बहता पानी

-दलबीर चेतन

हम अपनी नई पीढ़ी को बहुत कोसते हैं। दलीलों के बाद झगड़े और हाथापाई तक भी पहुंच जाते हैं। हमारे पास तर्क है कि नई पीढ़ी के पास कोई आदर्श नहीं, कोई सोच नहीं और कोई राह भी नहीं। ये दिशाहीन दर-ब-दर भटक रही है। इनके पास बड़ों के लिए आदर नहीं है, धर्म से प्रेम नहीं, मूल्यों से कोई सरोकार नहीं और इस तरह का बहुत कुछ है हमारे पास।

कई बार इस तरह की दलीलों से सहमत होकर इस तरह सोचा भी जा सकता है। फिर और थोड़ा गंभीर होकर सोचने वालों को लगता है कि इस नई पीढ़ी का क़सूर क्या है? क्या सचमुच उनको भी हमारी तरह ही सोचना चाहिए? क्या ज़िंदगी के प्रति उनका दृष्टिकोण भी हमारे जैसा ही होना चाहिए? इस तरह के बहुत सारे सवाल जब हमसे उत्तर मांगते हैं तो हम निरूत्तर हो जाते हैं। दलील देनी तो दूर की बात है, हमारा अपना ही दिल नहीं मानता कि यदि सारी बातें उन्होंने हमारी ही माननी हैं तो फिर वो नई पीढ़ी भी कैसी हुई?

हर बड़ी पीढ़ी ने अपने किरदार, अपनी कहानियों और कृतियों के ज़रिए एक सामाजिक, धार्मिक और राजनितिक मॉडल पेश करना होता है। वह मॉडल हम सभी की ज़िंदगी के मार्गदर्शक बन कर ज़िंदगी की ज़मीं ज़ामिनी भर सकता है। समाज का बहुत बड़ा हिस्सा इस तरह के मॉडल की प्रतीक्षा में होता है, और ऐसे आदर्श को वह अपने इष्ट के बराबर मानने को तैयार भी हो सकता हैं, पर ऐसा मॉडल उनको कोई दिखाई देता ही नहीं और वो दुःखी होकर प्रचलित रिवायत पर ज़िंदगी जीने के इन्कारी हो जाते हैं। सियासत की नाव इतने गहरे पानी में डूब चुकी है कि उसकी खोज भी उनको बेकार लगती है। वैसे तो धर्म की नाव का भी यही हाल है पर पता नहीं क्यों अभी तक कईयों को थोड़ा बहुत विश्वास या यक़ीन इसमें बाक़ी है।

पर यक़ीनन जिन्होंने यह नाव अभी-अभी अपनी आंखों से डूबती हुई देखी है उनको तो कोई किनारा भविष्य में भी दिखाई नहीं दे सकता।

यह नाव थी, किसी भगवान तक पहुंचे हुये का दावा करने वाले व्यक्ति की। सभी ही धार्मिक चिन्हों के इन पहरेदारों ने मान लिया है कि मैं जो भी कह या कर सकता हूं उस पर धर्म की सर्वमोहर लग चुकी होगी। हर सफ़ेद या श्याम मेरे हुक्मनामे के अधीन होगा। सरोवर में तैरती हुई मछलियां तो मुझसे पूछ कर पानी पीती हैंं, फिर यह मेरी घर की मछली ने गंदे तालाब का पानी पीने का हौसला कैसे कर लिया?

यदि एक धर्मिक मॉडल हमारे सामने इस ज़िंदगी का है तो हमें पूरी ज़िंदगी ही तालाब के गंदे पानी जैसी लगती है। फिर यह नई पीढ़ी अपनी तलाश का सफ़र किस मॉडल के आर्शीवाद के साथ शुरू करे?

यदि हमारे निर्मित मॉडल, हमारे अपने घरों में ही धोखा दे गए हैं तो इसे विश्वस्तर या विशाल स्तर पर कैसे स्वीकारा जा सकता है?

हमारी सोच, विधि और करनी के कारण यदि हमारी नई पीढ़ी भटक रही है या उस सब से बेमुख हो रही है तो हम स्वयं ही इस के ज़िम्मेवार हैं।

अपने बचाव के लिए दोष किसी अन्य के सिर पर थोपने से हम दोष मुक्त नहीं हो सकते।

अपने किरदार के ज़रिए से हम अपनी नई पीढ़ी के सम्मुख पूरे दोषी और शर्मसार हैं। मॉडल न बनाने से, ग़लत मॉडल बनाकर हम इनको और भी गुमराह कर रहे हैं।

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