जब सिर पर मौत खड़ी हो

जगते ने तेजे के कन्धे पर धौल जमाई फिर अंधेरे में ही बोला, ‘हां, तो क्या कहा था उस लड़की ने जिसके साथ तेरा रिश्ता होते-होते बीच में ही रह गया था।’

‘छोड़ो यार! जाने दो किसकी बात लेकर बैठ गए।’ तेजा इस विषय पर बात करने के मूड में नहीं था पर जगता कहां छोड़ने वाला था। झट से बोल पड़ा- ‘कंजरा, कर ले बात जो भी करनी है, कहीं यारों के साथ बातें सांझी करने में भी फाडी न रह जाओ।’

‘माथे पर लिखियों को कौन मिटा पाया है, यार? उम्र भर कितनी ही बार ज़िंदगी के खूबसूरत खेल खेलने के लिए, मित्रों-बेलियों के हाथ पकड़ कर पुगने की कोशिश की, पर कहां! सभी पुग जाते और मैं फाडी का फाडी (अंतिम का अंतिम)।’ तेजा उदास-सा हो गया।

‘उदास काहे होता है, बीबेया! जगता भी यारों का यार है। मुंह में पूरे बत्तीस दांत हैं।’ मेरी बेबे कहा करती है- ‘जगतु पुत्तर, जिसके मुंह में बत्तीस दांत होते हैं, उसके मुंह से निकली कोई भी बात सच हो जाती है।’

‘अच्छा!’- तेजे ने हैरानी के साथ पूछा- ‘तू सच कहता है?’ 

‘लो! तुम्हारे साथ झूठ बोल कर मैंने कौन सी जायदाद बांटनी है। आज़माई हुई बात है- नहीं यक़ीन तो तुम भी आज़मा लेना। आज मैं तुझे अपने इस बत्तीस दांत वाले मुंह के साथ कहता हूं कि आज के बाद तुम जब भी पुगोगे, पहले ही रहोगे, अंतिम नहीं।’

ख़ंदक के बाहर कीचड़ में आवाज़ हुई, जगते ने ख़ंदक के मुंह के पास जाकर दबी आवाज़ में पूछा, ‘सब ठीक तो है संतेया?’

संता जो बाहर ड्यूटि दे रहा था, बोला- ‘सब ठीक है जनाब! कोई जंगली जानवर था।’

जवाब सुन कर ख़ंदक में बैठे तीनों सिपाही निश्चिंत हो गए। पिछले ग्यारह दिनों से जंग छिड़ी हुई है। इन ग्यारह दिनों की जंग के दौरान उन्होंने जिनको अपनी गोली का निशाना बनाया था, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। लेकिन उन्हें क्यों निशाना बनाया था, वे यह अवश्य जानते थे।

पिछले दो दिनों से पानी बरस रहा था। जिसके कारण ख़ंदक के आस-पास दलदल सा जकड़ू कीचड़ बना पड़ा है। गड्ढे सारे बरसात के पानी से भर गए हैं। गणेशन समेत ख़ंदक में तीन सिपाही हैं। चौथा संता सिंह बाहर पहरा दे रहा है। बाक़ी सभी साथी मारे जा चुके हैं। मोर्चे के हालात के बारे में ख़बर पीछे हेड क्वार्टर तक पहुंचा दी गई है पर अभी तक पीछे से मदद के लिए फ़ौजी टुकड़ी नहीं पहुंची है।

बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। पानी बार-बार ख़ंदक में दाख़िल हो जाता है। वे तीनों मिल कर हर बार पानी बाहर निकालते हैं और फिर बैठ कर थोड़ा सुस्ता लेते हैंं। चारों को बड़ी बेसब्री से मदद के लिए आ रही टुकड़ी का इंतज़ार है। असला भी अधिक नहीं बचा है। जिस कारण चारों को डर है कि अगर कहीं दुश्मन ने अचानक पूरी ताक़त के साथ हमला कर दिया तो उनके लिए चौकी को बचाना मुश्किल हो जाएगा।

गणेशन जो काफ़ी देर से चुपचाप एक कोने में धंसा पड़ा था और तेज़ा सिंह एवं जगत सिंह की बातें सुन रहा था। कोने से निकल कर उन दोनों के पास जा बैठा और बोला, ‘जगत भाई, वो तुम जो अभी बत्तीस दांत वाली बात तेजा को कह रहे थे, वो बात सही है क्या?’

‘सौ फीसदी ठीक है, बेलिया! एकदम सही। मैं तुम को एक बात बताता हूं गणेशन भाई, फ़ौज में भरती होने से पहले की बात है। मेरी मां मुझे काम करने के लिए कहीं दूर नहीं जाने देती थी। वो क्या था न यार, मेरा बाप नहीं था और ऊपर से मैं अपनी मां का अकेला बेटा था। वो तो मुझे अपनी चुन्नी में छुपा लेना चाहती थी। ‘चुन्नी’ समझते हो कि नहीं? … वो क्या कहते हैं, यार हिन्दी में …? साला याद ही नहीं आ रहा।’

साथ ही बैठे तेजे ने कहा- ‘आंचल’

‘हां, वही यानी कि गणेशन भाई, हमारी मां हमको अपने आंचल में छुपा लेना चाहती थी पर हमको आदतें पड़ी थी ख़राब, हम कहां रुकने वाले थे। हमने भी ग़ुस्से में एक दिन कह दिया, … भई देख बेबे, अगर तुमने हमको कहीं आने-जाने से रोका तो याद रखना कोई ऐसी नौकरी कर लेंगे कि छः-छः महीने हमारा मुंह नहीं देख सकोगी … और देख लो मित्रो बत्तीस दांतों वाले मुंह से निकली हुई बात थी, पूरे आठ महीने हो गए हैं मां से मिले हुए को।’ कहते हुए जगते का गला भर आया, आंखें भीग गईं। लम्बी सी सांस छोड़ते हुए बोला- ‘मां भी क्या चीज़ होती है, यार।’ कहते हुए उसने गणेशन का कंधा दबाया।

गणेशन का शरीर तपा पड़ा था। जगते ने हाथ हटा कर गणेशन के माथे पर फिर गले पर रख कर छुआ, ‘साले तेरे को तो बुख़ार चढ़ा हुआ है।’

‘जगत सिंह’ – गणेशन ने कहा- ‘एक रहस्य की बात बताऊं, मेरे मुंह में भी बत्तीस दांत हैं।’

‘लो- इसमें रहस्य वाली कौन सी बात है, मित्रा? वो तो सभी के होते हैं।’

‘नहीं, सबके नहीं होते।’ आवाज़ जैसे गणेशन के गले से नहीं बल्कि उदास गहरी गुफा से निकली हो।

इस बार जगते को गणेशन की आवाज़ में छिपी उदासी खटकी थी, बोला- ‘यार गणेशन, लगता है तुम हमसे कुछ छिपा रहे हो?’

गणेशन ने कुछ नहीं कहा। जगते ने फिर कहा- ‘देख यार, हम पंजाबी बहुत बड़े दिल के होते हैं, एकदम साफ़ दिल। कभी किसी गधी को भी नीचे ले लें तो यारों को बताने से नहीं संगते …। संगते … कहने का मतलब समझते हो? … नहीं शर्माते और तू साला लड़कियों की तरह चुप कर के बैठ गया है।’

‘नहीं-नहीं दोस्त, तुम ग़लत मत समझो। कोई ख़ास बताने वाली बात नहीं।’ गणेशन ने असली बात दबाकर कन्नी कतराने की कोशिश की।

‘तेरी मर्ज़ी भाई, न बता चाहे, पर इतना तो हम समझ ही गए हैं कि घर में किसी को उलट-पुलट बोल कर आए हो और अब पता चल गया है कि मुंह में बत्तीस दांत हैं, इसलिए डर रहे हो कि तुम्हारे मुंह से निकली हुई बात कहीं सच ही न हो जाए। क्यों! है कि नहीं यही बात?’

‘जगत भाई तुमको तो ज्योतिषी होना चाहिए था।’

‘लो! क्या बात करते हो, यार गणेशन। हम कोई ज्योतिषियों से कम हैं? बड़े-बड़े ज्योतिषी हमारे सामने आकर फेल हो जाते हैं।’ 

गणेशन उदास-सा हो गया था। आंखें भर आईं थी बात याद कर के। जगते से सहन नहीं हुआ, बोला- ‘लो भई, तुम भी बड़े भावुक आदमी निकले पर यार इसमें रोने वाली क्या बात हुई?’ इतने पढ़े लिखे हो कर तुम हम गंवारों की बात पर यक़ीन कर लेते हो। तुमने पढ़ा नहीं अंग्रेज़ी में- ‘एवरी डे इज़ नॉट संडे’ कोई ज़रूरी नहीं होता भई बत्तीस दांत वाले मुंह से निकली हुई बात सच ही हो। बोलते हुए उसे ख़्याल आया कि तेजे फाडी का दिल कहीं टूट न जाए। उसने अंधेरे में ही तेजे का हाथ दबा दिया- जैसे इशारे से कहना चाहता हो कि तू ऐसे ही न कहीं सोच में पड़ जाना, मैं तो ऐसे ही गणेशन का दिल रखने के लिए ही ऐसा कह रहा हूं।

असल में जगता जानता है, यह सब तो वैसे ही बातें बनी हुई हैं। फिर गणेशन को यक़ीन दिलाते हुए बोला, ‘मैं तुम को कई बातें बता सकता हूं, जब मेरे बत्तीस दांत वाले मुंह से निकली हुई बातें सच नहीं हुई- मेरे घर के पास तरखानों, यानी कार्पेन्टरों का घर था। उनकी बड़ी लड़की के साथ मेरा इश्क हो गया भई गणेशन, अपने इसी मुंह से मैंने उसे कहा था कि तुम मेरी हो और मेरे सिवा और किसी की नहीं हो सकती पर यारा ऐसा हुआ नहीं। मेरे सामने ही मेरी ‘तरखानी’ को एक मालदार रामगढ़िया ब्याह कर ले गया। अब तक तो दो बच्चों की मां भी हो गई है।’

अंधेरे में ही उसने फिर दोनों का कंधा दबाया और जगते को लगा, जैसे दोनों की ही तसल्ली हो गई हो। बोला- ‘मित्र, असल में तुम ज़िंदगी और मौत के खेल में फंसे हुए कुछ ज़्यादा ही भावुक हो गए हो। भई तुम ठहरे शहरी बाबू पर ससुरे हम गांवों वालों के साथ रह कर भी तुम्हें जीने की जाच यानी सलीक़ा नहीं आया। अब उस तेजे को ही देख लो- साले ने ज़िंदगी में कोई खुशी नहीं देखी, हर जगह फाडी ही रहा, ‘फाडी यानी कि जिसका नंबर आख़िर यानी एंड में आता है।’ बाहर खड़ा है संता- उसकी बीवी से फ़ौजी मर्द का विछोह सहा नहीं गया और निकल गई किसी ग़ैर मर्द के साथ पर देख लो डटा हुआ है शेर का पुत्तर। कोई परवाह ही नहीं। मुझे ही देख ले यार, अपनी बूढ़ी बेसहारा मां का इकलौता पुत्तर। यारा इसी को ज़िंदगी कहते हैं। क्यों भई तेजा, ज़रा सुनाना गणेशन को गाकर- ‘दो दिन घट जीऊणा …, पर जीऊणा मटक दे नाल, कि दो दिन घट जिऊणा …’ जगता गुनगुनाने लगा था।

अचानक ख़ंदक के बाहर पहरे पर खड़े संते ने कहा, ‘जनाब दुश्मन के कुछ जवान हमारी चौकी की तरफ़ बढ़ रहे हैं।’

‘कितने जवान होंगे?’ जगते ने पूछ लिया।

‘जनाब अंधेरे के कारण दूरबीन में सिर्फ़ हिलती-जुलती परछाइयां ही नज़र आती हैं। अंदाज़न चालीस-पचास होंगे।’ संते ने जवाब दिया।

‘ठीक है।’ जगते ने एक दम से कहा, ‘बाहर निकल कर अपनी-अपनी पोज़िशन लो। दुश्मन को इस बात का एहसास न हो कि इधर सिर्फ़ चार आदमी ही हैं। फायरिंग पोज़िशन बदल-बदल कर की जाएगी।’

‘यस सर।’ तेजे और गणेशन ने दृढ़ता के साथ कहा और ख़ंदक से बाहर निकल गए।

जगते ने वॉयरलेस सेट संभाला। दुश्मन की बढ़ रही फ़ौजी टुकड़ी की ख़बर हेॅड क्वार्टर पहुंचाने के बाद उसने मदद के बारे में पूछा तो उन्हें पता चला कि मदद के लिए सिपाही भेजे जा चुके हैं। शायद बरसात के साथ हुई रास्ते की ख़राबी के कारण अभी तक नहीं पहुंच पाए। वॉयरलेस सेॅट पर बात करने के पश्चात् जगते ने भी ख़ंदक से निकल कर एक पेड़ की ओट में पोज़िशन ले ली।

दुश्मन के जवानों की टुकड़ी जो उनकी चौकी की ओर बढ़ रही है लगभग सौ मीटर के फासले पर पहुंच चुकी है। बीच में एक दरिया है, जो दो हिस्सों में बंटा हुआ बह रहा है। जगते ने धीरे से गणेशन को कहा, ‘जैसे ही दुश्मन दरिया का पहला हिस्सा पार करके दूसरे हिस्से में दाख़िल हो, फायरिंग शुरू कर देना।’

‘यस सर।’ गणेशन ने कहा, और फिर हुक्म आगे तेजे को सुना दिया और तेजे ने संते को।

दरिया बरसाती पानी से भरा-भरा लगता था पर इस मैदानी इलाक़े में पहुंच कर उसकी रफ़्तार कम हो गई थी और चौड़ाई में फैल कर दो हिस्सों में बंट जाने के कारण गहरा कम था। दुश्मन के सिपाहियों ने बड़ी आसानी के साथ दरिया का पहला हिस्सा पार कर लिया था फिर जैसे ही वे दरिया के दूसरे हिस्से में उतरे जगत सिंह चीखा, ‘फ़ायर।’ 

… और एकाएक उन चारों ने पोज़िशन बदल-बदल कर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। दुश्मन के आए जवान तो इस अचानक फ़ायर में ही भुन दिये गए। बाक़ी बचे जवानों ने पीछे लौट कर दरिया के दोनों हिस्सों के बीच वाली उभरी हुई ज़मीन पर लेट कर पोज़िशन ले ली।

दोनों ओर से फायरिंग होने लगी। तेजा बड़ी तेज़ी के साथ पोज़िशन बदलता और दो-चार फ़ायर करके दूसरी जगह जा खड़ा होता।

जगता पोज़िशन बदलते हुए गीली मिट्टी में फिसल कर एक बड़े पत्थर पर मुंह के बल जा गिरा पर वो जल्दी ही संभल गया और उठ कर फायरिंग करने लगा।

पोज़िशन बदलने की इस भाग-दौड़ में ही दुश्मन की गोली तेजे की कमर में आ लगी, गणेशन ने देख लिया पर तेजे ने गोली की परवाह न करते हुए फायरिंग जारी रखी।

गणेशन के ज़हन में जगते के शब्द गूंजने लगे, ‘अब इस तेजे को ही देख लो, साले ने ज़िंदगी में कोई खुशी नहीं देखी। हर जगह साला ‘फाडी’ ही रहा … फाडी यानी कि जिसका नम्बर आख़िर यानी एंड में आता है …।’ ‘पर लेकिन गोली खाने में पहला नम्बर ले गए तुम, तेजा भाई।’ गणेशन के मुंह से स्वतः निकल गया और ज़हन में फिर जगते के शब्द गूंजे, ‘… आज मैं तुम्हें अपने बत्तीस दांत वाले मुंह के साथ कहता हूं कि आज के बाद तुम जब भी पुगोगे, पहले ही रहोगे, फाडी नहीं।’ गणेशन अभी मानसिक कशमकश में ही उलझा था कि अचानक एक गोली उसकी पतलून को छूती हुई निकल गई। उसकी सोच की लड़ी टूटी। होश लौटी तो उसने देखा, पतलून में सुराख़ हुआ पड़ा है और वह बाल-बाल बच गया है। उसे एकाएक अपनी पत्नी की याद आ गई, जिसे उसने ग़ुस्से में कह दिया था, ‘भगवान्  करे यह जंग मुझे …’ जगते के शब्द फिर उसके ज़हन में गूंजते हैं, मेरी बेबे कहा करती है, ‘जगतू पुत्तर, जिसके मुंह में बत्तीस दांत होते हैं, उसके मुंह से निकली हुई कोई भी बात सत्य हो जाती है…।’ और एकदम उसने अंगूठे के साथ झटका देकर अपना ऊपर का एक दांत तोड़ लिया।

थोड़ी ही देर में पीछे से मदद आ गई। आई हुई फ़ौजी टुकड़ी ने अपनी पोज़िशन ली और कुछ ही क्षणों में दरिया के बीच वाली उभरी ज़मीन पर बचे हुए दुश्मन के जवान दुनियां को अलविदा कह गए।

तेजे की लाश को फ़ौजी ट्रक में रखते हुए जगते का गला भर आया, ‘साले फाडी! अगर मुझे पता होता तुम जंग के इस खेल में शहीद होने के लिए यारों के साथ पुगोगे तो मैं तुझे कभी भी अपने बत्तीस दांत वाले मुंह से पहला रहने के लिए न कहता।’

ट्रक उन चारों को लेकर फ़ौजी अस्पताल की ओर चल पड़ा। ट्रक में बैठे हुए गणेशन ने जगते को कहा, ‘जगत भाई, अपने बत्तीस दांत वाले मुंह से एक बार कह दो कि हमारे अस्पताल पहुंचने तक जंगबन्दी का एलान हो जाएगा।’

जगता उत्तर में अपने सूजे हुए होंठ फैला कर हंस पड़ा। गणेशन ने देखा उसके ऊपर वाले दांतों में से सामने के दो दांत गायब थे।

‘जगत भाई, तुम्हारे दांत?’ गणेशन हैरान-सा हुआ बोला।

‘पोज़िशन बदलते हुए फिसल गया था, मित्तरा! मुंह के बल गिरा।’

‘चलो कोई नहीं गणेशन भाई, हमारे न रहे तो क्या हुआ तुम्हारे मुंह में तो बत्तीस दांत हैं।’ कहते हुए जगते ने आदतन गणेशन के कंधे पर धौल जमाई।

‘नहीं यार,’ गणेशन ने कहा, ‘मैंने अपना एक दांत तोड़ लिया है।’ 

‘तोड़ लिया है। क्यों भाई?’ जगते को हैरानी हुई, ‘ऐसी क्या बात हो गई थी?’

‘सच-सच बताऊं या झूठ बोलूं?’ गणेशन ने कुछ झिझकते हुए कहा, ‘साले ग़लती से तेरा पंजाबियों के साथ वास्ता पड़ गया लगता है, मर्दों की तरह बात करो, करनी है तो … तीमियों की तरह, यानी कुड़ियों … मेरा मतलब है, औरतों की तरह नख़रे क्यों करता है?’

संता जगते की बात पर हंस पड़ा। लेकिन गणेशन कुछ गम्भीर-सा हो गया था बोला- ‘वो … यार, दरअसल बात यह है कि घर से चलते वक़्त बीवी के साथ हलक़ा-सा झगड़ा हो गया था। हालांकि ग़लती मेरी ही थी और मैंने ग़ुस्से में कह दिया था, ‘भगवान् करे यह जंग मुझे इस दुनियां से उठा ले।’ और यार क्या बताऊं वो मेरे पांव में गिर पड़ी और सारा दोष उसने अपने सर ले लिया। तुम्हारी बत्तीस दांत वाली बात सुनकर पत्नी की बहुत याद आई। तुम तो जानते हो यार मरने से हम फ़ौजी नहीं डरते। लेकिन अपने साथ किसी और को मार डालो यह कहां का इन्साफ़ हुआ? वो जीते जी मर जाती मेरे बिना। इसलिए … फायरिंग के वक़्त जब तेजा को गोली लगी तो डर गया था कि कहीं मेरे मुंह से निकली हुई बात सच ही न हो जाए और … और मैंने एक दांत खुद ही तोड़ दिया।’ 

जगते से उसका गहर गम्भीर चेहरा देखा नहीं गया। बोला, ‘कमाल है भई गणेशन! इतनी-सी बात के लिए अपना दांत तोड़ लिया। तुमने तो साबित कर दिया कि अगर मौत सर पर खड़ी हो तो आदमी का दिमाग़ काम करना छोड़ देता है।’ 

‘क्या कह रहे हो, जगत भाई?’ गणेशन हैरान-सा हो गया। 

‘मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं। तेजे फाडी का मन रखने के लिए मैंने बत्तीस दांत वाली गप्प सुना दी। फिर तुम्हारा दिल रखने के लिए दोबारा एक गप्प सुना दी। मैं तो एक नम्बर का गप्पी हूं मित्तरा! और तुमने मुफ़्त में ही अपना दांत तोड़ दिया। क्यों भई संते मैंने ग़लत कहा क्या?’

‘ना भई, तुम ग़लत कब कहते हो तुम तो सुखमनी साहब का पाठ करते हो।’ कहते हुए संते के चेहरे पर बड़ी अर्थपूर्ण हंसी खिल उठी। जगता भी मुस्कुरा पड़ा। गणेशन को पहले तो कुछ समझ में नहीं आया लेकिन कुछ देर बाद वह भी अपनी जीभ टूटे हुए दांत वाली जगह फंसा कर हंस पड़ा। 

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