प्रेम का प्रतिशोध

जनवरी 1978 की 16 तारीख़ थी। चमचमाती तेज़ धूप में चंडीगढ़ जैसे खिल उठा था। सेक्टर- 34 स्थित, थाना दक्षिण के पुलिस अधिकारी प्रांगण में बैठे धूप का आनंद ले रहे थे। उसी समय एक दुबला-पतला व्यक्ति इधर-उधर देखता हुआ, वहां आकर खड़ा हो गया।

‘क्या बात है? क्यों खड़े हो यहां?’ एक पुलिस अधिकारी ने उस पर सरसरी निगाह डालते हुए पूछा।

‘सरकार, मेरा नाम किरपा राम है। 13 जनवरी को मेरे तीन बच्चों का अपहरण कर लिया गया। उन्हें एक ऑटो रिक्शा चालक राजकुमार जो कि हमारा परिचित है, फुसलाकर ले गया है।’

‘तीन दिनों तक तुमने रपट क्यों नहीं लिखाई?’

‘हुज़ूर, इस बीच मैं अपनी तरफ़ से बच्चों की तलाश करता रहा।’

सब इंस्पेक्टर वासुदेव बतरा के निर्देश पर 16 जनवरी को अपराध क्रमांक 38 पर भारतीय दण्ड विधान की धारा 363, 364 और 506 के अंतर्गत मामला दर्ज़ कर लिया गया। वासुदेव बतरा उसी क्षण से उस मामले की तहक़ीक़ात में जुट गए।

किरपा राम के मुताबिक़ अपहृत बच्चों एवं अपराधी का हुलिया इस प्रकार था।

सुशील कुमार उर्फ़ बंटी- आयु दो वर्ष, रंग सांवला, कमर पर पैदाइशी निशान। प्रवीन कुमार उर्फ़ बीनू- आयु पांच वर्ष, रंग साफ़, बाल हलके सुनहरी, कमर पर दो पैदाइशी निशान। सतीश कुमार- उम्र लगभग सात वर्ष, रंग सांवला तुतलाकर बोलने वाला। मुलज़िम राजकुमार- उम्र क़रीब 41 वर्ष, क़द पांच फ़ुट सात इंच, रंग गेहुंआ, आंखें भूरी, कान छिदे हुए व कंधे पर टांके के निशान, वह सिर्फ़ पंजाबी भाषा बोलता था।

बतरा ने आसपास के सभी थानों को अपहृत बच्चों एवं अभियुक्त का हुलिया भिजवा दिया, मगर कोई सफलता नहीं मिली।

अधेड़ आयु का किरपा राम, चंडीगढ़ के घनी आबादी वाले क्षेत्र सेक्टर- 22 में अपनी पत्नी शारदा तथा बच्चों के साथ किराए के फ्लैट में रहता था।

उसी मकान की निचली मंज़िल में राजकुमार भी रहता था। वह हृष्ट-पृष्ट था और ऑटो-रिक्शा चलाकर अपना गुज़ारा करता था।

राजकुमार गुरदासपुर ज़िले के डेरा बाबा नानक साहब थानान्तर्गत रामा तलवंडी गांव का निवासी था। 17-18 साल पहले उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी। तब से वह चंडीगढ़ चला आया था। ऑटोरिक्शा चलाने के कारण अधिकांश समय वह घर से बाहर ही रहता था। किरपा राम से उसकी केवल दुआ सलाम थी।

उन्हीं दिनों किरपा राम की बीवी शारदा ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिससे घर का ख़र्च कुछ बढ़ गया।

किरपा राम के पास दो कमरों का फ्लैट था। लिहाज़ा, वह एक कमरा किराए पर उठाकर अपनी समस्या हल कर लेना चाहता था, इस बारे में उसने राजकुमार से बात की तो वह सहर्ष मान गया और उसके कमरे को किराए पर ले लिया।

उसके आ जाने से किरपा राम को काफ़ी राहत मिली। फलस्वरूप, राजकुमार जल्द ही उनसे घुल-मिल गया। किरपा राम के बच्चे चाचा-चाचा कह कर उसके पीछे लगे रहते थे। वह भी उन्हें यदा-कदा टॉफ़ियां तथा मिठाई वग़ैरह ख़रीद दिया करता। उसका व्यवहार देखकर शारदा और किरपा राम दोनों प्रसन्नता से फूले नहीं समाए। वे भी उसका पूरा-पूरा ख़्याल रखते थे।

धीरे-धीरे राजकुमार एक तरह से उनके परिवार का सदस्य बन गया।

उसी दौरान राजकुमार के दिल में शारदा के प्रति प्रेम का अंकुर कब फूट पड़ा, स्वयं उसे पता न चला, वह अक्सर किरपा राम की ग़ैर मौजूदगी में शारदा के पास जा बैठता और मीठी-मीठी, लच्छेदार बातों से उसे आकर्षित करने का प्रयास करता, उसकी बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाय शारदा सिर्फ़ मुस्कुरा देती। राजकुमार उसे अपनी सफलता मान बैठा।

बातों ही बातों में एक दिन उसने शारदा के सामने अपने प्यार का इज़हार कर दिया। प्रत्युत्तर में शारदा कुछ बोली नहीं सिर्फ़ अपनी गर्दन झुका ली। उसकी खामोशी को मूक स्वीकृति समझकर राजकुमार ने उसे आलिंग्न में बांध लिया।

उस दिन के बाद तो राजकुमार का ज़्यादा समय शारदा के घर पर ही बीतने लगा। शनैःशनैः कई साल बीत गए। तब तक शारदा छः बच्चों की मां बन गई। किन्तु राजकुमार का उसके प्रति आकर्षण ज़रा भी कम नहीं हुआ। वह उसके प्यार में आकण्ठ डूबा रहा।

1977 में उनके मकान मालिक ने अपना वह तिमंज़िला मकान किसी व्यक्ति को बेच दिया। नए मकान मालिक ने किराए के लालच में पुराने किराएदारों को मकान ख़ाली करने का नोटिस दे दिया।

किरपा राम परेशान हो उठा कि अब वह कहां जाए? उस महंगाई में सस्ते किराए पर उसे कौन मकान देगा? यह सब सोचकर उसने पहले वाले मकान मालिक से अनुरोध किया कि वह उसके वहीं रहने का जुगाड़ बना दें। पुराने मकान-मालिक ने नए मकान मालिक से उसकी सिफ़ारिश कर दी। उसकी हालत पर रहम खाकर नया मकान मालिक भी उसे रखने के लिए सहमत हो गया। किन्तु अन्य किराएदारों को उसने शीघ्र मकान न छोड़ने पर कानूनी कार्यवाही करने की धमकी दे दी।

मकान मालिक के इस निर्णय पर राजकुमार को बहुत क्रोध आया। मगर क्या करता। मकान ख़ाली करने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था। कुछ दिनों बाद उसने कमरा छोड़ दिया और ‘अटावा’ गांव में एक खोली लेकर रहने लगा। वहां आकर पहली बार राजकुमार को एकाकीपन का एहसास हुआ। शारदा के बिना जैसे वो स्वयं को अधूरा महसूस करने लगा।

मकान छोड़ने के बाद भी राजकुमार किरपा राम के घर बेखटके आता जाता रहता। शारदा का दीदार किए बग़ैर उसे चैन नहीं मिलता था।

13 जनवरी 1978 को ‘लोहड़ी’ का त्योहार था। खुशी के उस अवसर पर राजकुमार, शारदा व किरपा राम से मिलने सेक्टर-22 आया। मकान के बाहर ही उसे किरपा राम के तीन लड़के सुशील, प्रवीण और सतीश खेलते हुए मिल गए।

एकाएक राजकुमार के दिल में न जाने क्या ख़्याल आया कि वह घर में प्रविष्ट होने की बजाय बच्चों के पास ही रुक गया और उन्हें प्यार से सहलाते हुए बोला, ‘आओ, तुम्हें मिठाई दिला दूं।’ फिर किसी को सूचित किये बिना वह तीनों बालकों को लेकर बाज़ार की ओर चल पड़ा। किरपा राम की सबसे छोटी लड़की बेबी, कुछ दूरी पर खड़ी यह सब देछ रही थी। उनके जाते ही भागकर वह ऊपर पहुंची और शारदा से तोतली ज़ुबान में बोली, ‘मां-मां, राजकुमार अंकल सतीश, सुनील व प्रवीण को मिठाई दिलाने बाज़ार ले गए हैं।’

‘जाने दे उन्हें, तेरे लिए मिठाई मैं ले आऊंगी।’ शारदा ने बेबी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा और स्वयं फुर्ती से काम निबटाने लगी।

देखते-देखते संध्या के पांच बज गए। राजकुमार बच्चों को लेकर तब तक वापिस नहीं लौटा था। शारदा के चेहरे पर चिंता के लक्षण झलकने लगे। वह बेचैन-सी नीचे उतर कर गली में इधर-उधर चक्कर काटने लगी। उसे मन ही मन राजकुमार पर क्रोध आ रहा था। जो बिना बताए बच्चों को अपने साथ लिवा ले गया था। प्रतीक्षा करने के अलावा शारदा के पास कोई चारा न था। अतः वह उदास-सी ऊपर आकर पलंग पर लेट गई।

अभी लेटे हुए उसे कुछ ही क्षण बीते होंगे कि उसका पति किरपा राम हाथों में लोहड़ी का प्रसाद मूंगफली, रेवड़ियां तथा फुल्ले आदि लिए आ पहुंचा। सारा सामान पत्नी को सौंपते हुए उसने पूछा, ‘भागवान्! आज घर में इतनी शांति कैसे है? 

जवाब में शारदा के नेत्रों से आंसू ढुलक कर गालों पर आ गए। वह सुबकते हुए बोली, ‘दोपहर को राजकुमार आया था। वह नीचे से ही चुपचाप सुशील, प्रवीण और सतीश को मिठाई वग़ैरह दिलवाने बाज़ार ले गया। अढ़ाई-तीन घंटे बीत चुके हैं मगर अब तक वापिस नहीं आया।’ यह सुनते ही किरपा राम व्याकुल हो उठा। थका-मांदा होने के बावजूद वह बच्चों को ढूंढ़ने निकल पड़ा। काफ़ी रात तक वह भूूखा-प्यासा इधर-उधर उनकी तलाश में भटकता रहा। लेकिन उनका कुुछ पता न चला। हारकर वह घर लौट आया।

उसी दौड़-धूप में दो दिन और गुज़र गए। किरपा राम ने शहर के प्रत्येक सम्भावित स्थानों पर बच्चों की तलाश की थी, पर वे नहीं मिले थे। निराश होकर 16 जनवरी 1978 को उसने थाना दक्षिण में मुक़द्दमा दर्ज़ करवा दिया।

पुलिस अधिकारियों को तफ़तीश में कोई सफलता नहीं मिली। उसी बीच एक दिन अचानक किरपा राम को राजकुमार की तरफ़ से एक ख़त मिला, जिसमें लिखा था, ‘तुम लोग थाने में दर्ज़ रपट वापिस ले लो, वरना मैं तुम्हारी बड़ी पुत्री शशिकांता को भी उठा ले जाऊंगा।’

पत्र से स्पष्ट था कि राजकुमार ने बदले की नीयत से तीनों बच्चों का अपहरण किया था। ख़त पाकर किरपा राम और भी घबरा उठा। उसने पुलिस-अधिकारी को वह ख़त सौंप दिया और शीघ्र ही बिरादरी के एक कमाऊ युवक से पुत्री शशिकांता की शादी कर दी।

धीरे-धीरे उस घटना को दो-अढ़ाई वर्ष बीत गए। बीच-बीच में शारदा को राजकुमार के कुछ पत्र और मिले, जिन्हें किरपा राम ने पुलिस को सौंप दिया था। उनमें से एक इस प्रकार था।

‘शारदा जी!’

‘नमस्ते, तुमसे मिले बिना मेरी जो हालत है, मैं ब्यान नहीं कर सकता। तुम्हें याद है, मैंने क़सम खाई थी कि तुम्हारे अलावा कोई और स्त्री मुझे नहीं चाहिए। अगर चाहिए तो सिर्फ़ मेरी शारदा। मैं अभी तक उसी आस में बैठा हूं।’

अंत में एक शेर लिखा थाः-

‘देर से लाश तड़पती थी, बाज़ार में पी के इंतज़ार में

क्या कफ़न मिलता नहीं, इस बेवफ़ा बाज़ार में।’

एक और पत्र इस प्रकार थाः-

‘शारदा देवी जी!’

‘नमस्ते, दो साल और तीन महीने हो गए, मिले बिना। पांच वर्ष पूरे होने में दो साल नौ महीने शेष रह गए हैं। मैं राज़ी-खुशी से हूं और तुम्हारी कुशलता ईश्वर से चाहता हूं। मैं तुमसे मिले बग़ैर नहीं रह सकता। इस समय मेरा तुमसे मिलना बेहद ज़रूरी है ताकि हम लोग अपने दिल की भड़ास निकाल सकें। मैंने तुमसे मिलने की बहुत कोशिशें की मगर कोई रास्ता नज़र नहीं आया। तुमने भी पुलिस में रपट लिखाकर बड़ी भूल की। मैंने पता लगा लिया है, उसकी मियाद कम से कम पांच वर्ष तक है। उससे पहले मैं तुमसे मिलूंगा, तो पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर लिया जाऊंगा।’

‘जो नशा है प्यार का, शारदा तू बता उतारूं कैसे?

दिन तो गुज़र जाता है, रात गुज़ारूं कैसे?’

इस थोड़े से लिखे हुए को ज़्यादा समझना।

तुम्हारा राजकुमार।

पंजाबी में लिखे गए उन पत्रों के आधार पर भी पुलिस ने मुलज़िम की काफ़ी तलाश की मगर कुछ पता नहीं लगा। बच्चों का अपहरण स्थानीय पुलिस के लिए एक चुनौती बन चुका था। कुछ सोचकर उच्चाधिकारियों ने यह केस एक अनुभवी सब-इंस्पेक्टर देशराज को सौंप दिया।

देशराज नए सिरे से मामले की छान-बीन में जुट गए। उन्होंने पंजाब के विभिन्न नगरों में जाकर राजकुमार के रिश्तेदारों से पूछताछ की परन्तु कोई ठोस सबूत हाथ नहीं लगा। एक गुप्त सूचना पर वह जम्मू होते हुए श्रीनगर भी गए। वहां तफ़तीश के दौरान उन्हें ट्रैफ़िक पुलिसवालों से राजकुमार का ड्राइविंग लाइसेंस मिल गया। उसका वह लाइसेंस ऑटो रिक्शा का चालान होने की वजह से दफ़्तर में जमा था। उसे लेकर वह चंडीगढ़ वापिस लौट आए।

उन्होंने उस फ़ोटो की बहुत-सी कापियां करवाईं और स्थानीय एम.ओ.बी शाखा को भेज दिया। उस शाखा के अध्यक्ष सरदार मोहिन्दर सिंह ने उन चित्रों को सभी थानों में भिजवा दिया। अभी यह कारवाई चल ही रही थी कि राजकुमार के एक परिचित ने जो जनता पार्टी का कार्यकर्ता और काफ़ी रसूखवाला व्यक्ति था, इंस्पेक्टर देशराज का चंडीगढ़ से तबादला करवा दिया।

उनके जाते ही जांच का काम जहां का तहां रुक गया। किरपा राम और पत्नी तो पहले ही निराश हो चुके थे।

समय पंख लगा कर उड़ता रहा। सप्ताह महीनों में और महीने वर्षों में तबदील होते गए। प्रकरण एक पुलिस अधिकारी के हाथों दूसरे तक पहुंचता रहा। उसी बीच इंस्पेक्टर सुरजीत सिंह ने थाने का कार्यभार संभाला।

उन्होंने इस केस की फ़ाइल का भलीभांति अध्ययन किया और फिर मुक़द्दमे की विवेचना सब इंस्पेक्टर प्रेम सिंह मलिक को सौंप दी। उन्होंने अथक प्रयास किया, फिर भी उन्हें सफलता पूरी तरह नहीं मिली।

21 फरवरी 83 की सुबह के दस बज चुके थे। जयपुर रेलवे स्टेशन में रोज़ाना की भांति चहल-पहल थी। स्टेशन के सामने चाय की दुकान पर पहुंच कर सदर थाने के हवलदार सूरजमल तथा रतन प्रकाश ने चाय का ऑर्डर दिया। चूंकि दुकान में भीड़ थी अतः समय गुज़ारने के लिए दोनों पुलिसकर्मी पास की एक बुक-स्टाल पर जा खड़े हुए और पत्रिकाएं देखने लगे। एक पत्रिका उन्होंने ख़रीदी और वापिस चाय की दुकान पर आ बैठे।

पत्रिका में बच्चों के अपहरण से संबंधित एक कहानी छपी थी। साथ ही अपहरण कर्ता का चित्र भी था। वह दोनों चाय पीते हुए पूर्ण दिलचस्पी से कथा पढ़ने लगे।

उसी दौरान एक रिक्शा चालक वहां आ पहुंचा और बैंच पर पसरते हुए चायवाले से बोला, ‘एक कड़क चाय बनाना, उस्ताद।’

चायवाले ने पुनः अंगीठी पर पानी चढ़ा दिया। उसी क्षण हवलदार सूरजमल की दृष्टि सामने बैठे उस रिक्शा चालक पर पड़ी तो वह चौंक उठा। उसने पुनः पत्रिका में छपी तसवीर को ग़ौर से देखा। तीन बच्चों का अपहरण करने वाला व्यक्ति शत-प्रतिशत वही था। सूरजमल ने रतन प्रकाश को भी वह फ़ोटो दिखाई।

आंखों ही आंखों में दोनों पुलिसकर्मियों ने एक दूसरे को इशारा किया और फिर चाय के पैसे देकर दुकान से थोड़ी दूर जा खड़े हुए। लगभग पांच मिनट बाद वह रिक्शा चालक चाय पीकर बाहर निकला और रिक्शा लेकर एक तरफ़ को चल पड़ा। दोनों पुलिसकर्मी सतर्कता से उसका पीछा करने लगे। वह रिक्शा शहर के भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र हसनपुर में एक कोठरी के आगे रुक गया। पुलिसकर्मियों ने उसके आस-पास में पूछा तो मालूम हुआ कि जिस मकान में वह रिक्शा चालक घुसा था उसका मालिक वहीद अली था। उन्होंने थानाध्यक्ष गोपाल कृष्ण गुप्त को पत्रिका दिखाते हुए सारा वाक़या बतलाया।

थानाध्यक्ष गोपाल कृष्ण ने उसी रात उस मकान में छापा मारकर उसे गिरफ़्तार कर लिया। थाने में पूछताछ के दौरान पहले तो वह इंस्पेक्टर गोपाल कृष्ण को चकमा देने का प्रयास करता रहा, किन्तु जब उन्होंने पत्रिका में छपी फ़ोटो दिखाई तो उसने अपना जुर्म क़बूल कर लिया। उसने पुलिस अधिकारी को बताया कि चंडीगढ़ से भागने के बाद वह काफ़ी अर्से तक लुधियाना, अमृतसर, जम्मू तथा श्रीनगर में भटकता रहा। फिर एक दिन छुपते छुपाते जयपुर आ गया। वहां उसे पहचान लिए जाने की उम्मीद बहुत कम थी।

जयपुर में वह स्टेशन पर सामान वग़ैरह ढो कर अपना ख़र्च चलाता रहा, पर इससे अधिक आय नहीं हो पाई थी। उसने ऑटो-रिक्शा भाड़े पर लेकर चलाना चाहा, मगर उसका लाइसेंस श्रीनगर में चालान हो जाने से ज़ब्त हो गया था। हारकर वह रिक्शा चलाकर अपना पेट पालने लगा।

आवश्यक छानबीन के बाद थाना-प्रभारी ने चंडीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आर.केे.नियोगी को उस बारे में सूचना भिजवा दी। सारा मामला जानकर नियोगी ने थाना दक्षिण केे प्रभारी इंस्पेक्टर सुरजीत सिंह को तत्काल कारवाई करने का आदेश दिया।

सूचना मिलते ही सब-इंस्पेक्टर प्रेम सिंह मलिक अपने एक सहयोगी के साथ जयपुर के लिए रवाना हो गए और राजकुमार को अपने साथ चंडीगढ़ ले आए।

चंडीगढ़ में राजकुमार से पूछताछ के बाद पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि शारदा ने राजकुमार के प्रणय-निवेदन को ठुकरा दिया था। इसका बदला लेने के लिए उसने बच्चों का अपहरण किया और बाद में उनकी हत्या कर दी थी। फलस्वरूप उन्होंने राजकुमार के विरुद्ध धारा 302 भा.द.वि. भी जोड़ दी।

अंततः अभियुक्त के ख़िलाफ़ ठोस प्रमाण एकत्र कर विवेचनाधिकारी प्रेम सिंह मलिक ने अदालत में अभियोग-पत्र दाख़िल कर दिया। सत्र-न्यायालय में मुक़द्दमा चला। सबूत पक्ष के वकील के.सी.गोदारा एवं ए.के.सूद ने अपनी दलील में कहा कि अभियुक्त राजकुमार ने तीन मासूम बच्चों की हत्या कर वहशीपन का परिचय दिया है। ऐसा जघन्य अपराध करने के जुर्म में उसे कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए।

जवाब में बचाव-पक्ष के अधीक्षक राम स्वरूप शर्मा ने तर्क दिया कि तीनों बच्चों की हत्या अभी तक संदिग्ध है, क्योंकि उनके शव बरामद नहीं हो सके। इस बात को मद्देनज़र रखते हुए राजकुमार को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।

काफ़ी समय तक दोनों पक्षों में धुआंदार बहस हुई और कई गवाह अदालत में प्रस्तुत किए गए। अंत में, सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विद्वान न्यायाधीश बी.एस.नेहरा ने राजकुमार को दोषी पाया और तीन मासूम बच्चों के अपहरण एवं हत्या करने के जुर्म में 5 दिसम्बर, 83 को मृत्युदण्ड दिया।

सत्र-न्यायालय के इस निर्णय के विरुद्ध अभियुक्त की तरफ़ से उच्च-न्यायालय में अपील की गई। उच्च-न्यायालय के न्यायाधीश ने एक बार फिर भलीभांति केस का अध्ययन किया और उन्होंने भी सेशन कोर्ट के फ़ैसले को सही मानते हुए राजकुमार की फांसी की सज़ा बहाल रखी।

उच्च-न्यायालय के निर्णय के बाद अभियुक्त ने उच्चतम्-न्यायालय में अपील की। वहां इस केस के हर पहलू पर एक बार फिर नज़र डाली गई।

10 जुलाई, 84 को उच्चतम्-न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि अभियुक्त ने तीन बच्चों का गला घोंट कर अपनी शैतानियत को उजागर किया है। अतः उसे कठोर से कठोर दण्ड मिलना चाहिए। यह अदालत उच्च-न्यायालय के फ़ैसले को बहाल रखती है।

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