ज़माना नहीं बदलेगा हम बदलेंगे

समय बदलता है, सभ्यताएं बदलती हैं, उनके साथ परम्पराएं भी बदलती हैं। सभ्यता के बदलने से मतलब है लोगों के सोच-समझ, रहन-सहन, परिवेश, ज़िन्दगी को सोचने-समझने के अंदाज़ में अंतर आना।

एक वो सभ्यता थी, जिसमें नारी का स्थान पुरुष से ऊपर रख कर उसकी तुलना देवी से की जाती थी। उस ज़माने में नारी का स्थान सर्वोपरि था, सभी उसकी इज़्ज़त करते थे। समय का बदलाव लोगों के जीने के अंदाज़ को बदल देता है। यूं तो आज भी पुत्र और पुत्री दोनों को बराबर दर्जा देने के दावे होते हैं। पर यह सिर्फ़ किताबों और कहानियों की बातें हैं। हमारा समाज जो कि खुद तीनों भागों में बट गया है जिसका आधार पैसा है।

उच्च वर्ग में पैसे की कोई कमी नहीं अतः यहां वो समस्याएं नहीं हैं जो मध्यमवर्ग में हैं। अतः यहां लड़की को उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ता जो कि पैसे की कमी से पैदा होती है।

मध्यम वर्गीय परिवार में लड़की के जन्म पर जश्न नहीं रोने जैसा माहौल तैयार हो जाता है, एक नन्ही कली जिसे दुनियां के बारे में कुछ भी पता नहीं, जन्म से ही दोहरे व्यवहार का शिकार सिर्फ़ वह नहीं, उसकी मां भी होती है, अगर घर में लड़का हुआ तो लड्डू तो बटेंगे ही साथ ही मां को भी पौष्टिक आहार नसीब होता है पर अगर ऐसा नहीं होता है तो बच्चे के साथ-साथ मां भी इसका शिकार होती है। इस प्रताड़ना में अहम भूमिका दादी निभाती है, जो स्वयं भी कभी इस चक्रव्यूह से गुज़र चुकी होती है और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी इस प्रताड़ना का चक्रव्यूह चलता रहता है।

दोष उस नारी का नहीं है, दोष है तो इन सब के पीछे उसके मन में पल रहे भ्रम का। उसकी सोच होती है कि अगर घर में लड़के जन्म लेंगे तो भविष्य में हमें खिलाएंगे और लड़कियां तो हमारे ऊपर और बोझ बनेंगी।

इस प्रकार समय के कुचक्र का शिकार होती ही जाती है एक लड़की। पहले अपनी दादी से अगर उसकी मां प्रताड़ित होती है। फिर घर में दूसरे बच्चे के रूप में लड़का हुआ तो दोहरापन मां के मन में भी पनपने लगता है और इस प्रकार मां लड़की का हिस्सा भी लड़के को देना चाहती है। अगर लड़का पढ़ने में अच्छा न हो तो लड़की का स्कूल शुल्क बचा कर लड़के के लिए अतिरिक्त शिक्षक लगवाया जाता है। ऐसी ही बातें खाने-पीने, स्वास्थ्य संबंधी बातों में भी होती हैं। इस माहौल को सुधारने में समाज सुधारक एवं एन.एस.एस. एकजुट होकर तन्मयता से इसके उन्मूलन (लड़का-लड़की पक्षपात) के लिए कार्य करें। शायद तभी इस सोच में, हमारे सामाजिक स्तर में बदलाव आ पाएगा, तभी हमारे समाज का पूर्ण विकास होगा और तभी लड़कियां लड़कों के कंधे से कंधा मिलाकर समाज के सर्वोन्मुखी विकास के लिए कार्य कर पाएंगी। यहां कुछ तथ्यों पर प्रकाश डाला जा रहा है जो कि आवश्यक है —

1. वयस्क शिक्षाः- स्वयं सेवी संस्थाएं और एन.एस.एस के साथी एकजुट होकर न सिर्फ़ इन्हें शिक्षित करें, बल्कि इनके सोचने-समझने के ढंग में बदलाव लाएं।

2. परिवार नियोजनः- कई बार सही जानकारी के अभाव में न चाहते हुए भी मां बच्चे को जन्म देती है, जिसकी वजह से घर की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाती है, चाहे परिवार में एक बच्ची हो, पर वह स्वस्थ हो, उसी का लालन पालन ठीक से होना चाहिए, जो कि आगे चल कर सही नागरिक साबित हो।

3. नैतिक ज्ञान या नैतिक शिक्षाः- हर मां का यह नैतिक कर्त्तव्य बनता है कि वह अपनी बच्ची को किसी भी वजह से कष्ट न होने दे, वह भी सिर्फ़ इसलिए कि वह एक लड़की है। अगर एक लड़का कोई काम कर सकता है तो ऐसा नहीं कि लड़की वह कार्य नहीं कर सकती है। आज दुनियां में कोई विभाग नहीं जहां लड़कियां लड़कों से पीछे हैं, ज़रूरत है तो बस इस बात की कि उन्हें मौक़ा मिले। माता-पिता का पूरा साथ मिले, तभी और तभी वे भी देश की सच्ची नागरिक बन सकेंगी।

4. शोषित लड़की के जागृति के प्रति कर्त्तव्यः- कई बार लड़कियां शोषित होना अपना नसीब समझ कर सब कुछ झेलती जाती हैं। या फिर अपनी हम उम्र की भी वही स्थिति देखकर ये भी नहीं समझ पाती हैं कि वे पीड़ित भी हैं, किसी उत्पीड़न का शिकार हैं। इसके लिए माता-पिता की जागृति के साथ-साथ बच्चे की जागृति भी आवश्यक है। इसमें शिक्षा बहुत ज़रूरी है क्योंकि यही वह सीढ़ी है जिसके सहारे इस शोषण से ऊपर उठा जा सकता है, अन्यथा इन कुरीतियों को ख़त्म करना बड़ा ही मुश्किल होगा।

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