डूबता मस्तूल

-डॉ. शीतांशु भारद्वाज

कभी मैंने हाई स्कूल की कक्षाओं में “कैसा बियंका” शीर्षक की अंग्रेज़ी कविता पढ़ी थी। उसमें एक बहादुर बालक की साहसपूर्ण एवं दर्दीली दास्तान थी। समुद्री जहाज़ डूब रहा है। उसका मस्तूल भी डूबता जा रहा है। स्वयं वह बालक गले-गले तक पानी में डूब चला है। फिर भी, वह अपने पिता को पुकारता रहता है, पिताजी, क्या मैं यहीं डटा रहूं?

मेरा जहाज़ भी तो बीच समुद्र में डूबता ही जा रहा है। मेरा बड़ा पुत्र, पुत्री हमसे कट कर अमेरिका में हैं। छोटा पुत्र भी तो वहीं जाने को मचल रहा है। ऐसे में मेरी समझ में नहीं आ पा रहा है कि मैं क्या करूं? कभी क्या सोचा था, अब क्या हो रहा है? शायद हर मां-बाप की यही त्रासदी है।

आज मुझे रह-रह कर ताऊजी की नसीहतें याद आ रही हैं। अब वे इस दुनियां में नहीं रहे। किंतु उनके उपदेश जब तब मेरे कानों की घाटियों में गूंजते ही रहते हैं।

‘देख बेटे!’ ताऊजी ने कभी मुझे कर्म फल पर पूरा व्याख्यान ही दे डाला था, ‘तू जो कुछ भी कर रहा है, उसका फल तुझे भोगना ही होगा। तूने कभी गाय की बछिया देखी है। हज़ारों गायों के बीच भी वह सीधी अपनी मां के पास ही जाया करती है। ठीक इसी प्रकार हमारे कर्म हमारा पीछा किया करते हैं।’

‘आप तो जातीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, ताऊ जी। जवानी के जोश में मैं अपने ही ढंग से तर्क देने लगा था, आज मेरे बापू होते तो…।’

‘तभी तो! ताऊजी ने मेरी बात बीच में काट दी थी, आज सरदारा होता तो तेरी ये हिमाक़त ही न होती। बाप के न होने पर ही तुझे पंख लगे हैं।’

‘कुछ भी हो ताऊजी। मैंने अपना वही निश्चय दोहरा दिया था, जाति-पाति से ऊंचा उठ कर मैं शांता से ही विवाह करूंगा। हम दोनों ही तो एक दूसरे को चाहते रहे हैं।’

‘चाहने और झेलने में अंतर हुआ करता है, मामचंद। ताऊजी मुझे प्यार से समझाने लगे थे, मेरी मान तो अपनी ही बिरादरी में किसी कन्या को पसंद कर ले। हमारे यहां छोरियों की कमी नहीं है।’

मैंने किसी की भी तो नहीं सुनी थी। सारे परिवार को मेरी इच्छा के आगे घुटने टेकने पड़े थे। शांता मेरे ही ऑफ़िस में काम किया करती थी। विवाह के बाद हम सेक्टर पांच में किराये के मकान में रहने लगे थे। धीरे-धीरे मैं अपनी संस्कृति से कटने लगा। मैंने गांव-जवार जाना भी छोड़ दिया था। दिन, महीने और वर्ष-पर-वर्ष बीतते गए। पियूष के आने पर मेरी अकाउंट्स अफ़सर के रूप में तरक्क़ी हो आई थी। हमारे यहां प्रियंका और प्रदीप भी आ गए। हम हर प्रकार से खुशहाली की ओर बढ़ते गए। पियूष एम.बी.बी.एस. करने लगा था। प्रियंका ने बी.ए., बी.एड. किया तो प्रदीप बेटे ने भी इंजीनियरिंग में प्रवेश ले लिया था।

‘क्यों जी।’ एक दिन शांता ने कहा था, ‘हम लोग लक्की है न। रिटायरमेंट से पहले ही हम बाल-बच्चों की ओर से फ़ारिग हो लेंगे।’

‘ठीक कहती हो।’ मैंने भी उसी का समर्थन कर दिया था, ‘बुढ़ापे में हम लोग चैन की बंसी बजाया करेंगे। खूब तीर्थ-यात्रायें किया करेंगे।’

अानुवंशिकता सदा से ही नई पीढ़ी को प्रभावित करती रही है। एम.बी.बी.एस. कर रहे पियूष की नन्हीं-नन्हीं मूंछें उग आई थी। मैं बेटे में अपना ही रूप देखा करता। एक दिन शांता बोली थी, ‘अब तो अपना पियूष भी जवान हो आया है।’

‘हां तो’, मैं मुस्कुरा दिया था, ‘उसे कहीं जॉब पर लगने दो। फिर अपने यहां रिश्ते ही रिश्ते आने लगेंगे। वह भी एक से बढ़ कर एक आया करेंगे।’

उस दिन चाय पीता हुआ मैं सुबह का अख़बार देखता आ रहा था। मेरी नज़रें एक मोटे विज्ञापन पर अटक गई थी। वह समुद्र पार का विज्ञापन था। किन्हीं कुलदीप मान ने अपनी बेटी का वैवाहिक विज्ञापन दिया था। झट से मैंने उन्हें अपने बेटे का प्रस्ताव लिख भेजा था एक-दो महीने पत्राचार में ही निकल गए। एक दिन मैंने बेटे का मन टटोला था, ‘क्यों रे पियूष! तुझे लड़की पसंद तो है न?’

‘हां, पापा।’ वह मुस्कुरा दिया था।

‘लेकिन पराई जात, पराया देश…।’ मैं सिर खुजलाने लगा था।

‘छोड़िए भी पापा! पियूष ने कंधे उचका कर कहा था, अापने भी तो अंतर्जातीय विवाह किया था न!’

‘लेकिन मैंने अपने ही देश में किया।’ मेरा तर्क था, ‘वह कन्या तो सात समुद्र पार रह रही है।’

‘ओ नो पापा।’ मेरा बेटा हाथ हिलाने लगा था, ‘आज की दुनियां बहुत ही सिमट गई है। अब ऐसे में…।’

‘ठीक है।’ मैंं उससे सहमत हो आया था, ‘वे लोग पंद्रह-बीस दिन के लिए भारत आ रहे हैं। विवाह के बाद तुझे उन्हीं के साथ अमेरिका चल देना होगा। उन्होंने वहां तेरे लिए किसी अस्पताल में जॉब भी ढूंढ़ लिया है।’

‘ठीक है, पापा।’ वह उस विवाह के लिए राज़ी हो आया था।

विवाह के दो-चार दिन बाद पियूष मान परिवार के साथ अमेरिका चल दिया था। सचमुच ही वहां उसे एक अस्पताल में जॉब मिल गया था। सप्ताह में दो बार वह हमें फ़ोन कर दिया करता था।

‘दिन बीतते गए। बड़े बेटे की खुशहाली सारे परिवार को ही प्रभावित करने लगी। प्रियंका बेटी भी दिन-दोपहरी के सपने देखने लगी थी। वह भी तो स्टेट जाने के लिए मचलने लगी थी। एक दिन शांता उसे समझाने लगी थी, ‘देख बेटी! हिंदी में एक कहावत है न कि दूर के ढोल सुहावने लगते हैं।’ ‘ऐसी बात नहीं है, मां,’ वह अपनी ही गाए जा रही थी, ‘विदेश में तो लोग दो ही दिन में मालामाल हो जाते हैं। भाई भी तो वहीं हैं।’

बेटे के बाद बेटी भी हमसे कटने को आतुर थी। वह पारिवारिक बिखराव मुझे बुरी तरह से उद्वेलित करने लगा था। एक दिन मैं इन्हीं सोच-विचारों में डूबा हुआ था कि तभी शांता का हाथ मेरे कंधे पर आ लगा था ‘क्या सोच रहे हैं?’

‘लगता है, मेरे कर्म मेरा पीछा करने लगे हैं। मैंने सर्द आह भरी थी, तभी तो मेरी संतान एक-एक कर प्रदेश की ओर उड़ रही है।’

उधर, पियूष जब अमेरिका पहुंचा तो वहां का भौतिक संसार उसे चमत्कृत करने लगा। वहां वह विलासिता के ताल में गोते लगाया करता। मान ने वहां बहुत सारी संपत्ति अर्जित की हुई थी। उनका कोई बेटा न था। उस संपत्ति की एकमात्र उत्तराधिकारी उनकी बेटी अमला ही थी।

सभी तो अपनी-अपनी दुनियां में रमते रहे। सरकारी सेवा से मुक्त होने के बाद मैंने मोहाली में बंगला बना लिया। प्रियंका का विवाह भी मैंने अमेरिका में अपनी ही जाति में कर दिया। छोटा पुत्र प्रदीप चंडीगढ़ की एक अंडरटेकिंग में जूनियर इंजीनियर के पद पर लग गया।

पिछले वर्ष पियूष अकेला ही भारत चला आया था। वह थका हुआ और उदास लग रहा था। शांता ने पूछा था, ‘क्यों रे, बहू को भी साथ ले आता!’

‘अमला यहां का नाम भी नहीं लेना चाहती।’ वह सिर खुजलाने लगा था, ‘कहती है मेरा वहां से क्या संबंध?’

‘ऐसा ही होता है, बेटे!’ मैं हाथ मलने लगा था ‘धनुष से छुटा हुआ तीर वापिस नहीं आता।’

‘आप ठीक कहते हैं पापा।’ उसने कहा था, ‘मुझे रह-रह कर यहां की याद आया करती है। मैं अपने देश को नहीं भुला पा रहा हूं।’

‘तो यहीं चले आ न,’ शांता बोल पड़ी थी।

‘यही तो रोना है, मां।’ उसका स्वर रुआंसा ही हो आया था, ‘अब तो मैं न घर का रहा न ही घाट का।’

‘ऐसी क्या बात हो आई?’ मैंने चौंक कर पूछा था।

‘मैं तो वहां घर जवाई बन क़ैद हो आया हूं।’ वह बताने लगा था, ‘अब तो वहां मेरे दो बच्चे भी हैं।’

‘अरे!’ मुझे धरती घूमती हुई प्रतीत होने लगी थी, ‘यह कैसे हो सकता है।’

‘यही सब हुआ है, पापा।’ उसने बताया था, ‘वह बूढ़ा बहुत ही धूर्त है। उसने मुझे वहां घर जवाई रखने के लिए ही तो बुलवाया था।’

‘तेरा व्यवसाय कैसा चल रहा है?’ शांता ने पूछा था।

‘व्यवसाय तो चांदी बरसा रहा है।’ उसने उदास स्वर में बतलाया था, ‘पर धन-दौलत से क्या होता है? वहां तो लोग रुपये के लिए जीते हैं।’

‘हूं।’ मैं इतना ही कह पाया था। मैंने उससे पूछा था, ‘मान के क्या हालचाल हैं?’

‘वह तो निन्यानवें के फेर में पड़ा रहता है।’ वह सिर खुजलाने लगा था, ‘मेरी उससे ज़रा भी तो नहीं पटती।’

‘तू तो अलग रह रहा होगा।’ शांता ने पूछा था, ‘है न?’

‘हां, मां।’ उसने कहा था, ‘वहां मैंने अपना फ्लैट ख़रीद लिया है। मेरा क्लीनिक भी अच्छा चल रहा है। अमला उसी नौकरी को करती है। वहां मैं हर प्रकार से सुखी हूं। पर…।’

पुत्र का वह ‘पर’ शब्द मुझे बुरी तरह से सताने लगा था। मुझे अपने कभी लिए गए निर्णय पर मलाल होने लगा था। मैं उसे समझाने लगा था, ‘कोई नहीं, बेटे! बहादुरी का जीवन जी।’

‘मैं कैसे बहादुर बनूं, पापा?’ उसने कहा था, ‘मेरा तो उस पराये देश में दम ही घुटता रहता है।’

‘क्या बहू यहां नहीं आ सकती?’ शांता ने पूछा था।

‘बताया न कि उसका इस देश से कोई लगाव नहीं है।’ पियूष बोला था, ‘वो वहीं की संस्कृति में रंगी हुई है। वहीं के गुण गाती फिरती है।’

‘क्यों जी!’ परसों शांता ने मुझे कहा था, ‘बड़े से कह कर छोटे को भी वहीं क्यों नहीं भेज देते?’

‘पगला गई है क्या?’ मैं पत्नी को घूरने लगा था, ‘दो बच्चे पहले ही हाथ से निकल गए हैं। अब उसे भी उड़ाना चाहती हो?’

‘लेकिन वह तो वहीं जाने की ज़िद्द करता जा रहा है।’

‘अभी उसे ऊंच-नीच का पता नहीं है।’ मैं पत्नी से कहने लगा था, ‘उसे समझाया-बुझाया भी तो जा सकता है न!’

‘पोस्टमैन!’ डाकिया दरवाज़े के नीचे लिफ़ाफ़ा खिसका गया।

‘पियूष की लंबी उम्र है।’ शांता उस पत्र को उठा लेती है, ‘शायद उसी का पत्र है।’

मैं बेटे का पत्र पढ़ने लगता हूं।

‘पापा, मैंने बहुत सोच-विचार के बाद निर्णय लिया है कि मैं यहां सब कुछ छोड़छाड़ कर अपने देश आ जाऊं अमला तो यहीं के रंग में रंगी हुई है। मैं अपने बच्चों के लिए लाखों डॉलर जमा कर चुका हूं। उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए वह धन-दौलत बहुत होगी।’

‘आप इस पर सोच कर मुझे राय दीजिए। क्या मैं अमला को तलाक़ देकर भारत आ जाऊं! पियूष।’

‘क्यों?’ शांता मुझे देखने लगी।

मेरे कर्म बराबर मेरा पीछा करते आ रहे हैं। मुझे ताऊ जी की नसीहतें याद आने लगीं, वो हमें डुबो कर ही रहेंगे।

‘तो पियूष यहां आ जाएगा?’

‘उसे दिल पर पत्थर रख कर आना ही पड़ेगा।’ मैं सिर धुन कर रह जाता हूं।

‘पापा! पापा!’ मेरा छोटा पुत्र उछलता-कूदता हुआ अंदर आता है।

मैं उसे प्रश्नसूचक दृष्टि से देखता हूं। वह कंधे उचका कर कहता है, ‘मेरा इंटरव्यू बहुत बढ़िया रहा।’

‘कैसा इंटरव्यू? कहां का इंटरव्यू?’ मैं चौंक पड़ता हूं।

‘मैं कनाडा की एम्बेसी में इंटरव्यू देकर आ रहा हूं।’ वह कहता है, ‘अब जल्द ही मैं भाई के देश चल दूंगा।’

‘छोड़ भी, बेटे!’ शांता का हाथ उसके कंधे पर जा लगता है, ‘भाई तो वहां से उठकर खुद ही यहीं आ रहा है। और तू है कि…।’

‘क्या?’ वह चौंक पड़ता है।

इस पर मैं उसे पियूष का पत्र थमा देता हूं। उसे पढ़ कर वह मुंह बिचकाता है, ‘ओह पापा! आप भी कितने बुज़दिल हैं। जहाज़ डूब रहा है। उसका कप्तान भी डूबता जा रहा हो। ऐसे में उसे बुज़दिल ही तो कहा जाएगा।’ मेरा अपना जाया ही मुझे डरपोक कह रहा है। आप क्या कहेंगे?

‘आप कुछ भी कहिए, साहब!’ मेरा छोटा पुत्र तो विदेश जाने के लिए मेरे पीछे हाथ धोकर ही पड़ा हुआ है। न जाने कब से वह वहां जाने का मन बना चुका है। फ़ोन की घंटी बजती है। लपक कर मैं उसे उठा लेता हूं, ‘हैलो।’

‘पापा, मैं पियूष बोल रहा हूं।’ उधर मेरा बड़ा पुत्र है। ‘बोल, बेटे!’

‘आपने क्या निर्णय लिया?’ वह पूछता है।

‘किस बात का?’

‘क्या मैं अमला को तलाक़ दे दूं?’ वह पूछता है।

मेरी बुद्धि चकरा जाती है। मेरा संस्कारी मन उस विस्फोटक शब्द को नहीं पचा पाता। मैं कहता हूं, ‘इतनी जल्दबाज़ी न करो, बेटे! जो भी काम करो, उसे बहुत ही सोच समझ कर किया करो।’

‘ठीक है, पापा।’ वह कहता है, ‘मैं कल सुबह की उड़ान से भारत आ रहा हूं। बाक़ी बातें वहीं होंगी।’ पियूष का फ़ोन कट जाता है। ‘शांता मुझे प्रश्न सूचक दृष्टि से देखती है। मैं गहरी सांस खींच कर कहता हूं, ‘पियूष आ रहा है।’

छोटा पुत्र मेरे पास आकर कहता है, ‘पापा, मेरा पासपोर्ट, वीज़ा सब कुछ बन गया है। मुझे वहां जॉब भी मिल गया है। फिर आप लोग मेरे जाने में रुकावट क्यों डाल रहे हैं?’

‘देख बेटे!’ शांता उसे प्यार से समझाने लगती है, ‘एक-एक कर तुम लोग घौंसले से उड़ते ही जा रहे हो। हमें क्या यह सब अच्छा लगेगा?’

‘मैं तो वहां केवल तीन वर्ष के अनुबंध पर ही जा रहा हूं।’ वह कहता है, ‘उसके बाद मुझे यहीं तो आना है।’

‘ठीक है।’ मैं कहता हूं’, ‘कल तेरा बड़ा भाई आ रहा है। दोनों भाई मिल-बैठ कर कोई निर्णय ले लेना।’

हम लोग भी कितने भ्रम में होते हैं। सभी तो इस संसार से मोह-माया पाले हुए हैं। रिश्तों के जाल फैलते रहते हैं किंतु वास्तविकता तो यह है कि कोई किसी का नहीं होता। जो भी होते हैं, वे सभी स्वार्थ की डोरी से बंधे रहते हैं। केवल मां-बाप ही ऐसे होते हैं जिनका अपनी संतान के साथ कोख का रिश्ता होता है। लेकिन बचकानी उम्र के बच्चे उसे क्या समझेंगे।

पियूष आ गया है। उसकी कुशल-क्षेम पूछने के बाद हम उसे छोटे भाई की मंशा बतला देते हैं।

मेरे विचार से छोटू का वहां जाना ठीक न होगा। पियूष किसी बुज़ुर्ग की भांति कहता है, वहां का जीवन तो चार दिन की चांदनी ही हुआ करता है।

‘बहू-बेटे तो ठीक हैं न?’ शांता पूछती है।

‘हां, मां।’ वह बताता है, ‘मैंने अमला को तलाक़ देने का मन बना लिया है।’

‘अरे!’ मैं स्तब्ध रह जाता हूं। अगले ही क्षण होंठों पर जीभ फिरा कर मैं कहता हूं, ‘क्या मूर्खता कर रहा है।’

‘मैं भी क्या करूं, पापा!’ वह सिर खुजलाने लगता है, ‘ऐसी ज़िद्दी और अशिष्ट लड़की मैंने कहीं नहीं देखी।’

‘फिर तेरे बच्चों का क्या होगा?’ शांता पूछती है।

‘मैंने उनके लिए ढेर सारी संपत्ति जमा की हुई है।’ वह कहता है, ‘वे वहीं रह लेंगे।’

‘और अमला?’

‘उसका क्या है!’ पियूष कहता है, ‘वह दूसरी शादी कर लेगी। वहां तो लोग अपने जीवन साथी को अपने कपड़ों की तरह से बदला करते हैं।’

‘पापा, मैं तो विदेश जाकर ही रहूंगा।’ मेरा छोटा-पुत्र वही रट लगाने लगता है।

‘मान भी जा न भाई!’ पियूष उसे सस्नेह समझाने लगता है, ‘मेरी मान तो यहीं रह। मैं भी तो सब कुछ छोड़ कर यहीं आ रहा हूं।’

पियूष को यहां आए हुए दो दिन हो आए हैं। तलाक़ के बारे में वह मेरा माथा ही चाटता आ रहा है। मैं उसे कुछ भी तो राय नहीं दे पा रहा हूं। मेरा संस्कारी मन इसकी स्वीकृति नहीं दे पाता। उधर, छोटा पुत्र भी वहीं जाने की ज़िद्द कर रहा है। वैसे भी, जाने वालों को कौन रोक पाया? एक दिन वह भी फुर्र-से उड़ जाएगा। पियूष क्या करेगा, यह वही जाने। मुझे लगता है, जहाज़ के डूब जाने के बाद अब उसका मस्तूल भी डूब कर ही रहेगा।

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