सुनकर सजन दुखी होने के बजाय खुश हो उठते हैं। मुझे तो दाल में कुछ काला लगता है। सो हर बार मायके जाने का प्रोग्राम रद्द कर देती हूं।

हे सजन, तुमने तो आज तक मेरी क़द्र न जानी और न ही आगे जानने की कोई उम्मीद दिखती है। अब मैं क्या करूं? अपना दुखड़ा इन काग़ज़ों पर उतार रही हूं ताकि जी हल्का हो सके और तुम इन्हें पढ़ो तो मेरी हालत पर चंद आंसू बहाने पर मजबूर हो सको।

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