वक़्त से डरो

-एस.मोहन

दो पुत्रों और एक पुत्री की मां बीरो को ज़िंदगी में कोई सुख नहीं मिला था। दोनों पुत्र अपना विवाह होते ही दूर-दूर जा बसे थे। मां और बहन किस हालत में हैं उन दोनों ने मुड़ कर भी नहीं देखा।

ऐसे में पड़ोस में रह रहे राय बाबू को व्यंग्य बाण छोड़ते हुए ज़रा भी दया नहीं आती थी। वह जब भी बीरो को देखता उसकी दयनीय हालत पर व्यंग्य करते हुए अपने बच्चों की प्रशंसा किये बिना न रहता। बीरो मौन बनी सब सुनती रहती। वह चाहकर भी न कह पाती- वक़्त का भय करो।

समय बीतते-बीतते बेटी के विवाह के बाद राय बाबू ने पुत्र की शादी भी कर दी, पुत्र मालदा में नौकरी करता था सो अपनी दुलहन को ले उड़न छू हो गया।

कुछ दिनों बाद राय बाबू अपनी पत्नी के साथ बेटे बहू के पास मालदा गये और सप्ताह भर में ही वापिस लौट आए। वहां से लौट कर राय बाबू काफ़ी दिनों तक अपने बेटे और बहू के गुणों के पुल बीरो को सुनाते रहे। बेटा श्रवण की मिसाल है तो बहू भी सास-ससुर की सेवा करने वाली है। ये सब संस्कारों की देन है, वग़ैरह-वग़ैरह। बीरो, राय बाबू की बातें सुनती रहती। बस यही तो कर सकती थी।

छः माह भी नहीं बीते थे जब राय बाबू बीरो से कह रहे थे, “विवाह के बाद मेरा बेटा बहुत बदल गया है, कई-कई दिन हो जाते हैं वह हमें फ़ोन तक नहीं करता। दिल से मजबूर कभी हम फ़ोन कर भी लें तो वे दोनों ढंग से बात तक नहीं करते। क्या करें? बुढ़ापे में हम दोनों बेसहारा से हो गए लगते हैं।”

सुनकर बीरो ने इतना ही कहा- ‘मैं तो इन सब के अंतिम छोर पर हूं…. पर तुम्हारी तो शुरुआत है। उन्हें संस्कारों की याद दिलाओ….।’

राय बाबू के पास उत्तर देने के लिए शब्द नहीं थे। आंखों में आंसू लिए वह वापिस मुड़ गए।

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