आलोचना

मास्टर साहब बारात से लौटे थे। अभी वे बिस्तर वग़ैरह रखकर बैठे ही थे कि उनकी पत्नी ने पूछा- “बारात में कैसी गुज़री?” 

“कोई ख़ास बात नहीं हुई। सब मज़े में बीत गया।” मास्टर साहब ने बताया, “हां, जिस गांव में बारात गई थी, वहां एक विचित्र बात देखने में आयी।”  

पत्नी की जिज्ञासा का पैमाना छलकने लगा। उसके आग्रह करने पर उन्होंने बताया, “हमारी बारात जिसके यहां गई थी, वो दो भाई हैं। आमने-सामने दोनों की हवेलियां खड़ी हैं। दूसरे भाई के यहां भी बारात आयी थी, लेकिन दोनों का इंतज़ाम एकदम भिन्न था, जिस भाई के यहां हमारी बारात गई थी, उसकी सारी व्यवस्था एकदम सादी थी जैसा कि देहात का सामान्य आदमी रखता है। इसके विपरीत दूसरे भाई के इंतज़ाम का क्या कहना! ठीक पुराने समय के ताल्लुकेदारों जैसा ठाठदार था। हमारी बारात जिसके यहां गई थी, उसकी बड़ी आलोचना हुई।” जिसे देखो, वह कह रहा था, “लगता है, बाबू साहब खोखले हो चुके हैं। सिर्फ़ दिखाने को खानदानी हवेली बची रह गई।” 

“पुराने रईस और ऐसी कंजूसी। बात ही आलोचना लायक़ थी।” पत्नी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “वैसे दूसरे भाई की दरियादिली की तो लोगों ने खूब प्रशंसा की होगी।” 

“छोड़ो जी, कौन किसकी प्रशंसा करता है? यही तो माजरा नहीं समझ में आता। सब यही कह रहे थे कि बाबू साहब ने अपनी रईसी की नुमाइश की है।” मास्टर साहब ने सपाट स्वर में जवाब दिया।

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