स्वर्ग जाएं हमारे दुश्मन

-विजय उपाघ्याए

दो सप्ताह की फ्रैन्च छुट्टी काटने के बाद मैं अपने कार्यालय गया। परिसर में पहुंचते ही नन्दू चपरासी से पता चला कि इंजीनियर कौशल इस दुनियां में नहीं रहे। बड़े ही नेक इंसान थे बेचारे- मगर ईश्वर की मर्ज़ी के आगे क्या कहना। बेहतर तो यह होता कि इनके बदले उस बुढ़ऊ अफ़सर को ले जाते। कम्बख़्त न खाता है, न खाने देता है, चला जाता तो कुछ राहत मिलती। यही बुदबुदाता हुआ मैं हॉल में पहुंचा, यहां सब कर्मचारी इकट्ठे होकर चाय की चुस्कियों में बीती शाम के बारे में गप्प लड़ा रहे थे। मैंने ‘हैलो हाय’ के बाद कौशल जी की ख़ाली पड़ी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘बड़े दु:ख की बात है, कौशल जी स्वर्ग सिधार गए।’

मेरे इतना कहते ही सभी की भौंहें तिरछी हो गईं, जैसे कोई घोर अपशब्द बोल दिये हों। इससे पहले कि मेरी खोपड़ी का ख़ाली स्थान भरता, वर्मा जी बरस पड़े ‘मिस्टर अक्ल-शक्ल ठीक न हो तो ज़ुबान तो ज़रा संभाल कर चलाया करो।’ मैंने ज़रा हौसला रख कर पूछ ही लिया- ‘आख़िर मैंने क्या कह दिया जो तुम जूते सहित सवार हो रहे हो।’

वर्मा जी बोले- ‘क्या कहा आपने? कौशल जी स्वर्ग सिधार गए? अरे स्वर्ग जाएं हमारे दुश्मन, कौशल जी वहां जाकर क्या करेंगे? अबे अक्ल के कंगाल, ज़रा सोच स्वर्ग में हमें क्या वे सुविधाएं मिल सकती हैं। जिन्हें हम इस लोक में पा रहे हैं। स्वर्ग से ज़्यादा सुविधाएं तो यहां मृत्युलोक में उपलब्ध हैं। दस-बीस हज़ार रुपयों की डिग्री लाओ। 25-30 हज़ार किसी नेता के माथे मारो, सरकारी नौकरी पाओ और सारी उम्र जी भर खाओ। स्वर्ग में तो वर्षों गुरुओं के आगे घुटने रगड़कर भी कोई मानद उपाधि तक नहीं मिलती- कमाएंगे क्या खाक़?’

‘मुझे तो वहां की भाषा ही बड़ी दक़ियानूसी लगती है। जब तक हम आठ दस किलो की कोई गाली नहीं परोसते तब तक बात में कुछ वज़न ही नहीं होता। क्या करें इस कलयुग में बिना वज़न के कोई काम भी तो नहीं निकलता। अब तुम लोग ही देखो। हम यहां रोज़ आते हैं, दूसरों की जेब से आई चाय और समोसे के साथ-साथ सारा दिन गप्पें लड़ाते हैं। कोई चढ़ावा चढ़ा जाए तो उसके अनुसार काम भी कर देते हैं। ठेकेदार लोग कमीशन दे जाते हैं, अपनी शाम मज़े से नाइट क्लबों में गुज़रती है और बीवी बच्चे भी सरकारी गाड़ियों में मस्ती मारते हैं। अब तुम ही बताओ स्वर्ग में हमें ऐसी सुविधाएं कहां मिलेंगी। वहां तो हमें रोज़ी रोटी के भी लाले पड़ जाएंगे दवा-दारू तो दूर की रही बच्चू!

‘सुना है स्वर्ग में प्रतिस्पर्धा न होने के कारण वहां अभी थर्ड ग्रेड सुरा ही मिलती है। यहां देखो देसी-अंग्रेज़ी, ठर्रा और इम्पोर्टेड टाइप की व्हिस्की, रम, जिन्न, बियर हो या फिर शैम्पेन, एक फ़ोन पर उपलब्ध हो जाती है। यहां मनोरंजन के व्यापक और विस्तृत साधन हैं और वहां संकुचित। स्वर्ग के राजा इन्द्र अभी तक स्टेज शो पर रम्भा और उर्वशी जैसी अप्सराओं का नृत्य देखते हैं। आम स्वर्गवासियों को तो यह सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। इधर हमें देखो, इंटरनेट की महामाया से जब भी बुद्धू बक्सा ऑन करेंगे- ऐश्वर्या, सुष्मिता व लारा जैसी सुन्दरियां भी टू पीस में नृत्यरत दिखेंगी।’

बात कुछ समझ में आने लगी। मैंने विनम्र होकर कहा- आप बुज़ुर्ग हैं और सही फरमा रहे हैं। इस विषय पर कुछ और रौशनी डालें, तो हम भी भावी पीढ़ियों को इसी के अनुसार अर्थात् ऐसी शिक्षा दे पाने में समर्थ होंगे। वर्मा जी बोले ‘मिस्टर तुम अभी बच्चे हो। मगर हम जैसे बुज़ुर्गों का फ़र्ज़ बनता है कि तुम्हें अपने अनुभवों से अवगत करवाते हुए सही शिक्षा दें।’

अब ज़रा देखो- शर्मा साहब का लड़का परसों दिन दिहाड़े उस विधवा की लड़की से बलात्कार कर बैठा। अरे भई जवानी है, सब चलता है। रश्मि मैडम के लड़के को देखो भरे-पूरे कॉलेज में उसने प्रिंसीपल के लड़के को ही गोली से उड़ा दिया। क्या हुआ? पच्चास-पच्चास हज़ार ही लगे न? आज दोनों बच्चे अपने-अपने घरों में आराम फरमा रहे हैं। अकड़ कर ठाठ-बाठ से आते-जाते हैं। सोसाइटी में उनका दबदबा है- क्या मजाल है कोई ऐरा-गैरा आंख भी उठाए। अगर हम स्वर्ग में होते तो हमारे यह बच्चे तो गले में फंदा डालकर किसी चौराहे पर लटका दिये जाते।

मेरी ओर इशारा करते हुए बोले, अब तुम ही बताओ, उस दिन जनरल स्टोर वाले ने तुमसे अपने रुपये वसूलने के लिए बीच बाज़ार में तुम्हें बेइज़्ज़त कर दिया और पुलिस वालों ने उसकी हड्डी पसलियां तोड़ दी। उस बेवकूफ़ को क्या मालूम कि सुविधा सम्पन्न लोग उधारी ना चुकाने के लिए ही लेते हैं। क्या मजाल कि रुपये मांगे और आपका क्या गया? पांच सौ रुपये ही दिये थे न पुलिसियों को, वे भी आपने शाम को ही सरकारी सीमेन्ट बेचकर पूरे कर लिए थे।’

वर्मा जी के चेहरे पर भ्रष्टाचार का अनुपम तेज़ चमक रहा था। उनकी वाणी मुखर होती गयी- ‘स्वर्ग को हम अपने लायक़ नहीं मानते क्योंकि वह हमारी आधुनिक आवश्यकताएं पूरी नहीं कर सकता, वहां से तो हम पृथ्वी लोक पर ही ज़्यादा सुविधा सम्पन्न हैं। अतः हम वहीं जाना चाहेंगे जहां हमें सुविधाएं अधिकाधिक मिलें। मनुष्य को किसी भी लोक में रहने के लिए समान्तर विचारों के लोगों की संगति मिलना बेहद ज़रूरी है। लेकिन जब हमारी संगति के कर्मचारी, झूठे मामले दर्जकर फंसाने वाले पुलिस कर्मी, जाली सर्टिफ़िकेट देने वाले डॉक्टर, सीमेन्ट की जगह रेत छापकर मोटी-मोटी कमीशनें देने वाला ठेकेदार आदि गणमान्य लोग ही नरक में जायेंगे तो हम स्वर्ग जाकर क्या करेंगे। आख़िर हम सामाजिक प्राणी हैं। और इनके बग़ैर हमारा समाज अधूरा है।’ वर्मा जी कुछ देर रुक कर शान्त स्वभाव से बोले- ‘मेरे ख़्याल से नरक से बेहतर हमारे लिए कोई दूसरा लोक उपयुक्त नहीं है। नरक में हमारे ऊपर कोई प्रतिबन्ध न होगा। हम जिस मर्जी नाली या गटर में दारू पीकर पड़े रहें, हमें वहां कोई डिस्टर्ब नही करेगा। जो काम हम यहां पर किन्हीं कारणों में नहीं कर पा रहे, वहां करने की पूरी स्वतंत्रता होगी। इसीलिए आओ मिलकर संकल्प करें कि आज के बाद जो भी हमारा साथी इस नश्वर देह को त्याग जाए वह नरक को ही प्रस्थान करे। हम भी यही कहेंगे कि वह नरक सिधार गए ताकि जाने वाले की आत्मा को शांति मिल सके।’ इतने में पांच बजे का हूटर बजा, सभी अपनी दिनचर्या से थके-थके रात्रिचर्या में चरने के लिए कार्यालय से बाहर निकल गये।

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