आधुनिक सीता

“बस इस मोड़ पर ही गाड़ी रोक दो, आगे मैं चली जाऊंगी।”

“ओ. के.” कहते हुए अरुण ने ब्रेक लगाया, अपना पर्स संभालती हुई शिखा गाड़ी से उतर गई। अरुण को गाड़ी फिर से स्टार्ट करते देखकर बोली, “चलो आज की तो माफ़ी है मगर नैक्स्ट् टाइम घर आये बिना मैं नहीं जाने दूंगी।” 

“ऑफकोर्स” कहते हुए अरुण ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। शिखा ने घड़ी पर नज़र डाली, ‘बाप रे! सात बज गए, पौने नौ बजे तक फिर ऑफ़िस के लिए निकलना है’, सोचते हुए वह तेज़ क़दमों से घर की ओर बढ़ी। कॉल बैॅल बजाने कि लिए उसने हाथ बढ़ाया तो देखा कि दरवाज़ा खुला था, शायद जाते वक़्त बाई बंद करना भूल गई थी। यह भी बस किसी दिन बड़ा नुक़सान कराकर मानेेगी। सोचते हुए शिखा अंदर आ गई। सुमित बालकनी में बैठा अख़बार पढ़ रहा था, चाय का ख़ाली कप पास के स्टूल पर रखा था। नाशता और लंच तैयार करने के बाद उसको भी ऑफ़िस के लिए तैयार होना है, इसलिए सुमित से थोड़ी देर बाद मिलती हूं, सोचकर किचिन में आकर शिखा ने जल्दी से सब्ज़ी काट कर छौंक दी और दूसरी गैस पर वह परांठे बनाने लगी। फिर सब सामान समेट कर वह नहाने चली गई। तैयार होकर उसने चाय बनाई और ट्रे लेकर बालकनी में आ गई। 

“गुड मॉर्निंग” ट्रे को स्टूल पर रखते हुए शिखा बोली। सुनकर सुमित ने पेपर से नज़र हटाई, पल भर के लिए उसे देखा और फिर से पेपर पढ़ने लगा। 

“अरे! हमारी विश का कोई जवाब नहीं। क्या बात है, तबीयत तो ठीक है तुम्हारी?” सुमित के माथे को छूते हुए शिखा ने पूछा। सुमित ने तुरंत ही उसका हाथ झटक दिया। 

“क्या बात हुई, कमाल है यह तो पूछा ही नहीं कि रात कहां और कैसे बिताई? चले हैं नाराज़ होने।” 

“मुझे अच्छी तरह मालूम है कि रात कहां और कैसे बिताई।” सुमित ने तीखे अंदाज़ में कहा।

“मतलब?” 

“मतलब तुम ज़्यादा बेहतर समझती हो।” 

“सुमित तुम्हें पता है, तुम क्या कह रहे हो?” 

“अच्छी तरह पता है।” 

“तुम होश में तो हो।” 

“पहले नहीं था मगर अब आ गया हूं।” 

“तुम कहना क्या चाहते हो?” 

“यही कि अब तुम्हें फ़ैसला करना होगा नौकरी और मुझ में से किसी एक को चुनना होगा। मैं यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरी बीवी नौकरी के नाम पर मौज़ मस्ती करे, रात-रात भर घर से ग़ायब रहे।”

“सुमित।” शिखा चीख पड़ी, “तुम मुझ पर शक कर रहे हो।”

“शक नहीं, मुझे पूरा यक़ीन है कि नौकरी तो बस बहाना है घर से बाहर घूमने जाने का। कौन है यह लड़का जो तुम्हें छोड़कर गया था? क्या नौकरी करने का यही मतलब है कि तुम्हें पूरी आज़ादी मिल गई, तुम जो मर्ज़ी आए करो, तुम्हें कोई रोकने वाला नहीं।” 

“अच्छा तो अब मेरी जासूसी भी करने लगे हो, तुम्हें क्या मालूम उसके बारे में।” 

“मुझे ज़रूरत भी नहीं है मालूम करने की क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं ऐसे लोगों को, जो टाइम पास करते हैं और फिर उनकी भी क्या ग़लती, जब कोई खुद ही अपना सब कुछ सौंपने को तैयार हो।”

“बस! सुमित बस! बहुत हो गया, बहुत कह चुके तुम और बहुत सुन चुकी मैं। अब आगे एक लफ़्ज़ भी नहीं वरना।” 

“वरना क्या? घर छोड़कर चली जाओगी। तो जाओ कौन रोकता है तुम्हें? और हां कान खोलकर सुन लो फिर वापिस आने की ज़रूरत नहीं। मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहता। नफ़रत हो गई है तुमसे।” कहकर सुमित ने बेडरूम का दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया। शिखा की रुलाई फूट पड़ी, पर्स उठाकर वह घर से बाहर आ गई। इतना अपमान, इतनी बेइज़्ज़ती बिना सच्चाई जाने। इतना ही विश्वास है सुमित को उस पर, बस अब और नहीं। उसने सामने से आते हुए ऑटो को हाथ देकर रोका और उसमें बैठकर चल दी।

शिखा को घर से गए दस दिन हो चुके थे, दोनों में से किसी ने भी मिलने की कोशिश नहीं की।

उस दिन शाम को सुमित ऑफ़िस से लौट रहा था कि पीछे से आते हुए हॉर्न की आवाज़ सुनकर उसने स्कूटर रोक दिया। “क्या बात है जीजा जी? कहां बिज़ी रहते हैं?” सामने मोटरसाइकिल पर सवार रवि ने पूछा। “हम लोग आपसे ही मिलने आ रहे थे, इनसे मिलिए यह हैं हमारे मामा जी के बेटे अरुण भैया। अभी पन्द्रह दिन पहले इन्होंने दीदी के ऑफ़िस को ज्वाइन किया है।”

“नमस्कार जीजा जी! माफ़ करना उस दिन दीदी को छोड़ने भी आया मगर लेट होने के कारण आपके दर्शन नहीं कर सका, चलो अब तो मिलना होता रहेगा। हां उस दिन नए प्रोजैक्ट के सिलसिले में हम लोगों को अचानक मेरठ जाना पड़ा, दीदी ने अपको कॉन्टैक्ट करने की बहुत कोशिश की मगर न जाने क्यों आपने मोबाइल नहीं उठाया और फिर अचानक वहां हुए दंगों के कारण लौटना नहीं हो पाया। उस रात, माई गॉड, बहुत मुश्किल से मैनेज किया। दीदी को तो बहुत तेज़ सिरदर्द भी हो गया था। मेरे लाख कहने पर भी उन्होंने मेडिसिन नहीं ली। कहने लगी, “मेरे सिरदर्द की दवा तो बस सुमित के ही पास है बस एक बार सिर पर हाथ रखेगा और मेरा सारा दर्द ग़ायब हो जाएगा। सच अरुण, सुमित का मेरे लिए प्यार ही है जो मुझे किसी भी परेशानी से तुरन्त उबार लेता है।” अरुण बोले जा रहा था और सुमित तो जैसे सुन्न होता जा रहा था। ‘ओह! यह उससे क्या हो गया उसे याद आया कि उस दिन वह अपना मोबइल ऑफ़िस ले जाना भूल गया था। बिना कुछ सोचे यह क्या अनर्थ कर दिया उसने शिखा के साथ। वो शिखा जिसने हर क़दम पर उसका साथ दिया, उसके ऊपर आई हर मुसीबत को खुद पर लेकर ज़िंदगी की तपती धूप में उसे शीतल छाया दी, अपने प्यार से उसके तन-मन को सराबोर किये रखा और इतने समय में कभी उसे शिकायत का मौक़ा नहीं दिया। सुमित को याद आया कि ट्रक के साथ हुए एक्सीडेंट में जब वह ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा था, तब वह शिखा ही थी जिसने दिन रात एक कर उसकी सेवा की और फिर पैसों की ज़रूरत पड़ने पर जब अपने ही सगों ने आंखें फेर ली तो उसने अपने सारे गहने बेचकर उसका इलाज कराया और खुद नौकरी के लिए कितनी ठोकरें खाई। उस समय बहुत मुश्किल से शिखा को यह नौकरी मिली थी। कितना थक जाती थी वह सारा दिन ऑफ़िस का काम, घर, अस्पताल और उसकी देखभाल। मगर फिर भी उसके चेहरे पर कोई शिकन नज़र नहीं आती थी। यदि कभी वह भी कुछ कहता तो उसका यही जबाव होता कि मुझे तुम्हारे साथ के अलावा दुनियां का कोई सुख नहीं चाहिए, तुम ठीक हो जाओ बस मेरे लिए इतना ही काफ़ी है। तब शिखा उसे देवी लगती और उसी शिखा की उसने बेइज़्ज़ती कर घर से निकाल दिया।’ वह तो अब माफ़ी के क़ाबिल भी नहीं है। वो क्या करे अब? लेकिन वह जानता है कि शिखा उसे बहुत प्यार करती है, उसके नाराज़ होने पर वह कितनी बेचैन हो जाती है। खुद वह कितनी बार कह चुकी है कि जब तुम मुझ से नाराज़ होते हो तो मुझे लगता है कि मेरी ज़िंदगी में कुछ नहीं बचा। वह जानता है कि वह शिखा की सबसे बड़ी कमज़ोरी है, वह अभी शिखा को फ़ोन करेगा और सॉरी बोलकर उस को वापिस ले आएगा।”

घर जाकर सुमित ने शिखा का नम्बर मिलाया।

“हैलो।” उधर से आवाज़ आई।

“हां, शिखा मैं सुमित हूं।”

“बोलो, मैं सुन रही हूं।”

“बहुत नाराज़ हो, अच्छा बाबा। सॉरी।”

“सॉरी किस लिए सुमित। तुमने तो बस अपने मन की बात ज़ाहिर की है कि तुम क्या सोचते हो मेरे बारे में।” 

“नहीं, शिखा रियली आई एम एक्स्ट्रीमली सॉरी। प्लीज़ तुम लौट आओ, आई मिस यू वैरी मच।”

“नहीं सुमित। यह नहीं हो सकता।”

“प्लीज़ शिखा। तुम जो कहो मैं करने के लिए तैयार हूं पर तुम आ जाओ। तुम्हारे बिना घर, घर नहीं लगता।”

“देखो, सुमित। पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास ही तो होता है जो उन्हें एक मज़बूत रिश्ते में बांधे रखता है और जब वह ही नहीं तो फिर रिश्ते का दिखावा कैसा।”

“नहीं शिखा। यह दिखावा नहीं, सच मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं।”

“क्यों खुद को छलावा दे रहे हो सुमित। यह तुम्हारा प्यार नहीं बल्कि ज़रूरत है।”

“ऐसा मत कहो, हम सब कुछ भुला कर फिर से नई ज़िंदगी शुरू करेंगे।” 

“मेरे लिए यह मुमकिन नहीं, मुझे नहीं मालूम कि तुम्हारे मन में मेरे लिए क्या है? मगर मेरे मन में तुम्हारे लिए प्यार और इज़्ज़त बिल्कुल ख़त्म हो चुकी है, अब दोबारा हमारा एक साथ रहना मात्र एक समझौता होगा और समझौते के आधार पर बने रिश्ते स्थाई नहीं होते।” कहकर शिखा ने फ़ोन रख दिया।

 

 

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