धत तेरे की

-धर्मपाल साहिल

आज वह ऑफ़िस में रीना का सामना कैसे कर पाएगा। इस बात को लेकर वह सुबह से ही परेशान था। रात भी वह ठीक ढंग से सो नहीं पाया था। आधी रात को एक बार आंख खुली तो बस फिर नींद आंखों के पास न फटकी। करवटें बदलते सूरज चढ़ आया था। रोज़ाना की भांति ‘मॉर्निंग वाक’ के लिए भी नहीं निकला। बस बिस्तर पर पड़ा-पड़ा किसी अनहोनी घटना की आशंका के बारे में सोच-सोच कर उस के दिमाग़ की नसें तनावग्रस्त हो गई थीं। उठने को मन नहीं कर रहा था। सोचा ऑफ़िस से छुट्टी कर ली जाए। पत्नी ने भी पूछा, “सेहत ठीक नहीं है तो छुट्टी कर लो आज।” लेकिन दूसरे ही पल उसने स्थिति से निपटने के लिए “जो होगा देखा जाएगा” का निर्णय लिया और अनमने ढंग से तैयार होकर ऑफ़िस पहुंच गया।

समय से पहले ऑफ़िस पहुंचने वाली रीना की कुर्सी ख़ाली थी। वह सीधा अपने केबिन में पहुंच गया। तभी रीना की अन्य कुलीग सुषमा ने चिर-परिचित अंदाज़ में मुस्कुरा कर उसे गुड मॉर्निंग कहते हुए रीना की छुट्टी की अर्ज़ी उसके सुुपुर्द कर दी। अर्ज़ी पकड़ते हुए उसे झटका-सा लगा। लेकिन कुछ देर बाद उसने रिलेक्स अनुभव किया, चलो आज का दिन तो टला। ऐसा सोच कर उसने अपनी कमज़ोर पड़ती मानसिकता को सम्बल देने का प्रयास किया। उस की आवाज़ में अफ़सरी वाली सुर ग़ायब थी। डर, सहम से भीगी आवाज़। सारा दिन चुप-चुप रहा। काम में मन लगाने की बहुत कोशिश की उसने, पर उस का ध्यान ज़बरदस्ती रीना की ओर चला जाता।

दो-माह पूर्व ही इस ऑफ़िस में स्टेनो के पद पर नियुक्त हुई थी रीना। अविवाहित, इकहरे शरीर के कारण छोटा कद अखरता नहीं था। पकी सुनहरी गेहूं जैसा रंग, बिल्लौरी आंखेंं, नैन नक्श सामान्य होते हुए भी उस के चेहरे पर हर समय नाचती मुस्कुराहट उसका प्रमुख आकर्षण थी। बला का आत्म विश्वास, कुशाग्र बुद्धि। उसने आते ही अपनी कार्य कुशलता एवं स्वभाव से अपने बॉस सलिल के हृदय पर अपना सिक्का जमा लिया था अपनी पन्द्रह वर्ष की सर्विस के दौरान सलिल ने सूरत और सीरत का इतना खूबसूरत संगम पहली बार देखा था। रीना की मुस्कुराहटों ने उसे यह एहसास भी भुला दिया था कि वह शादीशुदा, दो बच्चों का बाप भी है और रीना उस से आधी उम्र की है। उसे लगता कि रीना की मुस्कुराहटें केवल और केवल उसके लिए ही हैं। दूसरे कुलीग्ज़ को “स्माइल” देना तो दूर उनसे बात करते ही बहुत कम देखा था उसने।

अपने बर्थ-डे पर रीना मिठाई का डिब्बा लेकर सलिल के केबिन में गई तो सलिल ने उसे मुबारकबाद देते हुए, अपना एक पेन ही तोहफ़े के रूप में भेंट करते हुए कहा, “पहले पता होता तो कोई अच्छा-सा ग़िफ्ट ले आता।” “लेकिन इस की क्या ज़रूरत थी।” कहते हुए उस ने पेन को मुस्कुराते हुए स्वीकार कर लिया था।

फिर अचानक रीना बीमारी के कारण कई दिन ऑफ़िस नहीं आई थी। वह रीना की छुट्टी की अर्ज़ी देने आती सुषमा से उस का हाल-चाल पूछता। कई बार उसका मन किया कि वह रीना के घर जाकर उसकी मिज़ाज पुरसी करे। वह उसकी किसी भी प्रकार की मदद करे। वह शीघ्र ठीक होकर ऑफ़िस आए। उस ऑफ़िस में प्राण फूंके, जो उसके बिना शमशान-सा नज़र आता। वह केबिन में अकेला बैठा-बैठा रीना के मुस्कुराते चेहरे की कल्पना करके उसके सरूर में डूब जाता। एक दिन तो उसने रीना की “ज्वायनिंग फ़ाइल” से उसका पता नोट किया और शाम के धुंधलके में रीना के मुहल्ले में ही पहुंच गया। सर्दी का मौसम और हल्की वर्षा होने के कारण अधिकतर लोग घरों में दुबके पड़े थे। वह रीना के घर के सामने कितनी ही देर इसी असमंजस में खड़ा रहा कि पता नहीं उसके आने से रीना क्या सोचेगी, उसके घर वाले पता नहीं कैसे प्रभाव लेंगे उसके बारे में। वह काफ़ी देर इसी उधेड़-बुन में वहां खड़ा रहकर रीना के घर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था और रीना से बिना मिले वापिस आ गया था।

कुछ दिनों बाद रीना ऑफ़िस आने लगी थी। बीमारी के कारण मुर्झाया-सा चेहरा। हल्दी की माफ़िक ज़र्द रंग। पेपर साइन करवाने सलिल के केबिन में आई तो उसे कुर्सी पर बैठने के लिए कहते हुए सलिल ने पूछा, “अब क्या हाल है तुम्हारा?”

“ठीक हूं- लेकिन बीच-बीच में हल्का बुख़ार रहता है।”

“ट्रीटमेंट किस से ले रही हैं आप?”

“डॉ. सागर से।”

“तो आप एलोपेथी ट्रीटमेंट छोड़ कर देसी या होम्योपैथिक दवाई क्यों नहीं ले लेती, अगर वे फ़ायदा नहीं करती तो कम से कम नुक़सान भी नहीं करती कोई साइड इफेेक्ट नहीं। अब तो आम लोगों का रुझान एलोपैथी से हटकर होम्योपैथी की ओर बढ़ रहा है।”

“सर, मैं तो किसी होम्योपैथिक डॉक्टर को जानती नहीं, आपको मालूम है तो बताइये न।” रीना ने सलिल की बातों से प्रभावित होकर सहमत होते हुए कहा।

“हां-हां क्यों नहीं, मेरे घर के रास्ते में ही पड़ते हैं। अच्छे डॉक्टर हैं राज, मैं अपनी तथा बच्चों के लिए दवाई उन्हीं से लेता हूं। हमें तो काफ़ी सूट करता है उन का ट्रीटमेंट।”

“उन के टाइमिंग्ज़ क्या हैं सर?”

“सुबह आठ से एक बजे और शाम को चार से सात तक।”

“मेरे लिए तो इस समय पहुंचना मुश्किल होगा।”

“अगर तुम इन्टरस्टिड हो तो मेरे साथ लंच टाइम में चले चलो, मैं तुम्हें दिखा लाता हूं।” रीना ने हामी भर ली थी और लंच समय में वह सलिल के स्कूटर पर बैठ कर होम्योपैथिक डॉक्टर के यहां पहुंच गयी थी। लेकिन बदक़िस्मती से डॉक्टर साहिब दो दिनों के लिए बाहर गए हुए थे। सलिल ने लंच लेना था। रीना भी उस के साथ, उसके घर आ गई। सलिल ने पत्नी से परिचय कराया। सलिल ने भोजन किया। बहुत कहने पर रीना चाय के लिए तैयार हुई। वे चाय पी रहे थे कि इतने में उनकी पड़ोसन आ गई सलिल की पत्नी बाहर जा कर उससे बातें करने लगी। सलिल और रीना बैठक में चाय की चुस्कियां ले रहे थे। बीच-बीच में नज़रें मिलती तो रीना मुस्कुरा उठती। सलिल पर जादू सा छा रहा था। अचानक निकट बैठे सलिल ने एकाएक उठ कर रीना का चांद-सा चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर चूम लिया। शायद रीना इसके लिए तैयार न थी। उसने सलिल की इस हरकत का हल्का-सा प्रतिरोध किया। उसका चेहरा छुई-मुई की भांति एकदम मुरझा गया। सलिल ने अपनी इस हरकत की नाराज़गी स्पष्ट तौर पर रीना के चेहरे पर पढ़ ली थी।

दोनों ऑफ़िस पहुंचे। बिना कुछ बोले रीना अपनी सीट की ओर बढ़ गई। सलिल भी चुपचाप अपने केबिन में जा बैठा। कुछ मिनट बाद केबिन का दरवाज़ा खुला। सुषमा ने आकर रीना की आधे दिन की छुट्टी की अर्ज़ी सलिल की मेज़ पर रखी तो सलिल एकदम सदमे में आ गया था।

“क्यों रीना छुट्टी दे गई?”

“हां सर कह रही थी, उसकी सेहत फिर ख़राब हो गई हैै।”

“अच्छा कोई बात नहीं।” सुषमा के जाने के बाद सलिल के दिलो-दिमाग़ में हथौड़े बजने लगे थे। रीना नाराज़ होकर चली गई है। यह उसने क्या किया। वह अपने आप को क्यों रोक नहीं पाया। रीना के मन को उसने ठेस पहुंचा दी है। अगर उस ने अपने घरवालों को यह सब बता दिया तो, कल उसके घर वाले ऑफ़िस में आ धमकेंगे और सारे स्टाफ़ के सामने उसकी बेइज्ज़ती कर देंगे। वह बदनाम हो जाएगा। किसी को मुंह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहेगा। हो सकता है विभाग में रिपोर्ट कर दें। फिर तो उसे ट्रांसफर करानी पड़ सकती है। उसकी सारी फ़ैमिली अपसैट हो जाएगी, ऐसी आशंकाओं में डूबा वह परेशान-सा हो उठा।

फिर लगातार पूरा एक सप्ताह छुट्टी पर रहने के बाद रीना ऑफ़िस आई। पहले से कहीं अधिक उदास, गुमसुम, सभी को आकर्षित कर लेने वाली मुस्कुराहट ग़ायब। आंखों में चंचलता के स्थान पर डर और सहम के बादल छाए हुए थे। चुपचाप अपना काम करती।

सलिल के केबिन में स्वयं न जाकर चपड़ासी से काम चलाती। सलिल से आमना-सामना होने पर नज़रें झुका कर निकल जाती। सलिल को बॉस होने के नाते झूठे ही सही, विश भी न करती। सलिल मन-मसोस कर रह जाता। रीना का यह व्यवहार औरों का तो पता नहीं कम से कम सलिल के लिए एकदम असहनीय था। सलिल हर समय अपराध बोध से बुझा-बुझा रहता। घर आकर भी वह अख़बार, पुस्तक या टी.वी. आदि देख कर मन लगाने की कोशिश करता। ऑफ़िस में भी गंभीर और खोया-खोया-सा रहता।

एक दिन केबिन में जाते समय उस का सामना रीना से हो गया। आंखें झुकाए निकट से गुज़रती रीना को उसने धीरे से कहा, “रीना, प्लीज़ ज़रा केबिन में आकर मेरी बात सुनना।” सुन कर रीना पल भर को ठिठकी और कोई उत्तर दिये बिना अपनी सीट की ओर बढ़ गयी। सलिल केबिन में आ कर बैठ गया और आदत मुताबिक़ दायीं टांग ज़ोर-ज़ोर से हिलाते हुए सोचने लगा कि उसने व्यर्थ ही कहा है, वह नहीं आएगी। वह मेज़ पर रखी फ़ाइलें पलट ही रहा था कि केबिन का दरवाज़ा खुला। सामने रीना खड़ी थी। “आओ रीना- वैल कम आओ बैठो…..।” सलिल ने स्वयं खड़े होकर, यह भूल कर कि रीना उसकी मातहत है, वी. आई. पी. ट्रीटमेंट दिया। रीना उस के सामने वाली कुर्सी पर सिकुड़ कर बैठ गई। बिना नज़रें मिलाए, सिर झुकाए सलिल ने धीरे से कहना शुरू किया, “रीना दरअसल पता नहीं क्यों मैं उस दिन अपने आप पर कन्ट्रोल न कर सका, तुम मुझे अच्छी और प्यारी लगी कि मैं बेखुदी में ही तुम्हारे क़रीब आ गया कई बार इंसान को समझने में ग़लती लग जाती है रीना। मैं तुम्हारी मुस्कुराहटों का दूसरा अर्थ ही निकाल बैठा। तुम्हारे आकर्षण ने मुझे अंधा ही कर दिया था। इस लिए मैं तुमसे उस दिन की गुस्ताख़ी के लिए मुआफ़ी मांगता हूं…….।” यह सुन कर रीना नज़रें झुकाए ख़ामोश बैठी रही। सलिल उस के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था कि वह बिना कुछ बोले उठ कर चली गई। सलिल में उसे रोकने तक की हिम्मत न थी।

दूसरे दिन सलिल ऑफ़िस में अकेला बैठा था। रीना ने हाथ में एक काग़ज़ लिए केबिन में प्रवेश किया। सलिल ने ज़बरदस्ती चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर रीना का स्वागत किया। रीना ने वह काग़ज़ सलिल की ओर बढ़ा दिया। काग़ज़ की इबारत पढ़ते ही सलिल के पांव के तले की ज़मीन खिसकने लगी। उसने कांपती-सी आवाज़ में कहा, “रीना तुम मेरे कारण इतनी डरी-सहमी और मन पर बोझ लिए रहती हो, इस लिए मुझे ही यहां से ट्रांसफर करा कर कहीं दूर चले जाना चाहिए, मेरे क़सूर की सज़ा तुम क्यों उठाओगी।” सलिल ने रीना द्वारा अपनी बदली हेतु दिये प्रार्थना पत्र को वापिस लौटाते हुए कहा।

“नहीं सर इसे रख लीजिए।” रीना ने आग्रह किया।

“इस का अर्थ यह हुआ कि तुमने अभी मुझे मुआफ़ नहीं किया है न?”

सलिल के स्वर में नम्रता का पुट था।

“माफ़ करने वाली कोई बात नहीं है सर, दरअसल.. मेरी जिनसे सगाई हुई है न, वे ज़ोर डाल रहे हैं कि मैं शादी से पहले ही उन के शहर में बदली करा लूं।” रीना जीवनदायिनी मुस्कुराहट बिखेर कर केबिन से बाहर चली गयी।

“धत तेरे की” कहते हुए सलिल एकाएक तनाव रहित हो गया।

 

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