एक्स-रे

                                    

मूलः बलबीर परवाना

अनुवादः नरेश शर्मा दीनानगरी

मैं प्रायः ही उसे सुबह-सुबह देखता हूं। शॉल ओढ़े हुए वह पैदल ही आती और आगे जी. टी. रोड की ओर बढ़ जाती है। सम्भवतः बस अड्डे की ओर या शहर में ही। पीछे किसी गांव से आती है या बाहर बसे किसी मुहल्ले से, कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। कई बार सोचा है कि कुछ ‘अता-पता’ करूं परन्तु पराये स्थान की विवशता और कुछ शराफ़त के मुखौटे के कारण ऐसा कर नहीं सका हूं।

यहां आए हुए भी कौन-सा दीर्घ समय हुआ है अभी। मुश्किल से लगभग दो मास ही हुए हैं। यहां के बिजली बोर्ड के सब-सेंटर में नियुक्ति हुई है। सुबह दस बजे ड्यूटि आरंभ होती है। साइकिल पर दस मिनटों में कार्यालय जा पहुंचता हूं। कार्यालय जाने से पहले का सारा समय ख़ाली ही होता है। नहा-धो तो सुबह-सुबह ही लेता हूं और फिर समाचार-पत्र लेकर छत पर चला जाता हूं। सड़क पर आते-जाते लोगों को ताकता रहता हूं। सुबह-सुबह इनमें से अधिकतर स्कूलों के लड़के-लड़कियां होते हैं, कुछ कॉलेजों वाले भी। गांव के काम-काज के लिए आते आदमी, औरतें। ट्रैक्टरों पर भी, खच्चर गाड़ियों पर भी, स्कूटरों-कारों में भी। एक-दो बसें भी आती हैं, परन्तु आने वाले बस के अन्दर बैठे होने के कारण उनका पता नहीं चलता।

परन्तु उसके बारे में तो मैं अभी इतना भी नहीं जान सका हूं कि वह नौकरी करती है कि पढ़ती है। शॉल की ओढ़नी उसने ऐसे फैला रखी होती है कि पता ही नहीं चलता कि उसके हाथों में कुछ है या नहीं। मटक-मटक कर चलती हुई अपने आप में मस्त, आगे बढ़ जाती है प्रति दिन लगभग साढ़े आठ बजे के बाद और लगभग नौ बजे से पहले ही। मुहल्ले में अभी कोई मित्र भी नहीं बना है कि जिसके साथ कोई बात बांट सकूं। मकान मालिक ने कठोर शब्दों में कहा था, “आपके पास यूं ही फ़ालतू कोई नहीं आना चाहिए। बहू-बेटियों वाला घर है। यूं ही न आपके पास लड़कों की टोली बैठी रहा करे … यह अभी सोच लो…?” सोचना क्या था! तीन दिन कार्यालय की चारपाई पर सोने के बाद, इतना अका-थका था कि जी चाहता था कि कमरा मिले, चाहे कैसा भी हो। आंख मीचे मकान मालिक की सभी शर्तें मान ली थी।

तीन लड़कियां ही लड़कियां हैं मकान मालिक की। बड़ी वाली ने पढ़ाई छोड़ दी है और आजकल विवाह के सपने बुनती है। उससे छोटी वाली बी. ए. के अन्तिम वर्ष में है और सबसे छोटी वाली दसवीं में। मुझे कभी यह समझ नहीं आई है कि हम लड़कियों को इतना ढांप-छिपा कर, सम्भाल-सम्भाल कर क्यों रखते हैं। ऐसे जैसे वह रेवड़ियां हों। जिन्हें पता नहीं कब कोई मुंह में डाल लेगा। घर में भी मेरी पापा से इसी बात पर लड़ाई होती है। दीदी कार्यालय से ज़रा-सी भी लेट हो जाएं तो पूरी पड़ताल होती उसकी? कहां थी, क्यों थी? और कौन था साथ आदि-आदि। कई बार यूं ही पापा, दीदी के कार्यालय में फ़ोन करके पता करेंगे कि कार्यालय में है भी कि नहीं? मुझे पापा की यह जासूसों जैसी आदत कभी भली नहीं लगी।

यह न गांव है न शहर। क़सबा है, वह भी गांवनुमा। जी. टी. रोड पर बसा हुआ। रोड के साथ दोनों ओर दुकानों की पंक्तियां हैं। एक बाज़ार, बस अड्डे से क़सबे के अन्दर की ओर जाती सड़क पर है। और आस-पास के गांव से नौकरी-पेशा लोगों ने यहां आकर रहना आरम्भ कर दिया है। कुछ मुहल्ले बस गए हैं। इन मुहल्लों का अभी आपसी भाईचारा कोई नहीं विकसित हो सका है। बस एक दूसरे को जानते हैं, एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते। हर कोई अपने-अपने जज़ीरों में घिरा हुआ, स्व-केन्द्रित। और इस क़सबानुमा गांव में सबसे कठिन है किराए का मकान ढूंढ़ना। अभी-अभी सब-तहसील बना होने के कारण कईx-rey file image 1 सरकारी कार्यालय खुल गए हैं, परन्तु सुविधाओं की अभी कमी है।

किराए के मकान के लिए तीन जगहों से इसलिए इंकार हो गया था कि मैं विवाहित नहीं हूं। “बहू-बेटियों वाला घर है। हमने तो भई कोई परिवार वाला रखना है।” और अगला धड़ाम से किवाड़ बंद कर लेता। परिवार वाला … पता नहीं हमारे लोगों की यह कैसी मनोदशा है। वह समझते हैं कि हर अविवाहित लड़का भूखा भेड़िया है, जोकि पराए घर की बहू-बेटियों को देखते ही निगल जाएगा। अपनी इज़्ज़त खतरे में दिखने लगती है उन्हें।

छत पर से मैं प्रतिदिन देखता हूं उस जाती हुई लड़की को। इर्द-गिर्द के दुकानदार कैसे भूखी आंखों से ताकते हैं। आंखों से टपकती वहशत। इस आंखों की हवस को क्या कहोगे? कई नौजवान दुकानदार तो कई बार कटाक्ष भी कर जाते हैं परन्तु वह अपने आप में मस्त चली जाती है। शायद उसे तो यह एहसास भी नहीं होता होगा कि मैं प्रायः उसे देखने के लिए ही छत पर जाकर बैठता हूं। मानसिक चैन-सा मिलता है। क्या यह सेक्स का कोई मानसिक रूप तो नहीं?

“आपके घर रहने वाला लड़का तो ज़्यादा ही शरीफ़ है। कहीं आंख में डाले पता नहीं चलता।” एक दिन साथ वाले घर वाली पड़ोसिन, मकान मालिकन से कह रही थी। मैंने मन ही मन सोचा, ‘यदि कहीं मेरे मन में पलते सपनों के बारे इनको पता चल जाए? … पता नहीं मन ही मन में कितनी बार उनकी बेटियों को भोग चुका हूं। पता नहीं कितनी बार मैं मन ही मन खुद मकान मालकिन को भोग चुका हूं।’ उसकी आयु का हिसाब लगाएं, तो वह पैंतालीस से ऊपर बनती है, परन्तु लगती नहीं। बेटियों संग खड़ी, उनकी बड़ी बहन ही लगती है। पूरी पतिव्रता, परन्तु उस दिन…

मैं कुछ ठीक-सा नहीं था। कार्यालय जाने को तैयार तो हुआ परन्तु फिर चारपाई पर पड़ गया। अर्ध-निद्रित सा यूं ही लेटा रहा।

ग्यारह बजे के लगभग पवन आ गया। वह पहले भी कई बार इनके घर आता है। कई बार मध्य-रात्रि तक मकान मालिक के साथ बैठा शराब पीता रहता है। वह इनका रिश्तेदार है या सज्जन-मित्र इस संबंध में पता नहीं। और हां … उस दिन वह आया तो बड़ी बेटी भी घर में नहीं थी। छोटी दोनों पढ़ने गई थी और स्वयं सरदार वस्सन सिंह दिन में कम ही घर आता है। ठेकेदार है, नहरें पक्की करने और सड़कों के ठेके लेता है। मकान मालकिन आंगन में चारपाई पर पड़ी हुई थी। उसे देखते ही खिल उठी।

“आज घर में कोई नहीं दिखाई देता…”

पवन ने गेट से दाख़िल होते हुए कहा।

“बस, आज अपना ही राज है।”

“गेट बंद कर आऊं अंदर से।”

“कर आओ…।” और फिर चारपाई पर पड़ी को वह भूखा-उतावला जा पड़ा था। बांहों में उठा कर उसे अंदर ले गया। दो घंटे बाद निकले थे अंदर से।

हो सकता है उनके और भी कई दिन ऐसे ही बीते हों। मैं तो कार्यालय में होता हूं। क्या पता चलता है। पर्दे के पीछे एक खेल खेला जा रहा है। कैसे माप-दंड हैं, कैसे आदर्श हैं … शरीफ़ और शराफ़त, इज़्ज़तदार और मान-मर्यादा। यह कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनकी मुझे कभी भी समझ नहीं आई। कभी-कभी तो लगता है कि यह मूर्खता-पूर्ण शब्द हैं। जब भी मैं किसी बड़े के मुंह से सुनता हूं, ‘लोगों को अब लुच्चपुने का रंग चढ़ गया है, कोई शर्म-हया रही नहीं,’ तो लगता है, जैसे वह झूठ बोल रहा हो। पहले कौन-सा ‘लुच्चपुना’ नहीं होता था। घर के एक लड़के का विवाह होता था और बाक़ी सभी भाइयों की वह सांझी ‘बीवी’ बन जाती थी। सरेआम सभी को पता होता था। वह किसी को चाहती है या नहीं, इसका कोई अर्थ नहीं। वह तो बस ऐसी चपाती थी जिसने प्रत्येक की भूख मिटानी ही थी। कौन-कौन सा गुनाह नहीं हुआ है पहले, और अब क्या विचित्र हो रहा है? अब सम्भवतः पहले से कुछ कम ही हुआ हो। औरतों में चेतना बढ़ी है, औरत को उसकी इच्छा के बिना भोगना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा है।

परन्तु वह अपनी इच्छा से भी क्या कर सकती है?

“रवि, मैं तेरे साथ कुछ समय अकेले में बिताना चाहती हूं।” एक दिन लंच के समय सविता ने कहा। वह निकटवर्ती क़सबे से प्रतिदिन आती है बस से। लगभग पौने घंटे का सफ़र है। सुबह आती है, शाम को लौट जाती है, “मैं तेरे साथ तेरे कमरे में चलूं!”

“मेरे कमरे में! वहां कौन हमें अकेले में बैठने देगा … मकान मालकिन चक्कर पर चक्कर मारेगी। हो सकता है तेरे जाने के बाद कमरा ख़ाली करने का हुक्म ही सुना दे।”

“यहां कोई होटल या रेस्टोरेंट नहीं?”

“होटल! … यहां तो कोई चाय की दुकान भी नहीं है ढंग की … हम जालन्धर चले जाते हैं।”

“मैं इतना समय नहीं निकाल सकती, मैं तो आधा-पौना घंटा देरी से घर जा सकती हूं, वह भी बस लेट होने का बहाना बनाकर। तू नहीं जानता मेरे पापा को … पूरे पुलिसिया हैं।” वह उदास हो गई।

अपने कमरे में मैं प्रतिदिन अकेला होता हूं। इसने मेरे संग किसी औरत की महक का आनंद नहीं लिया। कभी मकान मालकिन भी अंदर नहीं आई। कुछ कहना हो तो किवाड़ के बाहर से हुक्म सुनाने जैसा कह देगी।

इस क़सबा बन रहे गांव में, ऐसे एकान्त जीवन व्यतीत करना कितना कठिन है, इसका एहसास ऐसी जगह पर रहकर ही होता है। कोई पार्क नहीं, कोई लाईब्रेरी नहीं, कोई रेस्टोरेंट या होटल नहीं। कोई भी ऐसी जगह नहीं जहां जाकर आप स्वतन्त्रता से बैठ सको, घूम-फिर सको। दूसरी बार बाज़ार से गुज़र जाओ तो देखने वाले कोई न कोई अनुमान लगाना आरम्भ कर देते हैं। वही जाने-पहचाने से चेहरे, वही जाने-पहचाने से अंदाज़। गांव वाली भ्रातृभाव वाली सांझेदारी नहीं रही, नगरों वाला अजनबीपन विकसित नहीं हो सका।

सप्ताह, दो सप्ताह के बाद गांव जाता हूं तो मां प्रायः ही किसी न किसी रिश्ते की बात शुरू कर लेती है, “तू कहीं भी हां कर … रोटी तो पकी हुई खाएगा। होटलों की रोटी खा-खाकर तो आदमी यूं ही बीमार हो जाता है।” शायद मां कहना तो यही चाहती कि अब तुझे साथी की आवश्यकता है, परन्तु बहाना रोटी के पकाने का लगाती है।

मुझसे मां की बात की कोई भी हामी नहीं भरी जाती। प्रायः चुप ही रहता हूं। परन्तु छुट्टी के बाद इस कमरे में आकर औरत के साथ की बड़ी तीव्र इच्छा अनुभव होती है। फिर इर्द-गिर्द झांकता रहता हूं या और नहीं तो बंद खिड़की की दरारों में से मकान मालिक की बेटियों की ओर टक लगाए रखता हूं।

जानता हूं, यह मेरे हवाई-महल ही हैं। उन लड़कियों ने कभी भी मेरे कमरे में मेरा एकान्त बांटने नहीं आना है। न ही सुबह गुज़रने वाली उस लड़की ने ही। फिर भी पता नहीं क्यों मैं इन हवाई कल्पनाओं से पीछा नहीं छुड़ा सकता हूं।

प्रतिदिन, सुबह, शाम, दोपहर, रात … ऐसे ही गुज़रे जा रहे हैं।  

 

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