राष्ट्र निर्माण या चरित्र निर्माण

-दीप ज़ीरवी

“वसुधैव कुटुम्बकम्”

जहां हमारी संस्कृति हमारे संस्कार हमारा गौरव है, वहीं हमारी पहचान है हमारा चरित्र और हमारा राष्ट्र।

“राष्ट्र” केवल ग्रामों, नगरों, जनपदों, महानगरों का समूह मात्र नहीं राष्ट्र एक संकल्प है एक निष्ठा है एक प्रतिष्ठा है। हमारे राष्ट्र निर्माण हेतु हम सब के भी कुछ कर्त्तव्य हैं राष्ट्र की सबसे छोटी इकाई को व्यक्ति माना जा सकता है।

राष्ट्र निर्माण हेतु व्यक्तित्व निर्माण की आवश्यकता रहती है और व्यक्ति के निर्माण को चरित्र निर्माण के बिना अधूरा जाना जाता है।

आख़िर क्या है चरित्रः- मनसा वाचा कर्मणा एकात्म होना ही सही चरित्र की पहचान है। वर्जित दैहिक नातों से परहेज़ करना चरित्र का एक अंग मात्र है।

चरित्र के अन्य कई आयामों को बहुधा अनदेखा-सा किया जाता है हम अपनी जड़ से कोसों दूर जा निकले हैं। आज नैतिक मूल्यों को बुद्धू बक्सा (टी.वी.) ही चबा निगल रहा है। क्या ड्रामे और क्या धारावाहिक सब में विवाहेत्तर संबंधों में उन्मुक्तता रखने, बरतने वाले बोल्ड एवं ब्यूटीफुल चरित्रों का बोल-बाला दिखाया जा रहा है।

अधकचरा कामुक फ़िल्मांकन धड़ल्ले से परोसा जा रहा है। आज रिश्तों की ही गरिमा लुट रही है धर्म-भाई, धर्म-बहन की तो बात छोड़िए क़रीबी रिश्तेदारियां तक गंदला गई हैं। अविश्वास का कोहरा सब रिश्तों पर जब भारी पड़ता दिखे तब चरित्र निर्माण राष्ट्र निर्माण का संकल्प करना और भी आवश्यक हो जाता है।

चरित्र में जहां रिश्तों की गरिमा बनाए रखना होता है वहीं सदाचार और सभ्याचार एवं कर्म सिद्धांत को अपने जीवन मूल्यों में समावेश करना भी अनिवार्य होता है।

राष्ट्र रसातल में चला गया तो हमारे होने का क्या लाभ। यदि राष्ट्र जन-गण सबल होंगे, वीर्यवान, ओजस्वी होंगे, विवेकशील, क्षमा-शील, पराक्रमी होंगे तो राष्ट्र अभ्युदय अवश्यंभावी है।

‘नारी सवर्त्र पूज्यते’ स्मरण रहे चरित्रवान महापुरुषों स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानंद की भांति ओजस्वी जन-गण ही राष्ट्र में नव जीवन संचार कर सकते हैं।

राष्ट्र के प्रति अपनी-अपनी योग्य आहुति देना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य परायणता, सत्यनिष्ठा, सुसंस्कारों से युक्त माता-पिता ही चरित्रवान संतति के जनक हो सकते हैं।

राष्ट्र निर्माण स्वतः हो जाएगा चरित्र निर्माण हो जाने दो।

 

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