श्रद्धा-सौंदर्य एवं लक्ष्मी है नारी

-रमेश सोबती

जहां नारी का सम्मान होता है वहां सम्पूर्ण ईश्वरीय सत्ता प्रसन्नता पूर्वक निवास करती है और जहां इस का अपमान होता है और अनादर की दृष्टि से देखा जाता है वहां सम्पूर्ण क्रियाएं निष्फल होती हैं। जिस घर में मां, बहन, पत्नी तथा पुत्रवधु दुखी रहती है वह वंश शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। पद्मपुराण में स्पष्ट लिखा है जहां पुरुष पुण्यमयी पतिव्रता पत्नी को त्याग दे तो धर्मार्थ भी उसे छोड़ कर चला जाता है उस का अर्जित किया हुआ सम्पूर्ण पुण्य निष्फल हो जाता है। साध्वी पत्नी के समान कोई तीर्थ नहीं है। नारी सदा से ही शक्ति का वाहन तथा पुरुष माध्यम रहा है। नारी चाहे पत्नी भी न हो लेकिन वह एक मां, पुत्री या शिष्य हो सकती है। तांत्रिक परम्परा में भी चौंसठ योगिनियों की पूजा सम्पूर्ण भारत में की जाती है। नारी शक्ति के इन चौंसठ आयामों के लिए चौंसठ मन्दिर बने हैं और ये शक्तिपीठ इन योगिनियों को समर्पित हैं। वैदिक ग्रंथों के अनुसार नारी शक्ति-सृजन करती है जिस में शिव निमित्त बनते हैं। भारत में हिन्दुओं ने विकास की प्रक्रिया को नारी के माध्यम से गति प्रदान करने के उद्देश्य से दोनों (नर तथा नारी) के संयोग को स्वीकारा है। जिस देश की संस्कृति में नारी को नर का पूरक माना जाता है, उसे शक्ति के रूप में पूजा जाता है। नारी की अनुकूलता स्वर्ग है उस का प्रतिकूल होना नरक से भी ज़्यादा बदतर है, स्त्री के समान दूसरी कोई औषधि नहीं है। समस्त कष्टों को दूर करने की नारी ही औषधि है। हिन्दू समाज में धार्मिक कर्मकांड भारतीय नारी के बिना सम्पन्न नहीं होते। इन में पुरुष की भूमिका गौण होती है, वास्तविक कर्त्ता या ऊर्जा नारी ही होती है जब कि नर मात्र सहयोगी होता है।

भारतीय नारी सौंदर्य की अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन माध्यम भी है। सत्यं, शिवं के साथ ईश्वर की तीसरी विशेषता सुन्दरम् है। ईश्वर को सुन्दरता बहुत प्रिय है और उस का अंश होने के कारण जीवात्मा भी प्रत्येक सुन्दर वस्तु को देख कर आकृष्ट होती है। सौंदर्य की ओर आकर्षण अंतरतम की अभिव्यक्ति है जो शाश्वत सौंदर्य की खोज करती है तथा उसे प्राप्त करने की सतत प्रेरणा देती है। शास्त्रों का वर्णन है कि बाह्य स्वरूप की दृष्टि से सुन्दर प्रतीत होने वाला संसार मिथ्या है लेकिन ऋषियों ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि अपना आप ही आकर्षित होकर विविध वस्तुओं एवं संसार को सुन्दर बनाता है। सौंदर्य का दिग्दर्शन इस आरोपण की प्रतिक्रिया मात्र है, जो जड़ वस्तुओं को भी सौंदर्य युक्त बना देता है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में भरहुत शिल्प (भारतीय कला) में नारी के शाश्वत सौंदर्य की धाराएं यहीं से प्रस्फुटित होती हैं। भारतीय शिल्प में नारी देवी तथा अप्सरा के रूप में अवतरित हुईं थीं। इस प्रकार नारी की मूर्तियों के आधार पर नारी-सौंदर्य का पर्याप्त परिचय मिलता है। विविध आभूषणों से अलंकृत नारियों के झीने रेशमी वस्त्रों से झांकता सुकुमार यौवन कलात्मक सिंगार के ज्वलंत उदाहरण हैंं। वेदिका स्तंभों पर उत्कीर्ण प्रतिमाएं आकर्षण मुद्राओं में स्नान के बाद बाल निचोड़ती हुई खड़ी सुन्दरियां, नूपुर, मेखला, केयूर, कर्ण-कुंडल आदि आभरण धारण किए हुए शोभायमान लगती हैं। सुरमे की सलाई से सुरमा लगाती हुई, अधर राग लगाती हुई, पैरों में अलता-महावर लगाती हुई, दर्पण देखती हुई, वेणी बंधनों तथा केश कलाओं में मग्न नारी सिंगार की ओर उन्मुख होती हुई चित्रित सोलह सिंगार में कितनी मनमोहक लगती है। नारी पूर्ण है, शक्ति है, ऊर्जा का पुंज है और है दुर्गा।

नारी को लक्ष्मी के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। भारतीय वाङ्मय में जब किसी के घर लड़की का जन्म होता है तो यही कहा जाता है कि लक्ष्मी का घर में प्रवेश हुआ है। वह संस्कृति है संस्कार लेकर आई है। लक्ष्मी को धन की देवी माना गया है। लक्ष्मी भगवान् विष्णु की पत्नी है और विष्णु का निवास श्री सागर में है जो कमल की जन्म स्थली है। ब्रह्मा ने इस धरती की सृष्टि कमल पर बैठ कर ही की थी और यह धरती भी लक्ष्मी का ही रूप मानी जाती है। उपनिषदों के अनुसार नारी नर के लिए अनुपम सहकारिणी है क्योंकि यदि नर जीव रूप से विचरण करता है तो नारी बुद्धि बन कर सहयोगी बनती है। यदि नर नारायण बन कर अगाध जलराशि में भयंकर शेष शय्या पर बैठना चाहते हैं तो नारी महालक्ष्मी बन अद्भुत वैभव द्वारा उसी को सुख शय्या बना चरण चांपती है। नर यदि राम बन कर रावण से युद्ध करते हैं तो नारी सीता बन कर अपने पतिव्रत रूपी तप से उनकी सहायता करती है। उमा शिव का आधा अंग है। नर यदि क्रोध है तो नारी शांति है। नर यदि वेत्ता है तो नारी विद्या (सरस्वती), नर यदि मोचक है तो नारी जीवन। लेकिन आज भी नारी दीप की तरह सुबक रही है। रोटी सेंकती नारी का हृदय चूल्हे के अंगारों पर तप कर फूल उठता है। उच्छृंखल नदी की तरह वह आज भी सामाजिक किनारों को तोड़ने में सक्ष्म नहीं हुई है। उस की उच्छृंखलता ममता में सिमट जाती है। वह कामवश होकर मां बनती है और सृष्टा हो जाती है, क्योंकि जिस तरह भगवान् सृजन करते हैं और नारी भी शिव की तरह सारी संवेदनाओं को एक ही सांस में पी जाती है।

स्वतंत्रता के बाद आज नारी की स्थिति कुछ सुधरी है और नैतिकता के आधार पर स्त्री और पुरुष की समानता स्वीकार कर ली गई है। वर्षों से होती आ रही आर्थिक और सामाजिक ज़्यादतियों को लगभग ख़त्म कर लिया गया है और व्यस्क मताधिकार से राजनीतिक क्षेत्र में भी नारी का महत्त्व बढ़ा है यहां तक कि वो विश्व सौंदर्य प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर भाग लेती है और ऐसा अनुभव होने लगा है कि आज की नारी जितनी स्वतंत्र है उतनी वह पहले कभी नहीं थी लेकिन समाज की अधिसंख्यक आम नारियों की स्थिति में ख़ास बदलाव अभी तक आया नहीं है।

उस की छवि अभी तक धूमिल ही है। वह अभी तक पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। जीवन के छोटे से छोटे फ़ैसलों के लिए आदमी के निर्णय का उसे स्वागत करना पड़ता है चाहे वह ग़लत ही क्यों न हो। नारी को केवल शोभा की वस्तु मान कर घर में सहेज कर रखा हुआ है। उस का अस्तित्त्व एक वस्तु के समान है उसे प्रजनन की भूमिका से परिभाषित किया जाता है। घरेलू गतिविधियों तक उस को सीमित रखा गया है।

प्राचीन भारतीय साहित्य में अर्द्धनारीश्वर की कल्पना की गई है। उपनिषद् में एक प्रसंग आता है कि संसार में एक आत्मा का अस्तित्त्व स्वीकार किया गया है, उसने और किसी दूसरे के साथ रहने की इच्छा की और स्वयं को ही दो भागों में बांट लिया। परिणाम स्वरूप वह स्त्री+पुरुष में विभाजित हो गया। नर और नारी दो आधे-आधे भाग हैं इन दोनों का पृथक-पृथक अस्तित्त्व नहीं है इन दोनों में कैसे प्रतिस्पर्द्धा हो सकती है। दो हाथ हैं, दो कान हैं, दो आंखें हैं। एक नाक में दो छिद्र हैं। मुंह से खाता है नीचे से निकालता है। नर देता है नारी स्वीकार करती है। शिशु का जन्म होता है सृष्टि की उत्पत्ति होती है। किसी भाग को कम आंकना तो कोई बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। हां यह अवश्य हो सकता है कि गुणवत्ता में थोड़ा बहुत अंतर हो। प्रकृति ने निश्चय ही नारी को अधिक गुण प्रदान किए हैं। वह धारण करती है धरती है वह। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में नर को नारी से सौ गुणा अधिक वन्दनीय माना गया है। नर और नारी को इस प्रतिस्पर्द्धा और वैमनस्य की इस नकारात्मकता से निकल कर सह-अस्तित्त्व पूर्वक कंधे से कंधा मिला कर पारस्परिक विकास सौहार्द और उस के द्वारा सामाजिक समरसता की भागीरथी को विश्व पटल पर सम्मानित करना होगा।

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