अमूल्य भारतीय संस्कृति

-डॉ. अंजना कुमारी

उठे जहां भी घोष शान्ति का, भारत स्वर तेरा है,

धर्म-दीप हो जिसके भी कर में, वह नर तेरा है।

तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है,

किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है।।

जी हां यही कवितांश भारत का जो वास्तविक रूप था उसे उभारने में बिलकुल सक्षम है। वह भारतीय संस्कृति जो कभी अनेकता में एकता, शान्ति, बलिदान सत्य अपने ज्ञानदीप से सभी को आलोकित और सभी का पथ-प्रशस्त करने वाली थी आज उसी पर प्रश्न चिन्ह लगाना यही सिद्ध करता है कि आज कहीं कुछ खो गया है। राम, कृष्ण, कबीर, नानक की जन्मभूमि को आज किसी की नज़र लग गयी है वह भारतीय संस्कृति जिसके लिए डॉ. मुहम्मद इक़बाल को कहना पड़ा था।

युनानो मिस्त्रों-रुमां सब मिट गए जहां से,

अब तक मगर है बाक़ी नामों निशां हमारा।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,

सदियों रहा है दुश्मन दौरे-ज़मां हमारा।

आज इक्कीसवीं शताब्दी के द्वार पर खड़े भारत और भारतीय संस्कृति में निरन्तर कई स्तरों पर परिवर्तन हो रहे हैं। इसके लिए केवल हम युवा पीढ़ी को दोष देकर स्वयं को दोषमुक्त नहीं मान सकते। लगातार नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, गुरु-शिष्य परम्परा ने एक व्यावसायिक जामा पहन लिया है। हर तरफ़ बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। भारतीय संस्कृति के मूल रूप में जो भी परिवर्तन हुए उसे हम केवल पश्चिमी सभ्यता का ही प्रभाव नहीं मान सकते बल्कि इसके लिए स्वयं हम और सामाजिक परिवेश ज़िम्मेदार है। मेरा प्रश्न है इस समाज से कि कितने माता-पिता आज के समाज में हैं जो पूरी निष्ठा और समर्पण से बच्चों को भारतीय संस्कृति का ज्ञान दे रहे हैं? जितनी कहानियां बचपन में हमें दादी-नानी, माता-पिता से सुनने को मिली थी क्या उससे आधी भी हम उनको सुना पाएं हैं? संयुक्त परिवारों के टूटने से भी बच्चे नैतिक शिक्षा और संस्कारों से वंचित हो रहे हैं।

आधुनिक समाज में एक तरफ़ तो यह शोर है कि भारतीय नारी हर क्षेत्र में अब स्वतंत्र हो गई है पर मेरे ख़्याल से आज नारी के साथ ज़ुल्म की इन्तहा हो रही है। बलात्कार, भ्रूण हत्या, दहेज़ के कारण होने वाली हत्याएं लगातार बढ़ रही हैं। ज़्यादातर महिलाओं को कामकाजी होने के कारण भी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ती है। अभी भी समय है कि हम अपनी संस्कृति में होने वाले नकारात्मक बदलाव को रोकें और सोचें कि कहां से सकारात्मक बदलाव शुरू हो सकता है।

घर ही व्यक्ति की पहली पाठशाला है, इसीलिए सबसे पहले हमें घर से ही प्रयास प्रारंभ करने होंगे। बच्चों को अपने देश के गौरवशाली इतिहास से परिचित करवाना होगा। साहित्य के माध्यम से उनमें नैतिक-मूल्यों का विकास करना होगा। अगर कामकाजी होना माता-पिता दोनों की ज़रूरत है तो फिर किट्टी पार्टी और क्लब के लिए समय नष्ट न करते हुए अपने बच्चों को सही संस्कारों की शिक्षा देनी होगी। आज के युवा ही कल के राष्ट्र के निर्माता हैं अगर आज दृढ़ प्रतिज्ञ होते हुए हमने उनमें अच्छे गुणों एवं संस्कारों की नींव डाल दी तो भविष्य में भारत की गौरवशाली संस्कृति पर फिर से सवालिया निशान लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और सभी यह कहने पर मज़बूर होंगे।

आपकी विचारधारा हो समान,

मन कमल में एक-सी सुगंध हो,

एक स्वर में तंत्री हृदय की बजे,

साथ-साथ जीने में आनन्द हो।

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