मेहंदी बिन सिंगार अधूरा

-नीना मित्तल

प्राचीन काल से ही नारी को सजने-संवरने का शौक़ रहा है। स्वयं को कभी वह फूलों के गहनों से सजाती रही है तो कभी सोने-चांदी या अन्य धातुओं से निर्मित गहनों से। इसके अतिरिक्त वह तरह-तरह के सौंदर्य प्रसाधनों का भी प्रयोग करती है जो उसकी सुन्दरता में चार-चांद लगा देते हैं। कलाई भरकर हरी-लाल चूड़ियों, माथे पर झिलमिल करती बिन्दी, काजल, सिंदूर, कानों में झूमर तथा और भी न जाने क्या-क्या प्रयोग करती है नारी अपनी साज-सज्जा के लिए। वैसे भी नारी के सोलह सिंगार माने गये हैं। इन सब सिंगार साधनों के साथ यदि हाथों में मेहंदी न लगी हो तो सिंगार कुछ अधूरा सा लगता है। सूनी हथेलियां सारे सिंगार को फीका कर देती हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति लिए तरह-तरह के बेल-बूटे जब हथेलियों पर उभर कर आते हैं तो नारी सौंदर्य में चार गुणा वृद्धि कर देते हैं।

भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही मेहंदी का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। हज़ारों वर्षों से स्त्रियां इसका प्रयोग करती आ रही हैं। इसे नारी के सौभाग्य का चिन्ह भी माना जाता है। इसलिए विवाह के अवसर पर जब दुलहन का सिंगार किया जाता है तो मेहंदी को महत्त्व दिया जाता है। आजकल सभी महिलाएं चाहे विवाहित हो या कुंआरी, मेहंदी रचाने का शौक़ रखती हैं। स्त्रियां त्योहार, विवाह या अन्य मांगलिक अवसरों पर मेहंदी ज़रूर लगाती हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, बिहार, उड़ीसा आदि राज्यों में मेहंदी लगाने की परम्परा अधिक है। 

मेहंदी मांडना भी एक कला है। मेहंदी का प्रयोग ताज़ी हरी पत्तियों को पीस कर किया जाता है और सूखे पाउडर को घोल कर भी हथेलियों पर लगाया जाता है। यदि मेहंदी की ताज़ी पत्तियों का प्रयोग करना हो तो उन्हें पहले बारीक-बारीक पीस लिया जाता है। फिर उसमें भिण्डी का पानी मिलाकर लेस तैयार कर लेते हैं और तीली या कोन की मदद से हथेलियों पर लगा देते हैं। मेहंदी के कुछ पारम्परिक डिज़ाइन होते हैं जबकि कुछ साधारण बेल-बूटे भी होते हैं। जब मेहंदी थोड़ा सूखने लगती है तो उस पर नींबू चीनी का घोल रूई की सहायता से धीरे-धीरे इस तरह लगाते हैं कि डिज़ाइन का रूप न बिगड़े। कुछ लोग इसमें चाय का पानी भी मिलाते हैं। ऐसा समझा जाता है कि ऐसा करने से मेहंदी का रंग गहरा होता है। पाउडर के प्रयोग में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। परन्तु उसे थोड़ा कपड़छन ज़रूर करना चाहिए ताकि गांठें वग़ैरह न रहें। इसे खूब फेंट कर उसमें थोड़ा हिना-इत्र मिला लेना चाहिए। इससे मेहंदी की ताज़गी और खुशबू का भीना-भीना एहसास मन को भीतर तक बाग़-बाग़ कर देता है। मेहंदी लगाने के 2-3 घंटे बाद इसे चाकू या छुरी की सहायता से धीरे से उतार देते हैं और तेल लगाकर छह-सात घंटे के लिए यूं ही खुला छोड़ देते हैं। इस बीच हथेलियों पर पानी नहीं लगने देना चाहिए। अब मेहंदी अपना पूरा रंग हथेलियों पर छोड़ देती है और उभर आते हैं मनमोहक बेल-बूटे जो हाथों पर अपनी आकर्षक छटा यूं बिखेरते हैं कि देखने वालों के मुंह से बरबस ही निकल जाता है…. वाह! क्या रची है मेहंदी।

आजकल मेहंदी के अधिकाधिक प्रचलन को देखते हुए इसे व्यवसाय के रूप में भी अपनाया जा रहा है और जगह-जगह इस का प्रशिक्षण दिया जाने लगा है। मेहंदी मात्र सिंगार के लिए ही नहीं है, इसकी उपयोगिता भी है। यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी को सोख कर शीतलता प्रदान करती है। इसलिए प्रचण्ड गर्मी से बचने के लिए पैरों के तलवों और हथेलियों पर इसका लेप किया जाता है। इसलिए सावन के महीने में विशेष तौर से मेहंदी लगाना केवल परम्परा ही नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी है।

वास्तव में मेहंदी अपने अंदर बहुत कुछ समेटे हुए है। मेहंदी शब्द सुनते ही एक मीठी, मनमोहक-सी सुगंध मन में रच बस जाती है। यह हमें एकता का भाव भी सिखाती है क्योंकि यह अमीर ग़रीब, जाति-पाति, छोटे-बड़े सब का भेद भुलाकर सभी की हथेलियों पर समान रूप से अपनी छटा बिखेरती है। यह नारी के सौंदर्य में चार चांद लगा देती है। तभी तो सम्पूर्ण सिंगार होने के बावजूद यदि हथेलियों पर मेहंदी ने अपनी छटा न बिखेरी हो तो मन यही कहने को मजबूर हो जाता है, मेहंदी बिन सिंगार अधूरा-सा लग रहा है।

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