योग्य बेटी के पांव की बेड़ियां न बनें

                  

    -सुमन कुमारी

लड़कियां अपनी प्रतिभा से जब मां-बाप का नाम रौशन करती हैं, समाज में उनकी पहचान बनाती हैं, तो उनका सर गर्व से ऊंचा हो जाता है। परन्तु कुछ बेटियां ऐसी भी हैं जो मां-बाप के बनाए हुए दायरे से बाहर ही नहीं आ पातीं और न जाने कितनी प्रतिभाएं आगे बढ़ने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। लड़का जैसे मर्ज़ी काम करे चाहे पढ़ाई न भी करे फिर भी उसके वंशज होने के कारण, उस पर भरोसा किया जाता है। लेकिन लड़की जो आमतौर पर मां-बाप को लड़के से ज़्यादा प्यार देती है उनका सिर ऊंचा रखने का प्रयत्न करती है, फिर भी कहीं न कहीं उसकी अवहेलना कर दी जाती है। समाज में अच्छे ढंग से रहने और काम करने का सलीक़ा औरतों में बेहद प्रभावशाली है जिस के कारण वे पुरुषों से आगे निकलती जा रही हैं। औरत जिसे देवी का दर्जा दिया जाता रहा है और उसने साबित भी किया है कि उसके बारे में कहे जाने वाले देवी जैसे शब्द बिलकुल उचित हैं। घर का काम करने वाली औरतें चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी हों पुरुषों द्वारा अपमानित की जाती हैं, यह बात तो सब जानते हैं। दुःख की बात यह है कि प्रोफ़ेशनल औरतें व बेटियां भी इस मानसिक प्रताड़ना से वंचित नहीं हैं। कहीं न कहीं उनको औरत होने का एहसास करवाया ही जाता है। समाज में चाहे औरत का जितना भी योगदान हो उसे भुला दिया जाता है। आज की औरत घर तक सीमित नहीं है। ऊंचाइयों को छूने के बावजूद वो अभी भी संघर्षरत दिखाई देती है। ऐसा लगता है जैसे भारतीय महिलाओं में अच्छी गुणवत्ता होने के बावजूद उन्हें अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना है जो कि बहुत कठिन है। इस सफ़र में न जाने उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़े।

जो युवा लड़कियां मां-बाप की कही हर बात को पूरा करती हैं, उन्हें अपने जीवन की हर सच्चाई से अवगत रखती हैं वे भी कभी न कभी शक के घेरे में आ जाती हैं। यही औरत की सबसे बड़ी हार है। वो समाज में जितनी भी पहचान स्थापित कर ले फिर भी वो औरत है, बेटी है इसका उसको कर्ज़ चुकाना पड़ता है और न जाने कितनी प्रतिभाएं इस मानसिक प्रताड़ना के चलते, अपने सफ़र को अधूरा छोड़ देती हैं। औरत होना उन्हें एक जुर्म लगने लगता है, मानों उनका जीवन सिमट कर रह गया हो। समाज में अच्छी इमेज बनाने वाली लड़कियां अपने ही सगे-संबंधियों द्वारा मानसिक यातना का शिकार होती हैं।

ज़रूरत है औरत को समझने की। बेटियों पर भरोसा करने की। मां-बाप व पति के हौसले से ही तो वे समाज में विचरती हैं, काम करती हैं। फिर आख़िर इनके द्वारा ही परेशान भी की जाती हैं। हमारे समाज में ऐसी कई लड़कियां हैं जो अपने अंदर न जाने कितनी प्रतिभा छिपाए बैठी हैं। लेकिन मां-बाप द्वारा बनाया गया दायरा उनके पांव की बेड़ियां बन गया है। वह अपने जीवन में सफलता की बुलंदियों को कभी छू ही नहीं पाती। ऐसी ही औरतें मानसिक रूप से परेशान रहती हैं। उनका व्यवहार अपने आस-पास के लोगों के साथ बिगड़ने लगता है। आसमान की ऊंचाइयों को छूने की चाह लिए औरत अंदर ही अंदर घुट-घुट कर दम तोड़ देती है। समाज को इसकी ख़बर भी नहीं होती। औरत को जन्म से पराया धन माना जाता है। हालांकि मां-बाप द्वारा भरपूर प्यार भी मिलता है और वो भी बदले में मां-बाप को ढेर सारा सम्मान दिलाती है। आमतौर पर वो लड़कों की तरह बड़ी-बड़ी मांग भी नहीं करती। बेटे की ख्वाहिशें तो जल्द पूरी हो जाती हैं लेकिन बेटी सब कुछ हंस कर बर्दाशत कर लेती है। लड़कों से हर क्षेत्र में आगे रहती हैं। मां-बाप की नज़र से उसकी प्रतिभा छिपी नहीं होती परन्तु फिर भी शायद उस पर भरोसा नहीं किया जाता। ममता की मूर्ति ये देवी आख़िर क्यों ऐसी यातना की शिकार हो जाती है इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। यह तो हमारे समाज में फैला हुआ अंधकार है जो औरत को समझने, पहचानने में असमर्थ है। तभी तो कहा जाता है कि औरत को समझ पाना सबके वश की बात नहीं। हमारे समाज ने कामकाजी औरतों को भी नहीं बख़्शा है। उन्हें भी एक सीमा में रह कर अपना कार्य करना होता है। ऐसा कहा जाना उचित है कि पुरुष प्रधान समाज में आज भी औरतें वो मुक़ाम हासिल नहीं कर पाई हैं जो उन्हें मिलना चाहिए।

घर-परिवार वालों के द्वारा लड़कियों के आस-पास सीमाएं निर्धारित करने से तथा अन्य सगे-संबंधियों द्वारा दी जाने वाली मानसिक यातना के कारण न जाने कितनी लड़कियां प्रोफ़ेशनल बन ही नहीं पातीं जो बन जाती हैं उनका उनके अपनों द्वारा जीवन दूभर कर दिया जाता है।

आज मां-बाप जब लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होने का मौक़ा दे रहे हैं तो उन्हें यह भी चाहिए कि उन्हें लड़कों की तरह पालें-पोसें, प्यार करें तथा औरत के अधिकार को समझें। उन्हें समाज में अपनी पहचान बनाने का अवसर दें।

यह सही है कि आज जिस तेज़ी से समाज में परिवर्तन हो रहे हैं उसके कारण बच्चों के बारे में ख़ास तौर पर लड़कियों के बारे में चिंतित रहना स्वाभाविक ही है। हमारा फ़र्ज़ है कि हम बच्चों को नैतिक-अनैतिक बातों का सही ज्ञान दे कर समाज में कार्य करते हुए सही दिशा में बढ़ने के लिए समय-असमय समझाते रहें। उनको मुश्किल पड़ने पर रक्षात्मक क़दम उठाने के बारे में समझाना चाहिए। लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि उस पर अविश्वास करके उसकी प्रतिभा को दबा दिया जाए। बल्कि उसको विश्वास में लेकर यह समझाना चाहिए कि वह अपने आस-पास के किसी व्यक्ति द्वारा ग़लत हरकत होने पर या किसी क़िस्म का ग़लत संकेत होने पर फ़ौरन् इससे अवगत कराए ताकि वक़्त रहते ही सही क़दम उठाए जा सकें। इस प्रकार मां-बाप और बेटी का विश्वास एक-दूसरे पर बन सके और वो हर मुश्किल से आपको अवगत करा सके।

औरतों पर अत्याचार में इस ‘शक’ जैसे अत्याचार का हमेशा के लिए विनाश करें। अपनी सोच को बदलें और अपने बच्चों में नए गुणों का, नई बातों का संचार करें। लड़कों को लड़कियों के प्रति स्नेह, आदर व प्यार की भावना सिखाएं। तभी आगे चल कर औरत पर अत्याचार ख़त्म हो सकेगा। औरत को मानसिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जाएगा। जब मां-बाप का बनाया हुआ ऐसा वातावरण औरत के रूप, उसके गुणों से सबको अवगत कराएगा तब ही वह अपने जीवन में अपार सुख हासिल कर सकती है, प्रोफ़ेशनल बन सकती है।

ऐसी सोच, प्यार व हौसला अगर हर किसी में आ जाता है तो वो दिन दूर नहीं होगा जब हर बेटी क़ामयाबी की बुलंदियों को छू लेगी।      

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*