कन्या भ्रूण हत्या

-शबनम शर्मा

कन्या भ्रूण हत्या आज के युग में न केवल वीभत्स अमानवीय कर्म है बल्कि कानून के विरूद्ध भी है। आज इस कुकृत्य के लिए दूरदर्शन, इश्तहारों के माध्यम से समाज में इस भ्रूण हत्या के बारे में लोगों को जागृत करने के लिए सरकार काफ़ी ज़ोरों पर है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि फिर भी जनता इससे अवगत नहीं हो रही। न जाने हमारे समाज में लड़की को हीन क्यों समझा जाता है। आज समय बदल गया है। आज यदि लड़कियों का सहयोग न मिले तो लड़के कोई काम नहीं कर सकते। वस्तुतः लड़की तो स्वर्ग का द्वार है। लड़की के अनेक रूप हैं, वह बहन है, पत्नी है, माता है, वह पुत्री भी है। महारानी लक्ष्मी बाई को कौन नहीं जानता, जिसने आत्म बलिदान के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम की नींव डाली थी। यही नहीं सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, इन्दिरा गांधी आदि नारियों ने प्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। आज हर क्षेत्र में लड़कियां ही राष्ट्र निर्माण में कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य करने में लगी हुई हैं। निःसंदेह लड़की तो घर की लक्ष्मी है, वह मानव जीवन के समतल में बहने वाली अमृत सलिल है। वह न हो तो जीवन उजााड़ मरुस्थली बन जाए। उसकी प्रसन्नता, मुस्कान, चमकती हुई दृष्टि, स्नेहपूर्ण वाणी, प्रेममय हृदय, सेवा परायणता, त्याग, बलिदान भावना, सहिष्णुता और औदार्य परमात्मा का सबसे बड़ा चमत्कार है। दोनों एक ही शरीर के दो भाग हैं। दोनों एक-दूसरे से बढ़कर हैं, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यही नहीं मानव सभ्यता और संस्कृति में लड़कियां हज़ारों वर्ष आगे हैं। यही कारण है कि हम लड़की को देवी कहते हैं, लड़के को देवता नहीं कहते। परंतु अफ़सोस की बात तो यह है कि इतना सब जानते हुए भी कन्या भ्रूण हत्या क्यों?

क्या लड़की समाज के लिए कलंक है? क्या लड़के पैदा होते ही अपने साथ पैसों की थैलियां भरकर लाते हैं जो लड़कियां नहीं लातीं? आज लड़की के पैदा होने पर दशा इतनी दयनीय और वीभत्स क्यों? क्या माताएं लड़की को नौ मास तक अपने गर्भ में रखकर उतना कष्ट नहीं भोगती जितना लड़के के समय भोगती हैं? तो फिर लड़की के साथ इतना क्रूर व्यवहार क्यों? शायद समाज इस बात को अनदेखा कर रहा है कि लड़कों के अनुपात में लड़कियां कितनी कम हो गई हैं। वो समय अब दूर नहीं कि घर बसाने के लिए लड़कियां कम पड़ जाएंगी। स्त्री ही प्रकृति है, वंदनीय है उसके बिना सुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रकृति के विधान को न तोड़ते हुए हमें कोख में ही नारी के बीज नष्ट करने का कोई हक़ नहीं। सरकार को इसके विरुद्ध कड़े क़दम उठाने चाहिए। प्रसव से पूर्व लिंग जांच पर पूरा-पूरा अंकुश होना चाहिए व इसकी उल्लंघना करने वाले को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। अंत में मैं लिखना चाहूंगी कि भारत की संस्कृति सारे विश्व में सर्वोच्च है इसमें इस तरह के घिनौने कार्य शोभा नहीं देते।

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