पूर्ववत इच्छित प्रसव

-दिलीप कुमार

आज के इस दौर में जब इंसान सब कुछ अपने क़ाबू में कर लेना चाहता है। वो क्या कर सकता है ये और बात है, मगर वो क्या कर रहा है और उसका नतीजा क्या होगा? ज़रा ग़ौर फरमायें। कन्या भ्रूण हत्या, डायनामाइट के बाद विज्ञान की सबसे निकृष्टतम सेवा है। इस पर काफ़ी चर्चा हो रही है। मगर यहां हम इस मुद्दे से हटते हुए नगरों में पनप रही एक चिन्ताजनक विधा की तरफ़ आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहेंगे। अब तो औरतें ये सोचकर एवं तय करके गर्भधारण करती हैं कि अमुक महीने में गर्भधारण करने से वे एक ख़ास माह में मां बनेगी। चलिए माना जा सकता है कि यह एक गनीमत है, मगर सिर्फ़ सनक और अंधविश्वास के नाम पर ज़बरदस्ती एक निश्चित तिथि पर बच्चा पैदा करना कहां की अक्लमंदी है। फिर अंधविश्वास के नाम पर व्यवसाय चलाने वाले लोग पति-पत्नी का राशिफल मिलाकर यह बता देते हैं या यूं कहिये ऐसा समां बांध देते हैं कि किसी विशेष राशिफल की संतान उन्हें मिल जाये तो उनके सारे कष्टों का निवारण हो जाएगा। अब अंधविश्वास का वृक्ष रोपा हो तो उसे फलने-फूलने का मौक़ा भी मिलना चाहिए यानी कि गर्भवती औरत को आने वाले समय में गर्भस्थ शिशु के जन्म की तारीख़ों का अन्तराल तथा उन तारीख़ों के राशिफल भी बता दिये जाते हैं। स्त्रियां ख़ास राशि वाली उन तारीख़ों हेतु गर्भधारण कर लेती हैं चूंकि डॉक्टर संभावित तिथि का अंतराल बता ही देते हैं। प्रायः स्त्री की नॉर्मल डिलीवरी का समय 36-40 सप्ताह के अन्तराल में एक ख़ास वक़्त निश्चित करके बता दिया जाता है कि उस अमुक ख़ास राशि का समय इस चार-पांच सप्ताह के दौरान अवश्य पड़ेगा। बस औरतें 3-4 सप्ताह के समय का इंतज़ार करने के बजाय, ऑपरेशन के ज़रिये उस ख़ास समय के राशिफल के कारण बच्चा पैदा कर देती हैं जबकि उनका प्रसव सामान्य तरीक़े से हो सकता है। जहां तक विशेषज्ञों की राय की बात है उनके मुताबिक़ गर्भावस्था के अन्तिम चार सप्ताहों में गर्भ की समुचित देखभाल करनी चाहिए और गर्भस्थ शिशु को उसका नियति चक्र पूरा करने का पूरा अवसर देना चाहिए। हद तो तब हो जाती है जब कुछ अति महत्वाकांक्षी स्त्रियां अपने जन्म दिन पर, पति के जन्म दिन पर, विवाह की वर्षगांठ पर, नये साल पर या वेलेन्टाइन डे के अवसर पर ही बच्चे को जन्म देने की ज़िद्द ठान लेती हैं। वे औरतें अपनी इस सनक को पूरा करने के प्रयास में अपने और अपने बच्चे के भावी जीवन पर खतरों के बादल ला देती हैं।

अब तो ये तय करना ही पड़ेगा कि आदमी के अधिकार की सीमा क्या है और प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ की सीमा क्या है।

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