चांदनी का प्रतिशोध

हर इंसान के जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी घटती हैं जिन्हें लाख चाह कर भी हृदय से निकाला नहीं जा सकता फिर वो घटना जो किसी के बहुत अपने व्यक्ति की हो तो जिस्म का अंग-अंग कट कर गिरता सा लगता है वो इंसान ऊपर से नीचे तक खून से लथपथ होकर भी चिल्ला नहीं सकता, रो नहीं सकता। यादों के पन्ने उसकी आंखों को चीरते फड़फड़ाते रहते हैं। अतीत के बेरहम चाबुक जब तब उसके दिल को लहूलुहान कर उसे तड़पाते रहते हैं। शायद उसी तड़प का शिकार कृष्ण ढोलवाल भी था जिसने अपने जीवन की उस घटना को भुलाने का भरसक प्रयास किया, किंतु लाख चाह कर भी उसी में उलझा रहा।

उस रात का मंज़र भी कुछ ऐसा ही था। घनघोर बरसात के बाद मौसम साफ़ हो गया था। बहता हुआ पानी, ठण्डी हवाएं, आकाश में चमकते चन्द्रमा की छटा बिखेरती किरणें भी रात की उन घड़ियों के मौन को तोड़ नहीं पा रही थी। कृष्ण अपने कमरे से निकल ऊपर छत पर आ गया था। आकाश साफ़ था। उसने देखा दूर नहर के साथ बनी हवेली के उस कमरे की लाइट अब भी जल रही थी जहां उसका दोस्त प्रकाश रहता था। प्रकाश के बिना उस रौशनी का कोई रंग कृष्ण को नज़र नहीं आ रहा था। उसे हर रंग फीका लग रहा था। कृ-ष्-ण कह कर हवेली से आने वाला उसके यार का स्वर अब नहीं था। जिस हवेली की रात जगमगाती खुशियों का एहसास कराती हो- आज उसी हवेली में मातम का धुआं निकल रहा था। रात के उस सन्नाटे में प्रकाश के बापू की खांसी का स्वर हवा में उठकर लोप होता, फिर से उठता और सहसा गिर जाता।

कृष्ण ने जेब से सिगरेट निकाली और होंठों से कश खींचने लगा। नहर के छलछलाते स्वर से बहते पानी का एहसास कृष्ण को खूब हो रहा था। लम्बा कश खींचते हुए कृष्ण ने धुएं को आकाश की तरफ़ छोड़ा तो उठते धुएं में उसे चांदनी के रूप की छटा दिखाई दी। वो चांदनी जो अब नहीं थी। मर चुकी थी। उसने आत्महत्या कर ली थी। चांदनी की चाहत होती तो वो पूरी स्वतंत्रता से जी सकती थी। पति प्रकाश की मौत के बाद लगातार तीन मौतों के बाद उस हवेली में चौधरी और वही तो रह गए थे। परन्तु चांदनी के मस्तिष्क में तो कुछ और ही था। विवाह पूर्व के सपने शादी के माह भर होते-होते टूट कर चकनाचूर हो गए थे। उसका संसार जैसे टूट गया था। उसके टूटे हुए हृदय को देखने वाला कोई भी नहीं था। उसका पति प्रकाश भी नहीं …, कृष्ण की छलछलाती आंखों की तहों में प्रकाश की तसवीर तैरने लगी थी। कृष्ण ने आकाश की तरफ़ निहारा जहां से प्रकाश उसे पुकारता हुआ उसके समीप आन खड़ा हुआ था। उसकी आंखों में आंसू थे- ‘अरे तुम? क्या हुआ तुम्हें?’ प्रकाश मौन खड़ा था बस आंसू बह कर गालों पर लुढ़क रहे थे।

‘क्यों रो रहे हो? क्या हो गया? बोलो भी? तुम्हारा विवाह हुए वर्ष भी नहीं गुज़रा … तुम्हारी पसंद की बीवी …,’ कृष्ण के शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि प्रकाश ने अपने दोनों हाथों से अपना सिर जकड़ लिया। उसके गले से दबी घुटी हिचकियां निकल रही थीं। कृष्ण ने घबराकर उसे उठाया और भीतर ले आया- ‘मेरे यार तुझे क्या हुआ है? तू तो ठीक-ठाक आया था। इतना उदास और दुःखी तो तुझे मैंने कभी नहीं देखा था। तेरी आंखों में आंसुओं का ये समुद्र देखकर मैं बेचैन हुआ जा रहा हूं।’ प्रकाश ने आंसुओं को पोंछा और बोला- ‘सब क़िस्मत का खेल है।’

‘तेरी क़िस्मत तो कहीं से बुरी न थी, अच्छी भली नौकरी है सुन्दर मनचाही बीवी पाई है तूने … और …,’ कृष्ण ने कहा तो वह बोला- ‘मैं भी यही सोचता था। दुनियां का सबसे खुशनसीब इंसान समझता था अपने आप को। अपने पर इतराने लगा था। शायद यही भूल कर गया था। मुझे नहीं मालूम था- मैं ग़लत सोच रहा हूं। मैं भाग्यशाली नहीं … दुनियां का सबसे दुर्भाग्यशाली व्यक्ति …,’ कृष्ण ने प्रकाश के होंठों पर अपनी हथेली रख दी। स्नेह भरे हाथों से प्रकाश के सिर को सहलाते हुए उसका माथा चूम लिया। भरे स्वर में प्रकाश बोला- ‘बहुत सारे सपने संजोए थे। सोचा था सेना की नौकरी में रोमांच के क्षण तो अब आयेंगे…,’

‘हिम्मत से काम ले मेरे यार। जानता हूं तुझ पर भारी विपदा आई है। परंतु ऐसी तो नहीं जो मेरे यार का हौसला ही तोड़ दे। मैं तो सोच रहा था अपने यार से विवाहित जीवन के सुखद क्षण सुनूंगा…’

‘वही तो सुनाने आया हूं। ऐसा सच, जिसे सुनकर तू यक़ीन नहीं करेगा।’ सहसा प्रकाश उठा। आंसुओं को रूमाल से पोंछते हुए उसने दरवाज़ा भीतर से बन्द कर लिया। कृष्ण के होंठ सुन्न पड़ गए थे ज़ुबान तालू से चिपक गई थी। प्रकाश वापिस कुर्सी पर आकर बैठ गया। कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा सा छा गया। कृष्ण ने उस सन्नाटे को थरमस खोलते हुए तोड़ा- ‘लो चाय पियो।’ चाय का कप प्रकाश की तरफ़ बढ़ाते हुए कृष्ण ने कहा।

‘मैं सुबह फ़ौज में वापिस जा रहा हूं?’ चाय का कप हाथों में लेते हुए प्रकाश ने बताया।

‘सुबह?’ कृष्ण ने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा।

‘हां।’

‘तुम तो लम्बी छुट्टी लेकर आये थे? फिर अभी तो सप्ताह भी नहीं गुज़रा?’ कृष्ण ने कहा।

‘शायद मैंने ग़लत सोचा था। ऊपर वाले को यह मंज़ूर नहीं, ज़रूरी तो नहीं हर इंसान की हर इच्छा पूरी हो। शादी से पूर्व मैंने अपने अफ़सर से कहा था- मुझे कुछ माह बॉर्डर पर न भेजें। संवेदनशील स्थानों पर न लगायें। मैं मुट्ठी भर समय को चांदनी और अपने बीच खुशियों में सराबोर कर समेटना चाहता हूं। उसमें डूबना चाहता हूं … पर … पर … ये मेरी क़िस्मत में कहां? घर और खुशी इसके पास मेरा बसेरा नहीं है। मेरा स्थान इनसे कोसों दूर अंधकार भरे समुद्र में है। मेरी ज़रूरत यहां किसी को नहीं है। मेरी ज़रूरत देश को है…,’ एक ही लय में बोलते जा रहे प्रकाश की हृदयव्यथा को कृष्ण स्तब्ध हुआ सुन रहा था।

‘मुझे मालूम है मेरा यार देशभक्त है, तुझ में देशभक्ति की भावना न होती तो अच्छी-अच्छी आई नौकरियों को ठुकरा सेना में भर्ती होने की ज़रूरत तुझे नहीं होती। लेकिन अभी उपयुक्त समय…’

प्रकाश ने बीच में ही टोका- ‘मैंने फ़ैसला कर लिया है। अफ़सर से मेरी बात हो चुकी है। मुझे जल्दी पहुंच कर जम्मू जा रही फ़ौजी टुकड़ी के साथ देश के दुश्मनों को ख़त्म करने जाना है। बस तुझ पर एक ज़िम्मेदारी सौंपने आया था।’

‘प्रकाश…’ कृष्ण की आंखें भर आईं- ‘इस तरह से बिना कुछ बताए मैं तुझे नहीं जाने दूंगा,’ कृष्ण ने कहा।

‘मेरे यार, यह शादी ही मेरी बर्बादी का कारण बन गई है। चांदनी के सम्बन्ध मेरे बापू से हैं…’

‘प्रकाश यह क्या कह रहा है … चौधरी साहब के लिए … नहीं नहीं ज़रूर तेरी आंखों को धोखा हुआ है। भला अपनी बेटी जैसी बहू से भी…’

‘यही सत्य है। मुझ पर यक़ीन करो। पहली बार जब मैं छुट्टी आया था मुझे तभी इन अवैध सम्बन्धों का पता चल चुका था। मैंने इसे दूर करने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ। बापू को कुछ कह सकने का साहस नहीं जुटा पाया। बापू से ज़्यादा कुछ कहने का मतलब चारपाई पर पड़ी बीमार मां को दुःखी करने के सिवा कुछ भी नहीं। वो तो बेचारी वैसे ही दिन गिन रही है। मौत के अंतिम लम्हों में भी वह तड़प-तड़प कर प्राण त्यागे- इसे मैं नहीं देख सकता था। इस सम्बन्ध में मां के लिए करने के लिए कुछ भी नहीं है। वो चाहकर भी बापू के सामने कुछ कह नहीं सकती। बापू के सामने बोलने की ताक़त घर में किसी की नहीं। मैं यही कहने आया था, मां का ध्यान तुम्हें ही रखना होगा। मेरे जाने के बाद मां को एक आध दिन में देख आने की ज़िम्मेवारी मैं तुम्हें ही सौंप सकता हूं। वैसे तो दोनों भाई भी हैं परन्तु वो छोटे हैं, तुम मेरी बात समझ रहे हो न?’

‘सब समझ रहा हूं … सब समझ गया …’ कह कर कृष्ण रो पड़ा। प्रकाश को न जाने के लिए मनाया भी किन्तु प्रकाश अडिग रहा वो निर्णय ले चुका था।

कृष्ण चाह कर भी अपने दोस्त की मदद करने में स्वयं को असमर्थ पा रहा था। ऐसा मामला जो पूरी तरह से पारिवारिक ही नहीं अत्यंत नाज़ुक भी था उसकी गुत्थी भला वो कैसे सुलझा सकता था। उसकी चाह उसके हृदय में दफ़न हो कर रह गई। इस घिनौने रिश्ते का किसी से ज़िक्र कर अपने यार के जीवन को सड़क पर लाने का पाप भी वो नहीं कर सकता था। चौधरी साहब के इस कृत्य से कुछ भी भयानक घट सकता है इसे कृष्ण जानता था। परन्तु मूक रहकर इस विनाशलीला को देखने के सिवा कोई और चारा भी नहीं था उसके पास।

कई सप्ताह बीत गए। प्रकाश की कोई सूचना नहीं आई। क़रीब एक माह पहले चौधरी ने गांव वालों को यही बताया था कि उसने ख़त में लिखा है- उसकी ड्यूटि बेहद संवेदनशील इलाके में लगी हुई है। सो वो पूरी तरह से फ्री होने के बाद ही पत्र लिखेगा।

कृष्ण कभी-कभार प्रकाश की मां को हवेली में जाकर देख आता था। कृष्ण की मां बिस्तर पर अचेत पड़ी शून्य को निहारती रहती थी। उसकी आंखों की पुतलियां हिलडुल भर सकती थीं। जिस्म मृत सा पड़ा रहता था। कृष्ण कई बार चांदनी को देखने के लिए हवेली में इधर-उधर देखता भी परन्तु निराशा ही हाथ लगती। कभी-कभार चौधरी से सामना हो जाता तो सिवाए सलाम दुआ के कुछ न होता था। चौधरी का रोबदाब ही ऐसा था कि कृष्ण ने कभी रुक कर बात करने की हिम्मत भी नहीं की। चौधरी भी अपनी धुन में रहता था। गांव वालों के बीच में उस का उठना-बैठना भी बहुत कम था।

एक दिन वही हुआ जिसकी आशंका कृष्ण को थी। प्रकाश संसार से आज़ाद हो गया। गांव वालों को प्रकाश की मौत की सूचना मिली तो गांव में सन्नाटा छा गया। कृष्ण का अंतरंग मित्र संसार से कूच कर गया- यह उसके लिए जीवन का सबसे भयानक सच था। मरने वाला तो सब बन्धनों से मुक्त होकर शांत हो जाता है परन्तु उसका अपना जो उसे जान से ज़्यादा प्यार करता था। उसके लिए तिल-तिल करके तड़पना उसके जीवन रहने तक चलता रहता है। दो-चार दिन की चुप्पी के उपरांत चारों ओर वातावरण सामान्य हो ही जाता है सो गांव में भी हो गया।

प्रकाश की राख अभी ठण्डी भी नहीं हुई थी कि चौधरी ने चांदनी का हाथ अपने मंझले बेटे के हाथों में देने की घोषणा भी कर दी। गांव के एक दो बुज़ुर्गों ने चौधरी को समझाया भी, परन्तु चौधरी अपनी बात पर अड़ा रहा- ‘घर की इज़्ज़त घर में ही रहेगी। उसे घर से बाहर किसी ग़ैर के हाथों में सौंपा जाए- ये चौधरी की शान के ख़िलाफ़ है।’ कहकर उसने चांदनी को मंझले संजय के साथ बांध दिया।

संजय ने दबे स्वर में अपना विरोध भी जताया, भाई की पत्नी को वह अपनी पत्नी बनाने के लिए तैयार नहीं था। परन्तु मजबूरन उसे यह रिश्ता क़बूल करना पड़ा।

दो तीन दिन बाद बहुत सा साहस जुटा कर उसने चांदनी को चौधरी साहब से सम्बन्ध तोड़ लेने के लिये समझाया तो वह घायल नागिन की तरह फुंकारती बोली- ‘मान गई। अब तुम्हें यह सब मंज़ूर नहीं, क्यों? तुम उस वक़्त कहां थे जब तुम्हारे बापू ने मुझे अपनी हवस का शिकार बनाया था? तुमने एक बार भी इसका विरोध नहीं किया। अपने भाई के बाहर होने का फ़ायदा स्वयं भी उठाते रहे। मुझ बेबस की मदद करने वाला लक्ष्मण खुद राक्षस बन गया’ वह बोल रही थी।

संजय ने उसका हाथ अपने हाथ में लेना चाहा तो उसने झटक कर उसे छुड़ा लिया- ‘मुझे मत छुओ’ चांदनी की आंखें अग्नि सी दमक रही थीं। ज़ुबान क़ाबू से बाहर और अधर क्रोध से फड़फड़ा रहे थे- संजय ने उसे पकड़ कर कुर्सी पर बिठा दिया ‘तुम पागल हो गई हो। समझने की कोशिश करो। अब मैं तुम्हारा देवर नहीं … पति हूं पति। फिर एक मर्द के लिए शर्म की इससे ज़्यादा क्या बात हो सकती है कि उसकी बीवी के सम्बन्ध ग़ैर…’

‘बहुत खूब। मर्द हो, अब तुम्हारा बाप ग़ैर हो गया? इस लिए क्योंकि मैं तुम्हारी पत्नी हो गई हूं। तुम मर्द भी खूब हो अपना मतलब निकालने के लिए रिश्तों के अर्थ किस तरह बदलते हो। तुम तो कहते थे- तुम औरत हो, नारी हो। क्या बिगड़ता है तुम्हारा, मेरा भाई हो या बाप और या फिर मैं, पुरुष तो हूं। फिर बड़ा भाई तो वर्ष में एक आध बार ही आएगा। रहना तो तुम्हें हमारे साथ ही है। इसी हवेली में …, और तुम मेरी अस्मत का मज़ाक उड़ाते रहे … मुझे अपमानित …,’ चांदनी फफकने लगी।

‘भूल जाओ चांदनी … अब …’

‘चुप हो जाओ।’ चांदनी चीखी, आंखों में आए आंसुओं को साड़ी के पल्ले से पोंछने लगी- ‘जो मेरे साथ हुआ है इसे मैं मर कर भी भूल नहीं सकती … मर कर भी नहीं …,’ वह फिर से सिसकने लगी। सिसकियों का वो स्वर पत्थर को भी मोम बनाने की शक्ति रखता था। संजय मौन खड़ा चांदनी को रोते हुए देख रहा था। उसके पैर जैसे जड़ हो गए थे। अंधेरा बढ़ता जा रहा था। चंद्रमा की चांदनी अंधकार में डूबी शांत लग रही थी। चांदनी झटक कर खड़ी हो गई। उसके केश बिखर कर चेहरे पर आ गए थे- ‘अब तुम्हारी चाहत कभी पूरी नहीं होगी। मैं औरत हूं न … क्या फ़र्क़ पड़ता है … तुम हो या फिर चौधरी … हो तो मर्द ही न … यही कहते थे न …?’ संजय के होंठ सिल से गए। वो चाह कर भी कुछ कह नहीं पा रहा था। आग में जलती चांदनी को ठंडा करने का साहस जैसे क्षीण हो गया था।

‘अब रोने की बारी तुम्हारी है … निर्दोष बड़े भाई से विश्वासघात करने की सज़ा तो तुम्हीं को भुगतनी है … मुझे बेवा बनाने की सज़ा भी तो तुम्हीं को भोगनी है। तुमने जो किया है उसका प्रायश्चित जीते जी … तुम्हें ही करना है … तुम्हें ही …’ चांदनी का गला फिर भर आया। आंचल में अपने आंसुओं को समेटती चांदनी कमरे से निकलते हुए हवेली की ड्योढ़ी में आ गई। हवेली में जलने वाले बल्ब भी घोर अंधकार के प्रभाव से मंद पड़ गये थे। चांदनी धीरे-धीरे डग भरती चौधरी साहब के कमरे की तरफ़ बढ़ रही थी। संजय शून्य में खड़ा उसे देख भर रहा था। दूर चौधरी साहब की खिड़की से रौशनी की झलक दिखाई दे रही थी। संजय ने चांदनी को चौधरी साहब के कमरे में घुसते हुए देखा और आंखें बन्द कर लीं। स्वयं को संभालता हुआ वो वापिस कमरे में आ गया। अंधकार की काली रात और गहरा गई थी। खामोशी के मिजाज़ पूरे यौवन पर थे। रात का दूसरा पहर दरवाज़े पर आन खड़ा हुआ था। संजय को लगा चांदनी ठीक ही तो कह रही है अपने बड़े भैया की मौत का ज़िम्मेवार वही तो है। उसने अपने पिता का विरोध किया होता तो वो बेमौत नहीं मरता। उसकी मां और पस्त न होती … पर … बापू का विरोध कौन करे … बड़े भैया भी तो कर सकते थे … वो भी मौन बने रहे … आंख बन्द किये इस अत्याचार को देखते रहे … उफ़ तक नहीं कर सके … खुद चले गए। अब उसका भी वही हाल है … वो क्यों नहीं कुछ करता … उसे करना चाहिए … उसे आगे आना चाहिए … भला चांदनी का क्या क़सूर … उसे किस पाप की सज़ा दे रहे हैं हम …, सोचते-सोचते संजय को पसीना आने लगा। शरीर कांपने लगा। उसका हृदय फटा जा रहा था। बाहर तेज़ हवाएं चल रही थीं। दूर कहीं बादल गरजने का शोर अंधेरी रात की खामोशी को बार-बार ललकार रहा था। संजय ने देखा उमड़ते बादलों का भयानक झुण्ड उसी की तरफ़ बढ़ता आ रहा है। बिजली चमक कर आकाश गंगा में लोप हुई जा रही है। वो उठा और कमरे से बाहर आ गया। दूर आकाश में बिजली का कड़कना अभी भी जारी था। हवेली से निकलता हुआ संजय गांव की पगडंडियों पर दौड़ने लगा। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था। वो बस बढ़ा जा रहा था। बरसात तेज़ और तेज़ होती जा रही थी। बरसाती फुहारों ने नालों का रूप धारण कर लिया था। नाले नदियों की आगोश में समा गए थे। पानी से लथपथ हुआ संजय बेतहाशा दौड़ा चला जा रहा था। सहसा नदी के तेज़ बहाव से टकराया तो संजय चीख पड़ा- ‘भैया…’ उसकी चीख का स्वर बादलों की गड़गड़ाहट में समा गया और शरीर जल की विशाल लहरों में सिमट कर अंधकार में विलीन हो गया। पानी का बहाव उसकी देह को दूर बहाता गहराई में खो गया था।

चांदनी एक बार फिर विधवा हो गई थी। दूसरे पति की क्षतविक्षत लाश को देखने से चांदनी ने इन्कार कर दिया था। न वो रोई और न ही उसने लिबास बदला। होनी का यह एहसास उसे बहुत पहले हो चुका था परंतु इसका ख़ौफ़ उसे ज़रा भी न था।

दबी ज़ुबान में गांव में इसकी चर्चा होने लगी थी। गांव वाले चौधरी को ही दोशी मानने लगे थे। परन्तु ये सब आपसी खुसर पुसर से अधिक नहीं था। पुलिस भी आई। लाश का पोस्टमार्टम भी हुआ परन्तु सब एक हादसे से ज़्यादा सिद्ध नहीं हुआ। गांव वालों के पास चुप्पी से ज़्यादा कुछ करने को था भी नहीं।

प्रकाश की तरह संजय भी मौत की घाटियों में खो गया। चौधरी साहब ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस बार जो फ़ैसला किया वो सबसे भयानक था। अपने तीसरे बेटे को उसने चांदनी के साथ बांधने का निर्णय सुनाया तो गांव वालों ने अपने होंठों तले उंगलियां दबा ली। इस बार भी चौधरी ने इसे पारिवारिक मामला बताया और फ़ैसले का अधिकार भी अपने पास ही रखा। उसका बेरहम हृदय स्वार्थ और घमण्ड के गारे में डूबा रहा।

हवेली का अन्तिम चिराग़ नगीना था। दोनों भाइयों की तरह वो भी अपने पिता का भक्त और साथ में सहनशीलता की जीती जागती मूर्त था। गांव वालों का चहेता और मां की आंखों का तारा भी था। खुशी का मंज़र हो या फिर मातम का माहौल नगीना अपना कर्त्तव्य बखूबी निभाता था।

नगीना बापू का फ़ैसला सुन कर चुप ही रहा। परन्तु नगीना की मां के शरीर का तार-तार हिल गया था। उसकी रगों में बहता रक्त उसकी ज़ुबान में आकर इकट्ठा हो गया था। पल भर के लिए वह हिली थी- ‘मत करो ऐसा। उसे सुहागन बनाने के लिए मेरे आख़िरी बेटे को बलि का बकरा मत बनाओ … ये पाप है … पाप …’

‘तुम समझ नहीं रही, मैंने कोई पाप नहीं किया अपनी बहू की खुशहाली और इस घर की इज़्ज़त के लिए मेरे बेटों के जीवन की आहुति पाप नहीं हो सकती। मैं इसे विधवा नहीं रहने दूंगा…’ वह गुड़गुड़ाते चट्टान की तरह डटे रहे। नगीना की मां रोती रही बिलखती रही। उसमें अब सहन करने की ताक़त नहीं बची थी। वो फिर से बोलना चाह रही थी, कुछ कहना चाह रही थी, चारपाई से उठ कर चीखना चाह रही थी। परन्तु शक्ति का एक कण भी शायद उसमें नहीं रह गया था। वो फिर से पस्त हो गई थी। नगीना सब देख रहा था। मां की व्यथा को बेबस लाचार हुआ वो देख भर रहा था। मां की तरह उसमें बापू की बात का विरोध करने का बल नहीं था। फिर किसी भी बात को गांव में चर्चा का विषय बनाकर वो खुलेआम हवेली की बदनामी भी नहीं करवाना चाहता था। सब क़िस्मत का खेल है जो लिखा है वो होकर ही रहेगा जैसी बातों से वह मां को समझाने का प्रयास कर रहा था।

चौधरी साहब अपने कक्ष में जा चुके थे। रात का दूसरा पहर अपने पांव पसार रहा था। अंधकार बढ़ रहा था। चारों तरफ़ सन्नाटे की चादर बिछी हुई थी। नगीना अपनी मां के पास बैठा हुआ था। न जाने क्यों उसे रात का हर पल ख़ौफ़नाक लग रहा था। मां की डूबती आंखों में उसे अपने भाई का उदास चेहरा नज़र आ रहा था- ‘मां…’ उसने मां के चेहरे को सहलाते हुए कहा तो मां की टकटकी टूटी नहीं। उसने चौंक कर मां की तरफ़ देखा- मां की आंखें स्थिर थी। आंखों की पुतलीयां घड़ी की बन्द धड़कन सी रुकी हुई थी। नगीना कांपने लगा। सहम कर खड़ा हो गया। दौड़ कर कमरे से बाहर आ गया। उसके क़दम अपने ही इर्द-गिर्द बेबस हुए व्यक्ति की तरह डगमगा रहे थे। किसे पुकारे? क्या कहे? उसे कुछ भी तो नहीं सूझ रहा था। अंधेरी रात के उस खुमार में कौन उसकी मां की रक्षा करने आयेगा? उसके डगमगाते क़दम पीछे मुड़े वो वापिस मां के कमरे में आ गया। मां तो उसी तरह पड़ी है, न हिलडुल रही है, न कुछ कह रही है। वैसे ही एक टक देख रही है। मौन, शांत वो फिर वापिस मुड़ा बुदबुदाने लगा- ‘मां सो रही है … बीमार है … उसे नहीं जगाना … जाग गई तो फिर रोयेगी। कौन चुप करायेगा? बापू तो अपने कमरे में…’ नगीना मां के चरणों के पास आकर बैठ गया। उसका चेहरा पसीने से तर हो गया था। आंखों में जलाशय था। उसका बदन कांपने लगा। हिचकियां गले में अटक रही थी। मां अब भी मौन थी। कब नगीना का सिर मां के चरणों पर टिक गया- उसे मालूम ही नहीं पड़ा। पूरी हवेली अब भी ख़ामोश थी। सांय-सांय करती हवाएं अब भी बह रही थीं। कहीं दूर कुत्तों के रोने का स्वर तेज़ हो गया था।

इस बार चांदनी सुहागन बनने से पहले ही विधवा हो गई थी। हवेली में दो लाशें पड़ी थी नगीना और उसकी मां की। गांव वाले लाशों के इर्द-गिर्द बैठे थे। चौधरी साहब मौन थे। अकेले बैठे थे। उनके चमन के सारे फूल मुरझा कर टहनी सहित गिर चुके थे। उनकी आंखें डबडबा रहीं थीं। पहली बार गांव वालों ने उनकी आंखों में आंसू देखे थे। उन आंसुओं को देखने वाला उनका अपना वहां कोई भी नहीं था।

‘चौधरी साहब, चांदनी को बुलवा लो। सास के अंतिम दर्शन कर ले’ किसी एक ने चौधरी साहब के क़रीब पहुंचते हुए कहा तो चौधरी साहब चौंक गए- ‘हां … हां … ऊपर होगी। किसी को भेज कर बुलवा लो।’ चौधरी साहब के शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि ऊपर से आती नारी चीखों से हवेली दहल उठी। गांव वाले उठ खड़े हुए। चौधरी साहब तेज़ी से ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास आ गए। गिर पड़ते यदि साथ खड़े गांव के आदमियों ने पकड़ा न होता- ‘क्या हुआ कृष्ण की मां?’ चौधरी साहब ने तेज़ी से उतरती वृद्धा से हांफते हूए पूछा- ‘तेरा सब कुछ लुट गया चौधरी…’ इतना ही कह सकी कृष्ण की मां और पल्लू से मुंह ढांपती लंबे डग भरती हवेली से बाहर निकल गई। थोड़ी सी देर में यह ख़बर गांव में आग की तरह फैल गई- ‘चांदनी ने ज़हर खा कर आत्महत्या कर ली।’ गांव वाले स्तब्ध रह गए। चांदनी को यह सब करने की क्या ज़रूरत थी? अब तो वो स्वतंत्र हो कर चौधरी साहब के साथ रह सकती थी। हवेली में उन दोनों के सिवा कोई भी नहीं बचा था। पुलिस और कानून के तमाम झमेलों से चांदनी ने चौधरी को मुक्त करते हुए आत्महत्या में किसी भी मजबूरी अथवा परेशानी का ज़िक्र न करते हुए उसे अपनी इच्छा और मर्ज़ी पर डाल दिया था। पुलिस ने केस फाइल करते हुए चौधरी पर कोई कार्यवाही नहीं की।

कृष्ण समझ सकता था। वो जानता था यह एक ऐसा प्रतिशोध था जो चौधरी के कल को ग़र्क़ बना कर रख देगा। कानून तो उसे जेल में बन्द कर देगा बस, परन्तु विशाल हवेली में ऊंची-ऊंची दीवारों और बड़े-बड़े कमरों में अतीत से जुड़ी स्मृतियों के बीच ज़िन्दा लाश की तरह घूमते हुए ज़िन्दगी के दिन काटने की सज़ा से बड़ी कोई और सज़ा हो भी नहीं सकती। इससे भयानक सज़ा कोई और होती तो शायद चांदनी वही देती। कितना ख़ौफ़नाक दण्ड था जिसे भोगने के लिए चौधरी को जीना था।

कृष्ण ने देखा, चौधरी की खांसी का स्वर तेज़ हो गया है। वो आहिस्ता-आहिस्ता थके हुए क़दमों से हवेली में चक्कर लगा रहे हैं। अकेले, असहाय और बेबस। उनकी इस हालत को देखने के लिए अगर वहां कुछ बचा था तो वो हवेली की ऊंची-ऊंची दीवारें थी उन दीवारों से निकलती बेबस चीखें थीं जिन्हें चौधरी को सुनना था मरते दम तक।

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