ब्रह्मा की कृति नारी

-सतबीर

नारी प्रकृति की अनुपम अद्वितीय रचना है और इसी प्रकृति द्वारा प्रदत्त अनेकों गुण इसमें विद्यमान हैं। कुछ गुण ऐसे हैं जो अधिकांश महिलाओं में पाए जाते हैं जैसे आंसू बहाना, बहुत डरपोक होना, ईर्ष्या करना, बहुत ज़्यादा बोलना, सौंदर्य प्रेमी होना। ये कुछ गुण हैं जो हमें हर एक नारी में आसानी से मिल जाते हैं।

महिलाओं में सौंदर्य व सिंगार रस की प्रधानता पाई जाती है अर्थात् इनमें पहला गुण यह है कि ये सिंगार व सौंदर्य प्रेमी होती हैं। हों भी क्यों न! नारी प्रकृति की खूबसूरत कलाकृति व अपार सौंदर्य की प्रतिमा है और इस हुस्न-ए-मलिका द्वारा अपने आप को हमेशा सुंदर, आकर्षक व जवान बनाए रखने का प्रयत्न करना बुरा नहीं है। हां ये बात और है कि कोई भी महिला अपनी सही उम्र बताने में संकोच करती है क्योंकि आज कल सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग के कारण उनकी त्वचा से उनकी उम्र का पता ही नहीं चलता और वो चाहती भी नहीं कि पता चले। अक्सर पुरुष वर्ग महिलाओं के सिंगार पर कई प्रकार की टिप्पणियां करता है, वहीं दूसरी ओर वो उनका दीवाना है। इसीलिए तो एक दीवाने ने कहा-

ओ लाली फूल सी मेहंदी लगा इन गोरे हाथों पे,

उतर आ ऐ घटा काजल लगा इन प्यारी आंखों में

अब नारी ये सब चीज़ें तो ला नहीं सकती लेकिन उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए उसे सिंगार प्रसाधन की सामग्री का सहारा लेना पड़ा तो फिर उससे इस बात पर खफ़ा होना कि ये सिंगार की ओर ही लगी रहती हैं, कहां तक उचित या न्यायसंगत है।

दूसरा गुण इनका बहुत ज़्यादा बोलना है। कहा जाता है कि जहां दो महिलाएं इकट्ठी बैठीं हों वहां शांति तो हो ही नहीं सकती और जहां चार महिलाएं जमा हों और वे चुप रहें तो यह दुनियां की सबसे बड़ी गप्प मानी जाएगी। पुरुषों को चाहिए कि वो कोई भी राज़ की बात महिलाओं को न बताएं क्योंकि इनके पेट में कोई भी बात नहीं पचती।

परन्तु नारी बहुत ही संवेदनशील, निष्ठावान व समर्पण की भावना से ओत-प्रोत होती है। वो बात जिसे छुपाने के लिए कहा गया हो नारी सफलता से छुपा जाती है। नारी पत्नी के रूप में अपने पति के अवगुणों को छुपाने का प्रयत्न करती है ताकि कोई उसके पति की अवहेलना न करे, उसका अपमान न करे। इस प्रकार नारी अपनी प्रकृति के अनुरूप न चल कर इसके विपरीत चल पड़ती है। ज़्यादा बोलने का गुण होते हुए भी वो कुछ बातें छुपा भी सकती है। ये एक नारी ही है जिसका दिल सागर से भी गहरा होता है जहां अगर कोई बात दफ़न कर दी जाए या कोई राज़ छुपाया जाए तो बाहर नहीं आ सकता। तो फिर ये कैसे आसानी से कहा जा सकता है कि वो कोई बात छुपा नहीं सकती जबकि वो दिल की बात होंठों पर नहीं लाती और दुःखों को छुपाती हुई हंसती-मुस्कुराती रहती है।

महिलाओं में तीसरा प्रमुख गुण आंसू बहाना है। ये बहुत भावुक होती हैं। ज़रा-सी तकलीफ़ में ही आंसू बहाना शुरू कर देती है और यही आंसू कई बार पत्थर दिल आदमी को भी पिघला देते हैं। अक्सर कहा जाता है कि ये महिलाओं का सबसे कारगर व अचूक हथियार है। इस द्वारा वो अपनी किसी भी बात को आसानी से मनवा लेती हैं। परन्तु देखा जाए तो हमेशा ऐसा नहीं होता। महिलाएं बहुत ही कोमल हृदय की मलिका होती हैं। इसलिए ज़रा सी बात की ठेस उनके दिल पर बहुत ज़ोर से लगती है और यही ठेस विषाद के कारण आंसू के रूप में बाहर आ जाती है। नारी को बहुत ही संवेदनशील माना गया है और इसमें सबसे नाज़ुक अंग हृदय है जो हल्की-सी चोट से भी आहत हो जाता है। जब कोई इसे अपशब्द बोलता है और वो पलट कर उसका जवाब देने में अपने आप को असमर्थ पाती है तो उसके मन में आक्रोश पनपते लगता है और यही आक्रोश आंसुओं की अविरल धारा के रूप में बह निकलता है।

महिलाओं में अगला विशेष गुण ईर्ष्या होती है। इन्हें अपने पास-पड़ोसियों से बहुत ईर्ष्या होती है। ख़ास कर जब वे उनके यहां किसी नई चीज़ को देखती हैं तो वे भी चाहती हैं कि उनके यहां भी वैसी ही चीज़ हो, यही नहीं उससे भी बढ़ कर हो। इनमें ईर्ष्यालु प्रवृत्ति यहीं ख़त्म नहीं होती। ये तो आपस में भी ईर्ष्या करती हैं जैसे सास को बहू से ईर्ष्या होती है, पत्नी को प्रेमिका से इत्यादि। लेकिन इस गुण को बढ़ावा देने में कहीं न कहीं पुरुषों का ही हाथ होता है। यदि पुरुष उसकी पसंद-नापसंद के अनुरूप उसे वित्त के अनुसार प्यार से चीज़ लाकर दें तो वो कभी ईर्ष्यालु नहीं बनेगी। रही बात एक महिला की दूसरी महिला से ईर्ष्या की तो इसमें भी पुरुष वर्ग ही ज़िम्मेदार है। अगर नारी पत्नी बन कर अपना सर्वस्व पुरुष पर न्योछावर करती है तो उसे प्रेमिका की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है। अगर पुरुष अपनी पत्नी को प्रेयसी, प्रेमिका के रूप में चाहे तो वो ये भी बन जाती है और समय आने पर पत्नी भी। जब पत्नी एक समय में दो रूपों में रूपांतरित होकर पति को चाहती है तो पति क्यों नहीं कर सकता? दरअसल बात ये है कि वो ईर्ष्यालु नहीं होती वो स्वत्व बोधक प्रवृत्ति की होती है। वो चाहती है कि जितना प्यार यह दूसरों को देती है वो भी उससे उतना ही प्यार करें, उसे चाहें व सराहें। लेकिन उनकी भावनाओं को समझने की बजाए उन्हें ईर्ष्यालु का ख़िताब दे दिया जाता है।

महिलाओं में चौथा गुण इनका डरपोक होना है। अक्सर महिलाएं छिपकली, चूहों आदि से डर जाती हैं या फिर अकेलेपन से या अंधेरे में जाने से डरती हैं। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि अपनी परछाई को वो ये समझ लेती हैं जैसे उनका कोई पीछा कर रहा है और इसी कारण उनका अपना साया ही उन्हें डरा जाता है। किन्तु हैरानीजनक तथ्य ये है कि कई बार तो वे इतने बुलन्द हौसले दिखा जाती है कि सागर की लहरें, नदी की धारा भी उसे रोक नहीं पाती। तभी तो वो अपने प्रियतम से मिलने के लिए रात के अंधेरे में नदी पार कर जाती है।

ये हैं नारी के प्रमुख गुण जो अधिकांशतः हर नारी में पाए जाते हैं और उसकी ज़िंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अब अगर उसके इन गुणों के कारण उसे बुरा कहा जाए या उसका मज़ाक उड़ाया जाए तो सरासर ग़लत होगा क्योंकि अगर प्रकृति पुरुष वर्ग को इन गुणों के लायक़ समझती तो फिर ये गुण उन्हें देने की बजाय ब्रह्मा की कृति- नारी को क्यों देती है। दरअसल प्रकृति ने नारी में ही इन गुणों को प्रदत्त करने में बेहतरी समझी तभी उसे ये प्रदान किए।

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