विवशता

“भइया! पी.एच.डी. करने के लिए मुझे लाइब्रेरी जॉयन करनी पड़ेगी, मनजीत भी हिन्दी में ही पी.एच.डी. कर रहा है। हम दोनों के विषय एक जैसे हैं। आप कहें तो मैं उसके साथ दिल्ली चली जाऊं।” शोभा ने बड़े भाई से अनुरोध करते हुए कहा।

“कोई ज़रूरत नहीं है पी.एच.डी. करने की। ख़बरदार जो किसी के साथ जाने की बात की तो….।”

“भइया, मनजीत हमारा पड़ोसी है। बिल्कुल मेरे भाई जैसा। वर्षों से आप इसे जानते हैं फिर भी आप….।”

“ज़्यादा सफ़ाई पेश मत कर।” बड़े भाई का लहज़ा सख़्त हो चला था।

“अच्छा भइया आप ही चलिये। इस समय मेरा लाइब्रेरी जॉयन करना बहुत ज़रूरी है। शीघ्र ही सिनॉपसिस तैयार करनी है।”

“एक बार कह तो दिया, नहीं जाना। फिर भी जाना ही है तो छोटा साथ जाएगा।”

“मगर छोटा तो बीमार है।”

“जब वह ठीक हो जाए तब चली जाना।” भाई ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए कहा।

“मम्मी! आप मेरी मदद क्यों नहीं करतीं? आप तो अच्छी तरह जानती हैं कि मुझे पढ़ाई का कितना शौक़ है। इसी तरह चलता रहा तो मैं सिनॉपसिस कैसे तैयार करूंगी?” उसकी आंखों में आंसू आ गए।

“मैं तेरे भइया से आगे नहीं चल सकती।” मां ने सपाट स्वर में कहा।

“आप मुझे क्यों नहीं पढ़ाना चाहते?” वह चीख पड़ी।

“क्या करोगी ज़्यादा पढ़-लिखकर। तेरी इन्टर पास बहन के लिए तो अच्छे लड़के नहीं मिल रहे, फिर तेरे लिए पी.एच.डी. लड़का कहां से ढूंढ़ कर लाऊंगी।” मां ने झुंझलाते हुए कहा और कमरे से बाहर चली गई।

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