कल रात सपने में आए थे तुम

-आकाश पाठक

‘मैं एक बीस वर्षीय अच्छे नैन-नक़्श की युवती हूं। एक माह बाद मेरी शादी है। मैं अक्सर ख़्यालों में एक सुन्दर सजीले फ़िल्मी हीरो जैसे पति की कल्पना करती रहती थी, लेकिन मेरा होने वाला पति साधारण रंग-रूप का है। हालांकि वह अच्छे पद पर है पर मुझे लगता है कि वे सारे सपने टूट गए। मां-बाप के डर से शादी से भी इन्कार नहीं कर सकती हूं। मन में आता है कि कहीं भाग जाऊं।’

यह समस्या एक दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थी। इस युवती की यह कोई नई समस्या नहीं है, आमतौर पर किशोरावस्था की किशोरियों में इस प्रकार की कल्पनाएं पाई जाती हैं जो ज़हन में बैठ जाती हैं जिससे काल्पनिक जीवन साथी की भूमिका तैयार होनी शुरू हो जाती है।

ऐसा नहीं है कि युवक ऐसी काल्पनिक इच्छाओं से वंचित रहते हैं। सिनेमा जगत् की चकाचौंध में उफनती तारिकाओं के यह बहुत ही दीवाने होते हैं। नतीजा इनके सपनों की शहज़ादी अवश्य ही किसी न किसी एक तारिका से मिलती-जुलती होती है या कोई प्रसिद्ध तारिका भी इनके ख़्वाबों की मलिका हो सकती है।

रितिक, शाहरुख, सलमान जैसे व्यक्तित्व की हर युवती अपने पति में झलक देखना चाहती है। यही कारण है मस्तिष्क पटल पर फ़िल्मी पर्दा इस क़दर हावी हो चुका होता है कि किशोर वर्ग सोते-जागते ऐसे जीवन साथी की कल्पनाएं करने लगता है जोकि संभव नहीं हो पाता है।

प्रायः इस प्रकार की कल्पनाएं भविष्य को चौपट तो करती ही हैं, साथ ही कभी-कभी ज़िंदगी दोराहे पर भी खड़ी हो जाती है।

पाठकों के एक वर्ग ने यह जानना शुरू किया कि काल्पनिक जीवन साथी सपनों के अलावा ज़िंदगी की धरातल पर कितना सार्थक है तो स्नातक की छात्रा रह चुकी चेताली शर्मा ने कहा, ‘वही सपने सच हो सकते हैं जिनकी बुनियाद स्वयं तैयार की जाए।’

पोस्ट ग्रेजुएट रेनू के विचार कुछ यूं थे, ‘सपने दो प्रकार से दिखते हैं, नींद में, दूसरा जागती आंखों से। जागती आंखें अगर सपने दिखाती हैं तो दिन में रात होना स्वाभाविक है।’

मीनाक्षी सिंह ने कहा, ‘जीवन साथी की कल्पना रोमांच उत्पन्न करती है परन्तु दिवा-स्वप्न में घिरे रहना सामाजिक एवं मानसिक विकास में अवरोधक है।’

सरकारी विभाग में कार्यरत सुनील सिंह का मत परिपक्वता में समाहित है, ‘जीवन साथी के सपने संजोए रहने से न सिर्फ़ कैरियर ही चौपट होगा, वरन् विवाह पश्चात् दाम्पत्य जीवन व्यवस्थित नहीं हो पाएगा। अतः ऐसे सपने का क़तई लाभ नहीं है जिनका कि धरातल न हो।’

दिवा-स्वप्न या स्वप्न में सराबोर रहने का कारण है एकाकीपन। जो किशोर या किशोरी एकाकीपन में अधिक समय बिताता है, उसे अक्सर कल्पनाएं घेर लेती हैं। परिवारजन को ध्यान देना चाहिए कि उनका लाड़ला या लाड़ली एकांतप्रिय तो नहीं होते जा रहे हैं।

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