पारो खुश है

पारो मेरी बाल सखी है। छाया की तरह मैं हमेशा उसके साथ-साथ चलती रहती हूं। वह मेरे पास रहे या दूर इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता। वैसे असली मिलन तो मन का ही होता है। जैसे ही मैं आंखें बंद करती हूं वह मेरे सामने आ खड़ी होती है और हम दोनों गलबइयां वाली दुनियां में पहुंच जाती हैं। छुअन मात्र से ही मुझे पता चल जाता है कि कब वह खुशी के दरिया में तैरती है। और कब वह उदासी के गहरे समंदर में डूब जाती है। मुझे मालूम है कि आजकल वह बहुत खुश रहने लगी है, बहुत-बहुत खुश। वैसे खुशी कोई वस्त्र नहीं है जिसे जब-तब ओढ़ पहन लिया और जब तब उतार-तहा दिया।

जब वह लुकन-छिपाई वाली दुनियां में सांस लेती थी तब भी वह खुश रहा करती थी। ढोलक की थाप पर टप्पों की सुर पर वह खुश थी। सुतली वाले पीढ़े पर बैठकर मामा के घर का सुच्चा चूड़ा पहना जब उसे कलीरे बांधे गये थे तब भी वह खुश थी। लाल सुर्ख़ जोड़ा पहना जब किसी अजनबी के साथ फेरे डलवा दिये गये थे तब भी वह खुश थी। जौं-खीलों को पीठ पीछे उछालते, बाबुल का घर छोड़ते, पिया-आंगन क़दम रखते समय भी वह बहुत खुश थी। उसके रूपहले-दमकते रूप पर रीझने के बजाय जब पति कहे जाने वाले अजनबी ने पहली मुलाक़ात में ही उस पर मां-बहन की ढेर सारी मर्दानी, गालियां बरसा दी थी। तब भी वह बहुत खुश थी। भला वह खुश कब नहीं थी।

कोल्हू के बैल की तरह, काम करते, चौका-बासन करते, कपड़े धोते, आंगन लीपते और अजनबी की हवस का शिकार बनते वक़्त भी वह बहुत खुश थी। यह दूसरी बात है कि अपनी उस खुशी को आंखों के आबदारी रूप में लुढ़का उसे वह मलमल की ओढ़नी में सहेज लिया करती। अपनी हमउम्र लड़कियों की तरह न उसने सपने देखे, न प्यार किया और न आसमान में घर बसाया और न मायके की दहलीज़ पर माथा टेका। उसे जो कुछ भी मिला स्वीकार कर लिया। कभी दब्बू बनकर और कभी अपनी इज़्ज़त का लिहाज़ कर। इसी लिहाज़ी और बेलिहाज़ी वाली दुनियां में वह कैसे जी जाती थी, यह मैं ही जानती हूं। और बिना कुछ कहे सुने मैं उसके साथ-साथ चलती रही साथ-साथ वाली चाल ने मुझे एहसास करा दिया कि कोई भयंकर तूफ़ान आने वाला है। उसके इकलौते किशोर बेटे ने ही जब उसे ठेंगा दिखा दिया तब पारो ने मन ही मन चट्टान जैसा कठोर निर्णय ले लिया। वह जान चुकी थी कि उसकी औलाद उसे रुलाए बिना मानेगी नहीं।

एक दिन जब उसके घर से मुझे हाबड़-ताबड़ बुलावा मिला तो मेरी बदहवासी का ठिकाना ही नहीं रहा। मेरे पहुंचने से पहले महाभारत थम चुका था। न कहीं ‘अर्जुन’ का पता था न कहीं ‘अभिमन्यु’ का। वैसे ज़िंदगी में बिना अर्जुन, अभिमन्यु के ही रहना पड़ता है। इससे पहले कि मैं कुछ पूछती मेरे कानों में जो चंद वाक्य गूंजे वे ये थे…

‘समझाओ जी अपनी सहेली को। अब इस उम्र में पढ़ाई करने चली है।’ 

‘घर-गृहस्थी संभलवाओ।’ 

‘चलित्तर ही ऐसा है, नहीं तो मर्द को बांध कर न रखती।’ 

‘पता नहीं किस-किस से आंखें लड़ाती फिरती है तभी तो मर्द रात-रात भर बाहर रह दारू पीता है।’

इससे पहले कि मैं कुछ कहती पारो ने अपनी आंखों के सुच्चे मोतियों को पैबन्द लगी मलमल की ओढ़नी में सहेज लिया था। और पल्लू से बंधे पांच के मुड़े-तुड़े नोट को मेरी तरफ़ बढ़ा कर बोली थी- “एक किताब मंगा देना।”

और इस तरह कभी सूरज की रौशनी और कभी चांद की चांदनी में बैठकर उसने एक-एक कर हज़ारों किताबें पढ़ डाली थीं। वह साधना के जिस द्वार पर जा पहुंची थी वहां कोई ऋषि-मुनि भी नहीं पहुंच सकता था। समंदर में गहरी डुबकी लगा जब वह लौटी तो उसके चेहरे पर सूरज का तेज था, चांद की शीतलता थी और वाणी पर सरस्वती का निवास था। एक मोटी रकम का चेक मुझे थमा एक बार फिर वह अन्तर्ध्यान हो गयी थी। तरह-तरह के मूंगा मोती तलाशने के लिए।

अख़बारों से पता चला कि वह एक नामी यूनिवर्सिटी में उच्च पद पर आसीन है। बधाई देने वालों की क़तार में उसके खून के रिश्ते भी शामिल थे। इस बार उसके चेहरे पर चट्टान सी कठोरता और होंठों पर विद्रूप मुस्कान थी। अकेले जीते-जीते और अपने परायों से जूझते-जूझते उसके स्वाभिमान ने अवसरवादियों, चाटूकारों को भून कर रख दिया था।

मुझसे मिलते वक़्त उसकी कठोरता मोम की तरह पिघलने लगती और वह अश्रुमय हो उठती। और मैं कुछ क़दम पीछे लौट उन आवाज़ों को सुनने लगी जिन्होंने मुझे हिलाकर रख दिया था।

‘हमारे खानदान पर कलंक है यह पारो।’ 

‘पैदा होते ही मर क्यों न गई।’

उसके मायके के आंगन में गूंजती ये आवाज़ें अब पारो के मन से टकराती होंगी तो उसे कैसा-कैसा लगता होगा।

पहले वाली पारो से अलग-थलग आज की पारो अब अदब क़ायदे वाली भीड़ से घिरी रहती है। सात समंदर पार से आते हज़ारों मन-पारवी उसके आंचल में विश्राम करते हैं।

सभी को सहलाते-सहलाते वह प्रौढ़ावस्था की दहलीज़ पर जा पहुंची है। दूर दराज़ बसे मित्र उसकी हथेलियों का स्पर्श पाने को बेचैन रहते हैं। पारो जब-जब भी इस दहलीज़ से पिछवाड़े का दरवाज़ा खोलती है तो उसे कभी सतरंगी फूल, नीला आकाश और गहरा समंदर दिखाई देता है और जब वह सामने वाला दरवाज़ा खोलती है तो गिलहरी, कबूतर, तोता-मैना और मेरे जैसी कई छायाएं दिखाई देती हैं। उसने कभी भी इन छायाओं को छूने की कोशिश नहीं की।

पारो की खरगोश-सी मुलायम हथेलियों को जब-जब भी मैं छूने की कोशिश करती हूं तो वह मद्धम गहरी दिलकश आवाज़ में मुझ से कहने लगती है- ‘सुनो! सम वन इज़ लिविंग इन माई हार्ट।’ मैं उसके ‘सम वन’ को भी जानती हूं और उसके दिल को भी। उसके स्पर्श मात्र से पारो की आंखों से मोतियों की माला झरने लगती है और इस आबदार माला को पहन पारो खुश हो जाती है, बहुत-बहुत खुश।

और मैं इसलिए खुश हूं क्योंकि पारो खुश है। 

 

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