खुले मन से मनाएं दीपावली!

-राज कुमार सकोलिया

दीपावली ज्योति पर्व सदियों से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग अपने घरों में साफ़-सफ़ाई करके एक नया वातावरण पैदा करने का प्रयास करते हैं। दीपावली के दीपक दीवारों, गलियों और घरों को ही उजाला नहीं देते बल्कि मुरझाए हुए चेहरों और बुझे हुए दिलों को भी रौशनी देते हैं।

दीपावली पूर्ण अर्थों में एक अखिल भारतीय व पूर्ण सामाजिक पर्व है। इसमें अमीर, ग़रीब, जाति-बिरादरी, धर्म-सम्प्रदाय, भाषा, प्रांत अथवा क्षेत्रीय संस्कृति आदि का कोई भेदभाव नहीं है। इसीलिए इस पर्व को देश व्यापी और सर्व-सामाजिक कहा गया है लेकिन पिछले कुछ दशकों में लोगों का आर्थिक व विशेष रूप से सांस्कृतिक स्तर काफ़ी गिरा है, इसलिए इस पर्व के सौन्दर्य पक्ष में लोगों की रूचि भी विकृत हुई है और अब जो इस दिन के शुभ व कल्याणकारी प्रभाव होने चाहिए, वे नहीं हो पा रहे हैं।

संसार के विशाल इतिहास में भारतवर्ष के समान विपुल जनसंख्या वाला कोई भी बड़ा देश अल्पसंख्यक आक्रमणकारियों से पराजित होकर इतने ज़्यादा समय तक ग़ुलाम नहीं रहा। दीपावली के इस अवसर पर ज्ञान के असंख्य दीपक भी हमें जलाने चाहिए और निर्भीक होकर यह अनुसंधान करना चाहिए कि हमारी संस्कृति में, हमारे धार्मिक विश्वासों में, हमारे नैतिक आचार-व्यवहार, सामाजिक व्यवस्था आदि में कहां क्या दोष था जिसके कारण इतनी बहु-संख्या तथा विद्या, बल और बुद्धि में किसी से कम न होने पर भी हमारा देश अल्पसंख्यक हमलावरों से कई बार पराजित क्यों होता रहा? क्यों अनेक वर्षों तक भारत ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ा रहा?

ऐतिहासिक दोषों को समझकर तथा उनका निवारण करके हमें अपनी वर्तमान दुर्बलताओं को भी दूर करना चाहिए।

हमारे इतिहास की शिथिल और निश्चेष्ट गति के कारण हमारे सांस्कृतिक तत्व समय की धूल से आच्छादित हो गए हैं, तर्क और विवेक के कुशल हाथों से हमें उन्हें स्वच्छ करना चाहिए।

हमें प्राचीन परम्पराओं के प्रति विवेकपूर्ण दृष्टिकोण के साथ-साथ नवीन आकर्षणों के प्रति भी सतर्क रहना चाहिए और अंध-विश्वासों और रूढ़िवादी विचारों का त्याग करके दीपावली के इस पवित्र पर्व को मनाना चाहिए और इस दिन शराब, जुआ और लड़ाई-झगड़ों से दूर रहकर अपने घर-द्वार, जीवन समृद्धि को ध्यान में रखते हुए प्रेम-भाव और खुले मन से सबके साथ व्यवहार करना चाहिए।

दीपावली में आशा व उत्साह का जो मुख्य स्वर है, उसका महत्त्व आज की सारी अवनति व कलह-क्लेश के वातावरण में भी पूर्ववत् बना हुआ है। वास्तव में इस समय जो स्थिति हमारे देश में है, उसकी पृष्ठभूमि में दीपावली का महत्त्व पहले से बढ़ा ही प्रतीत होता है।

हमारे समाज में जहां अमीरी है, वहां ग़रीबी भी है, जहां प्यार हैं, वहां नफ़रत भी है, जहां उजाला है, वहां अन्धेरा भी है। इसलिए मन को छोटा करना बुद्धिमानी नहीं होती।

दीपावली के इस शुभ अवसर पर हमें अपने घरों में दीप जलाने के साथ-साथ रूठे हुओं को मनाने का प्रयास भी करना चाहिए। रोगियों, दुखियों और लाचार-बेबसों की मदद करनी चाहिए। अपने अवगुण त्याग कर अच्छे गुणों को ग्रहण करना चाहिए ताकि आने वाली अनेक दीपावलियों का हम हंसते-हंसते स्वागत कर सकें।

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